अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 71, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(10) अगस्त्य-संहिता अथ तृतीयोऽध्यायः पार्वत्युवाच सर्वज्ञ सर्वलोकेश सर्वदुःखनिषूदन। सर्वेषां सुगमः१ पन्थाः को मे वद दयानिधे।।1।। पार्वती बोलीं- हे सभी लोकों के स्वामी! सबके दुःखों का निवारण करने वाले हे दयानिधि! मोक्ष पाने के लिए ऐसा उपाय बतलायें, जो सबके लिए आसान हो। ईश्वर उवाच शृणुष्वावहिता देवि यदेतत्प्रतिपाद्यते। सर्वेश्वरः सर्वमयः सर्वभूतहिते रतः।।2।। सर्वेषामुपकाराय साकारोऽभून्निराकृतिः। हे देवि! मैं जो कह रहा हूँ उसे ध्यानपूर्वक सुनो। निराकार प्रभु जो सबके ईश्वर हैं, सभी रूपों में हैं तथा सभी प्राणियों की भलाई में लगे रहते हैं, सबके उपकार के लिए आकार ग्रहण कर अवतार लेते हैं। स भक्तवत्सलो लोके संसारीव व्यचेष्टत।।3।। भक्तानुकम्पया देवो दुःखं सुखमिवान्वभूत्। भक्तवत्सल भगवान् इस संसार में संसारी प्राणी के समान क्रियाएँ करते हैं और भक्त पर अनुकम्पा के कारण वे प्रभु दुःखों को सुख के समान अनुभव करते हैं। यदा यदा च भक्तानां भयमुत्पद्यते तदा।।4।। तत्तद्भक्तस्य चिन्तायै तत्तद्रूपो व्यजायत। जब जब भक्तों पर किसी प्रकार का भय उपस्थित होता है, तब उन उन भक्तों की चिन्ता करते हुए उसी रूप में अवतार लेते हैं। मत्स्यकूर्मवराहादिरूपेण परमार्थवित्२।।5।। तत्तत्कालेषु संभूय सर्वेषामप्युपाकरोत्। मत्स्य, कूर्म, वराह आदि रूप ग्रहण कर परोपकार करनेवाले वे महाप्रभु उन उन कालों में उत्पन्न होकर सबकी भलाई करते हैं।
- घ. निगमः। 2. घ. परमात्मदृक्।