अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 72, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें---------------- तृतीयोऽध्यायः ---------------- (11) साधूनामाश्रमस्थानां भक्तानां भक्तवत्सलः ।। 6 ।। उपकर्ता निराकारस्तदाकारेण जायते। साधुओं तथा चारों आश्रमों - ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ एवं संन्यास के भक्तों का उपकार करनेवाले वे भक्तवत्सल भगवान् तब आकार ग्रहण करते हैं। अजोऽयं जायतेऽनन्तः सान्तोऽभूद् भूतभावनः ।। 7 ।। कदाचिदवतीर्य्याऽयं मन्दभक्तानुकम्पया। ये अजन्मा हैं फिर भी जन्म लेते हैं, अनन्त होकर भी मरणशील होने की लीला करते हैं, प्राणियों की सृष्टि करते हैं, वे किसी समय हतभाग्य भक्तों पर अनुकम्पा करने के लिए अवतार लेते हैं। क्षीराब्धेः देवदेवेशो लक्ष्म्या नारायणो भुवि ।। 8 ।। सशेषः शंखचक्राभ्यां देवैर्ब्रह्मादिभिः सह। त्रेतायुगे दाशरथिर्भूत्वा नारायणो बभौ ।। 9 ।। क्षीरसागर में लक्ष्मी के साथ शयन करनेवाले वे देवेश शेषनाग, शंख, चक्र और ब्रह्मा आदि देवताओं के साथ त्रेता युग में इस संसार में दशरथ के पुत्र के रूप में अवतरित होकर विराजमान हुए।। शेषोऽभूल्लक्ष्मणो लक्ष्मीः शंखचक्रे च जानकी। जातौ भरतशत्रुघ्नौ देवाः सर्वेऽपि वानराः ।। 10 ।। शेषनाग के अवतार लक्ष्मण हुए, लक्ष्मी जनकनन्दिनी जानकी के रूप में अवतरित हुईं। शंख और चक्र के अवतार भरत और शत्रुघ्न हुए तथा सभी देवता वानर के रूप में अवतरित हुए। बभूवुरेवं सर्वेऽपि देवर्षिभयशान्तये। तत्र नारायणो देवो श्रीराम इति विश्रुतः ।। 11 सर्वलोकोपकाराय भूमौ सौर्येष्ववातरत्।¹ इस प्रकार सभी देवों और ऋषियों के भय को दूर करने के लिए भगवान् नारायण धराधाम पर अवतरित हुए, जिनमें सभी लोकों के उपकार के लिए सूर्यवंशियों के बीच श्रीराम के नाम से प्रख्यात होकर अवतरित हुए।
- घ. सोऽयमवातरत्।