अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 73, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(12) अगस्त्य-संहिता
तपः कुर्वन्ति तं केचिदपरोक्षं निरीक्षितुम् ।। पञ्चाग्निमध्ये ग्रीष्मेषु वर्षासु दिवि शेरते ।।12 कुछ लोग उस भगवान् श्रीराम के प्रत्यक्ष दर्शन के लिए तपस्या करते हैं। कुछ तपस्वी ग्रीष्मकाल में पाँच अग्नियों के बीच (चारों दिशाओं में अग्नि तथा ऊपर प्रचण्ड सूर्य- ये पाँच अग्नियाँ कहलाती है।) वर्षा ऋतु में खुले आकाश के नीचे तपस्या करते हैं। शिशिरेषु जलेष्वेवं तपः केचन तेपिरे। केचिद् भिक्षां पर्यटन्ति कृत्वा धारणपारणाम्¹ ।।13।। शोषयन्ति पुनर्देहमपरे कृच्छ्रचर्यया। इसी प्रकार जाड़े के दिनों में जल में खड़ा होकर कुछ लोग तपस्या करते हैं, कुछ लोग भिक्षाटन कर जो मिले उसी से भोजन करने का व्रत करते हुए तथा अन्य लोग न्यूनतम भोजन करने का व्रत करते हुए शरीर को सुखाते हैं। कालश्चान्द्रायणैरेव कैश्चित् पार्वति नीयते ।।14।। शाकमेवापरे देहमश्नन्तः शोषयन्त्यहो। हे पार्वती! कुछ लोग चान्द्रायण व्रत कर समय व्यतीत करते हैं तथा कुछ तो केवल साग खाते हुए अपने शरीर को सुखा डालते हैं। इह केचिद् वरारोहे नक्तायाचितभोजना ।।15।। चिन्तयन्ति चिरं कालं वनेष्वेकाकिनो² हृदि। हे पार्वती! कुछ लोग इस संसार में रात्रि में एक बार बिना माँगे जो मिल जाये वही खाकर, वन में अकेले रहकर चिरकाल तक अपने हृदय में भगवान् का चिन्तन करते रहते हैं। अनन्यमनसः शश्वद् गणयन्तोऽक्षमालया ।।16।। जपतो रामरामेति सुखामृतनिधौ मनः। प्रविलीयामतीभूय सुखं तिष्ठन्ति केचन ।।17।। एकाग्रभाव से रुद्राक्ष की माला पर गिनते हुए राम, राम का जप लगातार करते हुए सुख रूपी अमृत के भाण्डार में मन को एकाकार कर अमरत्व पाकर सुख से रहते हैं।
- घ. धारणपूरणे। 2. घ. बिल्ववनेष्वेकाकिनो।