अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 74, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः (13) मत्पश्चिमाभिमुख्येन केचित्प्रासादकोटरे। भावयन्ति चिरं देवि मम तत्प्राप्तये बुधाः।।18।। परिचर्यापराः केचित्प्रासादेष्वेव शेरते।। कुछ समझदार लोग मुझसे पश्चिम में अभिमुख बैठकर अर्थात् पूजा-स्थल के पश्चिम में पूर्वाभिमुख होकर अपने घर में हीं रहते हुए मेरे उस स्वरूप की प्राप्ति के लिए उनकी परिचर्या (सेवा) करते हुए घर में ही जीवन व्यतीत करते हैं। ¹मनुष्यस्य चिरं देवि भगवत्प्राप्तये बुधाः।।19।। मनुष्यमिव तं द्रष्टुं व्यवहर्तुं च बन्धुवत्। अध्यापनाय विद्यानां योद्धुमप्यपरे तपः।।20।। चक्रिरे वामनो भूत्वा केचिद्रोषेण तेपिरे²। क्षीराहाराः परे चाब्धेस्तीरेष्वेव निषेविरे।।21।। चञ्चलाक्ष्यथ केषांचित्तपः स्मर्तुं न शक्यते। किं करिष्यति देवोऽयं एवं दृष्ट्वा सुदारुणम्।।22।। तपस्तपस्विनामेतत्कृपयानुग्रहादिह । मानुषीभूय सर्वेषां भक्तानां भक्तवत्सलः।।23।। ध्यानमात्रेण देवेशि महापातकनाशकृत्। कृतेन स्मरणाभ्यां च हत्याकोटिनिवारणः।।24।। मनुष्यों की कालगणना के अनुसार चिरकाल तक भगवान् को पाने के लिए, उन्हें मानवाकार में देखने और सखा की तरह उनके साथ व्यवहार करने के लिए, उन्हें सभी विद्या पढ़ाने के लिए तथा उनके साथ युद्ध भी करने के लिए, कुछ कायर भगवान् विष्णु के शत्रु राक्षस बनकर आक्रोश के साथ तप करने लगे। वे केवल दूध पीकर सागर के उस पार ही सेवा करने लगे। हे चंचल आँखोंवाली पार्वती! ऐसे किसी ऐरे-गैरे की तपस्या तो स्मरण नहीं की जा सकती है, किन्तु ये देव भी क्या करेंगे? इस दारुण तपस्या को देखकर कृपापूर्वक अनुग्रह कर इस संसार में मनुष्य होकर वे सभी भक्तों के लिए भक्तवत्सल भगवान् बने। हे देवी! भगवान् तो केवल स्मरण करने से हीं महान् पापों का नाश करते हैं और कर्म और स्मरण दोनों करने से तो कोटि कोटि हत्याओं के भी महापाप का निवारण करते हैं। रामरामेति रामेति ये वदन्त्यपि पापिनः। पापकोटिसहस्रेभ्यस्तानुद्धरति नान्यथा।।25।।
- घ. दो चरण अनुपलब्ध। 2. घ. केचिद्रोषीषु तेपिरे।