भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

(14) अगस्त्य-संहिता ———————————————————————————————— जो पापी राम, राम, राम इस प्रकार उच्चारण करते हैं उन्हें भगवान् करोड़ों पापों से उद्धार करते हैं, यह निष्फल नहीं होता है। उग्रेण तपसा तेषां सोऽभूदेवं दयानिधिः। यतो वाचो निवर्त्तन्ते मनोभिः सह योगिनाम्।।26।। भागधेयेन सर्वेषां स प्रत्यक्षमजायत। अहोभाग्यातिरेकेण मनुष्योऽपि व्यवहरत्।।27।। तपो ददाति सौभाग्यं तपो विद्यां प्रयच्छति। तपसा दुर्लभं कञ्चिन्नास्ति भामिनि देहिनाम्।।28।। उनकी उग्र तपस्या से वे पृथ्वी पर इस प्रकार उत्पन्न हुए। योगियों के मन के साथ वाणी भी जहाँ जाकर लौट जाती है, वे परब्रह्म परमेश्वर सबके भाग्य से प्रत्यक्ष अवतरित हुए। भक्तों के अहोभाग्य में वृद्धि होने से मनुष्य ने भी उनके साथ देवता जैसा व्यवहार किया। हे देवी! पार्वती! तपस्या से सौभाग्य और विद्या की प्राप्ति होती है। मनुष्यों के लिए ऐसा कुछ भी नहीं है, जो तपस्या से नहीं मिले। अवाप्तसर्वकामोऽयं वाङ्मनोऽगोचरो विभुः। मनुष्य इव मानुष्यमाधाय भुवि मोदते।।29।। अहो कृपातिरेकेण सर्वत्र समुपैति वै। एतस्मादपि किं लाभादधिकं गजगामिनि।।30।। तपो धनं तपो भाग्यं तपः सर्वत्र सर्वदम्। अतस्तपस्विनां देवि दासत्वमपि दुर्लभम्।।31।। सभी प्रकार की कामनाओं को प्राप्त कर लेनेवाले ये प्रभु, जो वाणी और मन से भी अप्रत्यक्ष हैं, वे मानव का रूप धारण कर मनुष्य के समान इस संसार में प्रसन्न हैं। अहोभाग्य है कि अत्यधिक कृपा करने के कारण वे सभी जगह पहुँच जाते हैं। हे गजगामिनी पार्वती! इससे अधिक लाभ और क्या हो सकता है? अतः हे देवि! तपस्या धन है, तप ही भाग्य है, तप से ही हर स्थानों पर सब कुछ प्राप्त हो जाते हैं। अतः हे देवी पार्वती! जो तपस्या करते हैं, उनके लिए दासता दुर्लभ है; क्योंकि तपस्वी देवस्वरूप हो जाते हैं। इत्यगस्त्यसंहितायां रामावतारोपक्रमम् नाम तृतीयोऽध्यायः।।


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