भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 337 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 76

चतुर्थोऽध्यायः (15) अथ चतुर्थोऽध्यायः पार्वत्युवाच योगीन्द्रं वन्द्यचरणद्वन्द्वानन्दैकलक्षण। कथमेनमुपास्त्यैव मुक्तिं सर्वेऽपि भेजिरे।।1।। तदेतद् ब्रूहि देवेश यद्यस्ति करुणा मयि। पार्वती बोलीं- हे देवेश! आपके चरणकमल की वन्दना सभी करते हैं और आप एकमात्र आनन्दस्वरूप हैं। यदि मेरे ऊपर करुणा हो, तो कृपा कर यह बतलाइये कि योगियों के राजा श्रीराम की कैसी उपासना कर सब लोगों ने मुक्ति पायी थी। ईश्वर उवाच हैरण्यगर्भसिद्धान्तरहस्यमनघे शृणु।।2।। यज्ज्ञात्वा मुच्यते मोहाद् दौर्भाग्यव्याधिसाध्वसात्। भद्रे तदभिधास्यामि तत्सारग्राहिणी भव।।3।। भगवान् शिव ने कहा- हे निष्कलुष देवि! हिरण्यगर्भ भगवान् विष्णु का जो सिद्धान्त है, उसका रहस्य सुनो। इसे जानकर दुर्भाग्य और व्याधियों को मिटाते हुए लोग संसार के मोह का भी त्याग कर देते हैं। हे भद्रे! मैं वह रहस्य बतला रहा हूँ; उसके मूलतत्त्व को ग्रहण करो। पूर्वं ब्रह्मा तपस्तेपे कल्पकोटिशतत्रयम्। मुनीन्द्रैर्बहुभिः सार्द्धं दुर्द्धर्षानशनव्रतम्।।4।। प्राचीन काल में ब्रह्मा ने तीन सौ करोड़ वर्ष तक निराहार रहकर बहुत सारे मुनिश्रेष्ठ के साथ तपस्या की। पुरस्कृत्याग्निमध्यस्थस्तदाराधनतत्परः । आदरातिशयेनास्य नैरन्तर्येर्चनादिना।।5।। अग्नि के मध्य में रहकर और विष्णु को समक्ष में रखकर आदरपूर्वक लगातार पूजा-अर्चना करते हुए वे आराधना करते रहे। चिराय देवदेवोऽपि प्रत्यक्षमभवत्तदा। किञ्च पुण्यातिरेकेण सर्वेषां तस्य च प्रिये।।6।।