अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 77, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(16) अगस्त्य-संहिता बहुत दिनों के बाद पुण्य की वृद्धि के कारण ब्रह्मा तथा अन्य सभी मुनियों के सामने देवों के स्वामी भगवान् विष्णु प्रकट हुए। नवनीलाम्बुदश्यामः सर्वाभरणभूषितः। शङ्खचक्रगदापद्मजटामुकुटशोभितः ।।7।। भगवान् नवीन एवं नीले मेघ के समान श्यामल वर्ण के थे, उनके शरीर पर सभी गहने शोभित हो रहे थे तथा शंख, चक्र गदा, कमल, जटा और मुकुट से वे सुशोभित थे। किरीटहारकेयूररत्नकुण्डलमण्डितः । संतप्तकाञ्चनप्रख्यपीतवासोयुगावृतः ।।8।। मुकुट, हार, बाजूबन्द, रत्न के कुण्डल से वे विभूषित थे और तपे हुए सोने के समान पीले रंग के जोड़े वस्त्र उनके शरीर पर थे। तेजोमयः सोमसूर्य्यविद्युदुल्काग्निकोटयः । मिलित्वाविर्भवन्तीव प्रादुरासीत्पुरः प्रभुः ।।9।। भगवान् इस प्रकार सामने प्रकट हुए जैसे करोड़ों चन्द्रमा, सूर्य, बिजली, उल्का और अग्नि एक साथ मिलकर प्रकट हुए हों। स्तम्भीभूय तदा ब्रह्मा क्षणं तस्थौ विमोहितः । तुष्टाव मुनिभिः सार्द्धं प्रणम्य च पुनः पुनः।। 10।। कुछ देर तक तो ब्रह्मा घबराकर खम्भे की तरह ठिठक गये। पुनः मुनियों के साथ बार बार उन्हें प्रणाम कर स्तुति करने लगे। धन्योऽस्मि कृतकृत्योस्मि कृतार्थोस्मीह बन्धुभिः। प्रसन्नोऽसीह भगवन् जीवितं सफलं मम ।।11।। हे भगवन्! आज मैं अपने बन्धुओं के साथ धन्य हो गया; आज मेरे सभी कार्य सम्पन्न हो गये। हे भगवन्! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं, इससे मेरा जीवन सफल हो गया। कथं स्तोष्यामि देवेश भगवन्निति चिन्तयन्। ऋग्यजुःसामवेदैश्च शास्त्रैर्बहुभिरादरात् ।।12।। साङ्गैर्मन्वादिभिर्धर्मप्रतिपादनतत्परैः । तुष्टावेश्वरमभ्यर्च्य सन्तुष्टो मुनिभिः सह।।13।। Rarest Archiver