अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 78, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः (17) 'हे देवेश! मैं कैसे आपकी स्तुति करूँगा' यह सोचते हुए मुनियों के साथ सन्तुष्ट होकर ब्रह्मा ने वेदांग सहित ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अन्य अनेक शास्त्र, मनुस्मृति आदि धर्म को बखानने वाले शास्त्रों से भगवान् की अर्चना कर उनकी स्तुति की- त्वमेव विश्वतश्चक्षुर्विश्वतोमुख उच्यसे। विश्वतोबाहुरेकः सन् विश्वतः स्यात्तथा परः।।14।। जनयन् भूर्भुवर्लोकौ स्वर्लोकं सर्वशासकः। अक्षिभ्यामपि बाहुभ्यां कर्णाभ्यां भुवनत्रयम् ।।15।। पद्भ्यां च नासिकाभ्यां¹ च सर्वं सर्वत्र पश्यसि। समाधत्से शृणोष्येतत् सर्वं गच्छसि सर्वकृत्।।16।। जिघ्रस्येवं न ते किञ्चिदविज्ञातं प्रभोस्त्विह। ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्वमेव ननु केशवः।।17।। सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। पृथिव्यप्तेजसां रूपं मरुदाकाशयोरपि।।18।। कार्यं कर्ता कृतिर्देव कारणं केवलं परम्। अणोरणीयान् महतो महीयान् मध्यतः स्वयंम्।।19।। मध्योऽसि निर्विकल्पोऽसि कस्त्वं देवावगच्छति। हे भगवन्! आपके नेत्र सभी दिशाओं में हैं; आपके मुख भी सभी दिशाओं में हैं तथा आपकी बाहें भी सभी ओर फैली हुई हैं, फिर भी आप संसार से परे हैं। आप दोनों आँखों, बाहुओं और कानों, पैरों और नासिकाओं से भूलोक, भुवर्लोक, और स्वर्गलोक इन तीनों को उत्पन्न कर सब पर शासन करते हैं, सभी जगहों पर सब कुछ देखते-सूँघते हैं; सब कुछ सुनकर उनका समाधान करते हैं और सारे कार्य करते हैं। हे प्रभो! ऐसा कुछ भी नहीं, जिसे आप जानते न हों। आप ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं तथा केशव भी आप ही हैं। पुरुष रूप में आपके हजारों शिर हैं, हजारों नेत्र हैं तथा हजारों पैर हैं। हे देव!, पृथ्वी, जल, अग्नि के तथा मरुत् और आकाश स्वरूप आप हैं। आप ही करने योग्य, करनेवाले, किये गये पदार्थ तथा क्रिया के परम साधन भी आप ही हैं। हे देव! आप अणु से भी सूक्ष्म और महत् से भी महान् हैं और उनके बीच में भी आप ही हैं; आपका विकल्प कोई नहीं है; आपको भला कौन जान सकता है?'
- घ. पादाभ्यां नासिकाभ्यां च।