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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

द्वितीयोऽध्यायः (7) सत्त्व-स्वरूप, ज्ञान-स्वरूप, अनन्त, अनादि, आनन्दमय तथा अजन्मा कहे जाते हैं तथा केवल स्मरण करने से जन्म आदि के कारण उत्पन्न कष्ट को दूर करते हैं। उनमें जो ध्यान लगाते हैं उनकी बुद्धि इस संसार में पुनर्जन्म को काटनेवाली कैंची बन जाती है। नियमेनैव वर्णानां स्वाश्रमोक्तेन स प्रभुः ।। 7 ।। ध्येयः संसारनाशाय १ न चैवावर्तते पुनः । सभी वर्णों के अपने अपने आश्रमों के अनुरूप बने नियमों के अनुरूप ध्यान किये गये वे प्रभु पुनः संसार में जन्मग्रहण के नाशक हैं। वह भक्त इस संसार में पुनः उत्पन्न नहीं होता। स्वाश्रमोक्तं परित्यज्य य आत्मानमुपासते ।। 8 ।। तद्रूपेण ततो देवि मुच्यते भवबन्धनात्। हे देवि! अपने आश्रम के लिए कथित विधान को छोड़कर अर्थात् संन्यास लेकर जो आत्मा की उपासना करते हैं, वे उसी रूप में इस संसार के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। श्रुतिस्मृतिपुराणेषु यो यो नियम उच्यते ।। 9 ।। यस्य यस्याश्रमन्वायो न मोक्तव्यो मुमुक्षुभिः । अतो नियममादृत्य कुर्याद् ध्यानमनन्यधीः ।। 10 ।। वेद, स्मृति एवं पुराणों में जो जो नियम बतलाये गये हैं तथा जिसका जो आश्रम है, उस आश्रम के अनुरूप जो नियम बनाये हैं, मोक्षार्थियों को उन नियमों का त्याग नहीं करना चाहिए। नियमों के अनुसार एकचित्त होकर प्रभु का ध्यान करें। एतच्चराचरं विश्वं स्वप्नप्रत्ययवत्सुधीः । मिथ्यादृग्व्यतिरिक्तं यद् दृश्यतेद्धा तथा प्रिये ।। 11 ।। दृग्रूपेणात्मना ज्ञानं सत्यानन्दात्मनः स्वयम्। एकाकी जितचित्तात्मा चिन्तयेत् तदनन्यधीः ।। 12 ।। सोऽहमित्यात्मनात्मानं त्वाज्ञानपरिकल्पितम्। एतत् स्वव्यतिरिक्तं यद्यतः स्वेनैव कल्पते ।। 13 ।। न पारमार्थिकं देवि यद्यद् बालो हि कल्पयेत् ।। बालाज्ञयोर्वा को भेदः कल्पेते न तु चक्षुषा ।। 14 ।।

  1. क. संसृतिनाशाय।

(8) अगस्त्य-संहिता विद्वान् इस चराचर जगत् को स्वप्न के ज्ञान के समान मानते हैं। यह संसार दिखाई पड़ता है, अतः मिथ्या है। कुछलोग इसे मिथ्यादृष्टि से भिन्न अर्थात् वास्तविक मानते हैं। आत्मदृष्टि से ज्ञान को सत्य रूप और आनन्द स्वरूप समझते हुए स्वयं साधक एकाकी होकर चित्त और आत्मा को जीतकर उस ज्ञानमय ब्रह्म का चिन्तन करे कि 'वह ब्रह्म मैं हूँ '(सोऽहम्)। किन्तु मनुष्य अपनी अज्ञानता के कारण इस संसार को स्वप्न से भिन्न वास्तविक मानता है और उसी के अनुसार चलता है। बच्चे जो जो कल्पना करते हैं, वे परम तत्त्व (वास्तविक) नहीं हैं, तब बच्चे और अज्ञानियों में भेद भी कहाँ है? वे दोनों तत्त्वचक्षु से अवधारण नहीं करते हैं। ¹अयं पन्थाः पुराणः स्यादनुप्राप्तः पुरातनः। अध्यात्मविद्भिरर्चितो ज्ञापितः स परः स्मृतः।।15।। ब्रह्मज्ञान का यह प्राचीन मार्ग है, जो परम्परा से परम्परा के द्वारा प्राप्त है। अध्यात्मज्ञानियों ने देवता की अर्चना के द्वारा इसे लोगों को समझाया है, अतः वह परम तत्त्व है। आब्रह्मशुद्धवंश्यानां मातापित्रोः कुले च ये। स्त्रियो वाऽव्यभिचारिण्यः पुरुषाश्चैव धार्मिकाः।।16।। जो ब्रह्म से लेकर शुद्ध वंशवाले कुल में उत्पन्न माता-पिता से उत्पन्न पुरुष हैं तथा पतिव्रता स्त्रियाँ हैं, वे धार्मिक हैं। यज्ञाश्च वेदाध्ययनमेधेते प्रतिपूरुषम्। पूज्यन्तेऽतिथयो यत्र गुरुशिष्यपरम्परा।।17।। स्वप्नेऽपि चलनं नैव² स्त्रीष्वपि ब्रह्मचारिषु। नियमोऽप्याश्रमस्थेषु कदाचिदपि भामिनि³।।18।। यज्ञ और वेद का अध्ययन ये दोनों प्रति व्यक्ति में वृद्धि प्राप्त करते हैं। जहाँ गुरु-शिष्य की परम्परा और अतिथियों की पूजा होती है। उन आश्रमों में स्थित स्त्रियों और ब्रह्मचारियों के नियमों में स्वप्न में भी विचलन नहीं होता।

  1. क. यहाँ से छह चरण अनुपलब्ध। 2. घ. स्वल्पोऽपि स्खलते नैव। 3. घ. कदाचिन्न विमुच्यते।

द्वितीयोऽध्यायः (9) तत्तत्कालेषु¹ दानं हि तदर्थिभ्यः प्रदीयते। येषु वंशेषु सर्वेषां तेषामेव प्रकाशते।।19।। ब्रह्म ब्रह्मविदा देवि गुरुशिष्योक्तिशिक्षया। हे देवि! गुरु और शिष्य द्वारा किए गये उपदेश से जिन वंशों में विहित अवसरों पर प्रार्थियों को दान किए जाते हैं उन वंशों के ब्रह्मज्ञानी के द्वारा ब्रह्म प्रकाशित होते हैं। अयमेव परं ब्रह्म नान्यत्किञ्चिन्न विद्यते।।20।। इदमेव परं ब्रह्म ततोऽन्यं नास्ति किंचन। तदेतदखिलं ब्रह्म सत्यं सत्यं प्रकाशते।।21।। एक परम ब्रह्म स्वयं है, इससे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, यह समग्र ब्रह्माण्ड सत्य स्वरूप है, जो निश्चय ही प्रकाशवान् है। जन्मकोटिसहस्रेषु प्रक्षीणाशेषदुष्कृतैः। कैश्चिदेव नियम्यासूनपरोक्षं निरीक्ष्यते।।22।। सुखामृतरसास्वादसत्यज्ञानैकरूपता । भागाश्रयेण विदुषा स्वयमेवानुभूयते।।23।। अहो पुण्यमहो धर्म्यं नातः परतरं क्वचित्। अकृत्येषु च सर्वेषु प्रायश्चित्तमिदं परम्।।24।। सैकड़ो करोड़ जन्मों की तपस्या से जिन्होंने अपने सभी दुष्कर्म के फलों का नाश कर लिया है, वह कोई कोई प्राणवायु को नियंत्रित कर प्रत्यक्ष रूप में ब्रह्म का साक्षात्कार करते हैं। सुख, अमृत रस का आस्वादन और वास्तविक ज्ञान इन तीनों भेदों को एक रूप में अद्वैत की भावना का आश्रय लेकर विद्वान् स्वयं अनुभव करते हैं। अहो! यह पुण्य है, यह धर्म का फल है, इससे भिन्न कुछ भी नहीं सभी दुष्कर्मों में यही परम प्रायश्चित्त है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमेश्वरस्वरूपाख्यानम् नाम द्वितीयोऽध्यायः।

  1. घ. स्व स्वकालेषु।

(10) अगस्त्य-संहिता अथ तृतीयोऽध्यायः पार्वत्युवाच सर्वज्ञ सर्वलोकेश सर्वदुःखनिषूदन। सर्वेषां सुगमः१ पन्थाः को मे वद दयानिधे।।1।। पार्वती बोलीं- हे सभी लोकों के स्वामी! सबके दुःखों का निवारण करने वाले हे दयानिधि! मोक्ष पाने के लिए ऐसा उपाय बतलायें, जो सबके लिए आसान हो। ईश्वर उवाच शृणुष्वावहिता देवि यदेतत्प्रतिपाद्यते। सर्वेश्वरः सर्वमयः सर्वभूतहिते रतः।।2।। सर्वेषामुपकाराय साकारोऽभून्निराकृतिः। हे देवि! मैं जो कह रहा हूँ उसे ध्यानपूर्वक सुनो। निराकार प्रभु जो सबके ईश्वर हैं, सभी रूपों में हैं तथा सभी प्राणियों की भलाई में लगे रहते हैं, सबके उपकार के लिए आकार ग्रहण कर अवतार लेते हैं। स भक्तवत्सलो लोके संसारीव व्यचेष्टत।।3।। भक्तानुकम्पया देवो दुःखं सुखमिवान्वभूत्। भक्तवत्सल भगवान् इस संसार में संसारी प्राणी के समान क्रियाएँ करते हैं और भक्त पर अनुकम्पा के कारण वे प्रभु दुःखों को सुख के समान अनुभव करते हैं। यदा यदा च भक्तानां भयमुत्पद्यते तदा।।4।। तत्तद्भक्तस्य चिन्तायै तत्तद्रूपो व्यजायत। जब जब भक्तों पर किसी प्रकार का भय उपस्थित होता है, तब उन उन भक्तों की चिन्ता करते हुए उसी रूप में अवतार लेते हैं। मत्स्यकूर्मवराहादिरूपेण परमार्थवित्२।।5।। तत्तत्कालेषु संभूय सर्वेषामप्युपाकरोत्। मत्स्य, कूर्म, वराह आदि रूप ग्रहण कर परोपकार करनेवाले वे महाप्रभु उन उन कालों में उत्पन्न होकर सबकी भलाई करते हैं।

  1. घ. निगमः। 2. घ. परमात्मदृक्।

---------------- तृतीयोऽध्यायः ---------------- (11) साधूनामाश्रमस्थानां भक्तानां भक्तवत्सलः ।। 6 ।। उपकर्ता निराकारस्तदाकारेण जायते। साधुओं तथा चारों आश्रमों - ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ एवं संन्यास के भक्तों का उपकार करनेवाले वे भक्तवत्सल भगवान् तब आकार ग्रहण करते हैं। अजोऽयं जायतेऽनन्तः सान्तोऽभूद् भूतभावनः ।। 7 ।। कदाचिदवतीर्य्याऽयं मन्दभक्तानुकम्पया। ये अजन्मा हैं फिर भी जन्म लेते हैं, अनन्त होकर भी मरणशील होने की लीला करते हैं, प्राणियों की सृष्टि करते हैं, वे किसी समय हतभाग्य भक्तों पर अनुकम्पा करने के लिए अवतार लेते हैं। क्षीराब्धेः देवदेवेशो लक्ष्म्या नारायणो भुवि ।। 8 ।। सशेषः शंखचक्राभ्यां देवैर्ब्रह्मादिभिः सह। त्रेतायुगे दाशरथिर्भूत्वा नारायणो बभौ ।। 9 ।। क्षीरसागर में लक्ष्मी के साथ शयन करनेवाले वे देवेश शेषनाग, शंख, चक्र और ब्रह्मा आदि देवताओं के साथ त्रेता युग में इस संसार में दशरथ के पुत्र के रूप में अवतरित होकर विराजमान हुए।। शेषोऽभूल्लक्ष्मणो लक्ष्मीः शंखचक्रे च जानकी। जातौ भरतशत्रुघ्नौ देवाः सर्वेऽपि वानराः ।। 10 ।। शेषनाग के अवतार लक्ष्मण हुए, लक्ष्मी जनकनन्दिनी जानकी के रूप में अवतरित हुईं। शंख और चक्र के अवतार भरत और शत्रुघ्न हुए तथा सभी देवता वानर के रूप में अवतरित हुए। बभूवुरेवं सर्वेऽपि देवर्षिभयशान्तये। तत्र नारायणो देवो श्रीराम इति विश्रुतः ।। 11 सर्वलोकोपकाराय भूमौ सौर्येष्ववातरत्।¹ इस प्रकार सभी देवों और ऋषियों के भय को दूर करने के लिए भगवान् नारायण धराधाम पर अवतरित हुए, जिनमें सभी लोकों के उपकार के लिए सूर्यवंशियों के बीच श्रीराम के नाम से प्रख्यात होकर अवतरित हुए।


  1. घ. सोऽयमवातरत्।

(12) अगस्त्य-संहिता

तपः कुर्वन्ति तं केचिदपरोक्षं निरीक्षितुम् ।। पञ्चाग्निमध्ये ग्रीष्मेषु वर्षासु दिवि शेरते ।।12 कुछ लोग उस भगवान् श्रीराम के प्रत्यक्ष दर्शन के लिए तपस्या करते हैं। कुछ तपस्वी ग्रीष्मकाल में पाँच अग्नियों के बीच (चारों दिशाओं में अग्नि तथा ऊपर प्रचण्ड सूर्य- ये पाँच अग्नियाँ कहलाती है।) वर्षा ऋतु में खुले आकाश के नीचे तपस्या करते हैं। शिशिरेषु जलेष्वेवं तपः केचन तेपिरे। केचिद् भिक्षां पर्यटन्ति कृत्वा धारणपारणाम्¹ ।।13।। शोषयन्ति पुनर्देहमपरे कृच्छ्रचर्यया। इसी प्रकार जाड़े के दिनों में जल में खड़ा होकर कुछ लोग तपस्या करते हैं, कुछ लोग भिक्षाटन कर जो मिले उसी से भोजन करने का व्रत करते हुए तथा अन्य लोग न्यूनतम भोजन करने का व्रत करते हुए शरीर को सुखाते हैं। कालश्चान्द्रायणैरेव कैश्चित् पार्वति नीयते ।।14।। शाकमेवापरे देहमश्नन्तः शोषयन्त्यहो। हे पार्वती! कुछ लोग चान्द्रायण व्रत कर समय व्यतीत करते हैं तथा कुछ तो केवल साग खाते हुए अपने शरीर को सुखा डालते हैं। इह केचिद् वरारोहे नक्तायाचितभोजना ।।15।। चिन्तयन्ति चिरं कालं वनेष्वेकाकिनो² हृदि। हे पार्वती! कुछ लोग इस संसार में रात्रि में एक बार बिना माँगे जो मिल जाये वही खाकर, वन में अकेले रहकर चिरकाल तक अपने हृदय में भगवान् का चिन्तन करते रहते हैं। अनन्यमनसः शश्वद् गणयन्तोऽक्षमालया ।।16।। जपतो रामरामेति सुखामृतनिधौ मनः। प्रविलीयामतीभूय सुखं तिष्ठन्ति केचन ।।17।। एकाग्रभाव से रुद्राक्ष की माला पर गिनते हुए राम, राम का जप लगातार करते हुए सुख रूपी अमृत के भाण्डार में मन को एकाकार कर अमरत्व पाकर सुख से रहते हैं।


  1. घ. धारणपूरणे। 2. घ. बिल्ववनेष्वेकाकिनो।

तृतीयोऽध्यायः (13) मत्पश्चिमाभिमुख्येन केचित्प्रासादकोटरे। भावयन्ति चिरं देवि मम तत्प्राप्तये बुधाः।।18।। परिचर्यापराः केचित्प्रासादेष्वेव शेरते।। कुछ समझदार लोग मुझसे पश्चिम में अभिमुख बैठकर अर्थात् पूजा-स्थल के पश्चिम में पूर्वाभिमुख होकर अपने घर में हीं रहते हुए मेरे उस स्वरूप की प्राप्ति के लिए उनकी परिचर्या (सेवा) करते हुए घर में ही जीवन व्यतीत करते हैं। ¹मनुष्यस्य चिरं देवि भगवत्प्राप्तये बुधाः।।19।। मनुष्यमिव तं द्रष्टुं व्यवहर्तुं च बन्धुवत्। अध्यापनाय विद्यानां योद्धुमप्यपरे तपः।।20।। चक्रिरे वामनो भूत्वा केचिद्रोषेण तेपिरे²। क्षीराहाराः परे चाब्धेस्तीरेष्वेव निषेविरे।।21।। चञ्चलाक्ष्यथ केषांचित्तपः स्मर्तुं न शक्यते। किं करिष्यति देवोऽयं एवं दृष्ट्वा सुदारुणम्।।22।। तपस्तपस्विनामेतत्कृपयानुग्रहादिह । मानुषीभूय सर्वेषां भक्तानां भक्तवत्सलः।।23।। ध्यानमात्रेण देवेशि महापातकनाशकृत्। कृतेन स्मरणाभ्यां च हत्याकोटिनिवारणः।।24।। मनुष्यों की कालगणना के अनुसार चिरकाल तक भगवान् को पाने के लिए, उन्हें मानवाकार में देखने और सखा की तरह उनके साथ व्यवहार करने के लिए, उन्हें सभी विद्या पढ़ाने के लिए तथा उनके साथ युद्ध भी करने के लिए, कुछ कायर भगवान् विष्णु के शत्रु राक्षस बनकर आक्रोश के साथ तप करने लगे। वे केवल दूध पीकर सागर के उस पार ही सेवा करने लगे। हे चंचल आँखोंवाली पार्वती! ऐसे किसी ऐरे-गैरे की तपस्या तो स्मरण नहीं की जा सकती है, किन्तु ये देव भी क्या करेंगे? इस दारुण तपस्या को देखकर कृपापूर्वक अनुग्रह कर इस संसार में मनुष्य होकर वे सभी भक्तों के लिए भक्तवत्सल भगवान् बने। हे देवी! भगवान् तो केवल स्मरण करने से हीं महान् पापों का नाश करते हैं और कर्म और स्मरण दोनों करने से तो कोटि कोटि हत्याओं के भी महापाप का निवारण करते हैं। रामरामेति रामेति ये वदन्त्यपि पापिनः। पापकोटिसहस्रेभ्यस्तानुद्धरति नान्यथा।।25।।

  1. घ. दो चरण अनुपलब्ध। 2. घ. केचिद्रोषीषु तेपिरे।

(14) अगस्त्य-संहिता ———————————————————————————————— जो पापी राम, राम, राम इस प्रकार उच्चारण करते हैं उन्हें भगवान् करोड़ों पापों से उद्धार करते हैं, यह निष्फल नहीं होता है। उग्रेण तपसा तेषां सोऽभूदेवं दयानिधिः। यतो वाचो निवर्त्तन्ते मनोभिः सह योगिनाम्।।26।। भागधेयेन सर्वेषां स प्रत्यक्षमजायत। अहोभाग्यातिरेकेण मनुष्योऽपि व्यवहरत्।।27।। तपो ददाति सौभाग्यं तपो विद्यां प्रयच्छति। तपसा दुर्लभं कञ्चिन्नास्ति भामिनि देहिनाम्।।28।। उनकी उग्र तपस्या से वे पृथ्वी पर इस प्रकार उत्पन्न हुए। योगियों के मन के साथ वाणी भी जहाँ जाकर लौट जाती है, वे परब्रह्म परमेश्वर सबके भाग्य से प्रत्यक्ष अवतरित हुए। भक्तों के अहोभाग्य में वृद्धि होने से मनुष्य ने भी उनके साथ देवता जैसा व्यवहार किया। हे देवी! पार्वती! तपस्या से सौभाग्य और विद्या की प्राप्ति होती है। मनुष्यों के लिए ऐसा कुछ भी नहीं है, जो तपस्या से नहीं मिले। अवाप्तसर्वकामोऽयं वाङ्मनोऽगोचरो विभुः। मनुष्य इव मानुष्यमाधाय भुवि मोदते।।29।। अहो कृपातिरेकेण सर्वत्र समुपैति वै। एतस्मादपि किं लाभादधिकं गजगामिनि।।30।। तपो धनं तपो भाग्यं तपः सर्वत्र सर्वदम्। अतस्तपस्विनां देवि दासत्वमपि दुर्लभम्।।31।। सभी प्रकार की कामनाओं को प्राप्त कर लेनेवाले ये प्रभु, जो वाणी और मन से भी अप्रत्यक्ष हैं, वे मानव का रूप धारण कर मनुष्य के समान इस संसार में प्रसन्न हैं। अहोभाग्य है कि अत्यधिक कृपा करने के कारण वे सभी जगह पहुँच जाते हैं। हे गजगामिनी पार्वती! इससे अधिक लाभ और क्या हो सकता है? अतः हे देवि! तपस्या धन है, तप ही भाग्य है, तप से ही हर स्थानों पर सब कुछ प्राप्त हो जाते हैं। अतः हे देवी पार्वती! जो तपस्या करते हैं, उनके लिए दासता दुर्लभ है; क्योंकि तपस्वी देवस्वरूप हो जाते हैं। इत्यगस्त्यसंहितायां रामावतारोपक्रमम् नाम तृतीयोऽध्यायः।।


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चतुर्थोऽध्यायः (15) अथ चतुर्थोऽध्यायः पार्वत्युवाच योगीन्द्रं वन्द्यचरणद्वन्द्वानन्दैकलक्षण। कथमेनमुपास्त्यैव मुक्तिं सर्वेऽपि भेजिरे।।1।। तदेतद् ब्रूहि देवेश यद्यस्ति करुणा मयि। पार्वती बोलीं- हे देवेश! आपके चरणकमल की वन्दना सभी करते हैं और आप एकमात्र आनन्दस्वरूप हैं। यदि मेरे ऊपर करुणा हो, तो कृपा कर यह बतलाइये कि योगियों के राजा श्रीराम की कैसी उपासना कर सब लोगों ने मुक्ति पायी थी। ईश्वर उवाच हैरण्यगर्भसिद्धान्तरहस्यमनघे शृणु।।2।। यज्ज्ञात्वा मुच्यते मोहाद् दौर्भाग्यव्याधिसाध्वसात्। भद्रे तदभिधास्यामि तत्सारग्राहिणी भव।।3।। भगवान् शिव ने कहा- हे निष्कलुष देवि! हिरण्यगर्भ भगवान् विष्णु का जो सिद्धान्त है, उसका रहस्य सुनो। इसे जानकर दुर्भाग्य और व्याधियों को मिटाते हुए लोग संसार के मोह का भी त्याग कर देते हैं। हे भद्रे! मैं वह रहस्य बतला रहा हूँ; उसके मूलतत्त्व को ग्रहण करो। पूर्वं ब्रह्मा तपस्तेपे कल्पकोटिशतत्रयम्। मुनीन्द्रैर्बहुभिः सार्द्धं दुर्द्धर्षानशनव्रतम्।।4।। प्राचीन काल में ब्रह्मा ने तीन सौ करोड़ वर्ष तक निराहार रहकर बहुत सारे मुनिश्रेष्ठ के साथ तपस्या की। पुरस्कृत्याग्निमध्यस्थस्तदाराधनतत्परः । आदरातिशयेनास्य नैरन्तर्येर्चनादिना।।5।। अग्नि के मध्य में रहकर और विष्णु को समक्ष में रखकर आदरपूर्वक लगातार पूजा-अर्चना करते हुए वे आराधना करते रहे। चिराय देवदेवोऽपि प्रत्यक्षमभवत्तदा। किञ्च पुण्यातिरेकेण सर्वेषां तस्य च प्रिये।।6।।

(16) अगस्त्य-संहिता बहुत दिनों के बाद पुण्य की वृद्धि के कारण ब्रह्मा तथा अन्य सभी मुनियों के सामने देवों के स्वामी भगवान् विष्णु प्रकट हुए। नवनीलाम्बुदश्यामः सर्वाभरणभूषितः। शङ्खचक्रगदापद्मजटामुकुटशोभितः ।।7।। भगवान् नवीन एवं नीले मेघ के समान श्यामल वर्ण के थे, उनके शरीर पर सभी गहने शोभित हो रहे थे तथा शंख, चक्र गदा, कमल, जटा और मुकुट से वे सुशोभित थे। किरीटहारकेयूररत्नकुण्डलमण्डितः । संतप्तकाञ्चनप्रख्यपीतवासोयुगावृतः ।।8।। मुकुट, हार, बाजूबन्द, रत्न के कुण्डल से वे विभूषित थे और तपे हुए सोने के समान पीले रंग के जोड़े वस्त्र उनके शरीर पर थे। तेजोमयः सोमसूर्य्यविद्युदुल्काग्निकोटयः । मिलित्वाविर्भवन्तीव प्रादुरासीत्पुरः प्रभुः ।।9।। भगवान् इस प्रकार सामने प्रकट हुए जैसे करोड़ों चन्द्रमा, सूर्य, बिजली, उल्का और अग्नि एक साथ मिलकर प्रकट हुए हों। स्तम्भीभूय तदा ब्रह्मा क्षणं तस्थौ विमोहितः । तुष्टाव मुनिभिः सार्द्धं प्रणम्य च पुनः पुनः।। 10।। कुछ देर तक तो ब्रह्मा घबराकर खम्भे की तरह ठिठक गये। पुनः मुनियों के साथ बार बार उन्हें प्रणाम कर स्तुति करने लगे। धन्योऽस्मि कृतकृत्योस्मि कृतार्थोस्मीह बन्धुभिः। प्रसन्नोऽसीह भगवन् जीवितं सफलं मम ।।11।। हे भगवन्! आज मैं अपने बन्धुओं के साथ धन्य हो गया; आज मेरे सभी कार्य सम्पन्न हो गये। हे भगवन्! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं, इससे मेरा जीवन सफल हो गया। कथं स्तोष्यामि देवेश भगवन्निति चिन्तयन्। ऋग्यजुःसामवेदैश्च शास्त्रैर्बहुभिरादरात् ।।12।। साङ्गैर्मन्वादिभिर्धर्मप्रतिपादनतत्परैः । तुष्टावेश्वरमभ्यर्च्य सन्तुष्टो मुनिभिः सह।।13।। Rarest Archiver

चतुर्थोऽध्यायः (17) 'हे देवेश! मैं कैसे आपकी स्तुति करूँगा' यह सोचते हुए मुनियों के साथ सन्तुष्ट होकर ब्रह्मा ने वेदांग सहित ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अन्य अनेक शास्त्र, मनुस्मृति आदि धर्म को बखानने वाले शास्त्रों से भगवान् की अर्चना कर उनकी स्तुति की- त्वमेव विश्वतश्चक्षुर्विश्वतोमुख उच्यसे। विश्वतोबाहुरेकः सन् विश्वतः स्यात्तथा परः।।14।। जनयन् भूर्भुवर्लोकौ स्वर्लोकं सर्वशासकः। अक्षिभ्यामपि बाहुभ्यां कर्णाभ्यां भुवनत्रयम् ।।15।। पद्भ्यां च नासिकाभ्यां¹ च सर्वं सर्वत्र पश्यसि। समाधत्से शृणोष्येतत् सर्वं गच्छसि सर्वकृत्।।16।। जिघ्रस्येवं न ते किञ्चिदविज्ञातं प्रभोस्त्विह। ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्वमेव ननु केशवः।।17।। सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। पृथिव्यप्तेजसां रूपं मरुदाकाशयोरपि।।18।। कार्यं कर्ता कृतिर्देव कारणं केवलं परम्। अणोरणीयान् महतो महीयान् मध्यतः स्वयंम्।।19।। मध्योऽसि निर्विकल्पोऽसि कस्त्वं देवावगच्छति। हे भगवन्! आपके नेत्र सभी दिशाओं में हैं; आपके मुख भी सभी दिशाओं में हैं तथा आपकी बाहें भी सभी ओर फैली हुई हैं, फिर भी आप संसार से परे हैं। आप दोनों आँखों, बाहुओं और कानों, पैरों और नासिकाओं से भूलोक, भुवर्लोक, और स्वर्गलोक इन तीनों को उत्पन्न कर सब पर शासन करते हैं, सभी जगहों पर सब कुछ देखते-सूँघते हैं; सब कुछ सुनकर उनका समाधान करते हैं और सारे कार्य करते हैं। हे प्रभो! ऐसा कुछ भी नहीं, जिसे आप जानते न हों। आप ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं तथा केशव भी आप ही हैं। पुरुष रूप में आपके हजारों शिर हैं, हजारों नेत्र हैं तथा हजारों पैर हैं। हे देव!, पृथ्वी, जल, अग्नि के तथा मरुत् और आकाश स्वरूप आप हैं। आप ही करने योग्य, करनेवाले, किये गये पदार्थ तथा क्रिया के परम साधन भी आप ही हैं। हे देव! आप अणु से भी सूक्ष्म और महत् से भी महान् हैं और उनके बीच में भी आप ही हैं; आपका विकल्प कोई नहीं है; आपको भला कौन जान सकता है?'

  1. घ. पादाभ्यां नासिकाभ्यां च।

(18) अगस्त्य-संहिता

एवमेवादिबहुस्तोत्रैस्तुतः स परमेश्वरः ।।20।। वैदिकैः कृपया विष्णुर्ब्रह्माणमिदमब्रवीत्। इस प्रकार के वेदोक्त स्तोत्रों से जब ब्रह्मा ने भगवान् की स्तुति की, तब विष्णु ने ब्रह्मा से कहा- स्तुतस्तुष्टोऽस्मि ते ब्रह्मन् उग्रेण तपसाधुना।।21।। वृणीष्व पदमिष्टं¹ ते दास्यामि कमलोद्भव। इत्युक्तः सोऽब्रवीत् तेन विष्णुना प्रभविष्णुना।।22।। 'हे ब्रह्मा! मैं आपकी स्तुति और उग्र तपस्या से अब सन्तुष्ट हूँ। हे कमलोद्भव! तुम्हे जो स्थान चाहिए वह माँगो; मैं तुम्हें दूँगा।' विष्णु के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर ब्रह्मा बोले। ब्रह्मोवाच तुष्टोऽसि यदि देवेश दास्यं मे स्वीकरिष्यसि। अभीष्टं देव देवेश यद्यस्ति करुणा मयि।।23।। ब्रह्माजी बोले- हे देवेश! यदि आप सन्तुष्ट हैं और मेरे ऊपर यदि आपकी करुणा है, तो मेरी इस दासता को स्वीकार करें, यह मैं चाहता हूँ।। असौभाग्येन दारिद्र्यदुखेनाहं सुदुःखितः।। एतेऽपि मुनयो देव माययात्यन्तदुःखिताः।।24।। हे देव! मैं सुन्दर भाग्य से हीन तथा दरिद्रता के दुःख से दुःखी हूँ। ये मुनिगण भी माया के फेर में अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं। प्रतिभाति च दैवेन² सर्वमस्माकमीदृशम्। किं करिष्यामि देवेश ब्रूहि मे पुरुषोत्तम।।25।। हे पुरुषोत्तम! हमलोगों का सबकुछ इसी प्रकार से भाग्य के द्वारा प्रेरित प्रतीत हो रहा है। ऐसी स्थिति में मैं क्या करूँ यह कहें। कामक्रोधादिभिर्दुःखैर्दुष्टाः सर्वापि मम प्रजाः। पूर्वार्जितैर्विशेषेण न कश्चिदवशिष्यते।।26।। पूर्वजन्म में अर्जित कर्म से तथा काम, क्रोध आदि के दुःख से मेरी सारी प्रजा दोषग्रस्त हो गयी है। ऐसा कोई नहीं है, जो इन दोषों से अछूता हो।

  1. क. यदभीष्टं। 2.ख. वेदेन।

चतुर्थोऽध्यायः (19) — — — — — — — — — — — — — — — — — — को वोपायो मनुष्याणां भक्तानां भक्तवत्सल । एतच्छरीरपातान्ते नः परं मुक्तिसिद्धये ।।२७।। हे भक्तवत्सल भगवान्! मनुष्यों और भक्तों के लिए ऐसा कौन सा उपाय है, जिससे हमें इस शरीर का अन्त होने पर मुक्ति मिले। इहाप्यस्माकमैश्वर्यं वै दुष्टेष्टार्थसिद्धये¹। एवमुक्तः स देवोऽस्मै भुक्तिमुक्तिप्रसिद्धये ।।२८।। किञ्चिद् विचार्य भगवान्² षडक्षरमुपादिशत् । स्वर्ग में भी हम देवों का ऐश्वर्य दोषपूर्ण इच्छित वस्तुओं की सिद्धि के लिए हैं।” ऐसा कहने पर भगवान् ने कुछ सोचकर भोग और मोक्ष की सिद्धि के लिए छह अक्षरों वाले मन्त्र का उपदेश किया। एकैकं वर्णविन्यासं क्रमाच्चाङ्गानि षट् पुनः³।।२९।। तद्विधिं विधये प्रादात् पञ्चमन्त्राक्षराणि च। रहस्यं देवदेवोऽपि तं मिथः समबोधयत् ।।३०।। हे मुनि! भगवान् ने भी उस षडक्षर मन्त्र एक एक कर वर्णविन्यास, क्रमशः न्यास आदि छह अङ्ग उसकी विधि तथा रहस्य बतला दिया तथा पंचाक्षर मन्त्र का भी उपदेश किया। तस्य तत्प्राप्तिमात्रेण तदानीमेव तत्फलम् । सर्वाधिपत्यं सर्वज्ञं भावोऽप्यस्याभवन् तदा ।।३१।। ब्रह्मा ने भी ज्यों ही उसे प्राप्त किया, उस मन्त्र का फल तत्काल ही मिल गया। ब्रह्मा उसी क्षण सबके स्वामी बन गये तथा सारा ज्ञान उन्हें मिल गया। किं चास्य भगवत्त्वं च यदिष्टं तदभूदपि। सर्वेश्वरप्रसादेन तपसा किं न लभ्यते ।।३२।। इतना ही नहीं, ब्रह्मा जो चाह रहे थे, वह उन्हें मिल गया; वे भगवान् भी हो गये। भला सबके स्वामी भगवान् विष्णु की कृपा तथा तपस्या से क्या कुछ नहीं मिल जाता! मुनीनामपि सर्वेषां तदा ब्रह्मा तदाज्ञया। उपादिदेश तत्सर्वं ततस्तु विष्णुरब्रवीत् ।।३३।।

  1. घ. वैदुष्ट्येष्टार्थसिद्धये। 2. घ. कृपया। 3. क. षण्मुने। Rarest Archiver

(20) अगस्त्य-संहिता तब भगवान् विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने सभी मुनियों को इस मन्त्र का उपदेश किया। तब विष्णु बोले- ऋषिर्भावास्य मन्त्रस्य त्वं ब्रह्मन् सर्वमन्त्रवित्। रामोऽहं देवता छन्दो गायत्री छन्दसां परा।।३४।। हे ब्रह्मा! आप मन्त्रों के ज्ञाता हैं, अतः इस मन्त्र के ऋषि आप हों। मैं राम इस मन्त्र का देवता हूँ तथा छन्दों में श्रेष्ठ गायत्री इस मन्त्र का छन्द होगा। मान्तो¹ यान्तो भवेद्बीजं सर्वमाद्यफलप्रदम्।² नमः शक्तितयोद्दिष्टो नमोऽन्तो मन्त्रनायकः।।३५।। मकार (राम्) एवं यकार (रामाय) से अन्त होनेवाले इसके बीज-मन्त्र हों तथा ‘नमः’ इस मन्त्र की शक्ति हो। इस प्रकार ‘नमः’ से अन्त होनेवाला यह मन्त्रों में नायक बने। रामाय मध्यमो ब्रह्मन् तस्मै सर्वं निवेदयेत्। इह भुक्तिश्च मुक्तिश्च देहान्ते संभविष्यति।।३६।। हे ब्रह्मा! इस मन्त्र के बीच में ‘रामाय’ यह पद रहेगा और उसी राम को यह मन्त्र निवेदित करें। इससे संसार में भोग तथा देहान्त होने पर मोक्ष मिलेगा। यदन्यदप्यभीष्टं स्यात् तत्प्रसादात् प्रजायते। अनुतिष्ठादरेणैव निरन्तरमनन्यधीः।।३७।। इसके अतिरिक्त भी यदि कोई इच्छा हो, तो श्रीराम की कृपा से पूरी होगी। एकाग्रचित्त होकर लगातार इस मन्त्र का अनुष्ठान करें। चिरं मद्गतचित्तस्तु मामेवाराधयेच्चिरम्। मामेव मनसा ध्यायन् मामेवैष्यसि नान्यथा।।३८।। बहुत दिनों तक मुझमें मन लगाकर, मेरा ही ध्यान करते हुए जो मेरी उपासना करेंगे, वे मुझे ही पा लेंगे, इसमें सन्देह नहीं। तत्र तदेतद् विस्तार्य शिष्येभ्यो ब्रूहि गौरवम्। इत्युक्त्वान्तर्दधे देवस्तत्रैव कमलेक्षणः।।३९।। हे ब्रह्मा! संसार में इसीका विस्तार कर अपने शिष्यों से इस मन्त्र की गरिमा का बखान करें।" ऐसा कहकर कमलनयन भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये।

  1. घ. सान्तो। 2. ख. भवेद्बीजमाद्यमाद्यफलप्रदम्।

पञ्चमोऽध्यायः (21) प्रजापतिश्च भगवान् मुनिभिः सार्द्धमन्वहम् । अन्वतिष्ठद् विधानेन निक्षिप्याज्ञां सिरस्यथ ।। ४० ।। तब भगवान् प्रजापति ब्रह्मा ने विष्णु की आज्ञा सिर पर चढ़ाकर मुनियों के साथ विधानपूर्वक इस मन्त्र का अनुष्ठान किया। ब्रह्मा तदानीं सर्वेषामुपदेष्टा बभूव ह। आर्ये तवापि तेनैव सर्वाभीष्टं भविष्यति ।। ४१ ।। हे देवी पार्वती! तब ब्रह्मा सबके लिए इस मन्त्र के उपदेशक हुए। इसी मन्त्र से तुम्हारी भी सभी कामनाओं की पूर्ति होगी। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये ब्रह्मणा षडक्षरमन्त्रग्रहणम् नाम चतुर्थोऽध्यायः ।। ४ ।। अथ पञ्चमोऽध्यायः सुतीक्ष्ण उवाच पुरातन पुराणज्ञ सर्वाख्यानार्थवित्तम। ततः किमकरोद् विप्रश्रेष्ठागस्त्याम्बिका तदा ।। २ ।। ईश्वरः केन रूपेण तामेतदवबोधयत्¹ । सुतीक्ष्ण बोले- हे विप्रों में श्रेष्ठ अगस्त्य! आप तो प्राचीन काल से हैं, पुराणों के ज्ञाता हैं, सभी कथाओं के प्रयोजनों को आप भलीभाँति जानते हैं। भगवान् शंकर ने इसके बाद किस प्रकार पार्वती को समझाया, यह कहें। अगस्त्य उवाच तदादि हृदये रामं निधाय कमलेक्षणा ।। ३ ।। मुक्तये निश्चिनोति स्म तमनन्यपरायणा । अगस्त्य ने कहा- इस दिन से पार्वती श्रीराम में एकाग्रचित्त होकर अपने हृदय में बसाकर मुक्ति के लिए मन बनाने लगी। हैरण्यगर्भसिद्धान्तरहस्यश्रवणात् परम् ।। ४ ।। कामादिग्रस्तता तस्याश्चिरमेव न्यवर्तत¹ ।

  1. घ. तामेव तदबोधयत्।

(22) अगस्त्य-संहिता

पार्वती के मन में काम आदि जो घर कर गये थे, हिरण्यगर्भ के सिद्धान्त का रहस्य सुनने के बाद वे सब मिट गये। ईश्वरस्तां प्रियां सम्यग्ज्ञानमात्रेच्छया स्थिताम् ।।५।। न्यवर्त्तत ततो ज्ञात्वा संसारोच्छित्तिशङ्कया। संसार के विनाश की आशंका से भगवान् शिव ने केवल ज्ञान की इच्छा रखनेवाली पार्वती को रोक दिया। तामब्रवीच्च भगवानीश्वरः सर्वरूपधृक् ।।६।। मूलप्रकृतिरार्ये त्वं पुरुषोऽहं पुरातनः। सभी रूपों को धारण करनेवाले भगवान् शिव ने कहा कि हे आर्ये! मैं पुरातन पुरुष हूँ और तुम मूल प्रकृति हो। कारणं जगदुत्पत्तेरावान्तदऽनवेक्षणम् ।।७।। कुर्वहे स्यात्तदुच्छित्तिर्यदि किं तद्धितं तव। कल्याणि मम किं तुल्यमावयोनं तु तत्परम् ।।८।। हे कल्याणि! जगत् की उत्पत्ति के कारणस्वरूप हमदोनों हैं और हमदोनों ही अन्त में (प्रलय-काल में) उसकी देखभाल छोड़ देते हैं, जिससे वह विनष्ट हो जाता है। यदि हम इस संसार का विनाश कर देंगे (अर्थात् सभी प्राणियों को मोक्ष मिल जाये तो संसार कैसे चलेगा) तो इससे तुम्हारा और मेरा क्या लाभ? हमलोगों के समान या हमसे आगे भी कोई नहीं है। कार्यं हि करणाभावे कुत्र सम्पद्यते वद। आवयोः सम्भविष्यन्ति सतोः कल्याणि देवताः ।।९।। हे आर्ये! कारण के अभाव कार्य कैसे होगा, यह तो कहो! हम दोनों के अस्तित्व में रहने पर ही तो देवता भी उत्पन्न होंगे। त्वत्प्रसादादिदं सर्वं न कदाचिद् गमिष्यति। एवं च सति किं देवि सर्वं त्यक्तुमपेक्षसे ।।१०।। न युक्तमेतत् किमपि त्यक्तुं² देव्यधुना त्वया। तुम्हारी ही कृपा से तो यह सब है और कभी समाप्त भी नहीं होगा। इस प्रकार क्या तुम सबकुछ छोड़ सकती हो! इसलिए हे देवी! इस समय सबकुछ छोड़ देना तुम्हारे लिए उचित नहीं है।

  1. घ. व्यवर्तत। 2. घ. वक्तुं। Rarest Archiver

पञ्चमोऽध्यायः (23) इत्युक्ता साब्रवीद्देवी नीलोत्पलनिरीक्षणा ।।11।। प्राणनाथाधुना किं मे कर्त्तव्यमिति साब्रवीत् । इयं सद्वासना मत्तो नैवोच्छिन्ना¹ भवेत्प्रभो ।।12।। कदाचिदपि देवेश त्वं तथानुगृहाण माम्² । तब इस प्रकार कही गयी पार्वती ने कहा- हे प्राणनाथ! मुझे क्या करना चाहिए, जिससे मेरे मन में आपके प्रति जो आसक्ति है, वह मुझसे कभी अलग न हो। हे देवेश! यह बतलाकर मेरे ऊपर अनुग्रह करें। तथोक्तः सोऽब्रवीदेनां महीध्रतनयां पुनः ।।13।। श्रीरामाराधनं देवि तदर्थं ³ प्रतिवासरम्। इस प्रकार कहने पर भगवान् शिव ने हिमालय की पुत्री पार्वती से कहा- 'हे देवि! इसलिए प्रतिदिन श्रीराम की आराधना करो।' आराधयोपकरणैरन्यथा मा कृथाः प्रिये ।।14।। एतेनैवाभयं किञ्चिदिहामुत्र भविष्यति। कलौ संकीर्त्तनेनैव सर्वाघौघं व्यपोहति ।।15।। आराधनेन साङ्गेन गन्धपुष्पाक्षतादिभिः। किं वक्तव्यं प्रिये सर्वं मनसा चिन्तितं यतः ।।16।। सामग्रियों से ही आराधना करो, दूसरे प्रकार से नहीं। इसी से इस संसार में और परलोक में अभय मिलेगा; क्योंकि कलियुग में संकीर्तन और चन्दन, फूल, अक्षत आदि से आराधना करने से ही सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। हे प्रिये! जब तुमने मन में ठान ही लिया है, तो और क्या कहूँ। एवमाराधनेनैव भवत्येव च नान्यथा। न गृही ज्ञानमात्रेण परत्रेह च मंगलम् ।।17।। प्राप्नोति चन्द्रवदने दानहोमादिभिर्विना। इस प्रकार की आराधना करने से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है; क्योंकि जो गृहस्थ है, वह केवल ज्ञान प्राप्त कर इस संसार में और परलोक में दान, होम आदि के बिना मंगल नहीं पाता है। गृहस्थो यदि दानानि दद्यान्न जुहुयादपि ।।18।।

  1. घ. नैवोत्सन्ना। 2. घ. वै। 3. घ. तदमूं।

(24) अगस्त्य-संहिता

पूजयेद् विधिना नैव कः कुर्यादितदन्वहम्¹। गृहस्थ यदि प्रतिदिन दान न करे, होम नहीं करे और विधिपूर्वक पूजा नहीं करे, तो भला कौन करेगा? न ब्रह्मचारिणो दातुमधिकारोऽस्ति भामिनि ।।19।। गृहिभ्योऽन्यत्र सर्वेभ्यः को वा दास्यत्यपेक्षितम् । नारण्यवासिनां शक्तिर्न ते सन्ति कलौ युगे ।।20 हे भामिनि! ब्रह्मचारी को दान करने का अधिकार नहीं है। तब गृहस्थ को छोड़कर कौन सबको दान देगा? वन में रहनेवाले वानप्रस्थियों को तो इस कलियुग में दान करने की शक्ति ही नहीं है। ²परिव्राज्ज्ञानमात्रेण दानहोमादिभिर्विना । सर्व्वदुःखपिशाचेभ्यो मुक्तो भवति नान्यथा ।।21।। परिव्राडविरक्तश्च विरक्तश्च गृही तथा। कुम्भीपाके निमज्जेते³ तावुभौ कमलानने ।।22।। संन्यासी तो केवल ज्ञान प्राप्त कर ही दान होम आदि के बिना भी सभी दुःख रूपी पिशाच से मुक्त पा लेते हैं, दूसरे प्रकार से नहीं। यदि संन्यासी संसार में आसक्त हो और गृहस्थ के मन में वैराग्य हो, तो दोनों कुम्भीपाक नरक में जा डूबते हैं। पुण्यस्त्रियो गृहस्थाश्च मङ्गलैर्मङ्गलार्थिनः⁴ ।।23।। पूजोपकरणैः कुर्य्युर्द्द्युर्दनानि चार्हणम् । चन्दनागरुकस्तूरीकर्पूरैश्चैव चम्पकैः ।।24।। पञ्चामृताभिषेकैश्च पुष्पैस्तामरसैरपि। पुष्पमालैश्च बहुभिर्दुर्वाभिश्चाक्षतैः सह ।।25।। नीलोत्पलैर्मल्लिकैश्च करवीरैश्च चम्पकैः । जातीप्रसूनैर्बिल्वैश्च पुन्नागैर्बकुलैरपि ।।26।। कदम्बैः केतकीपुष्पैः करुणाशोककिंशुकैः । नागबाणादिपुष्पैश्च⁵ गन्धवद्भिर्मनोहरैः ।।27।। प्रत्यग्रैः कोमलैश्चैव पूजयेयुः प्रयत्नतः । पल्लवैश्चैव पत्रैश्च जलस्थलसमुद्भवैः ।।28।।

  1. घ. कः कुर्यात्तदनुग्रहम् । 2. घ. श्लोक सं. 21 अधिक है। 3. क. तु पच्येते । 4. घ. मङ्गले! मङ्गलार्थिनः । 4. घ. नागरङ्गादिपुष्पैश्च ।

पञ्चमः अध्यायः (25) एवमादिभिरन्यैश्च पुष्पैर्बहुभिरन्वहम्। सम्यक् सम्पाद्य यत्नेन शक्त्या भक्त्या रघूद्वहम्।।२९।। इसलिए पुण्यमयी स्त्रियाँ और गृहस्थ जो मंगल चाहते हों, वे दान करें और मांगलिक पूजा सामग्रियों चन्दन, अगरु, कस्तूरी, कर्पूर से पूजा करें; पंचामृत से अभिषेक करें; फूलों की माला, दूर्वा, अक्षत से तथा चम्पा, तामरस (लालकमल), नीलकमल, जूही, चम्पा, चमेली, नागकेसर, करवीर, वकुल, बेल का फूल, कदम्ब, केतकी फूल, मल्लिका, अशोक, पलाश, नाग, बाण आदि सुन्दर, सुगन्धित फूलों से अर्चना करें, जिनकी पंखुरियाँ आगे की ओर हों, कोमल हों, इनसे पूजा करें। नये पल्लव, जल एवं स्थल पर उत्पन्न पत्रों से तथा इस प्रकार के अन्य पत्रों-पुष्पों से प्रतिदिन शक्ति के अनुसार सभी सामग्रियाँ जुटाकर श्रीराम की पूजा करें। त्रिकालमेककालं वा पूजयेयुरहर्निशम्। ¹कक्कोलैलापूगफलैस्तथाजातिफलैरपि । प्रत्याहृतैर्बहुविधैः पिष्टकैरिष्टसिद्धये ।।३०।। दिन-रात, प्रातःकाल, मध्याह्नकाल एवं सन्ध्याकाल अथवा केवल प्रातःकाल में कक्कोल, इलायची, सुपारी, जायफल आदि अनेक प्रकार के संगृहीत साधनों से तथा चावल के पीठा से कामना की सिद्धि के लिए पूजा करें। क्षीरनीराज्यपक्वैश्च फेनापूपवटादिभिः। दध्योदनान्यपानीयैः सूपादिव्यञ्जनैरपि ।।३१।। ²वटीवटोपदंशादिपदार्थैर्बहुविस्तरैः । दूध, जल और घी में पकाये हुए फेना, फेन की तरह बनने वाला खाद्य पदार्थ बतासा, घेबर आदि, बड़ी तथा दही, भात, अन्य पेय पदार्थ और दाल, तरकारी, रोटी, गोलाकार खाद्य पदार्थ, चटनी या आचार आदि विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों से पूजा करें। आरातिकैर्धूपदीपैः³ षडावृत्त्योपकल्पितैः ।।३२।। ⁴शङ्खक्रगदापद्मगरुडान्तोपकल्पितैः । बहुभिर्दीपमालाभिरर्चयेयुरहर्निशम् ।।३३।। धूप, दीप, आरती से छह बार शङ्ख, चक्र गदा, कमल, तथा गरुड़ की प्रतिकृति बनाते हुए अनेक दीप मालाओं से दिन-रात पूजा करनी चाहिए।

  1. यह पंक्ति केवल घ. में। 2. घ. शाटीपटोपदंशादि (भोज्य पदार्थ के साथ वस्त्र अन्वित)। 3. घ. आरत्रिकै°। 4. घ. यह पंक्ति अनुपलब्ध।

(26) अगस्त्य-संहिता —————————————————————————————————— कङ्कोलैलापूगफलैस्तथा जातीफलैरपि। कर्पूरचूर्णसहितैस्ताम्बूलैश्च सुवासितैः।।134।। कंकल, इलायची, सुपारी, जायफल, कर्पूर के चूर्ण से सुगन्धित पान का बीड़ा समर्पित कर पूजा करें। महार्हेरर्हणां चक्रुः कल्याणार्थं तथान्वहम्। स्वस्वशक्त्यनुसारेण सर्वं सम्पाद्य यत्नतः।।135।। कल्याण के लिए प्राचीन काल में सन्तों ने इन श्रेष्ठ वस्तुओं से अपनी शक्ति के अनुसार सब एकत्रित कर प्रतिदिन अर्चना की थी। गृहस्थानां विधिरयं नैतरेषां शुभानने। दद्युर्दानानि जुहुयुरर्चितेग्नौ सुखार्थिनः।।136।। यह विधि केवल गृहस्थों के लिए है, अन्य के लिए नहीं। वे गृहस्थ सुख की कामना से दान करें और पूजित अग्नि में हवन भी करें। कल्याणं च वरारोहे रामार्पणधियान्वहम्। हे पार्वती! श्रीराम को समर्पित करने की बुद्धि से इस प्रकार अर्चना कर कल्याण होगा। एवं गृहस्थनियमस्तथैव ब्रह्मचारिणाम्।।137।। विधिमप्यनतिक्रम्य यथाशक्त्यनुसारतः। यदि कुर्युः प्रयत्नेन पूजा तत्साधनैरिह¹।।138।। सर्वं सम्पद्यते तेषां देवानां दुर्लभं च यत्। यह गृहस्थों के लिए नियम है, किन्तु इस प्रकार ब्रह्मचारी भी किसी विधान को छोड़े विना अपनी शक्ति के अनुसार यत्नपूर्वक यदि उन सामग्रियों से इस संसार में पूजा करते हैं, तो उनकी भी सभी कामनाओं की सिद्धि होती है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। कल्याणि शृणु मद्वाक्यं यदि कल्याणमिच्छसि।।139।। राममाराधयाद्यादेर्यावज्जीवं यथाविधि। एतेनैव वरारोहे कल्याणं तव सर्वदा।।140।।

  1. घ. तत्साधनैरपि।