भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 81

(20) अगस्त्य-संहिता तब भगवान् विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने सभी मुनियों को इस मन्त्र का उपदेश किया। तब विष्णु बोले- ऋषिर्भावास्य मन्त्रस्य त्वं ब्रह्मन् सर्वमन्त्रवित्। रामोऽहं देवता छन्दो गायत्री छन्दसां परा।।३४।। हे ब्रह्मा! आप मन्त्रों के ज्ञाता हैं, अतः इस मन्त्र के ऋषि आप हों। मैं राम इस मन्त्र का देवता हूँ तथा छन्दों में श्रेष्ठ गायत्री इस मन्त्र का छन्द होगा। मान्तो¹ यान्तो भवेद्बीजं सर्वमाद्यफलप्रदम्।² नमः शक्तितयोद्दिष्टो नमोऽन्तो मन्त्रनायकः।।३५।। मकार (राम्) एवं यकार (रामाय) से अन्त होनेवाले इसके बीज-मन्त्र हों तथा ‘नमः’ इस मन्त्र की शक्ति हो। इस प्रकार ‘नमः’ से अन्त होनेवाला यह मन्त्रों में नायक बने। रामाय मध्यमो ब्रह्मन् तस्मै सर्वं निवेदयेत्। इह भुक्तिश्च मुक्तिश्च देहान्ते संभविष्यति।।३६।। हे ब्रह्मा! इस मन्त्र के बीच में ‘रामाय’ यह पद रहेगा और उसी राम को यह मन्त्र निवेदित करें। इससे संसार में भोग तथा देहान्त होने पर मोक्ष मिलेगा। यदन्यदप्यभीष्टं स्यात् तत्प्रसादात् प्रजायते। अनुतिष्ठादरेणैव निरन्तरमनन्यधीः।।३७।। इसके अतिरिक्त भी यदि कोई इच्छा हो, तो श्रीराम की कृपा से पूरी होगी। एकाग्रचित्त होकर लगातार इस मन्त्र का अनुष्ठान करें। चिरं मद्गतचित्तस्तु मामेवाराधयेच्चिरम्। मामेव मनसा ध्यायन् मामेवैष्यसि नान्यथा।।३८।। बहुत दिनों तक मुझमें मन लगाकर, मेरा ही ध्यान करते हुए जो मेरी उपासना करेंगे, वे मुझे ही पा लेंगे, इसमें सन्देह नहीं। तत्र तदेतद् विस्तार्य शिष्येभ्यो ब्रूहि गौरवम्। इत्युक्त्वान्तर्दधे देवस्तत्रैव कमलेक्षणः।।३९।। हे ब्रह्मा! संसार में इसीका विस्तार कर अपने शिष्यों से इस मन्त्र की गरिमा का बखान करें।" ऐसा कहकर कमलनयन भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये।

  1. घ. सान्तो। 2. ख. भवेद्बीजमाद्यमाद्यफलप्रदम्।