अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 82, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः (21) प्रजापतिश्च भगवान् मुनिभिः सार्द्धमन्वहम् । अन्वतिष्ठद् विधानेन निक्षिप्याज्ञां सिरस्यथ ।। ४० ।। तब भगवान् प्रजापति ब्रह्मा ने विष्णु की आज्ञा सिर पर चढ़ाकर मुनियों के साथ विधानपूर्वक इस मन्त्र का अनुष्ठान किया। ब्रह्मा तदानीं सर्वेषामुपदेष्टा बभूव ह। आर्ये तवापि तेनैव सर्वाभीष्टं भविष्यति ।। ४१ ।। हे देवी पार्वती! तब ब्रह्मा सबके लिए इस मन्त्र के उपदेशक हुए। इसी मन्त्र से तुम्हारी भी सभी कामनाओं की पूर्ति होगी। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये ब्रह्मणा षडक्षरमन्त्रग्रहणम् नाम चतुर्थोऽध्यायः ।। ४ ।। अथ पञ्चमोऽध्यायः सुतीक्ष्ण उवाच पुरातन पुराणज्ञ सर्वाख्यानार्थवित्तम। ततः किमकरोद् विप्रश्रेष्ठागस्त्याम्बिका तदा ।। २ ।। ईश्वरः केन रूपेण तामेतदवबोधयत्¹ । सुतीक्ष्ण बोले- हे विप्रों में श्रेष्ठ अगस्त्य! आप तो प्राचीन काल से हैं, पुराणों के ज्ञाता हैं, सभी कथाओं के प्रयोजनों को आप भलीभाँति जानते हैं। भगवान् शंकर ने इसके बाद किस प्रकार पार्वती को समझाया, यह कहें। अगस्त्य उवाच तदादि हृदये रामं निधाय कमलेक्षणा ।। ३ ।। मुक्तये निश्चिनोति स्म तमनन्यपरायणा । अगस्त्य ने कहा- इस दिन से पार्वती श्रीराम में एकाग्रचित्त होकर अपने हृदय में बसाकर मुक्ति के लिए मन बनाने लगी। हैरण्यगर्भसिद्धान्तरहस्यश्रवणात् परम् ।। ४ ।। कामादिग्रस्तता तस्याश्चिरमेव न्यवर्तत¹ ।
- घ. तामेव तदबोधयत्।