अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ
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(22) अगस्त्य-संहिता
पार्वती के मन में काम आदि जो घर कर गये थे, हिरण्यगर्भ के सिद्धान्त का रहस्य सुनने के बाद वे सब मिट गये। ईश्वरस्तां प्रियां सम्यग्ज्ञानमात्रेच्छया स्थिताम् ।।५।। न्यवर्त्तत ततो ज्ञात्वा संसारोच्छित्तिशङ्कया। संसार के विनाश की आशंका से भगवान् शिव ने केवल ज्ञान की इच्छा रखनेवाली पार्वती को रोक दिया। तामब्रवीच्च भगवानीश्वरः सर्वरूपधृक् ।।६।। मूलप्रकृतिरार्ये त्वं पुरुषोऽहं पुरातनः। सभी रूपों को धारण करनेवाले भगवान् शिव ने कहा कि हे आर्ये! मैं पुरातन पुरुष हूँ और तुम मूल प्रकृति हो। कारणं जगदुत्पत्तेरावान्तदऽनवेक्षणम् ।।७।। कुर्वहे स्यात्तदुच्छित्तिर्यदि किं तद्धितं तव। कल्याणि मम किं तुल्यमावयोनं तु तत्परम् ।।८।। हे कल्याणि! जगत् की उत्पत्ति के कारणस्वरूप हमदोनों हैं और हमदोनों ही अन्त में (प्रलय-काल में) उसकी देखभाल छोड़ देते हैं, जिससे वह विनष्ट हो जाता है। यदि हम इस संसार का विनाश कर देंगे (अर्थात् सभी प्राणियों को मोक्ष मिल जाये तो संसार कैसे चलेगा) तो इससे तुम्हारा और मेरा क्या लाभ? हमलोगों के समान या हमसे आगे भी कोई नहीं है। कार्यं हि करणाभावे कुत्र सम्पद्यते वद। आवयोः सम्भविष्यन्ति सतोः कल्याणि देवताः ।।९।। हे आर्ये! कारण के अभाव कार्य कैसे होगा, यह तो कहो! हम दोनों के अस्तित्व में रहने पर ही तो देवता भी उत्पन्न होंगे। त्वत्प्रसादादिदं सर्वं न कदाचिद् गमिष्यति। एवं च सति किं देवि सर्वं त्यक्तुमपेक्षसे ।।१०।। न युक्तमेतत् किमपि त्यक्तुं² देव्यधुना त्वया। तुम्हारी ही कृपा से तो यह सब है और कभी समाप्त भी नहीं होगा। इस प्रकार क्या तुम सबकुछ छोड़ सकती हो! इसलिए हे देवी! इस समय सबकुछ छोड़ देना तुम्हारे लिए उचित नहीं है।
- घ. व्यवर्तत। 2. घ. वक्तुं। Rarest Archiver