अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 84, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः (23) इत्युक्ता साब्रवीद्देवी नीलोत्पलनिरीक्षणा ।।11।। प्राणनाथाधुना किं मे कर्त्तव्यमिति साब्रवीत् । इयं सद्वासना मत्तो नैवोच्छिन्ना¹ भवेत्प्रभो ।।12।। कदाचिदपि देवेश त्वं तथानुगृहाण माम्² । तब इस प्रकार कही गयी पार्वती ने कहा- हे प्राणनाथ! मुझे क्या करना चाहिए, जिससे मेरे मन में आपके प्रति जो आसक्ति है, वह मुझसे कभी अलग न हो। हे देवेश! यह बतलाकर मेरे ऊपर अनुग्रह करें। तथोक्तः सोऽब्रवीदेनां महीध्रतनयां पुनः ।।13।। श्रीरामाराधनं देवि तदर्थं ³ प्रतिवासरम्। इस प्रकार कहने पर भगवान् शिव ने हिमालय की पुत्री पार्वती से कहा- 'हे देवि! इसलिए प्रतिदिन श्रीराम की आराधना करो।' आराधयोपकरणैरन्यथा मा कृथाः प्रिये ।।14।। एतेनैवाभयं किञ्चिदिहामुत्र भविष्यति। कलौ संकीर्त्तनेनैव सर्वाघौघं व्यपोहति ।।15।। आराधनेन साङ्गेन गन्धपुष्पाक्षतादिभिः। किं वक्तव्यं प्रिये सर्वं मनसा चिन्तितं यतः ।।16।। सामग्रियों से ही आराधना करो, दूसरे प्रकार से नहीं। इसी से इस संसार में और परलोक में अभय मिलेगा; क्योंकि कलियुग में संकीर्तन और चन्दन, फूल, अक्षत आदि से आराधना करने से ही सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। हे प्रिये! जब तुमने मन में ठान ही लिया है, तो और क्या कहूँ। एवमाराधनेनैव भवत्येव च नान्यथा। न गृही ज्ञानमात्रेण परत्रेह च मंगलम् ।।17।। प्राप्नोति चन्द्रवदने दानहोमादिभिर्विना। इस प्रकार की आराधना करने से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है; क्योंकि जो गृहस्थ है, वह केवल ज्ञान प्राप्त कर इस संसार में और परलोक में दान, होम आदि के बिना मंगल नहीं पाता है। गृहस्थो यदि दानानि दद्यान्न जुहुयादपि ।।18।।
- घ. नैवोत्सन्ना। 2. घ. वै। 3. घ. तदमूं।