भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

चतुर्थोऽध्यायः (19) — — — — — — — — — — — — — — — — — — को वोपायो मनुष्याणां भक्तानां भक्तवत्सल । एतच्छरीरपातान्ते नः परं मुक्तिसिद्धये ।।२७।। हे भक्तवत्सल भगवान्! मनुष्यों और भक्तों के लिए ऐसा कौन सा उपाय है, जिससे हमें इस शरीर का अन्त होने पर मुक्ति मिले। इहाप्यस्माकमैश्वर्यं वै दुष्टेष्टार्थसिद्धये¹। एवमुक्तः स देवोऽस्मै भुक्तिमुक्तिप्रसिद्धये ।।२८।। किञ्चिद् विचार्य भगवान्² षडक्षरमुपादिशत् । स्वर्ग में भी हम देवों का ऐश्वर्य दोषपूर्ण इच्छित वस्तुओं की सिद्धि के लिए हैं।” ऐसा कहने पर भगवान् ने कुछ सोचकर भोग और मोक्ष की सिद्धि के लिए छह अक्षरों वाले मन्त्र का उपदेश किया। एकैकं वर्णविन्यासं क्रमाच्चाङ्गानि षट् पुनः³।।२९।। तद्विधिं विधये प्रादात् पञ्चमन्त्राक्षराणि च। रहस्यं देवदेवोऽपि तं मिथः समबोधयत् ।।३०।। हे मुनि! भगवान् ने भी उस षडक्षर मन्त्र एक एक कर वर्णविन्यास, क्रमशः न्यास आदि छह अङ्ग उसकी विधि तथा रहस्य बतला दिया तथा पंचाक्षर मन्त्र का भी उपदेश किया। तस्य तत्प्राप्तिमात्रेण तदानीमेव तत्फलम् । सर्वाधिपत्यं सर्वज्ञं भावोऽप्यस्याभवन् तदा ।।३१।। ब्रह्मा ने भी ज्यों ही उसे प्राप्त किया, उस मन्त्र का फल तत्काल ही मिल गया। ब्रह्मा उसी क्षण सबके स्वामी बन गये तथा सारा ज्ञान उन्हें मिल गया। किं चास्य भगवत्त्वं च यदिष्टं तदभूदपि। सर्वेश्वरप्रसादेन तपसा किं न लभ्यते ।।३२।। इतना ही नहीं, ब्रह्मा जो चाह रहे थे, वह उन्हें मिल गया; वे भगवान् भी हो गये। भला सबके स्वामी भगवान् विष्णु की कृपा तथा तपस्या से क्या कुछ नहीं मिल जाता! मुनीनामपि सर्वेषां तदा ब्रह्मा तदाज्ञया। उपादिदेश तत्सर्वं ततस्तु विष्णुरब्रवीत् ।।३३।।

  1. घ. वैदुष्ट्येष्टार्थसिद्धये। 2. घ. कृपया। 3. क. षण्मुने। Rarest Archiver