भारतकोश
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अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

७४ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

प्रोक्षण करना चाहिये। गुरुको चाहिये कि कुम्भपात्रमें पवित्राओंको रखकर उनकी रक्षाके उद्देश्यसे उस पात्रसे पूर्व-दिशामें संकर्षण-मन्त्रद्वारा दन्तकाष्ठ और आँवला, दक्षिण-दिशामें प्रद्युम्न-मन्त्रद्वारा भस्म और तिल, पश्चिम-दिशामें अनिरुद्ध-मन्त्रद्वारा गोबर और मिट्टी तथा उत्तर-दिशामें नारायण-मन्त्रद्वारा कुशोदक डाले। तदनन्तर अग्निकोणमें हृदय-मन्त्रसे कुङ्कुम तथा रोचना, ईशानकोणमें शिरोमन्त्रद्वारा धूप, नैर्ऋत्यकोणमें शिखामन्त्रद्वारा दिव्य मूलपुष्प तथा वायव्यकोणमें कवच-मन्त्रद्वारा चन्दन, जल, अक्षत, दही और दूर्वाको दोनेमें रखकर छीटे। मण्डपको त्रिसूत्रसे आवेष्टित करके पुनः सब ओर सरसों बिखेरे॥ १-६॥

देवताओंकी जिस क्रमसे पूजा की गयी हो, उसी क्रमसे, उनके लिये उनके अपने-अपने नाम-मन्त्रोंसे गन्धपवित्रक$^१$ देना चाहिये। द्वारपाल आदिको नाम-मन्त्रोंसे ही गन्धपवित्रक अर्पित करे। इसी क्रमसे कुम्भमें भगवान् विष्णुको सम्बोधित करके पवित्रक दे—'हे देव! यह आप भगवान् विष्णुके ही तेजसे उत्पन्न रमणीय तथा सर्वपातकाशन पवित्रक है। यह सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है, इसे मैं आपके अङ्गमें धारण कराता हूँ।' धूप-दीप आदिके द्वारा सम्यक् पूजन करके मण्डपके द्वारके समीप जाय तथा गन्ध, पुष्प और अक्षतसे युक्त वह पवित्रक स्वयंको भी अर्पित करे। अपनेको अर्पण करते समय इस प्रकार कहे—'यह पवित्रक भगवान् विष्णुका तेज है और बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है; मैं धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये इसे अपने अङ्गमें धारण करता हूँ।' आसनपर भगवान् श्रीहरिके परिवार आदिको एवं गुरुको पवित्रक दे। गन्ध, पुष्प और अक्षत आदिसे भगवान् श्रीहरिकी पूजा करके गन्ध-पुष्पादिसे पूजित पवित्रक श्रीहरिको अर्पित करे। उस समय 'विष्णुतेजोभवम्' इत्यादि मूलमन्त्रका उच्चारण करे॥ ७-१२॥

तदनन्तर अग्निमें अधिष्ठातारूपसे स्थित भगवान् विष्णुको पवित्रक अर्पित करके उन परमेश्वरसे यों प्रार्थना करे—'केशव! आपका श्रीविग्रह क्षीरसागरमें महानाग (अनन्त)-की शय्यापर शयन करनेवाला है। मैं प्रातःकाल आपकी पूजा करूँगा; आप मेरे समीप पधारिये।' इसके बाद इन्द्र आदि दिक्पालोंको बलि अर्पित करके श्रीविष्णु-पार्षदोंको भी बलि भेंट करे। इसके बाद भगवान्‌के सम्मुख युगलवस्त्र-भूषित तथा रोचना, कर्पूर, केसर और गन्ध आदिके जलसे पूरित कलशको गन्ध-पुष्प आदिसे विभूषित करके मूलमन्त्रसे उसकी पूजा करे। फिर मण्डपसे बाहर आकर पूर्व दिशामें लिये हुए मण्डलत्रयमें पञ्चगव्य, चरु और दन्तकाष्ठका क्रमशः सेवन करे$^२$ रातमें पुराणश्रवण तथा स्तोत्रपाठ करते हुए जागरण करे। पर प्रेषक बालकों, स्त्रियों तथा भोगीजनोंके उपयोगमें आनेवाले गन्धपवित्रकको छोड़कर शेषका तत्काल अधिवासन करे॥ १३-१८॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पवित्राधिवासन-विधिक वर्णन' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५॥


१. सूत्रको केवल त्रिगुणित करके पवित्रा बनायी जाय तो उसे 'गन्धपवित्रक' कहते हैं। इसमें एक गाँठ होती है और थोड़ेसे तन्तु। कोई-कोई इसे 'कनिष्ठसंख्य' भी कहते हैं। जैसा कि वचन है— 'त्रिसूत्री गन्धसूत्रे स्यात्।' तत्र गन्धपवित्रं स्यादेकग्रन्थ्यल्पतन्तुकम्। कनिष्ठसंख्यमित्येके त्रिसूत्रेण विनिर्मितम्॥ (ईशानशिव गुरुदेवपद्धति, क्रियापाद २१ पटल १२, ३६) २. बहिर्निर्गत्य प्राचीनेषु त्रिषु मण्डलेषु दीक्षोक्तमार्गेण पञ्चगव्यं चरुं दन्तधावनं च भजेत्। (ईशानशिव गुरुदेवपद्धति, उत्तरार्ध, क्रियापाद २१वाँ पटल)

  • अध्याय ३६ * ७५

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छत्तीसवाँ अध्याय

भगवान् विष्णुके लिये पवित्रारोपणकी विधि

अग्निदेव कहते हैं— मुने! प्रातःकाल स्नान आदि करके, द्वारपालोंका पूजन करनेके पश्चात् गुप्त स्थानमें प्रवेश करके, पूर्वाधिवासित पवित्रकमेंसे एक लेकर प्रसादरूपसे धारण कर ले। शेष द्रव्य-वस्त्र, आभूषण, गन्ध एवं सम्पूर्ण निर्माल्यको हटाकर भगवान्‌को स्नान करानेके पश्चात् उनकी पूजा करे। पञ्चामृत, कषाय एवं शुद्ध गन्धोदकसे नहलाकर भगवान्‌के निमित्त पहलेसे रखे हुए वस्त्र, गन्ध और पुष्पको उनकी सेवामें प्रस्तुत करे। अग्निमें नित्यहोमकी भाँति हवन करके भगवान्‌की स्तुति-प्रार्थना करनेके अनन्तर उनके चरणोंमें मस्तक नवावे। फिर अपने समस्त कर्म भगवान्‌को अर्पित करके उनकी नैमित्तिकी पूजा करे। द्वारपाल, विष्णु, कुम्भ और वर्धनीकी प्रार्थना करे। ‘अतो देवाः’ इत्यादि मन्त्रसे, अथवा मूल-मन्त्रसे कलशपर श्रीहरिकी स्तुति-प्रार्थना करे—‘हे कृष्ण! हे कृष्ण! आपको नमस्कार है। इस पवित्रकको ग्रहण कीजिये। यह उपासकको पवित्र करनेके लिये है और वर्षभर की हुई पूजाके सम्पूर्ण फलको देनेवाला है। नाथ! पहले मुझसे जो दुष्कृत (पाप) बन गया हो, उसे नष्ट करके आप मुझे परम पवित्र बना दीजिये। देव! सुरेश्वर! आपकी कृपासे मैं शुद्ध हो जाऊँगा।’* हृदय, सिर आदि मन्त्रोंद्वारा पवित्रकका तथा अपना भी अभिषेक करके विष्णुकलशका भी प्रोक्षण करनेके बाद भगवान्‌के समीप जाय। उनके रक्षाबन्धनको हटाकर उन्हें पवित्रक अर्पण करे और कहे—‘प्रभो! मैंने जो ब्रह्मसूत्र तैयार किया है, इसे आप ग्रहण करें। यह कर्मकी पूर्तिका साधक है; अतः इस पवित्रारोपण कर्मको आप इस तरह सम्पन्न करें, जिससे मुझे दोषका भागी न होना पड़े’॥ १—९ $\frac{१}{२}$ ॥

द्वारपाल, योगपीठासन तथा मुख्य गुरुओंको पवित्रक चढ़ावे। इनमें कनिष्ठ श्रेणीका (नाभितकका) पवित्रक द्वारपालोंको, मध्यम श्रेणीका (जाँघतक लटकनेवाला) पवित्रक योगपीठासनको और उत्तम (घुटनेतकका) पवित्रक गुरुजनोंको दे। साक्षात् भगवान्‌को मूल-मन्त्रसे वनमाला (पैरोंतक लटकनेवाला पवित्रक) अर्पित करे। ‘नमो विष्वक्सेनाय’ मन्त्र बोलकर विष्वक्सेनको भी पवित्रक चढ़ावे। अग्निमें होम करके अग्निस्थ विश्वादि देवताओंको पवित्रक अर्पित करे। तदनन्तर पूजनके पश्चात् मूल-मन्त्रसे प्रायश्चित्तके उद्देश्यसे पूर्णाहुति दे। अष्टोत्तरशत अथवा पाँच औपनिषद-मन्त्रोंसे पूर्णाहुति देनी चाहिये। मणि या मूँगोंकी मालाओंसे अथवा मन्दार-पुष्प आदिसे अष्टोत्तरशतकी गणना करनी चाहिये। अन्तमें भगवान्‌से इस प्रकार प्रार्थना करे—‘गरुडध्वज! यह आपकी वार्षिक पूजा सफल हो। देव! जैसे वनमाला आपके वक्षःस्थलमें सदा शोभा पाती है, उसी तरह पवित्रकके इन तन्तुओंको और इनके द्वारा की गयी पूजाको भी आप अपने हृदयमें धारण करें। मैंने इच्छासे या अनिच्छासे नियमपूर्वक की जानेवाली पूजामें जो त्रुटियाँ की हैं, विघ्नवश विधिके पालनमें जो न्यूनता हुई है, अथवा कर्मलोपका प्रसङ्ग आया है, वह सब


* कृष्ण कृष्ण नमस्तुभ्यं गृह्णीष्वेदं पवित्रकम्। पवित्रीकरणार्थाय वर्षपूजाफलप्रदम्॥
पवित्रकं कुरुष्वाद्य यन्मया दुष्कृतं कृतम्। शुद्धो भवाम्यहं देव त्वत्प्रसादात् सुरेश्वर॥
(अग्नि० ३६।६, ७)

७६ * अग्निपुराण *

आपकी कृपासे पूर्ण हो जाय। मेरे द्वारा की हुई आपकी पूजा पूर्णतः सफल हो'॥ १०-१५$\frac{\text{१}}{\text{२}}$॥

इस प्रकार प्रार्थना और नमस्कार करके अपराधोंके लिये क्षमा माँगकर पवित्रकको मस्तकपर चढ़ावे। फिर यथायोग्य बलि अर्पित करके दक्षिणाद्वारा वैष्णव गुरुको संतुष्ट करे। यथाशक्ति एक दिन या एक पक्षतक ब्राह्मणोंको भोजन-वस्त्र आदिसे संतोष प्रदान करे। स्नानकालमें पवित्रकको उतारकर पूजा करे। उत्सवके दिन किसीको आनेसे न रोके और सबको अनिवार्यरूपसे अन्न देकर अन्तमें स्वयं भी भोजन करे। विसर्जनके दिन पूजन करके पवित्रकोंका विसर्जन करे और इस प्रकार प्रार्थना करे—'हे पवित्रक! मेरी इस वार्षिक पूजाको विधिवत् सम्पादित करके अब तुम मेरे द्वारा विसर्जित हो विष्णुलोकको पधारो।' उत्तर और ईशानकोणके बीचमें विष्वक्सेनकी पूजा करके उनके भी पवित्रकोंकी अर्चना करनेके पश्चात् उन्हें ब्राह्मणको दे दे। उस पवित्रकमें जितने तन्तु कल्पित हुए हैं, उतने सहस्र युगोंतक उपासक विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। साधक पवित्रारोपणसे अपनी सौ पूर्व पीढ़ियोंका उद्धार करके दस पहले और दस बादकी पीढ़ियोंको विष्णुलोकमें स्थापित करता और स्वयं भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है॥ १६-२३॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'विष्णु-पवित्रारोपणविधि-निरूपण' नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६॥


सैंतीसवाँ अध्याय

संक्षेपसे समस्त देवताओंके लिये साधारण पवित्रारोपणकी विधि

अग्निदेव कहते हैं—मुने! अब संक्षेपसे समस्त देवताओंके लिये पवित्रारोपणकी विधि सुनो। पहले जो चिह्न कहे गये हैं, उन्हीं लक्षणोंसे युक्त पवित्रक देवताको अर्पित किया जाता है। उसके दो भेद होते हैं 'स्वरस' और 'अनेलग'। पहले निम्नाङ्कित रूपसे इष्टदेवताको निमन्त्रण देना चाहिये—'जगत्के कारणभूत ब्रह्मदेव! आप परिवार-सहित यहाँ पधारें। मैं आपको निमन्त्रित करता हूँ। कल प्रातःकाल आपकी सेवामें पवित्रक अर्पित करूँगा।' फिर दूसरे दिन पूजनके पश्चात् निम्नाङ्कित प्रार्थना करके पवित्रक भेंट करे—'संसारकी सृष्टि करनेवाले आप विधाताको नमस्कार है। यह पवित्रक ग्रहण कीजिये। इसे अपनेको पवित्र करनेके लिये आपकी सेवामें प्रस्तुत किया गया है। यह वर्षभरकी पूजाका फल देनेवाला है।' 'शिवदेव! वेदवेत्ताओंके पालक प्रभो! आपको नमस्कार है। यह पवित्रक स्वीकार कीजिये। इसके द्वारा आपके लिये मणि, मूँगे और मन्दार-कुसुम आदिसे प्रतिदिन एक वर्षतक की जानेवाली पूजा सम्पादित हो।' 'पवित्रक! मेरी इस वार्षिक-पूजाका विधिवत् सम्पादन करके मुझसे विदा लेकर अब तुम स्वर्गलोकको पधारो।' 'सूर्यदेव! आपको नमस्कार है; यह पवित्रक लीजिये। इसे पवित्रीकरणके उद्देश्यसे आपकी सेवामें अर्पित किया गया है। यह एक वर्षकी पूजाका फल देनेवाला है।' 'गणेशजी! आपको नमस्कार है; यह पवित्रक स्वीकार कीजिये। इसे पवित्रीकरणके उद्देश्यसे दिया गया है। यह वर्षभरकी पूजाका फल देनेवाला है।' 'शक्ति देवि! आपको नमस्कार है; यह पवित्रक लीजिये। इसे पवित्रीकरणके उद्देश्यसे आपकी सेवामें भेंट किया गया है। यह वर्षभरकी पूजाका फल देनेवाला है'॥ १-९$\frac{\text{१}}{\text{२}}$॥

  • अध्याय ३८ * | ७७

'पवित्रकका यह उत्तम सूत नारायणमय और अनिरुद्धमय है। धन-धान्य, आयु तथा आरोग्यको देनेवाला है, इसे मैं आपकी सेवामें दे रहा हूँ। यह श्रेष्ठ सूत प्रद्युम्नमय और संकर्षणमय है, विद्या, संतति तथा सौभाग्यको देनेवाला है। इसे मैं आपकी सेवामें अर्पित करता हूँ। यह वासुदेवमय सूत्र धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षको देनेवाला है। संसारसागरसे पार लगानेका यह उत्तम साधन है, इसे आपके चरणोंमें चढ़ा रहा हूँ। यह विश्वरूपमय सूत्र सब कुछ देनेवाला और समस्त पापोंका नाश करनेवाला है; भूतकालके पूर्वजों और भविष्यकी भावी संतानोंका उद्धार करनेवाला है, इसे आपकी सेवामें प्रस्तुत करता हूँ। कनिष्ठ, मध्यम, उत्तम एवं परमोत्तम—इन चार प्रकारके पवित्रकोंका मन्त्रोच्चारणपूर्वक क्रमशः दान करता हूँ'॥ १०–१४॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'संक्षेपतः सर्वदेवसाधारण पवित्रारोपण' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३७ ॥


अड़तीसवाँ अध्याय

देवालय-निर्माणसे प्राप्त होनेवाले फल आदिका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं—मुनिवर वसिष्ठ! भगवान् वासुदेव आदि विभिन्न देवताओंके निमित्त मन्दिरका निर्माण करानेसे जिस फल आदिकी प्राप्ति होती है, अब मैं उसीका वर्णन करूँगा। जो देवताके लिये मन्दिर-जलाशय आदिके निर्माण करानेकी इच्छा करता है, उसका वह शुभ संकल्प ही उसके हजारों जन्मोंके पापोंका नाश कर देता है। जो मनसे भावनाद्वारा भी मन्दिरका निर्माण करते हैं, उनके सैकड़ों जन्मोंके पापोंका नाश हो जाता है। जो लोग भगवान् श्रीकृष्णके लिये किसी दूसरेके द्वारा बनवाये जाते हुए मन्दिरके निर्माण-कार्यका अनुमोदन मात्र कर देते हैं, वे भी समस्त पापोंसे मुक्त हो उन अच्युतदेवके लोक (वैकुण्ठ अथवा गोलोकधामको) प्राप्त होते हैं। भगवान् विष्णुके निमित्त मन्दिरका निर्माण करके मनुष्य अपने भूतपूर्व तथा भविष्यमें होनेवाले दस हजार कुलोंको तत्काल विष्णुलोकमें जानेका अधिकारी बना देता है। श्रीकृष्ण-मन्दिरका निर्माण करनेवाले मनुष्यके पितर नरकके क्लेशोंसे तत्काल छुटकारा पा जाते हैं और दिव्य वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो बड़े हर्षके साथ विष्णुधाममें निवास करते हैं। देवालयका निर्माण ब्रह्महत्या आदि पापोंके पुञ्जका नाश करनेवाला है॥ १–५॥

यज्ञोंसे जिस फलकी प्राप्ति नहीं होती है, वह भी देवालयका निर्माण करानेमात्रसे प्राप्त हो जाता है। देवालयका निर्माण करा देनेपर समस्त तीर्थोंमें स्नान करनेका फल प्राप्त हो जाता है। देवता-ब्राह्मण आदिके लिये रणभूमिमें मारे जानेवाले धर्मात्मा शूरवीरोंको जिस फल आदिकी प्राप्ति होती है, वही देवालयके निर्माणसे भी सुलभ होता है। कोई शठता (कंजूसी)-के कारण धूल-मिट्टीसे भी देवालय बनवा दे तो वह उसे स्वर्ग या दिव्यलोक प्रदान करनेवाला होता है। एकायतन (एक ही देवविग्रहके लिये एक कमरेका) मन्दिर बनवानेवाले पुरुषको स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है। त्र्यायतन-मन्दिरका निर्माता ब्रह्मलोकमें निवास पाता है। पञ्चायतन-मन्दिरका निर्माण करनेवालेको शिवलोककी प्राप्ति होती है और अष्टायतन-मन्दिरके निर्माणसे श्रीहरिकी संनिधिमें रहनेका सौभाग्य प्राप्त होता है। जो षोडशायतन-

७८* अग्निपुराण *

मन्दिरका निर्माण कराता है, वह भोग और मोक्ष, दोनों पाता है। श्रीहरिके मन्दिरकी तीन श्रेणियाँ हैं—कनिष्ठ, मध्यम और श्रेष्ठ। इनका निर्माण करानेसे क्रमशः स्वर्गलोक, विष्णुलोक तथा मोक्षकी प्राप्ति होती है। धनी मनुष्य भगवान् विष्णुका उत्तम श्रेणीका मन्दिर बनवाकर जिस फलको प्राप्त करता है, उसे ही निर्धन मनुष्य निम्नश्रेणीका मन्दिर बनवाकर भी प्राप्त कर लेता है। धन-उपार्जनकर उसमेंसे थोड़ा-सा ही खर्च करके यदि मनुष्य देव-मन्दिर बनवा ले तो बहुत अधिक पुण्य एवं भगवान्का वरदान प्राप्त करता है। एक लाख या एक हजार या एक सौ अथवा उसका आधा (५०) मुद्रा ही खर्च करके भगवान् विष्णुका मन्दिर बनवानेवाला मनुष्य उस नित्य धामको प्राप्त होता है, जहाँ साक्षात् गरुडकी ध्वजा फहरानेवाले भगवान् विष्णु विराजमान होते हैं॥ ६-१२ $\frac{१}{२}$॥

जो लोग बचपनमें खेलते समय धूलिसे भगवान् विष्णुका मन्दिर बनाते हैं, वे भी उनके धामको प्राप्त होते हैं। तीर्थमें, पवित्र स्थानमें, सिद्धक्षेत्रमें तथा किसी आश्रमपर जो भगवान् विष्णुका मन्दिर बनवाते हैं, उन्हें अन्यत्र मन्दिर बनानेका जो फल बताया गया है, उससे तीन गुना अधिक फल मिलता है। जो लोग भगवान् विष्णुके मन्दिरको चूनेसे लिपाते और उसपर बन्धूकके फूलका चित्र बनाते हैं, वे अन्तमें भगवान्‌के धाममें पहुँच जाते हैं। भगवान्का जो मन्दिर गिर गया हो, गिर रहा हो, अथवा आधा गिर चुका हो, उसका जो मनुष्य जीर्णोद्धार करता है, वह नवीन मन्दिर बनवानेकी अपेक्षा दूना पुण्यफल प्राप्त करता है। जो गिरे हुए विष्णु-मन्दिरको पुनः बनवाता और गिरे हुएकी रक्षा करता है, वह मनुष्य साक्षात् भगवान् विष्णुका स्वरूप प्राप्त करता है। भगवान्‌के मन्दिरकी ईंटें जबतक रहती हैं, तबतक उसका बनवानेवाला विष्णुलोकमें कुलसहित प्रतिष्ठित होता है। इस संसारमें और परलोकमें वही पुण्यवान् और पूजनीय है॥ १३-२०॥

जो भगवान् श्रीकृष्णका मन्दिर बनवाता है, वही पुण्यवान् उत्पन्न हुआ है, उसीने अपने कुलकी रक्षा की है। जो भगवान् विष्णु, शिव, सूर्य और देवी आदिका मन्दिर बनवाता है, वही इस लोकमें कीर्तिका भागी होता है। सदा धनकी रक्षामें लगे रहनेवाले मूर्ख मनुष्यको बड़े कष्टसे कमाये हुए अधिक धनसे क्या लाभ हुआ, यदि वह उससे श्रीकृष्णका मन्दिर ही नहीं बनवाता। जिसका धन पितरों, ब्राह्मणों और देवताओंके उपयोगमें नहीं आता तथा बन्धु-बान्धवोंके भी उपयोगमें नहीं आ सका, उसके धनकी प्राप्ति व्यर्थ हुई। जैसे प्राणियोंकी मृत्यु निश्चित है, उसी प्रकार कमाये हुए धनका नाश भी निश्चित है। मूर्ख मनुष्य ही क्षणभङ्गुर जीवन और चञ्चल धनके मोहमें बँधा रहता है। जब धन दानके लिये, प्राणियोंके उपभोगके लिये, कीर्तिके लिये और धर्मके लिये काममें नहीं लाया जा सके तो उस धनका मालिक बननेमें क्या लाभ है? इसलिये प्रारब्धसे मिले अथवा पुरुषार्थसे, किसी भी उपायसे धनको प्राप्तकर उसे उत्तम ब्राह्मणोंको दान दे, अथवा कोई स्थिर कीर्ति बनवावे। चूँकि दान और कीर्तिसे भी बढ़कर मन्दिर बनवाना है, इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य विष्णु आदि देवताओंका मन्दिर आदि बनवावे। भक्तिमान् श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा यदि भगवान्‌के मन्दिरका निर्माण और उसमें भगवान्‌का प्रवेश (स्थापन आदि) हुआ तो यह समझना चाहिये कि उसने समस्त चराचर त्रिभुवनको रहनेके लिये भवन बनवा दिया। ब्रह्मासे लेकर

  • अध्याय ३८ * ७९

तृणपर्यन्त जो कुछ भी भूत, वर्तमान, भविष्य, स्थूल, सूक्ष्म और इससे भिन्न है, वह सब भगवान् विष्णुसे प्रकट हुआ है। उन देवाधिदेव सर्वव्यापक महात्मा विष्णुका मन्दिरमें स्थापन करके मनुष्य पुनः संसारमें जन्म नहीं लेता (मुक्त हो जाता है)। जिस प्रकार विष्णुका मन्दिर बनवानेमें फल बताया गया है, उसी प्रकार अन्य देवताओं—शिव, ब्रह्मा, सूर्य, गणेश, दुर्गा और लक्ष्मी आदिका भी मन्दिर बनवानेसे होता है। मन्दिर बनवानेसे अधिक पुण्य देवताकी प्रतिमा बनवानेमें है। देव-प्रतिमाकी स्थापना-सम्बन्धी जो यज्ञ होता है, उसके फलका तो अन्त ही नहीं है। कच्ची मिट्टीकी प्रतिमासे लकड़ीकी प्रतिमा उत्तम है, उससे ईंटकी, उससे भी पत्थरकी और उससे भी अधिक सुवर्ण आदि धातुओंकी प्रतिमाका फल है। देवमन्दिरका प्रारम्भ करने मात्रसे सात जन्मोंके किये हुए पापका नाश हो जाता है तथा बनवानेवाला मनुष्य स्वर्गलोकका अधिकारी होता है; वह नरकमें नहीं जाता। इतना ही नहीं, वह मनुष्य अपनी सौ पीढ़ीका उद्धार करके उसे विष्णुलोकमें पहुँचा देता है। यमराजने अपने दूतोंसे देवमन्दिर बनानेवालोंको लक्ष्य करके ऐसा कहा था—॥ २१—३५॥

यम बोले—(देवालय और) देव-प्रतिमाका निर्माण तथा उसकी पूजा आदि करनेवाले मनुष्योंको तुमलोग नरकमें न ले आना तथा जो देव-मन्दिर आदि नहीं बनवाते, उन्हें खास तौरपर पकड़ लाना। जाओ! तुमलोग संसारमें विचरो और न्यायपूर्वक मेरी आज्ञाका पालन करो। संसारके कोई भी प्राणी कभी तुम्हारी आज्ञा नहीं टाल सकेंगे। केवल उन लोगोंको तुम छोड़ देना जो कि जगत्पिता भगवान् अनन्तकी शरणमें जा चुके हैं; क्योंकि उन लोगोंकी स्थिति यहाँ (यमलोकमें) नहीं होती। संसारमें जहाँ भी भगवान्‌में चित्त लगाये हुए, भगवान्‌की ही शरणमें पड़े हुए भगवद्भक्त महात्मा सदा भगवान् विष्णुकी पूजा करते हों, उन्हें दूरसे ही छोड़कर तुमलोग चले जाना। जो स्थिर होते, सोते, चलते, उठते, गिरते, पड़ते या खड़े होते समय भगवान् श्रीकृष्णका नाम-कीर्तन करते हैं, उन्हें दूरसे ही त्याग देना। जो नित्य-नैमित्तिक कर्मोंद्वारा भगवान् जनार्दनकी पूजा करते हैं, उनकी ओर तुमलोग आँख उठाकर देखना भी नहीं; क्योंकि भगवान्‌का व्रत करनेवाले लोग भगवान्‌को ही प्राप्त होते हैं*॥ ३६—४१॥

जो लोग फूल, धूप, वस्त्र और अत्यन्त प्रिय आभूषणोंद्वारा भगवान्‌की पूजा करते हैं, उनका स्पर्श न करना; क्योंकि वे मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णके धामको पहुँच चुके हैं। जो भगवान्‌के मन्दिरमें लेप करते या बुहारी लगाते हैं, उनके पुत्रोंको तथा उनके वंशको भी छोड़ देना। जिन्होंने भगवान् विष्णुका मन्दिर बनवाया हो, उनके वंशमें सौ पीढ़ीत्तकके मनुष्योंकी ओर तुमलोग बुरे भावसे न देखना। जो लकड़ीका, पत्थरका अथवा मिट्टीका ही देवालय भगवान् विष्णुके लिये बनवाता है, वह समस्त पापोंसे


* यम उवाच— प्रतिमापूजादिकृतो नानेया नरकं नराः। देवालयाद्यकर्तारं आनेयास्ते विशेषतः॥ विचरध्वं यथान्यायं नियोगो मम पाल्यताम्। नाज्ञाभङ्गं करिष्यन्ति भवतां जन्तवः क्वचित्॥ केवलं ये जगत्तातमनन्त समुपाश्रिताः। भवद्भिः परिहर्त्तव्यास्तेषां नात्रास्ति संस्थितिः॥ यत्र भागवता लोके तच्चित्तास्तत्परायणाः। पूजयन्ति सदा विष्णुं ते च त्याज्याः सुदूरतः॥ यस्तिष्ठन् प्रस्वपन् गच्छन्नुत्तिष्ठन् स्खलिताः स्थिताः। संकीर्त्तयन्ति गोविन्दं ते वस्त्याज्याः सुदूरतः॥ नित्यैनैमित्तिकैर्देवं ये यजन्ति जनार्दनम्। नावलोक्या भवद्भिस्ते तद्व्रता यान्ति तद्गतिम्॥ (अग्निपु० ३८। ३६—४१)

८०* अग्निपुराण *

मुक्त हो जाता है। प्रतिदिन यज्ञोंद्वारा भगवान्‌की आराधना करनेवालेको जो महान् फल मिलता है, उसी फलको, जो विष्णुका मन्दिर बनवाता है, वह भी प्राप्त करता है। जो भगवान् अच्युतका मन्दिर बनवाता है, वह अपनी बीती हुई सौ पीढ़ीके पितरोंको तथा होनेवाले सौ पीढ़ीके वंशजोंको भगवान् विष्णुके लोकको पहुँचा देता है। भगवान् विष्णु ससलोकमय हैं। उनका मन्दिर जो बनवाता है, वह अपने कुलको तारता है, उन्हें अक्षय लोकोंकी प्राप्ति कराता है और स्वयं भी अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है। मन्दिरमें ईंटके समूहका जोड़ जितने वर्षोंतक रहता है, उतने ही हजार वर्षोंतक उस मन्दिरके बनवानेवालेकी स्वर्गलोकमें स्थिति होती है। भगवान्‌की प्रतिमा बनानेवाला विष्णुलोकको प्राप्त होता है, उसकी स्थापना करनेवाला भगवान्‌में लीन हो जाता है और देवालय बनवाकर उसमें प्रतिमाकी स्थापना करनेवाला सदा भगवान्‌के लोकमें निवास पाता है* ॥ ४२—५० ॥

अग्निदेव बोले—यमराजके इस प्रकार आज्ञा देनेपर यमके दूत भगवान् विष्णुकी स्थापना आदि करनेवालोंको यमलोकमें नहीं ले जाते। देवताओंकी प्रतिष्ठा आदिकी विधिका भगवान् हयग्रीवने ब्रह्माजीसे वर्णन किया था ॥ ५१ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'देवालय-निर्माण माहात्म्यादिका वर्णन' नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥


उन्तालीसवाँ अध्याय

विष्णु आदि देवताओंकी स्थापनाके लिये भूपरिग्रहका विधान

भगवान् हयग्रीव कहते हैं—ब्रह्मन् ! अब मैं विष्णु आदि देवताओंकी प्रतिष्ठाके विषयमें कहूँगा, ध्यान देकर सुनिये। इस विषयमें मेरे द्वारा वर्णित पञ्चरात्रों एवं सप्तरात्रोंका ऋषियोंने मानवलोकमें प्रचार किया है। वे संख्यामें पच्चीस हैं। (उनके नाम इस प्रकार हैं—) आदिहयशीर्षतन्त्र, त्रैलोक्यमोहनतन्त्र, वैभवतन्त्र, पुष्करतन्त्र, प्रह्लादतन्त्र, गार्ग्यतन्त्र, गालवतन्त्र, नारदीयतन्त्र, श्रीप्रश्वतन्त्र, शाण्डिल्यतन्त्र, ईश्वरतन्त्र, सत्यतन्त्र, शौनकत्तन्त्र, वसिष्ठोक्त ज्ञानसागरतन्त्र, स्वायम्भुवतन्त्र, कापिलतन्त्र, तार्क्ष्य (गारुड)-तन्त्र, नारायणीयतन्त्र, आत्रेयतन्त्र, नारसिंहतन्त्र, आनन्दतन्त्र, आरुणतन्त्र, बौधायनतन्त्र, अष्टाङ्गतन्त्र और विश्वतन्त्र ॥ १—५ ॥

इन तन्त्रोंके अनुसार मध्यदेश आदिमें उत्पन्न द्विज देवविग्रहोंकी प्रतिष्ठा करे। कच्छदेश, कावेरीतटवर्ती देश, कोंकण, कामरूप, कलिङ्ग, काञ्ची तथा काश्मीर देशमें उत्पन्न ब्राह्मण देवप्रतिष्ठा आदि न करे। आकाश, वायु, तेज, जल एवं पृथ्वी—


* ये पुष्पधूपवासोभिर्भूषणैश्चातिवल्लभैः । अर्चयन्ति न ते ग्राह्या नराः कृष्णालये गताः ॥
उपलेपनकर्तारः सम्मार्जनपराश्च ये । कृष्णालये परित्याज्यास्तेषां पुत्रास्तथा कुलम् ॥
येन चायतनं विष्णोः कारितं तत्कुलोद्भवम् । पुंसां शतं नावलोक्यं भवद्भिर्दुष्टचेतसा ॥
यस्तु देवालयं विष्णोर्दारुशैलमयं तथा । कारयेन्मृन्मयं वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
अह्न्यहनि यज्ञेन यजतो यन्महाफलम् । प्राप्नोति तत्फलं विष्णोर्यः कारयति केतनम् ॥
कुलानां शतमागामि समतीतं तथा शतम् । कारयन् भगवद्धाम नयत्यच्युतलोकताम् ॥
ससलोकमयो विष्णुस्तस्य यः कुरुते गृहम् । तारयत्यक्षयाँल्लोकानक्षयान् प्रतिपद्यते ॥
इष्टकाचयविन्यासो यावन्त्यब्दानि तिष्ठति । तावद्वर्षसहस्राणि तत्कर्तुर्दिवि संस्थितिः ॥
प्रतिमाकृद् विष्णुलोकं स्थापको लीयते हरौ । देवसद्यप्रतिकृतिप्रतिष्ठाकृत्तु गोचरे ॥
(अग्निपु० ३८ । ४२—५०)

  • अध्याय ४० * ८९

ये पञ्चमहाभूत पञ्चरात्र हैं। जो चेनाशून्य एवं अज्ञानान्धकारसे आच्छन्न हैं, वे पञ्चरात्रसे रहित हैं। जो मनुष्य यह धारणा करता है कि 'मैं पापमुक्त परब्रह्म विष्णु हूँ'—वह देशिक होता है। वह समस्त बाह्य लक्षणों (वेष आदि)-से हीन होनेपर भी तन्त्रवेत्ता आचार्य माना गया है॥६-८$\frac{\text{१}}{\text{२}}$॥

देवताओंकी नगराभिमुख स्थापना करनी चाहिये। नगरकी ओर उनका पृष्ठभाग नहीं होना चाहिये। कुरुक्षेत्र, गया आदि तीर्थस्थानोंमें अथवा नदीके समीप देवालयका निर्माण कराना चाहिये। ब्रह्माका मन्दिर नगरके मध्यमें तथा इन्द्रका पूर्व दिशामें उत्तम माना गया है। अग्निदेव तथा मातृकाओंका आग्नेयकोणमें, भूतगण और यमराजका दक्षिणमें, चण्डिका, पितृगण एवं दैत्यादिका मन्दिर नैर्ऋत्य-कोणमें बनवाना चाहिये। वरुणका पश्चिममें, वायुदेव और नागका वायव्यकोणमें, यक्ष या कुबेरका उत्तर दिशामें, चण्डीश-महेशका ईशानकोणमें और विष्णुका मन्दिर सभी ओर बनवाना श्रेष्ठ है। ज्ञानवान् मनुष्यको पूर्ववर्ती देव-मन्दिरको संकुचित करके अल्प, समान या विशाल मन्दिर नहीं बनवाना चाहिये॥९-१३$\frac{\text{१}}{\text{२}}$॥

(किसी देव-मन्दिरके समीप मन्दिर बनवानेपर) दोनों मन्दिरोंकी ऊँचाईके बराबर दुगुनी सीमा छोड़कर नवीन देव-प्रासादका निर्माण करावे। विद्वान् व्यक्ति दोनों मन्दिरोंको पीडित न करे। भूमिको शोधन करनेके बाद भूमि-परिग्रह करे। तदनन्तर प्राकारकी सीमातक माष, हरिद्राचूर्ण, खील, दधि और सक्तुसे भूतबलि प्रदान करे। फिर अष्टाक्षरमन्त्र पढ़कर आठों दिशाओंमें सक्तु बिखेरते हुए कहे—'इस भूमिखण्डपर जो राक्षस एवं पिशाच आदि निवास करते हों, वे सब यहाँसे चले जायँ। मैं यहाँपर श्रीहरिके लिये मन्दिरका निर्माण करूँगा$^{१}$।' फिर भूमिको हलसे जुतवाकर गोचारण करावे। आठ परमाणुका 'रथरेणु' माना गया है। आठ रथरेणुका 'त्रसरेणु' माना जाता है। आठ त्रसरेणुका 'बालाग्र' तथा आठ बालाग्रकी 'लिक्षा' कही जाती है। आठ लिक्षाकी 'यूका,' आठ यूकाका 'यवमध्यम', आठ यवका 'अङ्गुल,' चौबीस अङ्गुलका 'कर' और अट्ठाईस अङ्गुलका 'पद्महस्त' होता है$^{२}$॥१४-२१॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें विष्णु आदि देवताओंकी स्थापनाके लिये 'भूपरिग्रहका वर्णन' नामक उन्तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥३९॥

चालीसवाँ अध्याय वास्तुमण्डलवर्ती देवताओंके स्थापन, पूजन, अर्घ्यदान तथा बलिदान आदिकी विधि

**भगवान् हयग्रीव कहते हैं—**ब्रह्मन्! पूर्वकालमें सम्पूर्ण भूत-प्राणियोंके लिये भयंकर एक महाभूत था। देवताओंने उसे भूमिमें निहित कर दिया। उसीको 'वास्तुपुरुष' माना गया है। चतुःषष्टि पदोंसे युक्त क्षेत्रमें अर्धकोणमें स्थित ईश (या शिखी)-को घृत एवं अक्षतोंसे तृप्त करे। फिर एक पदमें स्थित पर्जन्यको कमल तथा जलसे, दो पदोंमें स्थित जयन्तको पताकासे, दो कोष्ठोंमें


१. राक्षसाश्च पिशाचाश्च येऽस्मिंस्तिष्ठन्ति भूतले। सर्वे ते व्यपगच्छन्तु स्थानं कुर्यामहं हरेः॥ २. श्रीविद्यार्णवतन्त्रमें यह मान इस प्रकार दिया गया है— वातायनपथं प्राप्य ये भान्ति रविरश्मयः। तेषु सूक्ष्मा विसर्पन्ते रेणवस्त्रसरेणवः॥ परमाणोरष्टगुणस्त्रसरेणुरुदाहृतः । तेऽष्टौ केशाग्रयास्तेऽष्टौ लिक्षा यूकास्तदष्टकम्॥ तदष्टकं यवस्तेऽष्टावङ्गुलिः समुदाहृता। सा तूत्तमाङ्गुलिः सप्तयवा सैव तु मध्यमा॥ षड्यवा साधमा प्रोक्ता मानाङ्गुलमितीरितम्॥ (१२।१-४)

८२ * अग्निपुराण *

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स्थित महेन्द्रको भी उसीसे, द्विपदस्थ रविको सभी लाल रंगकी वस्तुओंसे संतुष्ट करे। दो पदोंमें स्थित सत्यको वितान (चंदोवों)-से एवं एकपदस्थ भृशको घृतसे, अग्निकोणवर्ती अर्धपदमें स्थित व्योम (आकाश)-को शाकुननामक औषधके गूदेसे, उसी कोणके दूसरे अर्धपदमें स्थित अग्निदेवको स्रुक्से, एकपदस्थ पूषाको लाजा (खील)-से, द्विपदस्थ वितथको स्वर्णसे, एकपदस्थ गृहक्षतको माखनसे, एक पदमें स्थित यमराजको उड़दमिश्रित भातसे, द्विपदस्थ गन्धर्वको गन्धसे, एकपदस्थ भृङ्गको शाकुनजिह्वा नामक ओषधिसे, अर्धपदमें स्थित मृगको नीले वस्त्रसे, अर्धकोष्ठके निम्नभागमें विद्यमान पितृगणको कृशर (खिचड़ी)-से, एकपदस्थ दौवारिकको दन्तकाष्ठसे एवं दो पदोंमें स्थित सुग्रीवको यव-निर्मित पदार्थ (हलुवा आदि)-से परितृप्त करे॥१—७$\frac{१}{२}$॥

द्विपदस्थ पुष्पदन्तको कुश-समूहोंसे, दो पदोंमें स्थित वरुणको पद्मसे, द्विपदस्थ असुरको सुरासे, एक पदमें स्थित शेषको घृतमिश्रित जलसे, अर्धपदस्थित पाप (या पापयक्ष्मा)-को यवान्नसे, अर्धपदस्थ रोगको माँड़से, एकपदस्थित नाग (सर्प)- को नागपुष्पसे, द्विपदगत मुख्यको भक्ष्य-पदार्थोंसे, एकपदस्थ भल्लाटको मूंग-भातसे, एकपद-संस्थित सोमको मधुयुक्त खीरसे, दो पदोंमें अधिष्ठित ऋषिको शालूकसे, एक पदमें विद्यमान अदितिको लोपिकासे एवं अर्धपदस्थ दितिको पूरियोंद्वारा संतुष्ट करे। फिर ईशानस्थित ईशके निम्न भागमें अर्धपदस्थित 'आप'को दुग्धसे एवं उसके नीचे अर्धपदमें अधिष्ठित आप-वत्सको दहीसे संतुष्ट करे। साथ ही पूर्ववर्ती कोष्ठ-चतुष्टयमें मरीचिको लड्डू देकर तृप्त करे। ब्रह्माके ऊर्ध्वभागके कोणस्थित कोष्ठमें अर्धपदस्थ सावित्रको रक्तपुष्प निवेदन करे। उसके निम्नवर्ती अर्ध कोष्ठकमें स्थित सविताको कुशोदक प्रदान करे। चार पदोंमें स्थित विवस्वान्‌को रक्तचन्दन, नैर्ऋत्यकोणवर्ती अर्धकोष्ठमें स्थित सुराधिप इन्द्रको हरिद्रामिश्रित जलका अर्घ्य दे। उसीके अर्धभागमें कोणवर्ती कोष्ठकमें स्थित इन्द्रजय (अथवा जय)-को घृतका अर्घ्य दे। चतुष्पदमें मित्रको गुड़युक्त पायस दे। वायव्यकोणके आधे कोष्ठकमें प्रतिष्ठित रुद्रको पकायी हुई उड़द (या उसका बड़ा) एवं उसके अधोवर्ती अर्धकोष्ठमें स्थित यक्ष (या रुद्रदास)- को आर्द्रफल (अंगूर, सेव आदि) समर्पित करे। चतुष्पदवर्ती महीधर (या पृथ्वीधर)-को उड़दमिश्रित अन्न एवं माष (उड़द)-की बलि दे। मध्यवर्ती कोष्ठ-चतुष्टयमें भगवान् ब्रह्माके निमित्त तिल- तण्डुल स्थापित करे। चरकीको उड़द और घृतसे, स्कन्दको खिचड़ी तथा पुष्पमालासे, विदारीको लाल कमलसे, कन्दर्पको एक पलके तोलवाले भातसे, पूतनाको पलपित्तसे, जम्भकको उड़द एवं पुष्पमालासे, पापा या पापराक्षसीको पित्त, पुष्पमाला एवं अस्थियोंसे तथा पिलिपित्सको भाँति-भाँतिकी मालाके द्वारा संतुष्ट करे। तदनन्तर ईशान आदि दिक्पालोंको लाल उड़दकी बलि दे। इन सबके अभावमें अक्षतोंसे सबकी पूजा करनी चाहिये*। राक्षस, मातृका, गण, पिशाच, पितर एवं क्षेत्रपालको भी इच्छानुसार (दही- अक्षत या दही-उड़दकी) बलि प्रदान करनी चाहिये॥८—२१॥

वास्तु-होम एवं बलि-प्रदानसे इनकी तृप्ति किये बिना प्रासाद आदिका निर्माण नहीं करना चाहिये। ब्रह्माके स्थानमें श्रीहरि, श्रीलक्ष्मीजी तथा गणदेवताकी पूजा करें। फिर भूमि, वास्तुपुरुष एवं वर्धनीयुक्त कलशका पूजन करे। कलशके


* वर्तमान समयमें अक्षतसे ही सबका पूजन करना चाहिये। इससे शास्त्रीय आज्ञाका भी परिपालन होता है तथा हिंसा आदि दोषकी भी प्राप्ति नहीं होती है।

  • अध्याय ४१ * ८३

मध्यमें ब्रह्मा तथा दिक्पालोंका यजन करे। फिर स्वस्तिवाचन एवं प्रणाम करके पूर्णाहुति दे। ब्रह्मन्! तदनन्तर गृहपति हाथमें छिद्रयुक्त जलपात्र लेकर विधिपूर्वक दक्षिणावर्त मण्डल बनाते हुए सूत्रमार्गसे जलधाराको घुमावे। फिर पूर्ववत् उसी मार्गसे सात बीजोंका वपन करे। उसी मार्गसे खात (गड्ढे)-का आरम्भ करे। तदनन्तर मध्यमें हाथभर चौड़ा एवं चार अङ्गुल नीचा गर्त खोद ले। उसको लीप-पोतकर पूजन प्रारम्भ करे। सर्वप्रथम चार भुजाधारी श्रीविष्णु भगवान्‌का ध्यान करके उन्हें कलशसे अर्घ्य-प्रदान करे। फिर छिद्रयुक्त जलपात्र (झारी)-से गर्तको भरकर उसमें श्वेत पुष्प डाले। उस श्रेष्ठ दक्षिणावर्त गर्तको बीज एवं मृत्तिकासे भर दे। इस प्रकार अर्घ्यदानका कार्य निष्पन्न करके आचार्यको गो-वस्त्रादिका दान करे। ज्योतिषी और स्थपति (राजमिस्त्री)-का यथोचित सत्कार करके विष्णुभक्त और सूर्यका पूजन करे। फिर भूमिको यत्नपूर्वक जलपर्यन्त खुदवावे। मनुष्यके बराबरकी गहराईसे नीचे यदि शल्य (हड्डी आदि) हो तो वह गृहके लिये दोषकारक नहीं होता है। अस्थि (शल्य) होनेपर घरकी दीवार टूट जाती है और गृहपतिको सुख नहीं प्राप्त होता है। खुदाईके समय जिस जीव-जन्तुका नाम सुनायी दे जाय, वह शल्य उसी जीवके शरीरसे उद्भूत जानना चाहिये॥ २२-३१॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वास्तु-देवताओंके अर्घ्य-दान-विधान आदिका वर्णन' नामक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४०॥


इकतालीसवाँ अध्याय

शिलान्यासकी विधि

भगवान् हयग्रीव बोले—अब मैं शिलान्यासस्वरूपा पाद-प्रतिष्ठाका वर्णन करूँगा। पहले मण्डप बनाना चाहिये; फिर उसमें चार कुण्ड बनावे। वे कुण्ड क्रमशः कुम्भन्यास$^१$, इष्टकान्यास$^२$, द्वार और खम्भेके शुभ आश्रय होंगे। कुण्डका तीन चौथाई हिस्सा कंकड़ आदिसे भर दे और बराबर करके उसपर वास्तुदेवताका पूजन करे। नींवमें डाली जानेवाली ईंटें खूब पकी हों; बारह-बारह अङ्गुलकी लंबी हों तथा विस्तारके तिहाई भागके बराबर, अर्थात् चार अङ्गुल उनकी मोटाई होनी चाहिये। अगर पत्थरका मन्दिर बनवाना हो तो ईंटकी जगह पत्थर ही नींवमें डाला जायगा। एक-एक पत्थर एक-एक हाथका लंबा होना चाहिये। (यदि सामर्थ्य हो तो) ताँबेके नौ कलशोंकी, अन्यथा मिट्टीके बने नौ कलशोंकी स्थापना करे। जल, पञ्चकषाय$^३$, सर्वौषधि और चन्दनमिश्रित जलसे उन कलशोंको पूर्ण करना चाहिये। इसी प्रकार सोना, धान आदिसे युक्त तथा गन्ध-चन्दन आदिसे भलीभाँति पूजित करके उन जलपूर्ण कलशोंद्वारा 'आपो$^४$ हि ष्ठा'


१. कलशकी स्थापना।
२. ईंट या पत्थरकी स्थापना।
३. तन्त्रके अनुसार निम्नाङ्कित पाँच वृक्षोंका कषाय—जामुन, सेमर, खिरैंटी, मौलसिरी और बेर। यह कषाय वृक्षकी छालको पानीमें भिगोकर निकाला जाता है और कलशमें डालने एवं दुर्गापूजन आदिके काम आता है।
४. ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः। ॐ ता न ऊर्जे दधातन। ॐ महे रणाय चक्षसे। ॐ यो वः शिवतमो रसः। ॐ तस्य भाजयतेह नः। ॐ उशतीरिव मातरः। ॐ तस्मा अरं गमाम वः। ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ। ॐ आपो जनयथा च नः। (यजु०, अ० ११, मन्त्र ५०, ५१, ५२)

८४ * अग्निपुराण * ═══════════════════════════════════════════════════════════════════════════════

इत्यादि तीन ऋचाओं, 'शं नो देवीरभिष्टय' आदि मन्त्रों 'तरत्स मन्दीः' इत्यादि मन्त्र एवं पावमानी$^३$ ऋचाओंके तथा 'उदुत्तमं वरुण$^४$' 'कया$^५$ नः' और 'वरुणस्योत्तम्भनमसि$^६$' इत्यादि मन्त्रोंके पाठपूर्वक 'हंसः शुचिषद्$^७$' इत्यादि मन्त्र तथा श्रीसूक्तका भी उच्चारण करते हुए बहुत-सी शिलाओं अथवा ईंटोंका अभिषेक करे। फिर उन्हें नींवमें स्थापित करके मण्डपके भीतर एक शय्यापर पूर्वमण्डलमें भगवान् श्रीविष्णुका पूजन करे। अरणी-मन्थनद्वारा अग्नि प्रकट करके द्वादशाक्षर-मन्त्रसे उसमें समिधाओंका हवन करना चाहिये॥ १-९॥

'आधार' और 'आज्यभाग' नामक आहुतियाँ प्रणवमन्त्रसे ही करावे। फिर अष्टाक्षर-मन्त्रसे आठ आहुति देकर ॐ भूः स्वाहा, ॐ भुवः स्वाहा, ॐ स्वः स्वाहा—इस प्रकार तीन व्याहृतियोंसे क्रमशः लोकेश्वर अग्नि, सोमग्रह और भगवान् पुरुषोत्तमके निमित्त हवन करे। इसके बाद प्रायश्चित्तसंज्ञक हवन करके प्रणवयुक्त द्वादशाक्षर मन्त्रसे उड़द, घी और तिलको एक साथ लेकर पूर्णाहुति-हवन करना चाहिये। तत्पश्चात् आचार्य पूर्वाभिमुख होकर आठ दिशाओंमें स्थापित कलशोंपर पृथक्-पृथक् पद्म आदि देवताओंका स्थापन-पूजन करे। बीचमें भी धरती लीपकर पत्थरकी एक शिला और कलश स्थापित करे। इन नौ कलशोंपर क्रमशः नीचे लिखे देवताओंकी स्थापना करनी चाहिये॥ १०-१३॥

पद्म, महापद्म, मकर, कच्छप, कुमुद, आनन्द, पद्म और शङ्ख—इनको आठ कलशोंमें और पद्मिनीको मध्यवर्ती कलशपर स्थापित करे॥ १४॥

इन कलशोंको हिलावे-डुलावे नहीं; उनके निकट पूर्व आदिके क्रमसे ईशानकोणतक एक-एक ईंट रख दे। फिर उनपर उनकी देवता विमला आदि शक्तियोंका न्यास (स्थापन) करना चाहिये$^८$। बीचमें 'अनुग्रहा'की स्थापना करे। इसके बाद इस प्रकार प्रार्थना करे—'मुनिवर अङ्गिराकी सुपुत्री इष्टका देवी, तुम्हारा कोई अङ्ग टूटा-फूटा या खराब नहीं हुआ है; तुम अपने सभी अङ्गोंसे पूर्ण हो। मेरा अभीष्ट पूर्ण करो। अब मैं प्रतिष्ठा करा रहा हूँ'॥ १५-१७॥

उत्तम आचार्य इस मन्त्रसे इष्टकाओंकी स्थापना करनेके पश्चात् एकाग्रचित्त होकर मध्यवाले स्थानमें गर्भाधान करे। (उसकी विधि यों है—) एक कलशके ऊपर देवेश्वर भगवान् नारायण तथा


१. शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभिस्स्रवन्तु नः॥ (अथर्व०, १।६।१)
२. तरत्स मन्दी धावति धारा सुतस्यान्धसः। तरत्स मन्दी धावति॥
उस्त्रा वेद वसूनां मर्तस्य देव्यवसः। तरत्स मन्दी धावति॥
ध्वस्रयोः पुरुषन्त्योरा सहस्राणि दद्महे। तरत्स मन्दी धावति॥
आ ययोस्त्रिंशतं तना सहस्राणि च दद्महे। तरत्स मन्दी धावति॥ (ऋ०, मं० ९, सू० ५८।१-४)
३. ऋग्वेद, नवम मण्डल, अध्याय १, २, ३के सूक्तोंको 'पावमानसूक्त' तथा ऋचाओंको 'पावमानी ऋचाएँ' कहते हैं।
४. उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यमं श्रथाय। अथावयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम॥ (यजु०, १२।१२)
५. कया नश्चित्र आभुवदूती सदावृधः सखा। कया शचिष्ठया वृता॥ (यजु०, ३६।४)
६. वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद॥ (यजु०, ४।३६)
७. हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्। नृषद्वरसद्ऋतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत्॥ (यजु० १०।२४; कठ० २।२।२)
८. विमला आदि शक्तियोंके नाम इस प्रकार हैं—
विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशाना तथा अनुग्रहा।

  • अध्याय ४१ * ८५

पद्मिनी (लक्ष्मी) देवीको स्थापित करके उनके पास मिट्टी, फूल, धातु और रत्नोंको रखे। इसके बाद लोहे आदिके बने हुए गर्भपात्रमें, जिसका विस्तार बारह अङ्गुल और ऊँचाई चार अङ्गुल हो, अस्त्रकी पूजा करे। फिर ताँबेके बने हुए कमलके आकारवाले एक पात्रमें पृथ्वीका पूजन करे और इस प्रकार प्रार्थना करे—'सम्पूर्ण भूतोंकी ईश्वरी पृथ्वीदेवी! तुम पर्वतोंके आसनसे सुशोभित हो; चारों ओर समुद्रोंसे घिरी हुई हो; एकान्तमें गर्भ धारण करो। वसिष्ठकन्या नन्दा! वसुओं और प्रजाओंके सहित तुम मुझे आनन्दित करो। भार्गवपुत्री जया! तुम प्रजाओंको विजय दिलानेवाली हो। (मुझे भी विजय दो।) अङ्गिराकी पुत्री पूर्णा! तुम मेरी कामनाएँ पूर्ण करो। महर्षि कश्यपकी कन्या भद्रा! तुम मेरी बुद्धि कल्याणमयी कर दो। सम्पूर्ण बीजोंसे युक्त और समस्त रत्नों एवं औषधोंसे सम्पन्न सुन्दरी जया देवी तथा वसिष्ठपुत्री नन्दा देवी! यहाँ आनन्दपूर्वक रम जाओ। हे कश्यपकी कन्या भद्रा! तुम प्रजापतिकी पुत्री हो, चारों ओर फैली हुई हो, परम महान् हो; साथ ही सुन्दरी और सुकान्त हो, इस गृहमें रमण करो। हे भार्गवी देवी! तुम परम आश्चर्यमयी हो; गन्ध और माल्य आदिसे सुशोभित एवं पूजित हो; लोकोंको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली देवि! तुम इस गृहमें रमण करो। इस देशके सम्राट्, इस नगरके राजा और इस घरके मालिकके बाल-बच्चोंको तथा मनुष्य आदि प्राणियोंको आनन्द देनेके लिये पशु आदि सम्पदाकी वृद्धि करो।' इस प्रकार प्रार्थना करके वास्तु-कुण्डको गोमूत्रसे सींचना चाहिये॥ १८-२८॥

यह सब विधि पूर्ण करके कुण्डमें गर्भको स्थापित करे। यह गर्भाधान रातमें होना चाहिये। उस समय आचार्यको गौ-वस्त्र आदि दान करे तथा अन्य लोगोंको भोजन दे। इस प्रकार गर्भपात्र रखकर और ईंटोंको भी रखकर उस कुण्डको भर दे। तत्पश्चात् मन्दिरकी ऊँचाईके अनुसार प्रधानदेवताके पीठका निर्माण करे। 'उत्तम पीठ' वह है, जो ऊँचाईमें मन्दिरके आधे विस्तारके बराबर हो। उत्तम पीठकी अपेक्षा एक चौथाई कम ऊँचाई होनेपर मध्यम पीठ कहलाता है और उत्तम पीठकी आधी ऊँचाई होनेपर 'कनिष्ठ पीठ' होता है। पीठ-बन्धके ऊपर पुनः वास्तु-याग (वास्तुदेवताका पूजन) करना चाहिये। केवल पाद-प्रतिष्ठा करनेवाला मनुष्य भी सब पापोंसे रहित होकर देवलोकमें आनन्द-भोग करता है॥ २९-३२॥

मैं देवमन्दिर बनवा रहा हूँ, ऐसा जो मनसे चिन्तन भी करता है, उसका शारीरिक पाप उसी दिन नष्ट हो जाता है। फिर जो विधिपूर्वक मन्दिर बनवाता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है? जो आठ ईंटोंका भी देवमन्दिर बनवाता है, उसके फलकी सम्पत्तिका भी कोई वर्णन नहीं कर सकता। इसीसे विशाल मन्दिर बनवानेसे मिलनेवाले महान् फलका अनुमान कर लेना चाहिये॥ ३३-३५॥

गाँवके बीचमें अथवा गाँवसे पूर्वदिशामें यदि मन्दिर बनवाया जाय तो उसका दरवाजा पश्चिमकी ओर रखना चाहिये और सब कोणोंमेंसे किसी ओर बनवाना हो तो गाँवकी ओर दरवाजा रखे। गाँवसे दक्षिण, उत्तर या पश्चिमदिशामें मन्दिर बने, तो उसका दरवाजा पूर्वदिशाकी ओर रखना चाहिये॥ ३६-३७॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सर्वशिलाविन्यासविधान आदिका कथन' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४१॥

८६* अग्निपुराण *

बयालीसवाँ अध्याय

प्रासाद-लक्षण-वर्णन

भगवान् हयग्रीव कहते हैं— ब्रह्मन्! अब मैं सर्वसाधारण प्रासाद (देवालय)-का वर्णन करता हूँ, सुनो। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि जहाँ मन्दिरका निर्माण कराना हो, वहाँके चौकोर क्षेत्रके सोलह भाग करे। उसमें मध्यके चार भागोंद्वारा आयसहित गर्भ (मन्दिरके भीतरी भागकी रिक्त भूमि) निश्चित करे तथा शेष बारह भागोंको दीवार उठानेके लिये नियत करे। उक्त बारह भागोंमेंसे चार भागकी जितनी लंबाई है, उतनी ही ऊँचाई प्रासादकी दीवारोंकी होनी चाहिये। विद्वान् पुरुष दीवारोंकी ऊँचाईसे दुगुनी शिखरकी ऊँचाई रखे। शिखरके चौथे भागकी ऊँचाईके अनुसार मन्दिरकी परिक्रमाकी ऊँचाई रखे। उसी मानके अनुसार दोनों पार्श्व भागोंमें निकलनेका मार्ग (द्वार) बनाना चाहिये। वे द्वार एक-दूसरेके समान होने चाहिये। मन्दिरके सामनेके भूभागका विस्तार भी शिखरके समान ही करना चाहिये। जिस तरह उसकी शोभा हो सके, उसके अनुरूप उसका विस्तार शिखरसे दूना भी किया जा सकता है। मन्दिरके आगेका सभामण्डप विस्तारमें मन्दिरके गर्भसूत्रसे दूना होना चाहिये। मन्दिरके पादस्तम्भ आदि भित्तिके बराबर ही लंबे बनाये जायें। वे मध्यवर्ती स्तम्भोंसे विभूषित हों। अथवा मन्दिरके गर्भका जो मान है, वही उसके मुख-मण्डप (सभामण्डप या जगमोहन)-का भी रखे। तत्पश्चात् इक्यासी पदों (स्थानों)-से युक्त वास्तु-मण्डपका आरम्भ करे॥ १–७॥

इनमें पहले द्वारन्यासके समीपवर्ती पदोंके भीतर स्थित होनेवाले देवताओंका पूजन करे। फिर परकोटेके निकटवर्ती एवं सबसे अन्तके पदोंमें स्थापित होनेवाले बत्तीस देवताओंकी पूजा करे¹॥ ८॥

यह प्रासादका सर्वसाधारण लक्षण है। अब प्रतिमाके मानके अनुसार दूसरे प्रासादका वर्णन सुनो॥ ९॥

जितनी बड़ी प्रतिमा हो, उतनी ही बड़ी सुन्दर पिण्डी बनावे। पिण्डीके आधे मानसे गर्भका निर्माण करे और गर्भके ही मानके अनुसार भित्तियाँ उठावे। भीतोंकी लंबाईके अनुसार ही उनकी ऊँचाई रखे। विद्वान् पुरुष भीतरकी ऊँचाईसे दुगुनी शिखरकी ऊँचाई करावे। शिखरकी अपेक्षा चौथाई ऊँचाईमें मन्दिरकी परिक्रमा बनवावे तथा इसी ऊँचाईमें मन्दिरके आगेके मुख-मण्डपका भी निर्माण करावे॥ १०–१२॥

गर्भके आठवें अंशके मापका रथकोंके निकलनेका मार्ग (द्वार) बनावे। अथवा परिधिके तृतीय भागके अनुसार वहाँ रथकों (छोटे-छोटे रथों)-की रचना करावे तथा उनके भी तृतीय भागके मापका उन रथोंके निकलनेके मार्ग (द्वार)-का निर्माण करावे। तीन रथकोंपर सदा तीन वामोंकी स्थापना करे॥ १३–१४॥

शिखरके लिये चार सूत्रोंका निपातन करे। शुकनासोंके ऊपरसे सूतको तिरछा गिरावे।


¹ १. नारदपुराण, पूर्वभाग, द्वितीय पाद, ५६वें अध्यायके ६०० से लेकर ६०३ तकके श्लोकोंमें भी यही बात कही गयी है।
² २. शिखरके चार भाग करके नीचेके दो भागोंको 'शुकनासा' कहते हैं। उसके ऊपरके तीसरे भागमें वेदी होती है, जिसपर उसका कण्ठमात्र स्थित होता है। सबसे ऊपरके चतुर्थ भागमें 'आमलसार' संज्ञक कण्ठका निर्माण कराया जाना चाहिये। जैसा कि मत्स्यपुराणमें कहा है—

चतुर्धा शिखरं भज्य अर्धभागद्वयस्य तु। शुकनासं प्रकुर्वीत तृतीये वेदिका मता॥
कण्ठमामलसारं तु चतुर्थे परिकल्पयेत्। (२६९। १८–१९)

  • अध्याय ४३ * ८७

शिखरके आधे भागमें सिंहकी प्रतिमाका निर्माण करावे। शुकनासापर सूतको स्थिर करके उसे मध्य संधितक ले जाय॥ १५-१६॥

इसी प्रकार दूसरे पार्श्वमें भी सूत्रपात करे। शुकनासाके ऊपर वेदी हो और वेदीके ऊपर आमलसार नामक कण्ठसहित कलशका निर्माण कराया जाय। उसे विकराल न बनाया जाय। जहाँतक वेदीका मान है, उससे ऊपर ही कलशकी कल्पना होनी चाहिये। मन्दिरके द्वारकी जितनी चौड़ाई हो, उससे दूनी उसकी ऊँचाई रखनी चाहिये। द्वारको बहुत ही सुन्दर और शोभासम्पन्न बनाना चाहिये। द्वारके ऊपरी भागमें सुंदर मङ्गलमय वस्तुओंके साथ गूलरकी दो शाखाएँ स्थापित करे (खुदवावे) ॥ १७-१९॥

द्वारके चतुर्थांशमें चण्ड, प्रचण्ड, विष्वक्सेन और वत्सदण्ड — इन चार द्वारपालोंकी मूर्तियोंका निर्माण करावे। गूलरकी शाखाओंके अर्ध भागमें सुंदर रूपवाली लक्ष्मीदेवीके श्रीविग्रहको अङ्कित करे। उनके हाथमें कमल हो और दिग्गज कलशोंके जलद्वारा उन्हें नहला रहे हों। मन्दिरके परकोटेकी ऊँचाई उसके चतुर्थांशके बराबर हो। प्रासादके गोपुरकी ऊँचाई प्रासादसे एक चौथाई कम हो। यदि देवताका विग्रह पाँच हाथका हो तो उसके लिये एक हाथकी पीठिका होनी चाहिये॥ २०-२२॥

विष्णु-मन्दिरके सामने एक गरुडमण्डप तथा भौमादि धामका निर्माण करावे। भगवान्‌के श्रीविग्रहके सब ओर आठों दिशाओंके ऊपरी भागमें भगवत्प्रतिमासे दुगुनी बड़ी अवतारोंकी मूर्तियाँ बनावे। पूर्व दिशामें वराह, दक्षिणमें नृसिंह, पश्चिममें श्रीधर, उत्तरमें हयग्रीव, अग्निकोणमें परशुराम, नैर्ऋत्यकोणमें श्रीराम, वायव्यकोणमें वामन तथा ईशानकोणमें वासुदेवकी मूर्तिका निर्माण करे। प्रासाद-रचना आठ, बारह आदि समसंख्यावाले स्तम्भोंद्वारा करनी चाहिये। द्वारके अष्टम आदि अंशको छोड़कर जो वेध होता है, वह दोषकारक नहीं होता है॥ २३-२६॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'प्रासाद आदिके लक्षणका वर्णन' नामक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४२॥


तैंतालीसवाँ अध्याय

मन्दिरके देवताकी स्थापना और भूतशान्ति आदिका कथन

हयग्रीवजी कहते हैं— ब्रह्मन्! अब मैं मन्दिरमें स्थापित करनेयोग्य देवताओंका वर्णन करूँगा, आप सुनें। पञ्चायतन मन्दिरमें जो बीचका प्रधान मन्दिर हो, उसमें भगवान् वासुदेवको स्थापित करे। शेष चार मन्दिरोंमेंसे अग्निकोणवाले मन्दिरमें भगवान् वामनकी, नैर्ऋत्यकोणमें नरसिंहकी, वायव्यकोणमें हयग्रीवकी और ईशानकोणमें वराहभगवान्‌की स्थापना करे। अथवा यदि बीचमें भगवान् नारायणकी स्थापना करे तो अग्निकोणमें दुर्गाकी, नैर्ऋत्यकोणमें सूर्यकी, वायव्यकोणमें ब्रह्माकी और ईशानकोणमें लिङ्गमय शिवकी स्थापना करे। अथवा ईशानमें रुद्ररूपकी स्थापना करे। अथवा एक-एक आठ दिशाओंमें और एक बीचमें — इस प्रकार कुल नौ मन्दिर बनवावे। उनमेंसे बीचमें वासुदेवकी स्थापना करे और पूर्वादि दिशाओंमें परशुराम-राम आदि मुख्य-मुख्य नौ अवतारोंकी तथा इन्द्र आदि लोकपालोंकी स्थापना करनी चाहिये। अथवा कुल नौ धामोंमें पाँच मन्दिर मुख्य बनवावे। इनके मध्यमें भगवान् पुरुषोत्तमकी स्थापना करे॥ १-५॥

८८ * अग्निपुराण *

पूर्व दिशामें लक्ष्मी और कुबेरकी, दक्षिणमें मातृकागण, स्कन्द, गणेश और शिवकी, पश्चिममें सूर्य आदि नौ ग्रहोंकी तथा उत्तरमें मत्स्य आदि दस अवतारोंकी स्थापना करे। इसी प्रकार अग्निकोणमें चण्डीकी, नैर्ऋत्यकोणमें अम्बिकाकी, वायव्यकोणमें सरस्वतीकी और ईशानकोणमें लक्ष्मीजीकी स्थापना करनी चाहिये। मध्यभागमें वासुदेव अथवा नारायणकी स्थापना करे। अथवा तेरह कमरोंवाले देवालयके मध्यभागमें विश्वरूप भगवान् विष्णुकी स्थापना करे॥ ६-८॥

पूर्व आदि दिशाओंमें केशव आदि द्वादश विग्रहोंको स्थापित करे तथा इनसे अतिरिक्त गृहोंमें साक्षात् ये श्रीहरि ही विराजमान होते हैं। भगवान्‌की प्रतिमा मिट्टी, लकड़ी, लोहा, रत्न, पत्थर, चन्दन और फूल—इन सात वस्तुओंकी बनी हुई सात प्रकारकी मानी जाती है। फूल, मिट्टी तथा चन्दनकी बनी हुई प्रतिमाएँ बननेके बाद तुरंत पूजी जाती हैं। (अधिक कालके लिये नहीं होतीं।) पूजन करनेपर ये समस्त कामनाओंको पूर्ण करती हैं। अब मैं शैलमयी प्रतिमाका वर्णन करता हूँ, जहाँ प्रतिमा बनानेमें शिला (पत्थर)-का उपयोग किया जाता है॥ ९-११॥

उत्तम तो यह है कि किसी पर्वतका पत्थर लाकर प्रतिमा बनवावे। पर्वतोंके अभावमें जमीनसे निकले हुए पत्थरका उपयोग करे। ब्राह्मण आदि चारों वर्णवालोंके लिये क्रमशः सफेद, लाल, पीला और काला पत्थर उत्तम माना गया है। यदि ब्राह्मण आदि वर्णवालोंको उनके वर्णके अनुकूल उत्तम शिला न मिले तो उसमें आवश्यक वर्णकी कमीकी पूर्ति करनेके लिये नरसिंह-मन्त्रसे हवन करना चाहिये। यदि शिलामें सफेद रेखा हो तो वह बहुत ही उत्तम है, अगर काली रेखा हो तो वह नरसिंह-मन्त्रसे हवन करनेपर उत्तम होती है। यदि शिलासे काँसेके बने हुए घण्टेकी-सी आवाज निकलती हो और काटनेपर उससे चिनगारियाँ निकलती हों तो वह 'पुँल्लिङ्ग' है, ऐसा समझना चाहिये। यदि उपर्युक्त चिह्न उसमें कम दिखायी दें, तो उसे 'स्त्रीलिङ्ग' समझना चाहिये और पुँल्लिङ्ग-स्त्रीलिङ्ग-बोधक कोई रूप न होनेपर उसे 'नपुंसक' मानना चाहिये। तथा जिस शिलामें कोई मण्डलका चिह्न दिखायी दे, उसे सगर्भा समझकर त्याग देना चाहिये॥ १२-१५॥

प्रतिमा बनानेके लिये वनमें जाकर वनयाग आरम्भ करना चाहिये। वहाँ कुण्ड खोदकर और उसे लीपकर मण्डपमें भगवान् विष्णुका पूजन करना चाहिये तथा उन्हें बलि समर्पणकर कर्ममें उपयोगी टंक आदि शस्त्रोंकी भी पूजा करनी चाहिये। फिर हवन करनेके पश्चात् अगहनीके चावलके जलसे अस्त्र-मन्त्र (अस्त्राय फट्)-के उच्चारणपूर्वक उस शिलाको सींचना चाहिये। नरसिंह-मन्त्रसे उसकी रक्षा करके मूल-मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय)-से पूजन करे। फिर पूर्णाहूति-होम करके आचार्य भूतोंके लिये बलि समर्पित करें। वहाँ जो भी अव्यक्तरूपसे रहनेवाले जन्तु, यातुधान (राक्षस), गुह्यक और सिद्ध आदि हों अथवा और भी जो हों, उन सबका पूजन करके इस प्रकार क्षमा-प्रार्थना करनी चाहिये॥ १६-१९॥

'भगवान् केशवकी आज्ञासे प्रतिमाके लिये हमलोगोंकी यह यात्रा हुई है। भगवान् विष्णुके लिये जो कार्य हो, वह आपलोगोंका भी कार्य है। अतः हमारे दिये हुए इस बलिदानसे आपलोग सर्वथा तृप्त हों और शीघ्र ही यह स्थान छोड़कर कुशलपूर्वक अन्यत्र चले जायें'॥ २०-२१॥

इस प्रकार सावधान करनेपर वे जीव बड़े प्रसन्न होते हैं और सुखपूर्वक उस स्थानको छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं। इसके बाद

  • अध्याय ४४ * ८९

कारीगरोंके साथ यज्ञका चरु भक्षण करके रातमें सोते समय स्वप्न-मन्त्रका जप करे। 'जो समस्त प्राणियोंके निवास-स्थान हैं, व्यापक हैं, सबको उत्पन्न करनेवाले हैं, स्वयं विश्वरूप हैं और सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है, उन स्वप्नके अधिपति भगवान् श्रीहरिको नमस्कार है। देव! देवेश्वर! मैं आपके निकट सो रहा हूँ। मेरे मनमें जिन कार्योंका संकल्प है, उन सबके सम्बन्धमें मुझसे कुछ कहिये'॥ २२-२४॥

'ॐ ॐ हूं फट् विष्णवे स्वाहा।' इस प्रकार मन्त्र-जप करके सो जानेपर यदि अच्छा स्वप्न हो तो सब शुभ होता है और यदि बुरा स्वप्न हुआ तो नरसिंह-मन्त्रसे हवन करनेपर शुभ होता है। सबेरे उठकर अस्त्र-मन्त्रसे शिलापर अर्घ्य दे। फिर अस्त्रकी भी पूजा करे। कुदाल (फावड़े), टंक और शस्त्र आदिके मुखपर मधु और घी लगाकर पूजन करना चाहिये। अपने-आपको विष्णुरूपसे चिन्तन करे। कारीगरको विश्वकर्मा माने और शस्त्रके भी विष्णुरूप होनेकी ही भावना करे। फिर शस्त्र कारीगरको दे और उसका मुख-पृष्ठ आदि उसे दिखा दे॥ २५-२७॥

कारीगर अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखे और हाथमें टंक लेकर उससे उस शिलाको चौकोर बनावे। फिर पिण्डी बनानेके लिये उसे कुछ छोटी करे। इसके बाद शिलाको वस्त्रमें लपेटकर रथपर रखे और शिल्पशालामें लाकर पुनः उस शिलाका पूजन करे। इसके बाद कारीगर प्रतिमा बनावे॥ २८-२९॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मन्दिरके देवताकी स्थापना, भूतशान्ति, शिला-लक्षण और प्रतिमा-निर्माण आदिका निरूपण' नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४३॥


चौवालीसवाँ अध्याय

वासुदेव आदिकी प्रतिमाओंके लक्षण

भगवान् हयग्रीव बोले—ब्रह्मन्! अब मैं तुम्हें वासुदेव आदिकी प्रतिमाके लक्षण बताता हूँ, सुनो। मन्दिरके उत्तर भागमें शिलाको पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख रखकर उसकी पूजा करे और उसे बलि अर्पित करके कारीगर शिलाके बीचमें सूत लगाकर उसका नौ भाग करे। नवें भागको भी १२ भागोंमें विभाजित करनेपर एक-एक भाग अपने अङ्गुलसे एक अङ्गुलका होता है। दो अङ्गुलका एक गोलक होता है, जिसे 'कालनेत्र' भी कहते हैं॥ १-३॥

उक्त नौ भागोंमेंसे एक भागके तीन हिस्से करके उसमें पार्ष्णि-भागकी कल्पना करे। एक भाग घुटनेके लिये तथा एक भाग कण्ठके लिये निश्चित रखे। मुकुटको एक बित्ता रखे। मुँहका भाग भी एक बित्तेका ही होना चाहिये। इसी प्रकार एक बित्तेका कण्ठ और एक ही बित्तेका हृदय भी रहे। नाभि और लिङ्गके बीचमें एक बित्तेका अन्तर होना चाहिये। दोनों ऊरु दो बित्तेके हों। जंघा भी दो बित्तेकी हो। अब सूत्रोंका माप सुनो—॥ ४-६॥

दो सूत पैरमें और दो सूत जङ्घामें लगावे। घुटनोंमें दो सूत तथा दोनों ऊरुओंमें भी दो सूतका उपयोग करे। लिङ्गमें दूसरे दो सूत तथा कटिमें भी कमरबन्ध (करधन) बनानेके लिये दूसरे दो सूतोंका योग करे। नाभिमें भी दो सूत काममें लावे। इसी प्रकार हृदय और कण्ठमें दो सूतका उपयोग करे। ललाटमें दूसरे और मस्तकमें दूसरे दो सूतोंका उपयोग करे। बुद्धिमान् कारीगरोंको

९० * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

मुकुटके ऊपर एक सूत करना चाहिये। ब्रह्मन्! ऊपर सात ही सूत देने चाहिये। तीन कक्षाओंके अन्तरसे ही छः सूत्र दिलावे। फिर मध्य-सूत्रको त्याग दे और केवल सूत्रोंको ही निवेदित करे॥ ७–११॥

ललाट, नासिका और मुखका विस्तार चार अङ्गुलका होना चाहिये। गला और कानका भी चार-चार अङ्गुल विस्तार करना चाहिये। दोनों ओरकी हनु (ठोढ़ी) दो-दो अङ्गुल चौड़ी हो और चिबुक (ठोढ़ीके बीचका भाग) भी दो अङ्गुलका हो। पूरा विस्तार छः अङ्गुलका होना चाहिये। इसी प्रकार ललाट भी विस्तारमें आठ अङ्गुलका बताया गया है। दोनों ओरके शङ्ख दो-दो अङ्गुलके बनाये जायँ और उनपर बाल भी हों। कान और नेत्रके बीचमें चार अङ्गुलका अन्तर रहना चाहिये। दो-दो अङ्गुलके कान एवं पृथक् बनावे। भौंहोंके समान सूत्रके मापका कानका स्रोत कहा गया है। बिंधा हुआ कान छः अङ्गुलका हो और बिना बिंधा हुआ चार अङ्गुलका। अथवा बिंधा हो या बिना बिंधा, सब चिबुकके समान छः अङ्गुलका होना चाहिये॥ १२–१६॥

गन्धपात्र, आवर्त तथा शष्कुली (कानका पूरा घेरा) भी बनावे। एक अङ्गुलमें नीचेका ओठ और आधे अङ्गुलका ऊपरका ओठ बनावे। नेत्रका विस्तार आधा अङ्गुल हो और मुखका विस्तार चार अङ्गुल हो। मुखकी चौड़ाई डेढ़ अङ्गुलकी होनी चाहिये। नाककी ऊँचाई एक अङ्गुल हो और ऊँचाईसे आगे केवल लंबाई दो अङ्गुलकी रहे। करवीर-कुसुमके समान उसकी आकृति होनी चाहिये। दोनों नेत्रोंके बीच चार अङ्गुलका अन्तर हो। दो अङ्गुल तो आँखके घेरेमें आ जाता है, सिर्फ दो अङ्गुल अन्तर रह जाता है। पूरे नेत्रका तीन भाग करके एक भागके बराबर तारा (काली पुतली) बनावे और पाँच भाग करके, एक भागके बराबर दृक्तारा (छोटी पुतली) बनावे। नेत्रका विस्तार दो अङ्गुलका हो और द्रोणी आधे अङ्गुलकी। उतना ही प्रमाण भौंहोंकी रेखाका हो। दोनों ओरकी भौंहें बराबर रहनी चाहिये। भौंहोंका मध्य दो अङ्गुलका और विस्तार चार अङ्गुलका होना चाहिये॥ १७–२२॥

भगवान् केशव आदिकी मूर्तियोंके मस्तकका पूरा घेरा छब्बीस अङ्गुलका होवे अथवा बत्तीस अङ्गुलका। नीचे ग्रीवा (गला) पाँच नेत्र (अर्थात् दस अङ्गुल)-की हो और इसके तीन गुना अर्थात् तीस अङ्गुल उसका वेष्टन (चारों ओरका घेरा) हो। नीचेसे ऊपरकी ओर ग्रीवाका विस्तार आठ अङ्गुलका हो। ग्रीवा और छातीके बीचका अन्तर ग्रीवाके तीन गुने विस्तारवाला होना चाहिये। दोनों ओरके कंधे आठ-आठ अङ्गुलके और सुन्दर अंस तीन-तीन अङ्गुलके हों। सात नेत्र (यानी चौदह अङ्गुल)-की दोनों बाहें और सोलह अङ्गुलकी दोनों प्रबाहुएँ हों (बाहु और प्रबाहु मिलकर पूरी बाँह समझी जाती है)। बाहुओंकी चौड़ाई छः अङ्गुलकी हो। प्रबाहुओंकी भी इनके समान ही होनी चाहिये। बाहुदण्डका चारों ओरका घेरा कुछ ऊपरसे लेकर नौ कला अथवा सत्रह अङ्गुल समझना चाहिये। आधेपर बीचमें कूर्पर (कोहनी) है। कूर्परका घेरा सोलह अङ्गुलका होता है। ब्रह्माजी! प्रबाहुके मध्यमें उसका विस्तार सोलह अङ्गुलका हो। हाथके अग्रभागका विस्तार बारह अङ्गुल हो और उसके बीच करतलका विस्तार छः अङ्गुल कहा गया है। हाथकी चौड़ाई सात अङ्गुलकी करे। हाथके मध्यमा अङ्गुलीकी लंबाई पाँच अङ्गुलकी हो और तर्जनी तथा अनामिकाकी लंबाई उससे आधा अङ्गुल कम अर्थात् ४॥ अङ्गुलकी करे।

  • अध्याय ४४ * ९१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

कनिष्ठिका और अँगूठेकी लंबाई चार अङ्गुलकी करे। अँगूठेमें दो पोरु बनावे और बाकी सभी अँगु़लियोंमें तीन-तीन पोरु रखे। सभी अँगु़लियोंके एक-एक पोरुके आधे भागके बराबर प्रत्येक अँगुलीके नखकी नाप समझनी चाहिये। छातीकी जितनी माप हो, पेटकी उतनी ही रखे। एक अङ्गुलके छेदवाली नाभि हो। नाभिसे लिङ्गके बीचका अन्तर एक बित्ता होना चाहिये॥ २३-३३॥

नाभि-मध्याङ्ग (उदर)-का घेरा बयालीस अङ्गुलका हो। दोनों स्तनोंके बीचका अन्तर एक बित्ता होना चाहिये। स्तनोंका अग्रभाग—चुचुक यवके बराबर बनावे। दोनों स्तनोंका घेरा दो पदोंके बराबर हो। छातीका घेरा चौंसठ अङ्गुलका बनावे। उसके नीचे और चारों ओरका घेरा 'वेष्टन' कहा गया है। इसी प्रकार कमरका घेरा चौवन अङ्गुलका होना चाहिये। ऊरुओंके मूलका विस्तार बारह-बारह अङ्गुलका हो। इसके ऊपर मध्यभागका विस्तार अधिक रखना चाहिये। मध्यभागसे नीचेके अङ्गोंका विस्तार क्रमशः कम होना चाहिये। घुटनोंका विस्तार आठ अङ्गुलका करे और उसके नीचे जंघाका घेरा तीन गुना, अर्थात् चौबीस अङ्गुलका हो; जंघाके मध्यका विस्तार सात अङ्गुलका होना चाहिये और उसका घेरा तीन गुना, अर्थात् इक्कीस अङ्गुलका हो। जंघाके अग्रभागका विस्तार पाँच अङ्गुल और उसका घेरा तीन गुना—पंद्रह अङ्गुलका हो। चरण एक-एक बित्ते लंबे होने चाहिये। विस्तारसे उठे हुए पैर अर्थात् पैरोंकी ऊँचाई चार अङ्गुलकी हो। गुल्फ (घुट्टी)-से पहलेका हिस्सा भी चार अङ्गुलका ही हो॥ ३४-४०॥

दोनों पैरोंकी चौड़ाई छः अङ्गुलकी, गुह्यभाग तीन अङ्गुलका और उसका पंजा पाँच अङ्गुलका होना चाहिये। पैरोंमें प्रदेशिनी, अर्थात् अँगूठा चौड़ा होना उचित है। शेष अँगु़लियोंके मध्यभागका विस्तार क्रमशः पहली अँगुलीके आठवें-आठवें भागके बराबर कम होना चाहिये। अँगूठेकी ऊँचाई सवा अङ्गुल बतायी गयी है। इसी प्रकार अँगूठेके नखका प्रमाण और अँगु़लियोंसे दूना रखना चाहिये। दूसरी अँगुलीके नखका विस्तार आधा अङ्गुल तथा अन्य अँगु़लियोंके नखोंका विस्तार क्रमशः जरा-जरा-सा कम कर देना चाहिये॥ ४१-४३॥

दोनों अण्डकोष तीन-तीन अङ्गुल लंबे बनावे और लिङ्ग चार अङ्गुल लंबा करे। इसके ऊपरका भाग चार अङ्गुल रखे। अण्डकोषोंका पूरा घेरा छः-छः अङ्गुलका होना चाहिये। इसके सिवा भगवान्‌की प्रतिमा सब प्रकारके भूषणोंसे भूषित करनी चाहिये। यह लक्षण उद्देश्यमात्र (संक्षेपसे) बताया गया है॥ ४४-४५॥

इसी प्रकार लोकमें देखे जानेवाले अन्य लक्षणोंको भी दृष्टिमें रखकर प्रतिमामें उसका निर्माण करना चाहिये। दाहिने हाथोंमेंसे ऊपरवाले हाथमें चक्र और नीचेवाले हाथमें पद्म धारण करावे। बायें हाथोंमेंसे ऊपरवाले हाथमें शङ्ख और नीचेवाले हाथमें गदा बनावे। यह वासुदेव श्रीकृष्णका चिह्न है, अतः उन्हींकी प्रतिमामें रहना चाहिये। भगवान्‌के निकट हाथमें कमल लिये हुए लक्ष्मी तथा वीणा धारण किये पुष्टि देवीकी भी प्रतिमा बनावे। इनकी ऊँचाई (भगवद्विग्रहके) ऊरुओंके बराबर होनी चाहिये। इनके अलावा प्रभामण्डलमें स्थित मालाधर और विद्याधरका विग्रह बनावे। प्रभा हस्ती आदिसे भूषित होती है। भगवान्‌के चरणोंके नीचेका भाग अर्थात् पादपीठ कमलके आकारका बनावे। इस प्रकार देव-प्रतिमाओंमें उक्त लक्षणोंका समावेश करना चाहिये॥ ४६-४९॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वासुदेव आदिकी प्रतिमाओंके लक्षणका वर्णन' नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४४॥

९२ * अग्निपुराण *


पैंतालीसवाँ अध्याय

पिण्डिका आदिके लक्षण

भगवान् हयग्रीव कहते हैं— ब्रह्मन्! अब मैं पिण्डिकाका लक्षण बता रहा हूँ। पिण्डिका लंबाईमें प्रतिमाके समान ही होती है, परंतु उसकी ऊँचाई प्रतिमासे आधी होती है। पिण्डिकाको चौंसठ कुटों (पदों या कोष्ठकों)-से युक्त करके नीचेकी दो पङ्क्ति छोड़ दे और उसके ऊपरका जो कोष्ठ है, उसे चारों ओर दोनों पार्श्वोंमें भीतरकी ओरसे मिटा दे। इसी तरह ऊपरकी दो पङ्क्तियोंको त्यागकर उसके नीचेका जो एक कोष्ठ (या एक पङ्क्ति) है, उसे भीतरकी ओरसे यत्नपूर्वक मिटा दे। दोनों पार्श्वोंमें समान रूपसे यह क्रिया करे॥ १—३॥

दोनों पार्श्वोंके मध्यगत जो दो चौक हैं, उनका भी मार्जन कर दे। तदनन्तर उसे चार भागोंमें बाँटकर विद्वान् पुरुष ऊपरकी दो पङ्क्तियोंको मेखला माने। मेखलाभागकी जो मात्रा है, उसके आधे मानके अनुसार उसमें खात खुदवावे। फिर दोनों पार्श्वभागोंमें समानरूपसे एक-एक भागको त्यागकर बाहरकी ओरका एक पद नाली बनानेके लिये दे दे। विद्वान् पुरुष उसमें नाली बनवाये। फिर तीन भागमें जो एक भाग है, उसके आगे जल निकलनेका मार्ग रहे॥ ४—६॥

नाना प्रकारके भेदसे यह शुभ पिण्डिका 'भद्रा' कही गयी है। लक्ष्मी देवीकी प्रतिमा ताल (हथेली)-के मापसे आठ तालकी बनायी जानी चाहिये। अन्य देवियोंकी प्रतिमा भी ऐसी ही हो। दोनों भौंहोंको नासिकाकी अपेक्षा एक-एक जौ अधिक बनावे और नासिकाको उनकी अपेक्षा एक जौ कम। मुखकी गोलाई नेत्रगोलकसे बड़ी होनी चाहिये। वह ऊँचा और टेढ़ा-मेढ़ा न हो। आँखें बड़ी-बड़ी बनानी चाहिये। उनका माप सवा तीन जौके बराबर हो। नेत्रोंकी चौड़ाई उनकी लंबाईकी अपेक्षा आधी करे। मुखके एक कोनेसे लेकर दूसरे कोनेतककी जितनी लंबाई है, उसके बराबरके सूतसे नापकर कर्णपाश (कानका पूरा घेरा) बनावे। उसकी लंबाई उक्त सूतसे कुछ अधिक ही रखे। दोनों कंधोंको कुछ झुका हुआ और एक कलासे रहित बनावे। ग्रीवाकी लंबाई डेढ़ कला रखनी चाहिये। वह उतनी ही चौड़ाईसे भी सुशोभित हो। दोनों ऊरुओंका विस्तार ग्रीवाकी अपेक्षा एक नेत्र¹ कम होगा। जानु (घुटने), पिण्डली, पैर, पीठ, नितम्ब तथा कटिभाग—इन सबकी यथायोग्य कल्पना करे॥ ७—११$\frac{१}{२}$॥

हाथकी अँगुलियाँ बड़ी हों। वे परस्पर अवरुद्ध न हों। बड़ी अँगुलीकी अपेक्षा छोटी अँगुलियाँ सातवें अंशसे रहित हों। जंघा, ऊरु और कटि—इनकी लंबाई क्रमशः एक-एक नेत्र कम हो। शरीरके मध्यभागके आस-पासका अङ्ग गोल हो। दोनों कुच घने (परस्पर सटे हुए) और पीन (उभड़े हुए) हों। स्तनोंका माप हथेलीके बराबर हो। कटि उनकी अपेक्षा डेढ़ कला अधिक बड़ी हो। शेष चिह्न पूर्ववत् रहें। लक्ष्मीजीके दाहिने हाथमें कमल और बायें हाथमें बिल्वफल हो।² उनके पार्श्वभागमें हाथमें चँवर लिये दो सुन्दरी स्त्रियाँ खड़ी हों³। सामने बड़ी नाकवाले गरुड़की स्थापना करे। अब मैं चक्राङ्कित (शालग्राम) मूर्ति आदिका वर्णन करता हूँ॥ १२—१५॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पिण्डिका आदिके लक्षणका वर्णन' नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥


१. नेत्रकी जो लंबाई और चौड़ाई है, उतने मापको 'एक नेत्र' कहते हैं।
२. मत्स्यपुराणमें दाहिने हाथमें श्रीफल और बायें हाथमें कमलका उल्लेख है—
'पद्मं हस्ते प्रदातव्यं श्रीफलं दक्षिणे करे।' (२६१।४३)
३. मत्स्यपुराणमें अनेक चामरधारिणी स्त्रियोंका वर्णन है—'पार्श्वे तस्याः स्त्रियः कार्याश्चामरव्यग्रपाणयः।' (२६१।४५)

* अध्याय ४६ *९३

छियालीसवाँ अध्याय

शालग्राम-मूर्तियोंके लक्षण

भगवान् हयग्रीव कहते हैं— ब्रह्मन्! अब मैं शालग्रामगत भगवन्मूर्तियोंका वर्णन आरम्भ करता हूँ, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं। जिस शालग्राम-शिलाके द्वारमें दो चक्रके चिह्न हों और जिसका वर्ण श्वेत हो, उसकी 'वासुदेव' संज्ञा है। जिस उत्तम शिलाका रंग लाल हो और जिसमें दो चक्रके चिह्न संलग्न हों, उसे भगवान् 'संकर्षण'का श्रीविग्रह जानना चाहिये। जिसमें चक्रका सूक्ष्म चिह्न हो, अनेक छिद्र हों, नील वर्ण हो और आकृति बड़ी दिखायी देती हो, वह 'प्रद्युम्न'की मूर्ति है।$^१$ जहाँ कमलका चिह्न हो, जिसकी आकृति गोल और रंग पीला$^२$ हो तथा जिसमें दो-तीन रेखाएँ शोभा पा रही हों, यह 'अनिरुद्ध'का श्रीअङ्ग है। जिसकी कान्ति काली, नाभि उन्नत और जिसमें बड़े-बड़े छिद्र हों, उसे 'नारायण'का स्वरूप समझना चाहिये। जिसमें कमल और चक्रका चिह्न हो, पृष्ठभागमें छिद्र हो और जो बिन्दुसे युक्त हो, वह शालग्राम 'परमेष्ठी' नामसे प्रसिद्ध है। जिसमें चक्रका स्थूल चिह्न हो, जिसकी कान्ति श्याम हो और मध्यमें गदा-जैसी रेखा हो, उस शालग्रामकी 'विष्णु' संज्ञा है॥ १–४॥

नृसिंह-विग्रहमें चक्रका स्थूल चिह्न होता है। उसकी कान्ति कपिल वर्णकी होती है और उसमें पाँच बिन्दु सुशोभित होते हैं।$^३$

वाराह-विग्रहमें शक्ति नामक अस्त्रका चिह्न होता है। उसमें दो चक्र होते हैं, जो परस्पर विषम (समानतासे रहित) हैं। उसकी कान्ति इन्द्रनील मणिके समान नीली होती है। वह तीन स्थूल रेखाओंसे चिह्नित एवं शुभ होता है।$^४$ जिसका पृष्ठभाग ऊँचा हो, जो गोलाकार आवर्त्तचिह्नसे युक्त एवं श्याम हो, उस शालग्रामकी 'कूर्म' (कच्छप) संज्ञा है॥ ५-६॥

जो अंकुशकी-सी रेखासे सुशोभित, नीलवर्ण एवं बिन्दुयुक्त हो, उस शालग्राम-शिलाको 'हयग्रीव' कहते हैं। जिसमें एक चक्र और कमलका चिह्न हो, जो मणिके समान प्रकाशमान तथा पुच्छाकार रेखासे शोभित हो, उस शालग्रामको 'वैकुण्ठ' समझना चाहिये।$^६$ जिसकी आकृति बड़ी हो, जिसमें तीन बिन्दु शोभा पाते हों, जो काँचके समान श्वेत तथा भरा-पूरा हो, वह शालग्राम-शिला मत्स्यावतारधारी भगवान्‌की मूर्ति मानी जाती है।$^७$ जिसमें वनमालाका चिह्न और पाँच रेखाएँ हों, उस गोलाकार शालग्राम-शिलाको 'श्रीधर' कहते हैं॥ ७-८॥

गोलाकार, अत्यन्त छोटी, नीली एवं बिन्दुयुक्त शालग्राम-शिलाकी 'वामन' संज्ञा है।$^९$ जिसकी कान्ति श्याम हो, दक्षिण भागमें हारकी रेखा और बायें भागमें बिन्दु का चिह्न हो, उस शालग्राम-


१. वाचस्पत्यकोषमें संकलित गरुड़पुराण (४५वें अध्याय)-के निम्नाङ्कित वचनसे 'प्रद्युम्न-शिलाका पीतवर्ण सूचित होता है।' यथा—
'अथ प्रद्युम्नः सूक्ष्मचक्रस्तु पीतकः।'
२. उक्त ग्रन्थके अनुसार ही अनिरुद्धका नीलवर्ण सूचित होता है। यथा—'अनिरुद्धस्तु वर्तुलो नीलो द्वारि त्रिरेखश्च।'
३. पृथुचक्रो नृसिंहोऽथ कपिलोऽव्यात्त्रिबिन्दुकः। अथवा पञ्चबिन्दुस्तत्पूजनं ब्रह्मचारिणाम्॥ (इति गरुडपुराणेऽपि)
४. वराहः शुभलिङ्गोऽव्याद् विषमस्थद्विचक्रकः। नीलस्त्रिरेखः स्थूलः। (ग०पु०)
५. अथ कूर्ममूर्तिः स बिन्दुमान्। कृष्णः स वर्तुलावर्तः पातु चोन्नतपृष्ठकः। (ग०पु०)
६. हयग्रीवोऽङ्कुशाकारः पञ्चरेखः सकौस्तुभः। वैकुण्ठो मणिरत्नाभ एकचक्राम्बुजोऽसितः॥ (ग०पु०)
७. मत्स्यो दीर्घाम्बुजाकारो हारेखश्च पातु वः। (ग०पु०)
८. श्रीधरः पञ्चरेखोऽव्याद् वनमाली गदान्वितः। (ग०पु०) (वाचस्पत्यकोषसे संकलित)
९. वामनो वर्तुलो ह्रस्वः वामचक्रः सुरेश्वरः। (ग० पु०)