अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अध्याय ४१ * ८३
मध्यमें ब्रह्मा तथा दिक्पालोंका यजन करे। फिर स्वस्तिवाचन एवं प्रणाम करके पूर्णाहुति दे। ब्रह्मन्! तदनन्तर गृहपति हाथमें छिद्रयुक्त जलपात्र लेकर विधिपूर्वक दक्षिणावर्त मण्डल बनाते हुए सूत्रमार्गसे जलधाराको घुमावे। फिर पूर्ववत् उसी मार्गसे सात बीजोंका वपन करे। उसी मार्गसे खात (गड्ढे)-का आरम्भ करे। तदनन्तर मध्यमें हाथभर चौड़ा एवं चार अङ्गुल नीचा गर्त खोद ले। उसको लीप-पोतकर पूजन प्रारम्भ करे। सर्वप्रथम चार भुजाधारी श्रीविष्णु भगवान्का ध्यान करके उन्हें कलशसे अर्घ्य-प्रदान करे। फिर छिद्रयुक्त जलपात्र (झारी)-से गर्तको भरकर उसमें श्वेत पुष्प डाले। उस श्रेष्ठ दक्षिणावर्त गर्तको बीज एवं मृत्तिकासे भर दे। इस प्रकार अर्घ्यदानका कार्य निष्पन्न करके आचार्यको गो-वस्त्रादिका दान करे। ज्योतिषी और स्थपति (राजमिस्त्री)-का यथोचित सत्कार करके विष्णुभक्त और सूर्यका पूजन करे। फिर भूमिको यत्नपूर्वक जलपर्यन्त खुदवावे। मनुष्यके बराबरकी गहराईसे नीचे यदि शल्य (हड्डी आदि) हो तो वह गृहके लिये दोषकारक नहीं होता है। अस्थि (शल्य) होनेपर घरकी दीवार टूट जाती है और गृहपतिको सुख नहीं प्राप्त होता है। खुदाईके समय जिस जीव-जन्तुका नाम सुनायी दे जाय, वह शल्य उसी जीवके शरीरसे उद्भूत जानना चाहिये॥ २२-३१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वास्तु-देवताओंके अर्घ्य-दान-विधान आदिका वर्णन' नामक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४०॥
इकतालीसवाँ अध्याय
शिलान्यासकी विधि
भगवान् हयग्रीव बोले—अब मैं शिलान्यासस्वरूपा पाद-प्रतिष्ठाका वर्णन करूँगा। पहले मण्डप बनाना चाहिये; फिर उसमें चार कुण्ड बनावे। वे कुण्ड क्रमशः कुम्भन्यास$^१$, इष्टकान्यास$^२$, द्वार और खम्भेके शुभ आश्रय होंगे। कुण्डका तीन चौथाई हिस्सा कंकड़ आदिसे भर दे और बराबर करके उसपर वास्तुदेवताका पूजन करे। नींवमें डाली जानेवाली ईंटें खूब पकी हों; बारह-बारह अङ्गुलकी लंबी हों तथा विस्तारके तिहाई भागके बराबर, अर्थात् चार अङ्गुल उनकी मोटाई होनी चाहिये। अगर पत्थरका मन्दिर बनवाना हो तो ईंटकी जगह पत्थर ही नींवमें डाला जायगा। एक-एक पत्थर एक-एक हाथका लंबा होना चाहिये। (यदि सामर्थ्य हो तो) ताँबेके नौ कलशोंकी, अन्यथा मिट्टीके बने नौ कलशोंकी स्थापना करे। जल, पञ्चकषाय$^३$, सर्वौषधि और चन्दनमिश्रित जलसे उन कलशोंको पूर्ण करना चाहिये। इसी प्रकार सोना, धान आदिसे युक्त तथा गन्ध-चन्दन आदिसे भलीभाँति पूजित करके उन जलपूर्ण कलशोंद्वारा 'आपो$^४$ हि ष्ठा'
१. कलशकी स्थापना।
२. ईंट या पत्थरकी स्थापना।
३. तन्त्रके अनुसार निम्नाङ्कित पाँच वृक्षोंका कषाय—जामुन, सेमर, खिरैंटी, मौलसिरी और बेर। यह कषाय वृक्षकी छालको पानीमें भिगोकर निकाला जाता है और कलशमें डालने एवं दुर्गापूजन आदिके काम आता है।
४. ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः। ॐ ता न ऊर्जे दधातन। ॐ महे रणाय चक्षसे। ॐ यो वः शिवतमो रसः। ॐ तस्य भाजयतेह नः। ॐ उशतीरिव मातरः। ॐ तस्मा अरं गमाम वः। ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ। ॐ आपो जनयथा च नः। (यजु०, अ० ११, मन्त्र ५०, ५१, ५२)
८४ * अग्निपुराण * ═══════════════════════════════════════════════════════════════════════════════
इत्यादि तीन ऋचाओं, 'शं नो देवीरभिष्टय' आदि मन्त्रों 'तरत्स मन्दीः' इत्यादि मन्त्र एवं पावमानी$^३$ ऋचाओंके तथा 'उदुत्तमं वरुण$^४$' 'कया$^५$ नः' और 'वरुणस्योत्तम्भनमसि$^६$' इत्यादि मन्त्रोंके पाठपूर्वक 'हंसः शुचिषद्$^७$' इत्यादि मन्त्र तथा श्रीसूक्तका भी उच्चारण करते हुए बहुत-सी शिलाओं अथवा ईंटोंका अभिषेक करे। फिर उन्हें नींवमें स्थापित करके मण्डपके भीतर एक शय्यापर पूर्वमण्डलमें भगवान् श्रीविष्णुका पूजन करे। अरणी-मन्थनद्वारा अग्नि प्रकट करके द्वादशाक्षर-मन्त्रसे उसमें समिधाओंका हवन करना चाहिये॥ १-९॥
'आधार' और 'आज्यभाग' नामक आहुतियाँ प्रणवमन्त्रसे ही करावे। फिर अष्टाक्षर-मन्त्रसे आठ आहुति देकर ॐ भूः स्वाहा, ॐ भुवः स्वाहा, ॐ स्वः स्वाहा—इस प्रकार तीन व्याहृतियोंसे क्रमशः लोकेश्वर अग्नि, सोमग्रह और भगवान् पुरुषोत्तमके निमित्त हवन करे। इसके बाद प्रायश्चित्तसंज्ञक हवन करके प्रणवयुक्त द्वादशाक्षर मन्त्रसे उड़द, घी और तिलको एक साथ लेकर पूर्णाहुति-हवन करना चाहिये। तत्पश्चात् आचार्य पूर्वाभिमुख होकर आठ दिशाओंमें स्थापित कलशोंपर पृथक्-पृथक् पद्म आदि देवताओंका स्थापन-पूजन करे। बीचमें भी धरती लीपकर पत्थरकी एक शिला और कलश स्थापित करे। इन नौ कलशोंपर क्रमशः नीचे लिखे देवताओंकी स्थापना करनी चाहिये॥ १०-१३॥
पद्म, महापद्म, मकर, कच्छप, कुमुद, आनन्द, पद्म और शङ्ख—इनको आठ कलशोंमें और पद्मिनीको मध्यवर्ती कलशपर स्थापित करे॥ १४॥
इन कलशोंको हिलावे-डुलावे नहीं; उनके निकट पूर्व आदिके क्रमसे ईशानकोणतक एक-एक ईंट रख दे। फिर उनपर उनकी देवता विमला आदि शक्तियोंका न्यास (स्थापन) करना चाहिये$^८$। बीचमें 'अनुग्रहा'की स्थापना करे। इसके बाद इस प्रकार प्रार्थना करे—'मुनिवर अङ्गिराकी सुपुत्री इष्टका देवी, तुम्हारा कोई अङ्ग टूटा-फूटा या खराब नहीं हुआ है; तुम अपने सभी अङ्गोंसे पूर्ण हो। मेरा अभीष्ट पूर्ण करो। अब मैं प्रतिष्ठा करा रहा हूँ'॥ १५-१७॥
उत्तम आचार्य इस मन्त्रसे इष्टकाओंकी स्थापना करनेके पश्चात् एकाग्रचित्त होकर मध्यवाले स्थानमें गर्भाधान करे। (उसकी विधि यों है—) एक कलशके ऊपर देवेश्वर भगवान् नारायण तथा
१. शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभिस्स्रवन्तु नः॥ (अथर्व०, १।६।१)
२. तरत्स मन्दी धावति धारा सुतस्यान्धसः। तरत्स मन्दी धावति॥
उस्त्रा वेद वसूनां मर्तस्य देव्यवसः। तरत्स मन्दी धावति॥
ध्वस्रयोः पुरुषन्त्योरा सहस्राणि दद्महे। तरत्स मन्दी धावति॥
आ ययोस्त्रिंशतं तना सहस्राणि च दद्महे। तरत्स मन्दी धावति॥ (ऋ०, मं० ९, सू० ५८।१-४)
३. ऋग्वेद, नवम मण्डल, अध्याय १, २, ३के सूक्तोंको 'पावमानसूक्त' तथा ऋचाओंको 'पावमानी ऋचाएँ' कहते हैं।
४. उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यमं श्रथाय। अथावयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम॥ (यजु०, १२।१२)
५. कया नश्चित्र आभुवदूती सदावृधः सखा। कया शचिष्ठया वृता॥ (यजु०, ३६।४)
६. वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद॥ (यजु०, ४।३६)
७. हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्। नृषद्वरसद्ऋतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत्॥ (यजु० १०।२४; कठ० २।२।२)
८. विमला आदि शक्तियोंके नाम इस प्रकार हैं—
विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशाना तथा अनुग्रहा।
- अध्याय ४१ * ८५
पद्मिनी (लक्ष्मी) देवीको स्थापित करके उनके पास मिट्टी, फूल, धातु और रत्नोंको रखे। इसके बाद लोहे आदिके बने हुए गर्भपात्रमें, जिसका विस्तार बारह अङ्गुल और ऊँचाई चार अङ्गुल हो, अस्त्रकी पूजा करे। फिर ताँबेके बने हुए कमलके आकारवाले एक पात्रमें पृथ्वीका पूजन करे और इस प्रकार प्रार्थना करे—'सम्पूर्ण भूतोंकी ईश्वरी पृथ्वीदेवी! तुम पर्वतोंके आसनसे सुशोभित हो; चारों ओर समुद्रोंसे घिरी हुई हो; एकान्तमें गर्भ धारण करो। वसिष्ठकन्या नन्दा! वसुओं और प्रजाओंके सहित तुम मुझे आनन्दित करो। भार्गवपुत्री जया! तुम प्रजाओंको विजय दिलानेवाली हो। (मुझे भी विजय दो।) अङ्गिराकी पुत्री पूर्णा! तुम मेरी कामनाएँ पूर्ण करो। महर्षि कश्यपकी कन्या भद्रा! तुम मेरी बुद्धि कल्याणमयी कर दो। सम्पूर्ण बीजोंसे युक्त और समस्त रत्नों एवं औषधोंसे सम्पन्न सुन्दरी जया देवी तथा वसिष्ठपुत्री नन्दा देवी! यहाँ आनन्दपूर्वक रम जाओ। हे कश्यपकी कन्या भद्रा! तुम प्रजापतिकी पुत्री हो, चारों ओर फैली हुई हो, परम महान् हो; साथ ही सुन्दरी और सुकान्त हो, इस गृहमें रमण करो। हे भार्गवी देवी! तुम परम आश्चर्यमयी हो; गन्ध और माल्य आदिसे सुशोभित एवं पूजित हो; लोकोंको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली देवि! तुम इस गृहमें रमण करो। इस देशके सम्राट्, इस नगरके राजा और इस घरके मालिकके बाल-बच्चोंको तथा मनुष्य आदि प्राणियोंको आनन्द देनेके लिये पशु आदि सम्पदाकी वृद्धि करो।' इस प्रकार प्रार्थना करके वास्तु-कुण्डको गोमूत्रसे सींचना चाहिये॥ १८-२८॥
यह सब विधि पूर्ण करके कुण्डमें गर्भको स्थापित करे। यह गर्भाधान रातमें होना चाहिये। उस समय आचार्यको गौ-वस्त्र आदि दान करे तथा अन्य लोगोंको भोजन दे। इस प्रकार गर्भपात्र रखकर और ईंटोंको भी रखकर उस कुण्डको भर दे। तत्पश्चात् मन्दिरकी ऊँचाईके अनुसार प्रधानदेवताके पीठका निर्माण करे। 'उत्तम पीठ' वह है, जो ऊँचाईमें मन्दिरके आधे विस्तारके बराबर हो। उत्तम पीठकी अपेक्षा एक चौथाई कम ऊँचाई होनेपर मध्यम पीठ कहलाता है और उत्तम पीठकी आधी ऊँचाई होनेपर 'कनिष्ठ पीठ' होता है। पीठ-बन्धके ऊपर पुनः वास्तु-याग (वास्तुदेवताका पूजन) करना चाहिये। केवल पाद-प्रतिष्ठा करनेवाला मनुष्य भी सब पापोंसे रहित होकर देवलोकमें आनन्द-भोग करता है॥ २९-३२॥
मैं देवमन्दिर बनवा रहा हूँ, ऐसा जो मनसे चिन्तन भी करता है, उसका शारीरिक पाप उसी दिन नष्ट हो जाता है। फिर जो विधिपूर्वक मन्दिर बनवाता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है? जो आठ ईंटोंका भी देवमन्दिर बनवाता है, उसके फलकी सम्पत्तिका भी कोई वर्णन नहीं कर सकता। इसीसे विशाल मन्दिर बनवानेसे मिलनेवाले महान् फलका अनुमान कर लेना चाहिये॥ ३३-३५॥
गाँवके बीचमें अथवा गाँवसे पूर्वदिशामें यदि मन्दिर बनवाया जाय तो उसका दरवाजा पश्चिमकी ओर रखना चाहिये और सब कोणोंमेंसे किसी ओर बनवाना हो तो गाँवकी ओर दरवाजा रखे। गाँवसे दक्षिण, उत्तर या पश्चिमदिशामें मन्दिर बने, तो उसका दरवाजा पूर्वदिशाकी ओर रखना चाहिये॥ ३६-३७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सर्वशिलाविन्यासविधान आदिका कथन' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४१॥
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बयालीसवाँ अध्याय
प्रासाद-लक्षण-वर्णन
भगवान् हयग्रीव कहते हैं— ब्रह्मन्! अब मैं सर्वसाधारण प्रासाद (देवालय)-का वर्णन करता हूँ, सुनो। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि जहाँ मन्दिरका निर्माण कराना हो, वहाँके चौकोर क्षेत्रके सोलह भाग करे। उसमें मध्यके चार भागोंद्वारा आयसहित गर्भ (मन्दिरके भीतरी भागकी रिक्त भूमि) निश्चित करे तथा शेष बारह भागोंको दीवार उठानेके लिये नियत करे। उक्त बारह भागोंमेंसे चार भागकी जितनी लंबाई है, उतनी ही ऊँचाई प्रासादकी दीवारोंकी होनी चाहिये। विद्वान् पुरुष दीवारोंकी ऊँचाईसे दुगुनी शिखरकी ऊँचाई रखे। शिखरके चौथे भागकी ऊँचाईके अनुसार मन्दिरकी परिक्रमाकी ऊँचाई रखे। उसी मानके अनुसार दोनों पार्श्व भागोंमें निकलनेका मार्ग (द्वार) बनाना चाहिये। वे द्वार एक-दूसरेके समान होने चाहिये। मन्दिरके सामनेके भूभागका विस्तार भी शिखरके समान ही करना चाहिये। जिस तरह उसकी शोभा हो सके, उसके अनुरूप उसका विस्तार शिखरसे दूना भी किया जा सकता है। मन्दिरके आगेका सभामण्डप विस्तारमें मन्दिरके गर्भसूत्रसे दूना होना चाहिये। मन्दिरके पादस्तम्भ आदि भित्तिके बराबर ही लंबे बनाये जायें। वे मध्यवर्ती स्तम्भोंसे विभूषित हों। अथवा मन्दिरके गर्भका जो मान है, वही उसके मुख-मण्डप (सभामण्डप या जगमोहन)-का भी रखे। तत्पश्चात् इक्यासी पदों (स्थानों)-से युक्त वास्तु-मण्डपका आरम्भ करे॥ १–७॥
इनमें पहले द्वारन्यासके समीपवर्ती पदोंके भीतर स्थित होनेवाले देवताओंका पूजन करे। फिर परकोटेके निकटवर्ती एवं सबसे अन्तके पदोंमें स्थापित होनेवाले बत्तीस देवताओंकी पूजा करे¹॥ ८॥
यह प्रासादका सर्वसाधारण लक्षण है। अब प्रतिमाके मानके अनुसार दूसरे प्रासादका वर्णन सुनो॥ ९॥
जितनी बड़ी प्रतिमा हो, उतनी ही बड़ी सुन्दर पिण्डी बनावे। पिण्डीके आधे मानसे गर्भका निर्माण करे और गर्भके ही मानके अनुसार भित्तियाँ उठावे। भीतोंकी लंबाईके अनुसार ही उनकी ऊँचाई रखे। विद्वान् पुरुष भीतरकी ऊँचाईसे दुगुनी शिखरकी ऊँचाई करावे। शिखरकी अपेक्षा चौथाई ऊँचाईमें मन्दिरकी परिक्रमा बनवावे तथा इसी ऊँचाईमें मन्दिरके आगेके मुख-मण्डपका भी निर्माण करावे॥ १०–१२॥
गर्भके आठवें अंशके मापका रथकोंके निकलनेका मार्ग (द्वार) बनावे। अथवा परिधिके तृतीय भागके अनुसार वहाँ रथकों (छोटे-छोटे रथों)-की रचना करावे तथा उनके भी तृतीय भागके मापका उन रथोंके निकलनेके मार्ग (द्वार)-का निर्माण करावे। तीन रथकोंपर सदा तीन वामोंकी स्थापना करे॥ १३–१४॥
शिखरके लिये चार सूत्रोंका निपातन करे। शुकनासोंके ऊपरसे सूतको तिरछा गिरावे।
¹ १. नारदपुराण, पूर्वभाग, द्वितीय पाद, ५६वें अध्यायके ६०० से लेकर ६०३ तकके श्लोकोंमें भी यही बात कही गयी है।
² २. शिखरके चार भाग करके नीचेके दो भागोंको 'शुकनासा' कहते हैं। उसके ऊपरके तीसरे भागमें वेदी होती है, जिसपर उसका कण्ठमात्र स्थित होता है। सबसे ऊपरके चतुर्थ भागमें 'आमलसार' संज्ञक कण्ठका निर्माण कराया जाना चाहिये। जैसा कि मत्स्यपुराणमें कहा है—
चतुर्धा शिखरं भज्य अर्धभागद्वयस्य तु। शुकनासं प्रकुर्वीत तृतीये वेदिका मता॥
कण्ठमामलसारं तु चतुर्थे परिकल्पयेत्। (२६९। १८–१९)
- अध्याय ४३ * ८७
शिखरके आधे भागमें सिंहकी प्रतिमाका निर्माण करावे। शुकनासापर सूतको स्थिर करके उसे मध्य संधितक ले जाय॥ १५-१६॥
इसी प्रकार दूसरे पार्श्वमें भी सूत्रपात करे। शुकनासाके ऊपर वेदी हो और वेदीके ऊपर आमलसार नामक कण्ठसहित कलशका निर्माण कराया जाय। उसे विकराल न बनाया जाय। जहाँतक वेदीका मान है, उससे ऊपर ही कलशकी कल्पना होनी चाहिये। मन्दिरके द्वारकी जितनी चौड़ाई हो, उससे दूनी उसकी ऊँचाई रखनी चाहिये। द्वारको बहुत ही सुन्दर और शोभासम्पन्न बनाना चाहिये। द्वारके ऊपरी भागमें सुंदर मङ्गलमय वस्तुओंके साथ गूलरकी दो शाखाएँ स्थापित करे (खुदवावे) ॥ १७-१९॥
द्वारके चतुर्थांशमें चण्ड, प्रचण्ड, विष्वक्सेन और वत्सदण्ड — इन चार द्वारपालोंकी मूर्तियोंका निर्माण करावे। गूलरकी शाखाओंके अर्ध भागमें सुंदर रूपवाली लक्ष्मीदेवीके श्रीविग्रहको अङ्कित करे। उनके हाथमें कमल हो और दिग्गज कलशोंके जलद्वारा उन्हें नहला रहे हों। मन्दिरके परकोटेकी ऊँचाई उसके चतुर्थांशके बराबर हो। प्रासादके गोपुरकी ऊँचाई प्रासादसे एक चौथाई कम हो। यदि देवताका विग्रह पाँच हाथका हो तो उसके लिये एक हाथकी पीठिका होनी चाहिये॥ २०-२२॥
विष्णु-मन्दिरके सामने एक गरुडमण्डप तथा भौमादि धामका निर्माण करावे। भगवान्के श्रीविग्रहके सब ओर आठों दिशाओंके ऊपरी भागमें भगवत्प्रतिमासे दुगुनी बड़ी अवतारोंकी मूर्तियाँ बनावे। पूर्व दिशामें वराह, दक्षिणमें नृसिंह, पश्चिममें श्रीधर, उत्तरमें हयग्रीव, अग्निकोणमें परशुराम, नैर्ऋत्यकोणमें श्रीराम, वायव्यकोणमें वामन तथा ईशानकोणमें वासुदेवकी मूर्तिका निर्माण करे। प्रासाद-रचना आठ, बारह आदि समसंख्यावाले स्तम्भोंद्वारा करनी चाहिये। द्वारके अष्टम आदि अंशको छोड़कर जो वेध होता है, वह दोषकारक नहीं होता है॥ २३-२६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'प्रासाद आदिके लक्षणका वर्णन' नामक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४२॥
तैंतालीसवाँ अध्याय
मन्दिरके देवताकी स्थापना और भूतशान्ति आदिका कथन
हयग्रीवजी कहते हैं— ब्रह्मन्! अब मैं मन्दिरमें स्थापित करनेयोग्य देवताओंका वर्णन करूँगा, आप सुनें। पञ्चायतन मन्दिरमें जो बीचका प्रधान मन्दिर हो, उसमें भगवान् वासुदेवको स्थापित करे। शेष चार मन्दिरोंमेंसे अग्निकोणवाले मन्दिरमें भगवान् वामनकी, नैर्ऋत्यकोणमें नरसिंहकी, वायव्यकोणमें हयग्रीवकी और ईशानकोणमें वराहभगवान्की स्थापना करे। अथवा यदि बीचमें भगवान् नारायणकी स्थापना करे तो अग्निकोणमें दुर्गाकी, नैर्ऋत्यकोणमें सूर्यकी, वायव्यकोणमें ब्रह्माकी और ईशानकोणमें लिङ्गमय शिवकी स्थापना करे। अथवा ईशानमें रुद्ररूपकी स्थापना करे। अथवा एक-एक आठ दिशाओंमें और एक बीचमें — इस प्रकार कुल नौ मन्दिर बनवावे। उनमेंसे बीचमें वासुदेवकी स्थापना करे और पूर्वादि दिशाओंमें परशुराम-राम आदि मुख्य-मुख्य नौ अवतारोंकी तथा इन्द्र आदि लोकपालोंकी स्थापना करनी चाहिये। अथवा कुल नौ धामोंमें पाँच मन्दिर मुख्य बनवावे। इनके मध्यमें भगवान् पुरुषोत्तमकी स्थापना करे॥ १-५॥
८८ * अग्निपुराण *
पूर्व दिशामें लक्ष्मी और कुबेरकी, दक्षिणमें मातृकागण, स्कन्द, गणेश और शिवकी, पश्चिममें सूर्य आदि नौ ग्रहोंकी तथा उत्तरमें मत्स्य आदि दस अवतारोंकी स्थापना करे। इसी प्रकार अग्निकोणमें चण्डीकी, नैर्ऋत्यकोणमें अम्बिकाकी, वायव्यकोणमें सरस्वतीकी और ईशानकोणमें लक्ष्मीजीकी स्थापना करनी चाहिये। मध्यभागमें वासुदेव अथवा नारायणकी स्थापना करे। अथवा तेरह कमरोंवाले देवालयके मध्यभागमें विश्वरूप भगवान् विष्णुकी स्थापना करे॥ ६-८॥
पूर्व आदि दिशाओंमें केशव आदि द्वादश विग्रहोंको स्थापित करे तथा इनसे अतिरिक्त गृहोंमें साक्षात् ये श्रीहरि ही विराजमान होते हैं। भगवान्की प्रतिमा मिट्टी, लकड़ी, लोहा, रत्न, पत्थर, चन्दन और फूल—इन सात वस्तुओंकी बनी हुई सात प्रकारकी मानी जाती है। फूल, मिट्टी तथा चन्दनकी बनी हुई प्रतिमाएँ बननेके बाद तुरंत पूजी जाती हैं। (अधिक कालके लिये नहीं होतीं।) पूजन करनेपर ये समस्त कामनाओंको पूर्ण करती हैं। अब मैं शैलमयी प्रतिमाका वर्णन करता हूँ, जहाँ प्रतिमा बनानेमें शिला (पत्थर)-का उपयोग किया जाता है॥ ९-११॥
उत्तम तो यह है कि किसी पर्वतका पत्थर लाकर प्रतिमा बनवावे। पर्वतोंके अभावमें जमीनसे निकले हुए पत्थरका उपयोग करे। ब्राह्मण आदि चारों वर्णवालोंके लिये क्रमशः सफेद, लाल, पीला और काला पत्थर उत्तम माना गया है। यदि ब्राह्मण आदि वर्णवालोंको उनके वर्णके अनुकूल उत्तम शिला न मिले तो उसमें आवश्यक वर्णकी कमीकी पूर्ति करनेके लिये नरसिंह-मन्त्रसे हवन करना चाहिये। यदि शिलामें सफेद रेखा हो तो वह बहुत ही उत्तम है, अगर काली रेखा हो तो वह नरसिंह-मन्त्रसे हवन करनेपर उत्तम होती है। यदि शिलासे काँसेके बने हुए घण्टेकी-सी आवाज निकलती हो और काटनेपर उससे चिनगारियाँ निकलती हों तो वह 'पुँल्लिङ्ग' है, ऐसा समझना चाहिये। यदि उपर्युक्त चिह्न उसमें कम दिखायी दें, तो उसे 'स्त्रीलिङ्ग' समझना चाहिये और पुँल्लिङ्ग-स्त्रीलिङ्ग-बोधक कोई रूप न होनेपर उसे 'नपुंसक' मानना चाहिये। तथा जिस शिलामें कोई मण्डलका चिह्न दिखायी दे, उसे सगर्भा समझकर त्याग देना चाहिये॥ १२-१५॥
प्रतिमा बनानेके लिये वनमें जाकर वनयाग आरम्भ करना चाहिये। वहाँ कुण्ड खोदकर और उसे लीपकर मण्डपमें भगवान् विष्णुका पूजन करना चाहिये तथा उन्हें बलि समर्पणकर कर्ममें उपयोगी टंक आदि शस्त्रोंकी भी पूजा करनी चाहिये। फिर हवन करनेके पश्चात् अगहनीके चावलके जलसे अस्त्र-मन्त्र (अस्त्राय फट्)-के उच्चारणपूर्वक उस शिलाको सींचना चाहिये। नरसिंह-मन्त्रसे उसकी रक्षा करके मूल-मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय)-से पूजन करे। फिर पूर्णाहूति-होम करके आचार्य भूतोंके लिये बलि समर्पित करें। वहाँ जो भी अव्यक्तरूपसे रहनेवाले जन्तु, यातुधान (राक्षस), गुह्यक और सिद्ध आदि हों अथवा और भी जो हों, उन सबका पूजन करके इस प्रकार क्षमा-प्रार्थना करनी चाहिये॥ १६-१९॥
'भगवान् केशवकी आज्ञासे प्रतिमाके लिये हमलोगोंकी यह यात्रा हुई है। भगवान् विष्णुके लिये जो कार्य हो, वह आपलोगोंका भी कार्य है। अतः हमारे दिये हुए इस बलिदानसे आपलोग सर्वथा तृप्त हों और शीघ्र ही यह स्थान छोड़कर कुशलपूर्वक अन्यत्र चले जायें'॥ २०-२१॥
इस प्रकार सावधान करनेपर वे जीव बड़े प्रसन्न होते हैं और सुखपूर्वक उस स्थानको छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं। इसके बाद
- अध्याय ४४ * ८९
कारीगरोंके साथ यज्ञका चरु भक्षण करके रातमें सोते समय स्वप्न-मन्त्रका जप करे। 'जो समस्त प्राणियोंके निवास-स्थान हैं, व्यापक हैं, सबको उत्पन्न करनेवाले हैं, स्वयं विश्वरूप हैं और सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है, उन स्वप्नके अधिपति भगवान् श्रीहरिको नमस्कार है। देव! देवेश्वर! मैं आपके निकट सो रहा हूँ। मेरे मनमें जिन कार्योंका संकल्प है, उन सबके सम्बन्धमें मुझसे कुछ कहिये'॥ २२-२४॥
'ॐ ॐ हूं फट् विष्णवे स्वाहा।' इस प्रकार मन्त्र-जप करके सो जानेपर यदि अच्छा स्वप्न हो तो सब शुभ होता है और यदि बुरा स्वप्न हुआ तो नरसिंह-मन्त्रसे हवन करनेपर शुभ होता है। सबेरे उठकर अस्त्र-मन्त्रसे शिलापर अर्घ्य दे। फिर अस्त्रकी भी पूजा करे। कुदाल (फावड़े), टंक और शस्त्र आदिके मुखपर मधु और घी लगाकर पूजन करना चाहिये। अपने-आपको विष्णुरूपसे चिन्तन करे। कारीगरको विश्वकर्मा माने और शस्त्रके भी विष्णुरूप होनेकी ही भावना करे। फिर शस्त्र कारीगरको दे और उसका मुख-पृष्ठ आदि उसे दिखा दे॥ २५-२७॥
कारीगर अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखे और हाथमें टंक लेकर उससे उस शिलाको चौकोर बनावे। फिर पिण्डी बनानेके लिये उसे कुछ छोटी करे। इसके बाद शिलाको वस्त्रमें लपेटकर रथपर रखे और शिल्पशालामें लाकर पुनः उस शिलाका पूजन करे। इसके बाद कारीगर प्रतिमा बनावे॥ २८-२९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मन्दिरके देवताकी स्थापना, भूतशान्ति, शिला-लक्षण और प्रतिमा-निर्माण आदिका निरूपण' नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४३॥
चौवालीसवाँ अध्याय
वासुदेव आदिकी प्रतिमाओंके लक्षण
भगवान् हयग्रीव बोले—ब्रह्मन्! अब मैं तुम्हें वासुदेव आदिकी प्रतिमाके लक्षण बताता हूँ, सुनो। मन्दिरके उत्तर भागमें शिलाको पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख रखकर उसकी पूजा करे और उसे बलि अर्पित करके कारीगर शिलाके बीचमें सूत लगाकर उसका नौ भाग करे। नवें भागको भी १२ भागोंमें विभाजित करनेपर एक-एक भाग अपने अङ्गुलसे एक अङ्गुलका होता है। दो अङ्गुलका एक गोलक होता है, जिसे 'कालनेत्र' भी कहते हैं॥ १-३॥
उक्त नौ भागोंमेंसे एक भागके तीन हिस्से करके उसमें पार्ष्णि-भागकी कल्पना करे। एक भाग घुटनेके लिये तथा एक भाग कण्ठके लिये निश्चित रखे। मुकुटको एक बित्ता रखे। मुँहका भाग भी एक बित्तेका ही होना चाहिये। इसी प्रकार एक बित्तेका कण्ठ और एक ही बित्तेका हृदय भी रहे। नाभि और लिङ्गके बीचमें एक बित्तेका अन्तर होना चाहिये। दोनों ऊरु दो बित्तेके हों। जंघा भी दो बित्तेकी हो। अब सूत्रोंका माप सुनो—॥ ४-६॥
दो सूत पैरमें और दो सूत जङ्घामें लगावे। घुटनोंमें दो सूत तथा दोनों ऊरुओंमें भी दो सूतका उपयोग करे। लिङ्गमें दूसरे दो सूत तथा कटिमें भी कमरबन्ध (करधन) बनानेके लिये दूसरे दो सूतोंका योग करे। नाभिमें भी दो सूत काममें लावे। इसी प्रकार हृदय और कण्ठमें दो सूतका उपयोग करे। ललाटमें दूसरे और मस्तकमें दूसरे दो सूतोंका उपयोग करे। बुद्धिमान् कारीगरोंको
९० * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
मुकुटके ऊपर एक सूत करना चाहिये। ब्रह्मन्! ऊपर सात ही सूत देने चाहिये। तीन कक्षाओंके अन्तरसे ही छः सूत्र दिलावे। फिर मध्य-सूत्रको त्याग दे और केवल सूत्रोंको ही निवेदित करे॥ ७–११॥
ललाट, नासिका और मुखका विस्तार चार अङ्गुलका होना चाहिये। गला और कानका भी चार-चार अङ्गुल विस्तार करना चाहिये। दोनों ओरकी हनु (ठोढ़ी) दो-दो अङ्गुल चौड़ी हो और चिबुक (ठोढ़ीके बीचका भाग) भी दो अङ्गुलका हो। पूरा विस्तार छः अङ्गुलका होना चाहिये। इसी प्रकार ललाट भी विस्तारमें आठ अङ्गुलका बताया गया है। दोनों ओरके शङ्ख दो-दो अङ्गुलके बनाये जायँ और उनपर बाल भी हों। कान और नेत्रके बीचमें चार अङ्गुलका अन्तर रहना चाहिये। दो-दो अङ्गुलके कान एवं पृथक् बनावे। भौंहोंके समान सूत्रके मापका कानका स्रोत कहा गया है। बिंधा हुआ कान छः अङ्गुलका हो और बिना बिंधा हुआ चार अङ्गुलका। अथवा बिंधा हो या बिना बिंधा, सब चिबुकके समान छः अङ्गुलका होना चाहिये॥ १२–१६॥
गन्धपात्र, आवर्त तथा शष्कुली (कानका पूरा घेरा) भी बनावे। एक अङ्गुलमें नीचेका ओठ और आधे अङ्गुलका ऊपरका ओठ बनावे। नेत्रका विस्तार आधा अङ्गुल हो और मुखका विस्तार चार अङ्गुल हो। मुखकी चौड़ाई डेढ़ अङ्गुलकी होनी चाहिये। नाककी ऊँचाई एक अङ्गुल हो और ऊँचाईसे आगे केवल लंबाई दो अङ्गुलकी रहे। करवीर-कुसुमके समान उसकी आकृति होनी चाहिये। दोनों नेत्रोंके बीच चार अङ्गुलका अन्तर हो। दो अङ्गुल तो आँखके घेरेमें आ जाता है, सिर्फ दो अङ्गुल अन्तर रह जाता है। पूरे नेत्रका तीन भाग करके एक भागके बराबर तारा (काली पुतली) बनावे और पाँच भाग करके, एक भागके बराबर दृक्तारा (छोटी पुतली) बनावे। नेत्रका विस्तार दो अङ्गुलका हो और द्रोणी आधे अङ्गुलकी। उतना ही प्रमाण भौंहोंकी रेखाका हो। दोनों ओरकी भौंहें बराबर रहनी चाहिये। भौंहोंका मध्य दो अङ्गुलका और विस्तार चार अङ्गुलका होना चाहिये॥ १७–२२॥
भगवान् केशव आदिकी मूर्तियोंके मस्तकका पूरा घेरा छब्बीस अङ्गुलका होवे अथवा बत्तीस अङ्गुलका। नीचे ग्रीवा (गला) पाँच नेत्र (अर्थात् दस अङ्गुल)-की हो और इसके तीन गुना अर्थात् तीस अङ्गुल उसका वेष्टन (चारों ओरका घेरा) हो। नीचेसे ऊपरकी ओर ग्रीवाका विस्तार आठ अङ्गुलका हो। ग्रीवा और छातीके बीचका अन्तर ग्रीवाके तीन गुने विस्तारवाला होना चाहिये। दोनों ओरके कंधे आठ-आठ अङ्गुलके और सुन्दर अंस तीन-तीन अङ्गुलके हों। सात नेत्र (यानी चौदह अङ्गुल)-की दोनों बाहें और सोलह अङ्गुलकी दोनों प्रबाहुएँ हों (बाहु और प्रबाहु मिलकर पूरी बाँह समझी जाती है)। बाहुओंकी चौड़ाई छः अङ्गुलकी हो। प्रबाहुओंकी भी इनके समान ही होनी चाहिये। बाहुदण्डका चारों ओरका घेरा कुछ ऊपरसे लेकर नौ कला अथवा सत्रह अङ्गुल समझना चाहिये। आधेपर बीचमें कूर्पर (कोहनी) है। कूर्परका घेरा सोलह अङ्गुलका होता है। ब्रह्माजी! प्रबाहुके मध्यमें उसका विस्तार सोलह अङ्गुलका हो। हाथके अग्रभागका विस्तार बारह अङ्गुल हो और उसके बीच करतलका विस्तार छः अङ्गुल कहा गया है। हाथकी चौड़ाई सात अङ्गुलकी करे। हाथके मध्यमा अङ्गुलीकी लंबाई पाँच अङ्गुलकी हो और तर्जनी तथा अनामिकाकी लंबाई उससे आधा अङ्गुल कम अर्थात् ४॥ अङ्गुलकी करे।
- अध्याय ४४ * ९१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
कनिष्ठिका और अँगूठेकी लंबाई चार अङ्गुलकी करे। अँगूठेमें दो पोरु बनावे और बाकी सभी अँगु़लियोंमें तीन-तीन पोरु रखे। सभी अँगु़लियोंके एक-एक पोरुके आधे भागके बराबर प्रत्येक अँगुलीके नखकी नाप समझनी चाहिये। छातीकी जितनी माप हो, पेटकी उतनी ही रखे। एक अङ्गुलके छेदवाली नाभि हो। नाभिसे लिङ्गके बीचका अन्तर एक बित्ता होना चाहिये॥ २३-३३॥
नाभि-मध्याङ्ग (उदर)-का घेरा बयालीस अङ्गुलका हो। दोनों स्तनोंके बीचका अन्तर एक बित्ता होना चाहिये। स्तनोंका अग्रभाग—चुचुक यवके बराबर बनावे। दोनों स्तनोंका घेरा दो पदोंके बराबर हो। छातीका घेरा चौंसठ अङ्गुलका बनावे। उसके नीचे और चारों ओरका घेरा 'वेष्टन' कहा गया है। इसी प्रकार कमरका घेरा चौवन अङ्गुलका होना चाहिये। ऊरुओंके मूलका विस्तार बारह-बारह अङ्गुलका हो। इसके ऊपर मध्यभागका विस्तार अधिक रखना चाहिये। मध्यभागसे नीचेके अङ्गोंका विस्तार क्रमशः कम होना चाहिये। घुटनोंका विस्तार आठ अङ्गुलका करे और उसके नीचे जंघाका घेरा तीन गुना, अर्थात् चौबीस अङ्गुलका हो; जंघाके मध्यका विस्तार सात अङ्गुलका होना चाहिये और उसका घेरा तीन गुना, अर्थात् इक्कीस अङ्गुलका हो। जंघाके अग्रभागका विस्तार पाँच अङ्गुल और उसका घेरा तीन गुना—पंद्रह अङ्गुलका हो। चरण एक-एक बित्ते लंबे होने चाहिये। विस्तारसे उठे हुए पैर अर्थात् पैरोंकी ऊँचाई चार अङ्गुलकी हो। गुल्फ (घुट्टी)-से पहलेका हिस्सा भी चार अङ्गुलका ही हो॥ ३४-४०॥
दोनों पैरोंकी चौड़ाई छः अङ्गुलकी, गुह्यभाग तीन अङ्गुलका और उसका पंजा पाँच अङ्गुलका होना चाहिये। पैरोंमें प्रदेशिनी, अर्थात् अँगूठा चौड़ा होना उचित है। शेष अँगु़लियोंके मध्यभागका विस्तार क्रमशः पहली अँगुलीके आठवें-आठवें भागके बराबर कम होना चाहिये। अँगूठेकी ऊँचाई सवा अङ्गुल बतायी गयी है। इसी प्रकार अँगूठेके नखका प्रमाण और अँगु़लियोंसे दूना रखना चाहिये। दूसरी अँगुलीके नखका विस्तार आधा अङ्गुल तथा अन्य अँगु़लियोंके नखोंका विस्तार क्रमशः जरा-जरा-सा कम कर देना चाहिये॥ ४१-४३॥
दोनों अण्डकोष तीन-तीन अङ्गुल लंबे बनावे और लिङ्ग चार अङ्गुल लंबा करे। इसके ऊपरका भाग चार अङ्गुल रखे। अण्डकोषोंका पूरा घेरा छः-छः अङ्गुलका होना चाहिये। इसके सिवा भगवान्की प्रतिमा सब प्रकारके भूषणोंसे भूषित करनी चाहिये। यह लक्षण उद्देश्यमात्र (संक्षेपसे) बताया गया है॥ ४४-४५॥
इसी प्रकार लोकमें देखे जानेवाले अन्य लक्षणोंको भी दृष्टिमें रखकर प्रतिमामें उसका निर्माण करना चाहिये। दाहिने हाथोंमेंसे ऊपरवाले हाथमें चक्र और नीचेवाले हाथमें पद्म धारण करावे। बायें हाथोंमेंसे ऊपरवाले हाथमें शङ्ख और नीचेवाले हाथमें गदा बनावे। यह वासुदेव श्रीकृष्णका चिह्न है, अतः उन्हींकी प्रतिमामें रहना चाहिये। भगवान्के निकट हाथमें कमल लिये हुए लक्ष्मी तथा वीणा धारण किये पुष्टि देवीकी भी प्रतिमा बनावे। इनकी ऊँचाई (भगवद्विग्रहके) ऊरुओंके बराबर होनी चाहिये। इनके अलावा प्रभामण्डलमें स्थित मालाधर और विद्याधरका विग्रह बनावे। प्रभा हस्ती आदिसे भूषित होती है। भगवान्के चरणोंके नीचेका भाग अर्थात् पादपीठ कमलके आकारका बनावे। इस प्रकार देव-प्रतिमाओंमें उक्त लक्षणोंका समावेश करना चाहिये॥ ४६-४९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वासुदेव आदिकी प्रतिमाओंके लक्षणका वर्णन' नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४४॥
९२ * अग्निपुराण *
पैंतालीसवाँ अध्याय
पिण्डिका आदिके लक्षण
भगवान् हयग्रीव कहते हैं— ब्रह्मन्! अब मैं पिण्डिकाका लक्षण बता रहा हूँ। पिण्डिका लंबाईमें प्रतिमाके समान ही होती है, परंतु उसकी ऊँचाई प्रतिमासे आधी होती है। पिण्डिकाको चौंसठ कुटों (पदों या कोष्ठकों)-से युक्त करके नीचेकी दो पङ्क्ति छोड़ दे और उसके ऊपरका जो कोष्ठ है, उसे चारों ओर दोनों पार्श्वोंमें भीतरकी ओरसे मिटा दे। इसी तरह ऊपरकी दो पङ्क्तियोंको त्यागकर उसके नीचेका जो एक कोष्ठ (या एक पङ्क्ति) है, उसे भीतरकी ओरसे यत्नपूर्वक मिटा दे। दोनों पार्श्वोंमें समान रूपसे यह क्रिया करे॥ १—३॥
दोनों पार्श्वोंके मध्यगत जो दो चौक हैं, उनका भी मार्जन कर दे। तदनन्तर उसे चार भागोंमें बाँटकर विद्वान् पुरुष ऊपरकी दो पङ्क्तियोंको मेखला माने। मेखलाभागकी जो मात्रा है, उसके आधे मानके अनुसार उसमें खात खुदवावे। फिर दोनों पार्श्वभागोंमें समानरूपसे एक-एक भागको त्यागकर बाहरकी ओरका एक पद नाली बनानेके लिये दे दे। विद्वान् पुरुष उसमें नाली बनवाये। फिर तीन भागमें जो एक भाग है, उसके आगे जल निकलनेका मार्ग रहे॥ ४—६॥
नाना प्रकारके भेदसे यह शुभ पिण्डिका 'भद्रा' कही गयी है। लक्ष्मी देवीकी प्रतिमा ताल (हथेली)-के मापसे आठ तालकी बनायी जानी चाहिये। अन्य देवियोंकी प्रतिमा भी ऐसी ही हो। दोनों भौंहोंको नासिकाकी अपेक्षा एक-एक जौ अधिक बनावे और नासिकाको उनकी अपेक्षा एक जौ कम। मुखकी गोलाई नेत्रगोलकसे बड़ी होनी चाहिये। वह ऊँचा और टेढ़ा-मेढ़ा न हो। आँखें बड़ी-बड़ी बनानी चाहिये। उनका माप सवा तीन जौके बराबर हो। नेत्रोंकी चौड़ाई उनकी लंबाईकी अपेक्षा आधी करे। मुखके एक कोनेसे लेकर दूसरे कोनेतककी जितनी लंबाई है, उसके बराबरके सूतसे नापकर कर्णपाश (कानका पूरा घेरा) बनावे। उसकी लंबाई उक्त सूतसे कुछ अधिक ही रखे। दोनों कंधोंको कुछ झुका हुआ और एक कलासे रहित बनावे। ग्रीवाकी लंबाई डेढ़ कला रखनी चाहिये। वह उतनी ही चौड़ाईसे भी सुशोभित हो। दोनों ऊरुओंका विस्तार ग्रीवाकी अपेक्षा एक नेत्र¹ कम होगा। जानु (घुटने), पिण्डली, पैर, पीठ, नितम्ब तथा कटिभाग—इन सबकी यथायोग्य कल्पना करे॥ ७—११$\frac{१}{२}$॥
हाथकी अँगुलियाँ बड़ी हों। वे परस्पर अवरुद्ध न हों। बड़ी अँगुलीकी अपेक्षा छोटी अँगुलियाँ सातवें अंशसे रहित हों। जंघा, ऊरु और कटि—इनकी लंबाई क्रमशः एक-एक नेत्र कम हो। शरीरके मध्यभागके आस-पासका अङ्ग गोल हो। दोनों कुच घने (परस्पर सटे हुए) और पीन (उभड़े हुए) हों। स्तनोंका माप हथेलीके बराबर हो। कटि उनकी अपेक्षा डेढ़ कला अधिक बड़ी हो। शेष चिह्न पूर्ववत् रहें। लक्ष्मीजीके दाहिने हाथमें कमल और बायें हाथमें बिल्वफल हो।² उनके पार्श्वभागमें हाथमें चँवर लिये दो सुन्दरी स्त्रियाँ खड़ी हों³। सामने बड़ी नाकवाले गरुड़की स्थापना करे। अब मैं चक्राङ्कित (शालग्राम) मूर्ति आदिका वर्णन करता हूँ॥ १२—१५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पिण्डिका आदिके लक्षणका वर्णन' नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥
१. नेत्रकी जो लंबाई और चौड़ाई है, उतने मापको 'एक नेत्र' कहते हैं।
२. मत्स्यपुराणमें दाहिने हाथमें श्रीफल और बायें हाथमें कमलका उल्लेख है—
'पद्मं हस्ते प्रदातव्यं श्रीफलं दक्षिणे करे।' (२६१।४३)
३. मत्स्यपुराणमें अनेक चामरधारिणी स्त्रियोंका वर्णन है—'पार्श्वे तस्याः स्त्रियः कार्याश्चामरव्यग्रपाणयः।' (२६१।४५)
| * अध्याय ४६ * | ९३ |
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छियालीसवाँ अध्याय
शालग्राम-मूर्तियोंके लक्षण
भगवान् हयग्रीव कहते हैं— ब्रह्मन्! अब मैं शालग्रामगत भगवन्मूर्तियोंका वर्णन आरम्भ करता हूँ, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं। जिस शालग्राम-शिलाके द्वारमें दो चक्रके चिह्न हों और जिसका वर्ण श्वेत हो, उसकी 'वासुदेव' संज्ञा है। जिस उत्तम शिलाका रंग लाल हो और जिसमें दो चक्रके चिह्न संलग्न हों, उसे भगवान् 'संकर्षण'का श्रीविग्रह जानना चाहिये। जिसमें चक्रका सूक्ष्म चिह्न हो, अनेक छिद्र हों, नील वर्ण हो और आकृति बड़ी दिखायी देती हो, वह 'प्रद्युम्न'की मूर्ति है।$^१$ जहाँ कमलका चिह्न हो, जिसकी आकृति गोल और रंग पीला$^२$ हो तथा जिसमें दो-तीन रेखाएँ शोभा पा रही हों, यह 'अनिरुद्ध'का श्रीअङ्ग है। जिसकी कान्ति काली, नाभि उन्नत और जिसमें बड़े-बड़े छिद्र हों, उसे 'नारायण'का स्वरूप समझना चाहिये। जिसमें कमल और चक्रका चिह्न हो, पृष्ठभागमें छिद्र हो और जो बिन्दुसे युक्त हो, वह शालग्राम 'परमेष्ठी' नामसे प्रसिद्ध है। जिसमें चक्रका स्थूल चिह्न हो, जिसकी कान्ति श्याम हो और मध्यमें गदा-जैसी रेखा हो, उस शालग्रामकी 'विष्णु' संज्ञा है॥ १–४॥
नृसिंह-विग्रहमें चक्रका स्थूल चिह्न होता है। उसकी कान्ति कपिल वर्णकी होती है और उसमें पाँच बिन्दु सुशोभित होते हैं।$^३$
वाराह-विग्रहमें शक्ति नामक अस्त्रका चिह्न होता है। उसमें दो चक्र होते हैं, जो परस्पर विषम (समानतासे रहित) हैं। उसकी कान्ति इन्द्रनील मणिके समान नीली होती है। वह तीन स्थूल रेखाओंसे चिह्नित एवं शुभ होता है।$^४$ जिसका पृष्ठभाग ऊँचा हो, जो गोलाकार आवर्त्तचिह्नसे युक्त एवं श्याम हो, उस शालग्रामकी 'कूर्म' (कच्छप) संज्ञा है॥ ५-६॥
जो अंकुशकी-सी रेखासे सुशोभित, नीलवर्ण एवं बिन्दुयुक्त हो, उस शालग्राम-शिलाको 'हयग्रीव' कहते हैं। जिसमें एक चक्र और कमलका चिह्न हो, जो मणिके समान प्रकाशमान तथा पुच्छाकार रेखासे शोभित हो, उस शालग्रामको 'वैकुण्ठ' समझना चाहिये।$^६$ जिसकी आकृति बड़ी हो, जिसमें तीन बिन्दु शोभा पाते हों, जो काँचके समान श्वेत तथा भरा-पूरा हो, वह शालग्राम-शिला मत्स्यावतारधारी भगवान्की मूर्ति मानी जाती है।$^७$ जिसमें वनमालाका चिह्न और पाँच रेखाएँ हों, उस गोलाकार शालग्राम-शिलाको 'श्रीधर' कहते हैं॥ ७-८॥
गोलाकार, अत्यन्त छोटी, नीली एवं बिन्दुयुक्त शालग्राम-शिलाकी 'वामन' संज्ञा है।$^९$ जिसकी कान्ति श्याम हो, दक्षिण भागमें हारकी रेखा और बायें भागमें बिन्दु का चिह्न हो, उस शालग्राम-
१. वाचस्पत्यकोषमें संकलित गरुड़पुराण (४५वें अध्याय)-के निम्नाङ्कित वचनसे 'प्रद्युम्न-शिलाका पीतवर्ण सूचित होता है।' यथा—
'अथ प्रद्युम्नः सूक्ष्मचक्रस्तु पीतकः।'
२. उक्त ग्रन्थके अनुसार ही अनिरुद्धका नीलवर्ण सूचित होता है। यथा—'अनिरुद्धस्तु वर्तुलो नीलो द्वारि त्रिरेखश्च।'
३. पृथुचक्रो नृसिंहोऽथ कपिलोऽव्यात्त्रिबिन्दुकः। अथवा पञ्चबिन्दुस्तत्पूजनं ब्रह्मचारिणाम्॥ (इति गरुडपुराणेऽपि)
४. वराहः शुभलिङ्गोऽव्याद् विषमस्थद्विचक्रकः। नीलस्त्रिरेखः स्थूलः। (ग०पु०)
५. अथ कूर्ममूर्तिः स बिन्दुमान्। कृष्णः स वर्तुलावर्तः पातु चोन्नतपृष्ठकः। (ग०पु०)
६. हयग्रीवोऽङ्कुशाकारः पञ्चरेखः सकौस्तुभः। वैकुण्ठो मणिरत्नाभ एकचक्राम्बुजोऽसितः॥ (ग०पु०)
७. मत्स्यो दीर्घाम्बुजाकारो हारेखश्च पातु वः। (ग०पु०)
८. श्रीधरः पञ्चरेखोऽव्याद् वनमाली गदान्वितः। (ग०पु०) (वाचस्पत्यकोषसे संकलित)
९. वामनो वर्तुलो ह्रस्वः वामचक्रः सुरेश्वरः। (ग० पु०)
९४ * अग्निपुराण *
शिलाको 'त्रिविक्रम' कहते हैं$^१$॥ ९ ॥
जिसमें सर्पके शरीरका चिह्न हो, अनेक प्रकारकी आभाएँ दीखती हों तथा जो अनेक मूर्तियोंसे मण्डित हो, वह शालग्राम-शिला 'अनन्त' (शेषनाग) कही गयी है।$^२$ जो स्थूल हो, जिसके मध्यभागमें चक्रका चिह्न हो तथा अधोभागमें सूक्ष्म बिन्दु शोभा पा रहा हो, उस शालग्रामकी 'दामोदर' संज्ञा है।$^३$ एक चक्रवाले शालग्रामको सुदर्शन कहते हैं, दो चक्र होनेसे उसकी 'लक्ष्मीनारायण' संज्ञा होती है। जिसमें तीन चक्र हों, वह शिला भगवान् 'अच्युत' अथवा 'त्रिविक्रम' है। चार चक्रोंसे युक्त शालग्रामको 'जनार्दन', पाँच चक्रवालेको 'वासुदेव', छः चक्रवालेको 'प्रद्युम्न' तथा सात चक्रवालेको 'संकर्षण' कहते हैं। आठ चक्रवाले शालग्रामकी 'पुरुषोत्तम' संज्ञा है। नौ चक्रवालेको 'नवव्यूह' कहते हैं। दस चक्रोंसे युक्त शिलाकी 'दशावतार' संज्ञा है। ग्यारह चक्रोंसे युक्त होनेपर उसे 'अनिरुद्ध', द्वादश चक्रोंसे चिह्नित होनेपर 'द्वादशात्मा' तथा इससे अधिक चक्रोंसे युक्त होनेपर उसे 'अनन्त' कहते हैं॥ १०—१३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शालग्रामगत मूर्तियोंके लक्षणका वर्णन' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४६॥
सैंतालीसवाँ अध्याय
शालग्राम-विग्रहोंकी पूजाका वर्णन
भगवान् हयग्रीव कहते हैं—ब्रह्मन्! अब मैं तुम्हारे सम्मुख पूर्वोक्त चक्राङ्कित शालग्राम-विग्रहोंकी पूजाका वर्णन करता हूँ, जो सिद्धि प्रदान करनेवाली है। श्रीहरिकी पूजा तीन प्रकारकी होती है—काम्या, अकाम्या और उभयात्मिका। मत्स्य आदि पाँच विग्रहोंकी पूजा काम्या अथवा उभयात्मिका हो सकती है। पूर्वोक्त चक्रादिसे सुशोभित वराह, नृसिंह और वामन—इन तीनोंकी पूजा मुक्तिके लिये करनी चाहिये। अब शालग्राम-पूजनके विषयमें सुनो, जो तीन प्रकारकी होती है। इनमें निष्कला पूजा उत्तम, सकला पूजा कनिष्ठ और मूर्तिपूजाको मध्यम माना गया है। चौकोर मण्डलमें स्थित कमलपर पूजाकी विधि इस प्रकार है—हृदयमें प्रणवका न्यास करते हुए षडङ्गन्यास करे। फिर करन्यास और व्यापक न्यास करके तीन मुद्राओंका प्रदर्शन करे। तत्पश्चात् चक्रके बाह्यभागमें पूर्व दिशाकी ओर गुरुदेवका पूजन करे। पश्चिम दिशामें गणका, वायव्यकोणमें धाताका एवं नैर्ऋत्यकोणमें विधाताका पूजन करे। दक्षिण और उत्तर दिशामें क्रमशः कर्ता और हर्ताकी पूजा करे। इसी प्रकार ईशानकोणमें विष्वक्सेन और अग्निकोणमें क्षेत्रपालकी पूजा करे। फिर पूर्वादि दिशाओंमें ऋग्वेद आदि चारों वेदोंकी पूजा करके आधारशक्ति, अनन्त, पृथिवी, योगपीठ, पद्म तथा सूर्य, चन्द्र और ब्रह्मात्मक अग्नि—इन तीनोंके मण्डलोंका यजन करे। तदनन्तर द्वादशाक्षर मन्त्रसे आसनपर शिलाकी स्थापना करके पूजन करे। फिर मूल मन्त्रके विभाग करके एवं सम्पूर्ण मन्त्रसे क्रमपूर्वक पूजन करे। फिर प्रणवसे पूजन करनेके पश्चात् तीन मुद्राओंका
१. वामचक्रो हारेरेखः श्यामो वोऽव्यात् त्रिविक्रमः। (ग० पु०)
२. नानावर्णोऽनेकमूर्तिर्नागभोगी त्वनन्तकः। (ग० पु०)
३. स्थूलो दामोदरो नीलो मध्येचक्रः सनीलकः। (ग० पु०)
- अध्याय ४८ * ९५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
प्रदर्शन करे ॥ १—९ ॥
इस प्रकार यह शालग्रामकी प्रथम पूजा निष्कला कही जाती है। पूर्ववत् षोडशदलकमलसे युक्त मण्डलको अङ्कित करे। उसमें शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग—इन आयुधोंकी तथा गुरु आदिकी पहलेकी भाँति पूजा करे। पूर्व और उत्तर दिशाओंमें क्रमशः धनुष और बाणकी पूजा करे। प्रणवमन्त्रसे आसन समर्पण करे और द्वादशाक्षर मन्त्रसे शिलाका न्यास करना चाहिये। अब तीसरे प्रकारकी कनिष्ठ पूजाका वर्णन करता हूँ, सुनो। अष्टदलकमल अङ्कित करके उसपर पहलेके समान गुरु आदिकी पूजा करे। फिर अष्टाक्षर मन्त्रसे आसन देकर उसीसे शिलाका न्यास करे ॥ १०—१३ $\frac{१}{२}$ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शालग्राम आदिकी पूजाका वर्णन' विषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४७॥
अड़तालीसवाँ अध्याय
चतुर्विंशति-मूर्तिस्तोत्र एवं द्वादशाक्षर स्तोत्र
श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं—ब्रह्मन्! ओंकारस्वरूप केशव अपने हाथोंमें पद्म, शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले हैं*। नारायण शङ्ख, पद्म, गदा और चक्र धारण करते हैं, मैं प्रदक्षिणापूर्वक उनके चरणोंमें नतमस्तक होता हूँ। माधव गदा, चक्र, शङ्ख और पद्म धारण करनेवाले हैं, मैं उनको नमस्कार करता हूँ। गोविन्द अपने हाथोंमें क्रमशः चक्र, गदा, पद्म और शङ्ख धारण करनेवाले तथा बलशाली हैं। श्रीविष्णु गदा, पद्म, शङ्ख एवं चक्र धारण करते हैं, वे मोक्ष देनेवाले हैं। मधुसूदन शङ्ख, चक्र, पद्म और गदा धारण करते हैं। मैं उनके सामने भक्तिभावसे नतमस्तक होता हूँ। त्रिविक्रम क्रमशः पद्म, गदा, चक्र एवं शङ्ख धारण करते हैं। भगवान् वामनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा एवं पद्म शोभा पाते हैं, वे सदा मेरी रक्षा करें ॥ १—४ ॥
श्रीधर कमल, चक्र, शार्ङ्ग धनुष एवं शङ्ख धारण करते हैं। वे सबको सद्गति प्रदान करनेवाले हैं। हृषीकेश गदा, चक्र, पद्म एवं शङ्ख धारण करते हैं, वे हम सबकी रक्षा करें। वरदायक भगवान् पद्मनाभ शङ्ख, पद्म, चक्र और गदा धारण करते हैं। दामोदरके हाथोंमें पद्म, शङ्ख, गदा और चक्र शोभा पाते हैं, मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। गदा, शङ्ख, चक्र और पद्म धारण करनेवाले वासुदेवने ही सम्पूर्ण जगत्का विस्तार किया है। गदा, शङ्ख, पद्म और चक्र धारण करनेवाले संकर्षण आपलोगोंकी रक्षा करें ॥ ५—७ ॥
वाद (युद्ध)-कुशल भगवान् प्रद्युम्न चक्र, शङ्ख, गदा और पद्म धारण करते हैं। अनिरुद्ध चक्र, गदा, शङ्ख और पद्म धारण करनेवाले हैं, वे हमलोगोंकी रक्षा करें। सुरेश्वर पुरुषोत्तम चक्र, कमल, शङ्ख और गदा धारण करते हैं, भगवान् अधोक्षज पद्म, गदा, शङ्ख और चक्र धारण करनेवाले हैं। वे आपलोगोंकी रक्षा करें। नृसिंहदेव चक्र, कमल, गदा और शङ्ख धारण करनेवाले हैं, मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ। श्रीगदा, पद्म, चक्र
* अस्त्र-धारणका यह क्रम दाहिने भागके नीचेवाले हाथसे आरम्भ होकर बायें भागके नीचेवाले हाथतक जाता है। अर्थात् केशव दायें भागके निचले हाथमें पद्म, ऊपरवाले हाथमें शङ्ख, बायें भागके ऊपरवाले हाथमें चक्र और नीचेवाले हाथमें गदा धारण करते हैं। ऐसा ही सर्वत्र समझना चाहिये। मतान्तरके अनुसार दाहिने हाथके ऊपरवाले हाथसे भी यह क्रम आरम्भ होता है।
९६ * अग्निपुराण *
और शङ्ख धारण करनेवाले अच्युत आपलोगोंकी रक्षा करें। शङ्ख, गदा, चक्र और पद्म धारण करनेवाले बालवटुरूपधारी वामन, पद्म, चक्र, शङ्ख और गदा धारण करनेवाले जनार्दन, शङ्ख, पद्म, चक्र और गदाधारी यज्ञस्वरूप श्रीहरि तथा शङ्ख, गदा, पद्म एवं चक्र धारण करनेवाले श्रीकृष्ण मुझे भोग और मोक्ष देनेवाले हों॥ ८—१२॥
आदिमूर्ति भगवान् वासुदेव हैं। उनसे संकर्षण प्रकट हुए। संकर्षणसे प्रद्युम्न और प्रद्युम्नसे अनिरुद्धका प्रादुर्भाव हुआ। इनमेंसे एक-एक क्रमशः केशव आदि मूर्तियोंके भेदसे तीन-तीन रूपोंमें अभिव्यक्त हुआ। (अतः कुल मिलाकर बारह स्वरूप हुए)$^१$। चौबीस-मूर्तियोंकी स्तुतिसे युक्त इस द्वादशाक्षर स्तोत्रका जो पाठ अथवा श्रवण करता है, वह निर्मल होकर सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है$^२$॥ १३—१५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'श्रीहरिकी चौबीस मूर्तियोंके स्तोत्रका वर्णन' नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४८॥
उनचासवाँ अध्याय
मत्स्यादि दशावतारोंकी प्रतिमाओंके लक्षणोंका वर्णन
भगवान् हयग्रीव कहते हैं— ब्रह्मन्! अब मैं तुम्हें मत्स्य आदि दस अवतार-विग्रहोंका लक्षण बताता हूँ। मत्स्यभगवान्की आकृति मत्स्यके समान और कूर्म भगवान्की प्रतिमा कूर्म (कच्छप)के आकारकी होनी चाहिये। पृथ्वीके उद्धारक भगवान् वराहको मनुष्याकार बनाना चाहिये, वे दाहिने हाथमें गदा और चक्र धारण करते हैं। उनके बायें हाथमें शङ्ख और पद्म शोभा पाते हैं।
$^१.$ तात्पर्य यह है कि वासुदेवसे केशव, नारायण और माधवकी, संकर्षणसे गोविन्द, विष्णु और मधुसूदनकी, प्रद्युम्नसे त्रिविक्रम, वामन और श्रीधरकी तथा अनिरुद्धसे हृषीकेश, पद्मनाभ एवं दामोदरकी अभिव्यक्ति हुई।
$^२.$ इस अध्यायमें बारह श्लोक स्तुतिके हैं। प्रत्येक श्लोकमें भगवान्की दो-दो मूर्तियोंका स्तवन हुआ तथा इन बारहौं श्लोकोंके आदिका एक-एक अक्षर जोड़नेसे 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' यह द्वादशाक्षर मन्त्र बनता है। इसीलिये इसे द्वादशाक्षर-स्तोत्र एवं चौबीस मूर्तियोंका स्तोत्र कहते हैं।
श्रीभगवानुवाच—
ॐरूपः केशवः पद्मशङ्खचक्रगदाधरः। नारायणः शङ्खपद्मगदाचक्री प्रदक्षिणम्॥ १॥
नतो गदी माधवोऽरिशङ्खपद्मी नमामि तम्। चक्रकौमोदकीपद्मशङ्खी गोविन्द ऊर्जितः॥ २॥
मोक्षदः श्रीगदी पद्मी शङ्खी विष्णुश्च चक्रधृक्। शङ्खचक्राब्जगदिनं मधुसूदनमानमे॥ ३॥
भक्त्या त्रिविक्रमः पद्मगदी चक्री च शङ्ख्यपि। शङ्खचक्रगदापद्मी वामनः पातु मां सदा॥ ४॥
गतिदः श्रीधरः पद्मी चक्रशार्ङ्गी च शङ्ख्यपि। हृषीकेशो गदी चक्री पद्मी शङ्खी च पातु नः॥ ५॥
वरदः पद्मनाभस्तु शङ्खाब्जारिगदाधरः। दामोदरः पद्मशङ्खगदाचक्री नमामि तम्॥ ६॥
तेने गदी शङ्खचक्री वासुदेवोऽब्जभृज्जगत्। संकर्षणो गदी शङ्खी पद्मी चक्री च पातु वः॥ ७॥
वादी चक्री शङ्खगदी प्रद्युम्नः पद्मभृत्प्रभुः। अनिरुद्धश्चक्रगदी शङ्खी पद्मी च पातु नः॥ ८॥
सुरेशोऽर्यब्जशङ्खाढ्यः श्रीगदी पुरुषोत्तमः। अधोक्षजः पद्मगदी शङ्खचक्री च पातु वः॥ ९॥
देवो नृसिंहश्चक्राब्जगदी शङ्खी नमामि तम्। अच्युतः श्रीगदी पद्मी चक्री शङ्खी च पातु वः॥ १०॥
बालरूपी शङ्खगदी उपेन्द्रश्चक्रपद्म्यपि। जनार्दनः पद्मचक्री शङ्खधारी गदाधरः॥ ११॥
यज्ञः शङ्खी पद्मचक्री हरिः कौमोदकीधरः। कृष्णः शङ्खी गदी पद्मी चक्री मे भुक्तिमुक्तिदः॥ १२॥
आदिमूर्तिर्वासुदेवस्तस्मात्कर्षणोऽभवत्। संकर्षणाच्च प्रद्युम्नः प्रद्युम्नादनिरुद्धकः॥ १३॥
केशवादिप्रभेदेन एकैकः स्यात्त्रिधा क्रमात्॥ १४॥
द्वादशाक्षरकं स्तोत्रं चतुर्विंशतिमूर्तिमत्। यः पठेच्छृणुयाद्वाऽपि निर्मलः सर्वमाप्नुयात्॥ १५॥
* अध्याय ४९ * ९७
अथवा पद्मके स्थानपर वाम भागमें पद्मा देवी सुशोभित होती हैं। लक्ष्मी उनके बायें कूर्पर (कोहनी)-का सहारा लिये रहती हैं। पृथ्वी तथा अनन्त चरणोंके अनुगत होते हैं। भगवान् वराहकी स्थापनासे राज्यकी प्राप्ति होती है और मनुष्य भवसागरसे पार हो जाता है। नरसिंहका मुँह खुला हुआ है। उन्होंने अपनी बायीं जाँघपर दानव हिरण्यकशिपुको दबा रखा है और उस दैत्यके वक्षको विदीर्ण करते दिखायी देते हैं। उनके गलेमें माला है और हाथोंमें चक्र एवं गदा प्रकाशित हो रहे हैं॥ १-४॥
वामनका विग्रह छत्र एवं दण्डसे सुशोभित होता है अथवा उनका विग्रह चतुर्भुज बनाया जाय। परशुरामके हाथोंमें धनुष और बाण होना चाहिये। वे खड्ग और फरसेसे भी शोभित होते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके श्रीविग्रहको धनुष, बाण, खड्ग और शङ्खसे सुशोभित करना चाहिये। अथवा वे द्विभुज माने गये हैं। बलरामजी गदा एवं हल धारण करनेवाले हैं, अथवा उन्हें भी चतुर्भुज बनाना चाहिये। उनके बायें भागके ऊपरवाले हाथमें हल धारण करावे और नीचेवालेमें सुन्दर शोभावाली शङ्ख, दायें भागके ऊपरवाले हाथमें मुसल धारण करावे और नीचेवाले हाथमें शोभायमान सुदर्शन चक्र॥ ५-७॥
बुद्धदेवकी प्रतिमाका लक्षण यों है। बुद्ध ऊँचे पद्ममय आसनपर बैठे हैं। उनके एक हाथमें वरद और दूसरेमें अभयकी मुद्रा है। वे शान्तस्वरूप हैं। उनके शरीरका रंग गोरा और कान लम्बे हैं। वे सुन्दर पीत वस्त्रसे आवृत हैं। कल्की भगवान् धनुष और तूणीरसे सुशोभित हैं। म्लेच्छोंके संहारमें लगे हैं। वे ब्राह्मण हैं। अथवा उनकी आकृति इस प्रकार बनावे—वे घोड़ेकी पीठपर बैठे हैं और अपने चार हाथोंमें खड्ग, शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करते हैं॥ ८-९॥
ब्रह्मन्! अब मैं तुम्हें वासुदेव आदि नौ मूर्तियोंके लक्षण बताता हूँ। दाहिने भागके ऊपरवाले हाथमें उत्तम चक्र—यह वासुदेवकी मुख्य पहचान है। उनके एक पार्श्वमें ब्रह्मा और दूसरे भागमें महादेवजी सदा विराजमान रहते हैं। वासुदेवकी शेष बातें पूर्ववत् हैं। वे शङ्ख अथवा वरदकी मुद्रा धारण करते हैं। उनका स्वरूप द्विभुज अथवा चतुर्भुज होता है। बलरामके चार भुजाएँ हैं। वे दायें हाथमें हल और मुसल तथा बायें हाथमें गदा और पद्म धारण करते हैं। प्रद्युम्न दायें हाथमें चक्र और शङ्ख तथा बायें हाथमें धनुष-बाण धारण करते हैं। अथवा द्विभुज प्रद्युम्नके एक हाथमें गदा और दूसरेमें धनुष है। वे प्रसन्नतापूर्वक इन अस्त्रोंको धारण करते हैं। या उनके एक हाथमें धनुष और दूसरेमें बाण है। अनिरुद्ध और भगवान् नारायणका विग्रह चतुर्भुज होता है॥ १०-१३॥
ब्रह्माजी हंसपर आरूढ होते हैं। उनके चार मुख और चार भुजाएँ हैं। उदर-मण्डल विशाल है। लंबी दाढ़ी और सिरपर जटा—यही उनकी प्रतिमाका लक्षण है। वे दाहिने हाथोंमें अक्षसूत्र और स्रुवा एवं बायें हाथोंमें कुण्डिका और आज्यस्थाली धारण करते हैं। उनके वाम भागमें सरस्वती और दक्षिण भागमें सावित्री हैं। विष्णुके आठ भुजाएँ हैं। वे गरुड़पर आरूढ़ हैं। उनके दाहिने हाथोंमें खड्ग, गदा, बाण और वरदकी मुद्रा है। बायें हाथोंमें धनुष, खेट, चक्र और शङ्ख हैं। अथवा उनका विग्रह चतुर्भुज भी है। नृसिंहके चार भुजाएँ हैं। उनकी दो भुजाओंमें शङ्ख और चक्र हैं तथा दो भुजाओंसे वे महान् असुर हिरण्यकशिपुका वक्ष विदीर्ण कर रहे हैं॥ १४-१७॥
वराहके चार भुजाएँ हैं। उन्होंने शेषनागको अपने करतलमें धारण कर रखा है। वे बायें
९८ * अग्निपुराण *
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हाथसे पृथ्वीको और वाम भागमें लक्ष्मीको धारण करते हैं। जब लक्ष्मी उनके साथ हों, तब पृथ्वीको उनके चरणोंमें संलग्न बनाना चाहिये। त्रैलोक्यमोहनमूर्ति श्रीहरि गरुड़पर आरूढ़ हैं। उनके आठ भुजाएँ हैं। वे दाहिने हाथोंमें चक्र, शङ्ख, मुसल और अंकुश धारण करते हैं। उनके बायें हाथोंमें शङ्ख, शार्ङ्गधनुष, गदा और पाश शोभा पाते हैं। वाम भागमें कमलधारिणी कमला और दक्षिण भागमें वीणाधारिणी सरस्वतीकी प्रतिमाएँ बनानी चाहिये। भगवान् विश्वरूपका विग्रह बीस भुजाओंसे सुशोभित है। वे दाहिने हाथोंमें क्रमशः चक्र, खड्ग, मुसल, अंकुश, पट्टिश, मुद्गर, पाश, शक्ति, शूल तथा बाण धारण करते हैं। बायें हाथोंमें शङ्ख, शार्ङ्गधनुष, गदा, पाश, तोमर, हल, फरसा, दण्ड, छुरी और उत्तम ढाल लिये रहते हैं। उनके दाहिने भागमें चतुर्भुज ब्रह्मा तथा बायें भागमें त्रिनेत्रधारी महादेव विराजमान हैं। जलशायी जलमें शयन करते हैं। इनकी मूर्ति शेषशय्यापर सोयी हुई बनानी चाहिये। भगवती लक्ष्मी उनकी एक चरणकी सेवामें लगी हैं। विमला आदि शक्तियाँ उनकी स्तुति करती हैं। उन श्रीहरिके नाभिकमलपर चतुर्भुज ब्रह्मा विराज रहे हैं॥ १८-२४ $\frac{\text{१}}{\text{२}}$ ॥
हरिहर-मूर्ति इस प्रकार बनानी चाहिये-वह दाहिने हाथमें शूल तथा ऋष्टि धारण करती है और बायें हाथमें गदा एवं चक्र। शरीरके दाहिने भागमें रुद्रके चिह्न हैं और वाम भागमें केशवके। दाहिने पार्श्वमें गौरी तथा वाम पार्श्वमें लक्ष्मी विराज रही हैं। भगवान् हयग्रीवके चार हाथोंमें क्रमशः शङ्ख, चक्र, गदा और वेद शोभा पाते हैं। उन्होंने अपना बायाँ पैर शेषनागपर और दाहिना पैर कच्छपकी पीठपर रख छोड़ा है। दत्तात्रेयके दो बाँहें हैं। उनके वामाङ्कमें लक्ष्मी शोभा पाती है। भगवान्के पार्षद विष्क्क्सेन अपने चार हाथोंमें क्रमशः चक्र, गदा, हल और शङ्ख धारण करते हैं॥ २५-२८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मत्स्यादि दशावतारोंकी प्रतिमाओंके लक्षणोंका वर्णन' नामक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४९॥
पचासवाँ अध्याय
चण्डी आदि देवी-देवताओंकी प्रतिमाओंके लक्षण
श्रीभगवान् बोले- चण्डी बीस भुजाओंसे विभूषित होती है। वह अपने दाहिने हाथोंमें शूल, खड्ग, शक्ति, चक्र, पाश, खेट, आयुध, अभय, डमरू और शक्ति धारण करती है। बायें हाथोंमें नागपाश, खेटक, कुठार, अंकुश, पाश, घण्टा, आयुध, गदा, दर्पण और मुद्गर लिये रहती है। अथवा चण्डीकी प्रतिमा दस भुजाओंसे युक्त होनी चाहिये। उसके चरणोंके नीचे कटे हुए मस्तकवाला महिष हो। उसका मस्तक अलग गिरा हुआ हो। वह हाथोंमें शस्त्र उठाये हो। उसकी ग्रीवासे एक पुरुष प्रकट हुआ हो, जो अत्यन्त कुपित हो। उसके हाथमें शूल हो, वह मुँहसे रक्त उगल रहा हो। उसके गलेकी माला, सिरके बाल और दोनों नेत्र लाल दिखायी देते हों। देवीका वाहन सिंह उसके रक्तका आस्वादन कर रहा हो। उस महिषासुरके गलेमें खूब कसकर पाश बाँधा गया हो। देवीका दाहिना पैर सिंहपर और बायाँ पैर नीचे महिषासुरके शरीरपर हो॥ १-५॥
ये चण्डीदेवी त्रिनेत्रधारिणी हैं तथा शस्त्रोंसे
- अध्याय ५० * ९९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
सम्पन्न रहकर शत्रुओंका मर्दन करनेवाली हैं। नवकमलात्मक पीठपर दुर्गाकी प्रतिमामें उनकी पूजा करनी चाहिये। पहले कमलके नौ दलोंमें तथा मध्यवर्तिनी कर्णिकामें इन्द्र आदि दिक्पालोंकी तथा नौ तत्त्वात्मिका शक्तियोंके$^१$ साथ दुर्गाकी पूजा करे॥६$\frac{१}{२}$॥
दुर्गाजीकी एक प्रतिमा अठारह भुजाओंकी होती है। वह दाहिने भागके हाथोंमें मुण्ड, खेटक, दर्पण, तर्जनी, धनुष, ध्वज, डमरू, ढाल और पाश धारण करती है; तथा वाम भागकी भुजाओंमें शक्ति, मुद्गर, शूल, वज्र, खड्ग, अंकुश, बाण, चक्र और शलाका लिये रहती है। सोलह बाँहवाली दुर्गाकी प्रतिमा भी इन्हीं आयुधोंसे युक्त होती है। अठारहमेंसे दो भुजाओं तथा डमरू और तर्जनी—इन दो आयुधोंको छोड़कर शेष सोलह हाथ उन पूर्वोक्त आयुधोंसे ही सम्पन्न होते हैं। रुद्रचण्डा आदि नौ दुर्गाएँ इस प्रकार हैं—रुद्रचण्डा, प्रचण्डा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, चण्डा, चण्डवती, चण्डरूपा और अतिचण्डिका। ये पूर्वादि आठ दिशाओंमें पूजित होती हैं तथा नवीं उग्रचण्डा मध्यभागमें स्थापित एवं पूजित होती हैं। रुद्रचण्डा आदि आठ देवियोंकी अङ्गकान्ति क्रमशः गोरोचनाके सदृश पीली, अरुणवर्णा, काली, नीली, शुक्लवर्णा, धूम्रवर्णा, पीतवर्णा और श्वेतवर्णा है। ये सब-की-सब सिंहवाहिनी हैं। महिषासुरके कण्ठसे प्रकट हुआ जो पुरुष है, वह शस्त्रधारी है और ये पूर्वोक्त देवियाँ अपनी मुट्ठीमें उसका केश पकड़े रहती हैं॥७—१२॥
ये नौ दुर्गाएँ 'आलीढा'$^२$ आकृतिकी होनी चाहिये। पुत्र-पौत्र आदिकी वृद्धिके लिये इनकी स्थापना (एवं पूजा) करनी उचित है। गौरी ही चण्डिका आदि देवियोंके रूपमें पूजित होती हैं। वे ही हाथोंमें कुण्डी, अक्षमाला, गदा और अग्नि धारण करके 'रम्भा' कहलाती हैं। वे ही वनमें 'सिद्धा' कही गयी हैं। सिद्धावस्थामें वे अग्निसे रहित होती हैं। 'ललिता' भी वे ही हैं। उनका परिचय इस प्रकार है—उनके एक बायें हाथमें गर्दनसहित मुण्ड है और दूसरेमें दर्पण। दाहिने हाथमें फलाञ्जलि है और उससे ऊपरके हाथमें सौभाग्यकी मुद्रा॥१३-१४$\frac{१}{२}$॥
लक्ष्मीके दायें हाथमें कमल और बायें हाथमें श्रीफल होता है। सरस्वतीके दो हाथोंमें पुस्तक और अक्षमाला शोभा पाती है और शेष दो हाथोंमें वे वीणा धारण करती हैं। गङ्गाजीकी अङ्गकान्ति श्वेत है। वे मकरपर आरूढ हैं। उनके एक हाथमें कलश है और दूसरेमें कमल। यमुना देवी कच्छपपर आरूढ हैं। उनके दोनों हाथोंमें कलश है और वे श्यामवर्णा हैं। इसी रूपमें इनकी पूजा होती है। तुम्बुरुकी प्रतिमा वीणासहित होनी चाहिये। उनकी अङ्गकान्ति श्वेत है। शूलपाणि शंकर वृषभपर आरूढ हो मातृकाओंके आगे-आगे चलते हैं। ब्रह्माजीकी प्रिया सावित्री गौरवर्णा एवं चतुर्मुखी हैं। उनके दाहिने हाथोंमें अक्षमाला और स्रुक् शोभा पाते हैं और बायें हाथोंमें वे
१. इन नौ तत्त्वात्मिका शक्तियोंकी नामावली इस प्रकार समझनी चाहिये—अग्निपुराण अध्याय २१ में—लक्ष्मी, मेधा, कला, तुष्टि, पुष्टि, गौरी, प्रभा, मति और दुर्गा—ये नाम आये हैं। तथा तन्त्रसमुच्चय और मन्त्रमहार्णवके अनुसार इन शक्तियोंके ये नाम हैं—प्रभा, माया, जया, सूक्ष्मा, विशुद्धा, नन्दिनी, सुप्रभा, विजया तथा सर्वसिद्धिदा। २. वाचस्पत्यकोषमें आलीढका लक्षण इस प्रकार दिया गया है— भुग्नवामपदं पश्चात्तत्त्वजानूरूदक्षिणम्। वितस्त्यः पञ्च विस्तारे तदालीढं प्रकीर्तितम्॥ जिसमें मुड़ा हुआ बायाँ पैर तो पीछे हो और तने हुए घुटने तथा ऊरुवाला दाहिना पैर आगेकी ओर हो, दोनोंके बीचका विस्तार पाँच बित्ता हो तो इस प्रकारके आसन या अवस्थानको 'आलीढ' कहा गया है।
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१००
- अग्निपुराण *
कुण्ड एवं अक्षपात्र लिये रहती हैं। उनका वाहन हंस है। शंकरप्रिया पार्वती वृषभपर आरूढ होती है। उनके दाहिने हाथोंमें धनुष-बाण और बायें हाथोंमें चक्र-धनुष शोभित होते हैं। कौमारी शक्ति मोरपर आरूढ होती है। उसकी अङ्गकान्ति लाल है। उसके दो हाथ हैं और वह अपने हाथोंमें शक्ति धारण करती है॥ १५-१९॥
लक्ष्मी (वैष्णवी शक्ति) अपने दायें हाथोंमें चक्र और शङ्ख धारण करती हैं तथा बायें हाथोंमें गदा एवं कमल लिये रहती हैं। वाराही शक्ति भैंसेपर आरूढ होती है। उसके हाथ दण्ड, शङ्ख, चक्र और गदासे सुशोभित होते हैं। ऐन्द्री शक्ति ऐरावत हाथीपर आरूढ होती है। उसके सहस्र नेत्र हैं तथा उसके हाथोंमें वज्र शोभा पाता है। ऐन्द्री देवी पूजित होनेपर सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं। चामुण्डाकी आँखें वृक्षके खोखलेकी भाँति गहरी होती हैं। उनका शरीर मांसरहित—कंकाल दिखायी देता है। उनके तीन नेत्र हैं। मांसहीन शरीरमें अस्थिमात्र ही सार है। केश ऊपरकी ओर उठे हुए हैं। पेट सटा हुआ है। वे हाथीका चमड़ा पहनती हैं। उनके बायें हाथोंमें कपाल और पट्टिश है तथा दायें हाथोंमें शूल और कटार। वे शवपर आरूढ होती और हड्डियोंके गहनोंसे अपने शरीरको विभूषित करती हैं॥ २०—२२ १/२॥
विनायक (गणेश)—की आकृति मनुष्यके समान है; किंतु उनका पेट बहुत बड़ा है। मुख हाथीके समान है और सूँड़ लंबी है। वे यज्ञोपवीत धारण करते हैं। उनके मुखकी चौड़ाई सात कला है और सूँड़की लंबाई छत्तीस अङ्गुल। उनकी नाड़ी (गर्दनके ऊपरकी हड्डी) बारह कला विस्तृत और गर्दन डेढ़ कला ऊँची होती है। उनके कण्ठभागकी लंबाई छत्तीस अङ्गुल है और गुह्यभागका घेरा डेढ़ अङ्गुल। नाभि और ऊरुका विस्तार बारह अङ्गुल है। जाँघों और पैरोंका भी यही माप है। वे दाहिने हाथोंमें गजदन्त और फरसा धारण करते हैं तथा बायें हाथोंमें लड्डू एवं उत्पल लिये रहते हैं॥ २३—२६॥
स्कन्द स्वामी मयूरपर आरूढ हैं। उनके उभय पार्श्वमें सुमुखी और विडालाक्षी मातृका तथा शाख और विशाख अनुज खड़े हैं। उनके दो भुजाएँ हैं। वे बालरूपधारी हैं। उनके दाहिने हाथमें शक्ति शोभा पाती है और बायें हाथमें कुक्कुट। उनके एक या छः मुख बनाने चाहिये। गाँवमें उनके अर्चाविग्रहको छः अथवा बारह भुजाओंसे युक्त बनाना चाहिये, परंतु वनमें यदि उनकी मूर्ति स्थापित करनी हो तो उसके दो ही भुजाएँ बनानी चाहिये। कौमारी-शक्तिकी छहों दाहिनी भुजाओंमें शक्ति, बाण, पाश, खड्ग, गदा और तर्जनी (मुद्रा)—ये अस्त्र रहने चाहिये और छः बायें हाथोंमें मोरपंख, धनुष, खेट, पताका, अभयमुद्रा तथा कुक्कुट होने चाहिये। रुद्रचर्चिका देवी हाथीके चर्म धारण करती हैं। उनके मुख और एक पैर ऊपरकी ओर उठे हैं। वे बायें-दायें हाथोंमें क्रमशः कपाल, कर्तरी, शूल और पाश धारण करती हैं। वे ही देवी—'अष्टभुजा'के रूपमें भी पूजित होती हैं॥ २७—३१॥
मुण्डमाला और डमरूसे युक्त होनेपर वे ही 'रुद्रचामुण्डा' कही गयी हैं। वे नृत्य करती हैं, इसलिये 'नाट्येश्वरी' कहलाती हैं। ये ही आसनपर बैठी हुई चतुर्मुखी 'महालक्ष्मी' (की तामसी मूर्ति) कही गयी हैं, जो अपने हाथोंमें पड़े हुए मनुष्यों, घोड़ों, भैंसों और हाथियोंको खा रही हैं। 'सिद्धचामुण्डा' देवीके दस भुजाएँ और तीन नेत्र हैं। ये दाहिने भागके पाँच हाथोंमें शस्त्र, खड्ग तथा तीन डमरू धारण करती हैं और बायें भागके हाथोंमें घण्टा, खेटक, खट्वाङ्ग, त्रिशूल (और ढाल) लिये रहती हैं। 'सिद्धयोगेश्वरी' देवी सम्पूर्ण सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं। इन्हीं
* अध्याय ५० * १०१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
हरिहर भगवान् [ अग्नि० अ० ४९ ] | स्कन्द स्वामी [ अग्नि० अ० ५० ]
चण्डी—बीस भुजा [ अग्नि० अ० ५० ] | दुर्गा—अठारह भुजा [ अग्नि० अ० ५० ]
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१०२ * अग्निपुराण *
देवीकी स्वरूपभूता एक दूसरी शक्ति हैं, जिनकी अङ्गकान्ति अरुण है। ये अपने दो हाथोंमें पाश और अंकुश धारण करती हैं तथा ‘भैरवी’ नामसे विख्यात हैं। ‘रूपविद्या देवी’ बारह भुजाओंसे युक्त कही गयी हैं। ये सब-की-सब श्मशानभूमिमें प्रकट होनेवाली तथा भयंकर हैं। इन आठों देवियोंको ‘अम्बाष्टक’$^१$ कहते हैं॥ ३२—३६॥
‘क्षमादेवी’—शिवाओं (शृगालियों)-से आवृत हैं। वे एक बूढ़ी स्त्रीके रूपमें स्थित हैं। उनके दो भुजाएँ हैं। मुँह खुला हुआ है। दाँत निकले हुए हैं तथा ये धरतीपर घुटनों और हाथका सहारा लेकर बैठी हैं। उनके द्वारा उपासकोंका कल्याण होता है। यक्षिणियोंकी आँखें स्तब्ध (एकटक देखनेवाली) और बड़ी होती हैं। शाकिनियाँ वक्रदृष्टिसे देखनेवाली होती हैं। अप्सराएँ सदा ही अत्यन्त रमणीय एवं सुन्दर रूपवाली हुआ करती हैं। इनकी आँखें भूरी होती हैं॥ ३७-३८॥
भगवान् शंकरके द्वारपाल नन्दीश्वर एक हाथमें अक्षमाला और दूसरेमें त्रिशूल लिये रहते हैं। महाकालके एक हाथमें तलवार, दूसरेमें कटा हुआ सिर, तीसरेमें शूल और चौथेमें खेट होना चाहिये। भृङ्गीका शरीर कृश होता है। वे नृत्यकी मुद्रामें देखे जाते हैं। उनका मस्तक कूष्माण्डके समान स्थूल और गंजा होता है। वीरभद्र आदि गण हाथी और गायके समान कान और मुखवाले होते हैं। घण्टाकर्णके अठारह भुजाएँ होती हैं। वे पाप और रोगका विनाश करनेवाले हैं। वे बायें भागके आठ हाथोंमें वज्र, खड्ग, दण्ड, चक्र, बाण, मुसल, अंकुश और मुद्गर तथा दायें भागके आठ हाथोंमें तर्जनी, खेट, शक्ति, मुण्ड, पाश, धनुष, घण्टा और कुठार धारण करते हैं। शेष दो हाथोंमें त्रिशूल लिये रहते हैं। घण्टाकी मालासे अलंकृत देव घण्टाकर्ण विस्फोट (फोड़े, फुंसी एवं चेचक आदि)-का निवारण करनेवाले हैं॥ ३९—४३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘चण्डी आदि देवी-देवताओंकी प्रतिमाओंके लक्षणोंका निरूपण’ नामक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५०॥
इक्यावनवाँ अध्याय
सूर्यादि ग्रहों तथा दिक्पाल आदि देवताओंकी प्रतिमाओंके लक्षणोंका वर्णन
**श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं—**ब्रह्मन्! सात अश्वोंसे जुते हुए एक पहियेवाले रथपर विराजमान सूर्यदेवकी प्रतिमाको स्थापित करना चाहिये। भगवान् सूर्य अपने दोनों हाथोंमें दो कमल धारण करते हैं। उनके दाहिने भागमें दावात और कलम लिये दण्डी खड़े हैं और वाम भागमें पिङ्गल हाथमें दण्ड लिये द्वारपर विद्यमान हैं। ये दोनों सूर्यदेवके पार्षद हैं। भगवान् सूर्यदेवके उभय पार्श्वमें बालव्यजन (चँवर) लिये ‘राज्ञी’ तथा ‘निष्प्रभा’ खड़ी हैं।$^२$ अथवा घोड़ेपर चढ़े हुए
१. रुद्रचण्डा, अष्टभुजा (या रुद्रचामुण्डा), नाट्येश्वरी, चतुर्मुखी महालक्ष्मी, सिद्धचामुण्डा, सिद्धयोगेश्वरी, भैरवी तथा रूपविद्या— इन आठ देवियोंको ही ‘अम्बाष्टक’ कहा गया है।
२. ‘राज्ञी’ और ‘निष्प्रभा’—ये चँवर डुलानेवाली स्त्रियोंके नाम हैं। अथवा इन नामोंद्वारा सूर्यदेवकी दोनों पत्नियोंकी ओर संकेत किया गया है। ‘राज्ञी’ शब्दसे उनकी रानी ‘संज्ञा’ गृहीत होती हैं और ‘निष्प्रभा’ शब्दसे ‘छाया’। ये दोनों देवियाँ चँवर डुलाकर पतिकी सेवा कर रही हैं।