अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अध्याय ५१ * १०३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
एकमात्र सूर्यकी ही प्रतिमा बनानी चाहिये। समस्त दिक्पाल हाथोंमें वरद मुद्रा, दो-दो कमल तथा शस्त्र लिये क्रमशः पूर्वाद दिशाओंमें स्थित दिखाये जाने चाहिये ॥ १-३॥
बारह दलोंका एक कमल-चक्र बनावे। उसमें सूर्य, अर्यमा* आदि नामवाले बारह आदित्योंका क्रमशः बारह दलोंमें स्थापन करे। यह स्थापना वरुण-दिशा एवं वायव्यकोणसे आरम्भ करके नैर्ऋत्यकोणके अन्ततकके दलोंमें होनी चाहिये। उक्त आदित्यगण चार-चार हाथवाले हों और उन हाथोंमें मुद्गर, शूल, चक्र एवं कमल धारण किये हों। अग्निकोणसे लेकर नैर्ऋत्यतक, नैर्ऋत्यसे वायव्यतक, वायव्यसे ईशानतक और वहाँसे अग्निकोणतकके दलोंमें उक्त आदित्योंकी स्थिति जाननी चाहिये ॥ ४॥
बारह आदित्योंके नाम इस प्रकार हैं-वरुण, सूर्य, सहस्त्रांशु, धाता, तपन, सविता, गभस्तिक, रवि, पर्जन्य, त्वष्टा, मित्र और विष्णु। ये मेष आदि बारह राशियोंमें स्थित होकर जगत्को ताप एवं प्रकाश देते हैं। ये वरुण आदि आदित्य क्रमशः मार्गशीर्ष मास (या वृश्चिक राशि)-से लेकर कार्तिक मास (या तुलाराशि)-तकके मासों (एवं राशियों)-में स्थित होकर अपना कार्य सम्पन्न करते हैं। इनकी अङ्गकान्ति क्रमशः काली, लाल, कुछ-कुछ लाल, पीली, पाण्डुवर्ण, श्वेत, कपिलवर्ण, पीतवर्ण, तोतेके समान हरी, धवलवर्ण, धूम्रवर्ण और नीली है। इनकी शक्तियाँ द्वादशदल कमलके केसरोंके अग्रभागमें स्थित होती हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं-इडा, सुषुम्ना, विश्वार्चि, इन्दु, प्रमर्दिनी (प्रवर्द्धिनी), प्रहर्षिणी, महाकाली, कपिला, प्रबोधिनी, नीलाम्बरा, घनान्तस्था (घनान्तस्था) और अमृताख्या। वरुण आदिकी जो अङ्गकान्ति है, वही इन शक्तियोंकी भी है। केसरोंके अग्रभागोंमें इनकी स्थापना करे। सूर्यदेवका तेज प्रचण्ड और मुख विशाल है। उनके दो भुजाएँ हैं। वे अपने हाथोंमें कमल और खड्ग धारण करते हैं ॥ ५-१०॥
चन्द्रमा कुण्डिका तथा जपमाला धारण करते हैं। मङ्गलके हाथोंमें शक्ति और अक्षमाला शोभित होती हैं। बुधके हाथोंमें धनुष और अक्षमाला शोभा पाते हैं। बृहस्पति कुण्डिका और अक्षमालाधारी हैं। शुक्रका भी ऐसा ही स्वरूप है। अर्थात् उनके हाथोंमें भी कुण्डिका और अक्षमाला शोभित होती हैं। शनि किङ्किणी-सूत्र धारण करते हैं। राहु अर्द्धचन्द्रधारी हैं तथा केतुके हाथोंमें खड्ग और दीपक शोभा पाते हैं। अनन्त, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शङ्ख और कुलिक आदि सभी मुख्य नागगण सूत्रधारी होते हैं। फन ही इनके मुख हैं। ये सब-के-सब महान् प्रभापुञ्जसे उद्भासित होते हैं। इन्द्र वज्रधारी हैं। ये हाथीपर आरूढ होते हैं। अग्निका वाहन बकरा है। अग्निदेव शक्ति धारण करते हैं। यम दण्डधारी हैं और भैंसेपर आरूढ होते हैं। निर्ऋति खड्गधारी हैं और मनुष्य उनका वाहन है। वरुण मकरपर आरूढ हैं और पाश धारण करते हैं। वायुदेव वज्रधारी हैं और मृग उनका वाहन है। कुबेर भेड़पर चढ़ते और गदा धारण करते हैं। ईशान जटाधारी हैं और वृषभ उनका वाहन है ॥ ११-१५॥
समस्त लोकपाल द्विभुज हैं। विश्वकर्मा अक्षसूत्र
* सूर्य आदि द्वादश आदित्योंके नाम नीचे गिनाये गये हैं और अर्यमा आदि द्वादश आदित्योंके नाम १९वें अध्यायके दूसरे और तीसरे श्लोकोंमें देखने चाहिये। वे नाम वैवस्वत मन्वन्तरके आदित्योंके हैं। चाक्षुष मन्वन्तरमें वे ही 'तुषित' नामसे विख्यात थे। अन्य पुराणोंमें भी आदित्योंकी नामावली तथा उनके मासक्रममें यहाँकी अपेक्षा कुछ अन्तर मिलता है। इसकी संगति कल्पभेदके अनुसार माननी चाहिये।
१०४ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
धारण करते हैं। हनुमान्जीके हाथमें वज्र है। उन्होंने अपने दोनों पैरोंसे एक असुरको दबा रखा है। किंनर-मूर्तियाँ हाथमें वीणा लिये हों और विद्याधर माला धारण किये आकाशमें स्थित दिखाये जायें। पिशाचोंके शरीर दुर्बल-कङ्गालमात्र हों। वेतालोंके मुख विकराल हों। क्षेत्रपाल शूलधारी बनाये जायें। प्रेतोंके पेट लंबे और शरीर कृश हों॥ १६-१८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सूर्यादि ग्रहों तथा दिक्पालादि देवताओंकी प्रतिमाओंके लक्षणोंका वर्णन' नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५१ ॥
बावनवाँ अध्याय
चौंसठ योगिनी आदिकी प्रतिमाओंके लक्षण
श्रीभगवान् बोले— ब्रह्मन् ! अब मैं चौंसठ योगिनियोंका वर्णन करूँगा। इनका स्थान क्रमशः पूर्वदिशासे लेकर ईशानपर्यन्त है। इनके नाम इस प्रकार हैं— १. अक्षोभ्या, २. रूक्षकणीं, ३. राक्षसी, ४. क्षपणा, ५. क्षमा, ६. पिङ्गाक्षी, ७. अक्षया, ८. क्षेमा, ९. इला, १०. नीलालया, ११. लोला, १२. रक्ता (या लक्ता), १३. बलाकेशी, १४. लालसा, १५. विमला, १६. दुर्गा (अथवा हुताशा), १७. विशालाक्षी, १८. ह्रींकारा (या हुंकारा), १९. वडवामुखी, २०. महाक्रूरा, २१. क्रोधना, २२. भयंकरी, २३. महानाना, २४. सर्वज्ञा, २५. तरला, २६. तारा, २७. ऋग्व़ेदा, २८. हयानना, २९. सारा, ३०. रससंग्राही (अथवा सुसंग्राही या रुद्रसंग्राही), ३१. शबरा (या शाम्बरा), ३२. तालजङ्घिका, ३३. रक्ताक्षी, ३४. सुप्रसिद्धा, ३५. विद्युज्जिह्वा, ३६. करङ्किणी, ३७. मेघनादा, ३८. प्रचण्डा, ३९. उग्रा, ४०. कालकर्णी, ४१. वरप्रदा, ४२. चण्डा (अथवा चन्द्रा), ४३. चण्डवती (या चन्द्रावली), ४४. प्रपञ्चा, ४५. प्रलयान्तिका, ४६. शिशुवक्त्रा, ४७. पिशाची, ४८. पिशितास्रवलोलुपा, ४९. धमनी, ५०. तपनी, ५१. रागिणी (अथवा वामनी), ५२. विकृतानना, ५३. वायुवेगा, ५४. बृहत्कुक्षि, ५५. विकृता, ५६. विश्वरूपिका, ५७. यमजिह्वा, ५८. जयन्ती, ५९. दुर्जया, ६०. जयन्तिका (अथवा यमान्तिका), ६१. विडाली, ६२. रेवती, ६३. पूतना तथा ६४. विजयान्तिका॥ १-८॥
योगिनियाँ आठ अथवा चार हाथोंसे युक्त होती हैं। इच्छानुसार शस्त्र धारण करती हैं तथा उपासकोंको सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करनेवाली हैं। भैरवके बारह हाथ हैं। उनके मुखमें ऊँचे दाँत हैं तथा वे सिरपर जटा एवं चन्द्रमा धारण करते हैं। उन्होंने एक ओरके पाँच हाथोंमें क्रमशः खड्ग, अंकुश, कुठार, बाण तथा जगत्को अभय प्रदान करनेवाली मुद्रा धारण कर रखी है। उनके दूसरी ओरके पाँच हाथ धनुष, त्रिशूल, खट्वाङ्ग, पाशकाङ्क एवं वरकी मुद्रासे सुशोभित हैं। शेष दो हाथोंमें उन्होंने गजचर्म ले रखा है। हाथीका चमड़ा ही उनका वस्त्र है और वे सर्पमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। प्रेतपर आसन लगाये मातृकाओंके मध्यभागमें विराजमान हैं। इस रूपमें उनकी प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करनी चाहिये। भैरवके एक या पाँच मुख बनाने चाहिये॥ ९-११॥
पूर्व दिशासे लेकर अग्निकोणतक विलोम-क्रमसे प्रत्येक दिशामें भैरवको स्थापित करके क्रमशः उनका पूजन करे। बीज-मन्त्रको आठ दीर्घ स्वरोंमेंसे एक-एकके द्वारा भेदित एवं अनुस्वारयुक्त करके उस-उस दिशाके भैरवके साथ संयुक्त करे और उन सबके अन्तमें 'नमः' पदको जोड़े। यथा—ॐ ह्रां भैरवाय नमः—प्राच्याम्। ॐ ह्रीं भैरवाय नमः—ऐशान्याम्।
- अध्याय ५३ * १०५
ॐ हूं भैरवाय नमः—उदीच्याम्। ॐ हें भैरवाय नमः—वायव्ये। ॐ हैं भैरवाय नमः—प्रतीच्याम्। ॐ हों भैरवाय नमः—नैर्ऋत्याम्। ॐ हौं भैरवाय नमः—अवाच्याम्। ॐ ह्रः भैरवाय नमः—आग्नेय्याम्। इस प्रकार इन मन्त्रोंद्वारा क्रमशः उन दिशाओंमें भैरवका पूजन करे। इन्हींमेंसे छः बीजमन्त्रोंद्वारा षडङ्गन्यास एवं उन अङ्गोंका पूजन भी करना चाहिये$^१$ ॥ १२ ॥
उनका ध्यान इस प्रकार है—भैरवजी मन्दिर अथवा मण्डलके आग्नेयदल (अग्निकोणस्थ दल)-में विराजमान सुवर्णमयी रसनासे युक्त, नाद, बिन्दु एवं इन्दुसे सुशोभित तथा मातृकाधिपतिके अङ्गसे प्रकाशित हैं। (ऐसे भगवान् भैरवका मैं भजन करता हूँ।) वीरभद्र वृषभपर आरूढ हैं। वे मातृकाओंके मण्डलमें विराजमान और चार भुजाधारी हैं। गौरी दो भुजाओंसे युक्त और त्रिनेत्रधारिणी हैं। उनके एक हाथमें शूल और दूसरेमें दर्पण है। ललितादेवी कमलपर विराजमान हैं। उनके चार भुजाएँ हैं। वे अपने हाथोंमें त्रिशूल, कमण्डलु, कुण्डी और वरदानकी मुद्रा धारण करती हैं। स्कन्दकी अनुचरी मातृकागणोंके हाथोंमें दर्पण और शलाका होनी चाहिये ॥ १३-१५ ॥
चण्डिका देवीके दस हाथ हैं। वे अपने दाहिने हाथोंमें बाण, खड्ग, शूल, चक्र और शक्ति धारण करती हैं और बायें हाथोंमें नागपाश, ढाल, अंकुश, कुठार तथा धनुष लिये रहती हैं। वे सिंहपर सवार हैं और उनके सामने शूलसे मारे गये महिषासुरका शव है ॥ १६-१७ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'चौंसठ योगिनी आदिकी प्रतिमाओंके लक्षणोंका वर्णन' नामक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥
तिरपनवाँ अध्याय
लिङ्ग$^२$ आदिका लक्षण
**श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं—**कमलोद्भव ! अब मैं लिङ्ग आदिका लक्षण बताता हूँ, सुनो। लंबाईके आधेमें आठसे भाग देकर आठ भागोंमेंसे तीन भागको त्याग दे और शेष पाँच भागोंसे चौकोर विष्कम्भका निर्माण कराये। फिर लंबाईके छः भाग करके उन सबको एक, दो और तीनके
१. यथा—ॐ हां हृदयाय नमः। ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा। ॐ हूं शिखायै वषट्। ॐ हैं कवचाय हुम्। ॐ हौं, नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ ह्रः अस्त्राय फट्। २. श्रीविद्यार्णवतन्त्रके ११वें श्वासमें लिङ्ग-निर्माणकी साधारण विधि इस प्रकार दी गयी है— अपनी रुचिके अनुसार लिङ्ग कल्पित करके उसके मस्तकका विस्तार उतना ही रखे, जितनी पूजित लिङ्गभागकी ऊँचाई हो। जैसा कि शैवागमका वचन है—‘लिङ्गमस्तकविस्तारो लिङ्गोच्छ्रायसमो भवेत्।' लिङ्गके मस्तकका विस्तार जितना हो, उससे तिगुने सूत्रसे वेष्टित होने योग्य लिङ्गकी स्थूलता (मोटाई) रखे। शिवलिङ्गकी जो स्थूलता या मोटाई है, उसके सूत्रके बराबर पीठका विस्तार रखे। तत्पश्चात् पूज्य लिङ्गका जो उच्च अंश है, उससे दुगुनी ऊँचाईसे युक्त वृत्ताकार या चतुरस्र पीठ बनावे। पीठके मध्यभागमें लिङ्गके स्थूलतामात्रसूचक नाहसूत्रके द्विगुण सूत्रसे वेष्टित होने योग्य स्थूल कण्ठका निर्माण करे। कण्ठके ऊपर और नीचे समभागसे तीन या दो मेखलाओंकी रचना करे। तदनन्तर लिङ्गके मस्तकका जो विस्तार है, उसको छः भागोंमें विभक्त करे। उनमेंसे एक अंशके मानके अनुसार पीठके ऊपरी भागमें सबसे बाहरी अंशके द्वारा मेखला बनावे। उसके भीतर उसी मानके अनुसार उससे संलग्न अंशके द्वारा खात (गर्त)-की रचना करे। पीठसे बाह्यभागमें लिङ्गके समान ही बड़ी अथवा पीठमानके आधे मानके बराबर बड़ी, मूलदेशमें दीर्घांश मानके समान विस्तारवाली और अग्रभागमें उसके आधे मानके तुल्य विस्तारवाली नाली बनावे। इसीको 'प्रणाल' कहते हैं। प्रणालके मध्यमें मूलसे अग्रभागपर्यन्त जलमार्ग बनावे। प्रणालका जो विस्तार है, उसके एक तिहाई विस्तारवाले खातरूप जलमार्गसे युक्त पीठ-सदृश मेखलायुक्त प्रणाल बनाना चाहिये। यह स्फटिक आदि रत्नविशेषों अथवा पाषाण आदिके द्वारा शिवलिङ्ग-निर्माणकी साधारण विधि है। यथा— लिङ्गमस्तकविस्तारं पूज्यभागसमं नयेत्। .......................................'लक्षणमाचरेत् ॥ १-८॥
१०६ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
क्रमसे अलग-अलग रखे। इनमें पहला भाग ब्रह्माका, दूसरा विष्णुका और तीसरा शिवका है। उन भागोंमें यह 'वर्द्धमान' भाग कहा जाता है। चौकोर मण्डलमें कोणसूत्रके आधे मापको लेकर उसे सभी कोणोंमें चिह्नित करे। ऐसा करनेसे आठ कोणोंका 'वैष्णवभाग' सिद्ध होता है, इसमें संशय नहीं है। तदनन्तर उसे षोडश कोण और फिर बत्तीस कोणोंसे युक्त करे॥१-४॥
तत्पश्चात् चौंसठ कोणोंसे युक्त करके वहाँ गोल रेखा बनावे। तदनन्तर श्रेष्ठ आचार्य लिङ्गके शिरोभागका कर्तन करे। इसके बाद लिङ्गके विस्तारको आठ भागोंमें विभाजित करे। फिर उनमेंसे एक भागके चौथे अंशको छोड़ देनेपर छत्राकार सिरका निर्माण होता है। जिसकी लंबाई-चौड़ाई तीन भागोंमें समान हो, वह समभागवाला लिङ्ग सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाला है। देवपूजित लिङ्गमें लंबाईके चौथे भागसे विष्कम्भ बनता है। अब तुम सभी लिङ्गोंके लक्षण सुनो॥५-८॥
विद्वान् पुरुष सोलह अङ्गुलवाले लिङ्गके मध्यवर्ती सूत्रको, जो ब्रह्म और रुद्रभागके निकटस्थ है, लेकर उसे छः भागोंमें विभाजित करे। वैयमन-सूत्रोंद्वारा निश्चित जो वह माप है, उसे 'अन्तर' कहते हैं। जो सबसे उत्तरवर्ती लिङ्ग है, उसे आठ जौ बड़ा बनाना चाहिये; शेष लिङ्गोंको एक-एक जौ छोटा कर देना चाहिये। उपर्युक्त लिङ्गके निचले भागको तीन हिस्सोंमें विभक्त करके ऊपरके एक भागको छोड़ दे। शेष दो भागोंको आठ हिस्सोंमें विभक्त करके ऊपरके तीन भागोंको त्याग दे। पाँचवें भागके ऊपरसे घूमती हुई एक लंबी रेखा बनावे और एक भागको छोड़कर बीचमें उन दो रेखाओंका संगम करावे। यह लिङ्गोंका साधारण लक्षण बताया गया; अब पिण्डकाका सर्वसाधारण लक्षण बताता हूँ, मुझसे सुनो॥९-१३॥
ब्रह्मभागमें प्रवेश तथा लिङ्गकी ऊँचाई जानकर विद्वान् पुरुष ब्रह्मशिलाकी स्थापना करे और उस शिलाके ऊपर ही उत्तम रीतिसे कर्मका सम्पादन करे। पिण्डिकाकी ऊँचाईको जानकर उसका विभाजन करे। दो भागकी ऊँचाईको पीठ समझे। चौड़ाईमें वह लिङ्गके समान ही हो। पीठके मध्यभागमें खात (गड्ढा) करके उसे तीन भागोंमें विभाजित करे। अपने मानके आधे त्रिभागसे 'बाहुल्य' की कल्पना करे। बाहुल्यके तृतीय भागसे मेखला बनावे और मेखलाके ही तुल्य खात (गड्ढा) तैयार करे। उसे क्रमशः निम्न (नीचे झुका हुआ) रखे। मेखलाके सोलहवें अंशसे खात निर्माण करे और उसीके मापके अनुसार उस पीठकी ऊँचाई, जिसे 'विकाराङ्ग' कहते हैं, करावे। प्रस्तरका एक भाग भूमिमें प्रविष्ट हो, एक भागसे पिण्डका बने, तीन भागोंसे कण्ठका निर्माण कराया जाय और एक भागसे पट्टिका बनायी जाय॥१४-१९॥
दो भागसे ऊपरका पट्ट बने; एक भागसे शेष-पट्टिका तैयार करायी जाय। कण्ठपर्यन्त एक-एक भाग प्रविष्ट हो। तत्पश्चात् पुनः एक भागसे निर्गम (जल निकलनेका मार्ग) बनाया जाय। यह शेष-पट्टिकातक रहे। प्रणाल (नाली)-के तृतीय भागसे निर्गम बनना चाहिये। तृतीय भागके मूलमें अङ्गुलिके अग्रभागके बराबर विस्तृत खात बनावे, जो तृतीय भागसे आधे विस्तारका हो। वह खात उत्तरकी ओर जाय। यह पिण्डिकासहित साधारण लिङ्गका वर्णन किया गया॥२०-२३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'लिङ्ग आदिके लक्षणका वर्णन' नामक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥५३॥
- अध्याय ५४ * १०७
चौवनवाँ अध्याय
लिङ्ग-मान एवं व्यक्ताव्यक्त लक्षण आदिका वर्णन
श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं— ब्रह्मन्! अब मैं दूसरे प्रकारसे लिङ्ग आदिका वर्णन करता हूँ, सुनो, लवण तथा घृतसे निर्मित शिवलिङ्ग बुद्धिको बढ़ानेवाला होता है। वस्त्रमय लिङ्ग ऐश्वर्यदायक होता है। उसे तात्कालिक (केवल एक बार ही पूजाके उपयोगमें आनेवाला) लिङ्ग माना गया है। मृत्तिकासे बनाया हुआ शिवलिङ्ग दो प्रकारका होता है—पक्व तथा अपक्व। अपक्वसे पक्व श्रेष्ठ माना गया है। उसकी अपेक्षा काष्ठका बना हुआ शिवलिङ्ग अधिक पवित्र एवं पुण्यदायक है। काष्ठमय लिङ्गसे प्रस्तरका लिङ्ग श्रेष्ठ है। प्रस्तरसे मोतीका और मोतीसे सुवर्णका बना हुआ 'लौह लिङ्ग' उत्तम माना गया है। चाँदी, ताँबे, पीतल, रत्न तथा रस (पारद)-का बना हुआ शिवलिङ्ग भोग-मोक्ष देनेवाला एवं श्रेष्ठ है। रस (पारद आदि)-के लिङ्गको राँगा, लोहा (सुवर्ण, ताँबा) आदि तथा रत्नके भीतर आबद्ध करके स्थापित करे। सिद्ध आदिके द्वारा स्थापित स्वयम्भूलिङ्ग आदिके लिये माप आदि करना अभीष्ट नहीं है॥ १–५॥
बाणलिङ्ग (नर्मदेश्वर)-के लिये भी यही बात है। (अर्थात् उसके लिये भी 'वह इतने अङ्गुलका हो'—इस तरहका मान आदि आवश्यक नहीं है।) वैसे शिवलिङ्गोंके लिये अपनी इच्छाके अनुसार पीठ और प्रासादका निर्माण करा लेना चाहिये। सूर्यमण्डलस्थ शिवलिङ्गको दर्पणमें प्रतिबिम्बित करके उसका पूजन करना चाहिये। वैसे तो भगवान् शंकर सर्वत्र ही पूजनीय हैं, किंतु शिवलिङ्गमें उनके अर्चनकी पूर्णता होती है। प्रस्तरका शिवलिङ्ग एक हाथसे अधिक ऊँचा होना चाहिये। काष्ठमय लिङ्गका मान भी ऐसा ही है। चल शिवलिङ्गका स्वरूप अङ्गुल-मानके अनुसार निश्चित करना चाहिये तथा स्थिर लिङ्गका द्वारमान, गर्भमान एवं हस्तमानके अनुसार। गृहमें पूजित होनेवाला चललिङ्ग एक अङ्गुलसे लेकर पंद्रह अङ्गुलतकका हो सकता है॥ ६–८॥
द्वारमानसे लिङ्गके तीन भेद हैं। इनमेंसे प्रत्येकके गर्भमानके अनुसार नौ-नौ भेद होते हैं। (इस तरह कुल सत्ताईस हुए। इनके अतिरिक्त) करमानसे नौ लिङ्ग और हैं। इनकी देवालयमें पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार सबको एकमें जोड़नेसे छत्तीस लिङ्ग जानने चाहिये। ये ज्येष्ठमानके अनुसार हैं। मध्यममानसे और अधम (कनिष्ठ)-मानसे भी छत्तीस-छत्तीस शिवलिङ्ग हैं—ऐसा जानना चाहिये। इस प्रकार समस्त लिङ्गोंको एकत्र करनेसे एक सौ आठ शिवलिङ्ग हो सकते हैं। एकसे लेकर पाँच अङ्गुलतकका चल शिवलिङ्ग 'कनिष्ठ' कहलाता है, छः से लेकर दस अङ्गुलतकका चल लिङ्ग 'मध्यम' कहा गया है तथा ग्यारहसे लेकर पंद्रह अङ्गुलतकका चल शिवलिङ्ग 'ज्येष्ठ' जानने योग्य है। महामूल्यवान् रत्नोंका बना हुआ शिवलिङ्ग छः अङ्गुलका, अन्य रत्नोंसे निर्मित शिवलिङ्ग नौ अङ्गुलका, सुवर्णभारका बना हुआ बारह अङ्गुलका तथा शेष वस्तुओंसे निर्मित शिवलिङ्ग पंद्रह अङ्गुलका होना चाहिये॥ ९–१३॥
लिङ्ग-शिलाके सोलह अंश करके उसके ऊपरी चार अंशोंमेंसे पार्श्ववर्ती दो भाग निकाल दे। फिर बत्तीस अंश करके उसके दोनों कोणवर्ती सोलह अंशोंको लुप्त कर दे। फिर उसमें चार अंश मिलानेसे 'कण्ठ' होता है। तात्पर्य यह कि बीस अंशका कण्ठ होता है और उभय पार्श्ववर्ती ३×४=१२ अंशोंको मिटानेसे ज्येष्ठ चल लिङ्ग
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१०८ * अग्निपुराण *
बनता है। प्रासादकी ऊँचाईके मानको सोलह अंशोंमें विभक्त करके उसमेंसे चार, छः और आठ अंशोंद्वारा क्रमशः हीन, मध्यम और ज्येष्ठ द्वार निर्मित होता है। द्वारकी ऊँचाईमेंसे एक चौथाई कम कर दिया जाय तो वह लिङ्गकी ऊँचाईका मान है। लिङ्गशिलाके गर्भके आधे भागतककी ऊँचाईका शिवलिङ्ग 'अधम' (कनिष्ठ) होता है और तीन भूतांश ($३\times ५=$) पंद्रह अंशोंके बराबरकी ऊँचाईका शिवलिङ्ग 'ज्येष्ठ' कहा गया है। इन दोनोंके बीचमें बराबरकी ऊँचाईपर सात जगह सूत्रपात (सूतद्वारा रेखा) करे। इस तरह नौ सूत (सूत्रनिर्मित रेखाचिह्न) होंगे। इन नौ सूतोंमेंसे पाँच सूतोंकी ऊँचाईके मापका शिवलिङ्ग 'मध्यम' होगा। लिङ्गोंकी लंबाई (या ऊँचाई) उत्तरोत्तर दो-दो अंशके अन्तरसे होगी। इस तरह लिङ्गोंकी दीर्घता बढ़ती जायगी और नौ लिङ्ग निर्मित होंगे$^१$ ॥ १४-१८॥
यदि हाथके मापसे नौ लिङ्ग बनाये जायँ तो पहला लिङ्ग एक हाथका होगा, फिर दूसरेके मापमें पहलेसे एक हाथ बढ़ जायगा; इस प्रकार जबतक नौ हाथकी लंबाई पूरी न हो जाय तबतक शिला या काष्ठकी मापमें एक-एक हाथ बढ़ाते रहेंगे। ऊपर जो हीन, मध्यम और उत्तम-तीन प्रकारके लिङ्ग बताये गये हैं, उनमेंसे प्रत्येकके तीन-तीन भेद हैं। बुद्धिमान् पुरुष एक-एक लिङ्गमें विभागपूर्वक तीन-तीन लिङ्गका निर्माण करावें। छः अङ्गुल और नौ अङ्गुलके शिवलिङ्गोंमें भी तीन-तीन लिङ्ग-निर्माण करावे। स्थिर लिङ्ग द्वारमान, गर्भमान तथा हस्तमान-इन तीन दीर्घ प्रमाणों (मापों)-के अनुसार बनाना चाहिये। उक्त तीन मापोंके अनुसार ही उसकी तीन संज्ञाएँ हैं-भोगेश, जलेश तथा देवेश। विष्कम्भ (विस्तार)-के अनुसार लिङ्गके चार रूप लक्षित करे। दीर्घप्रमाणके अनुसार सम्पादित होनेवाले तीन रूपोंमें निर्दिष्ट लिङ्गको शुभ आय आदिसे युक्त करके निर्मित करावे। उन त्रिविध लिङ्गोंकी लंबाई चार या आठ-आठ हाथकी हो-यह अभीष्ट है। वे क्रमशः त्रितत्त्वरूप अथवा त्रिगुणरूप हैं। जो लिङ्ग जितने हाथका हो, उसका अङ्गुल बनाकर आय-संख्या (८), स्वर-संख्या (७), भूत-संख्या (५) तथा अग्नि-संख्या (३)-से पृथक्-पृथक् भाग दे। जो शेष बचे उसके अनुसार शुभाशुभ फलको जाने ॥ १९-२४ ॥
ध्वजादि आयोंमेंसे ध्वज, सिंह, हस्ती और वृषभ-ये श्रेष्ठ हैं$^२$। अन्य चार आय अशुभ हैं। (सात संख्यासे भाग देनेपर जो शेष बचे, उसके अनुसार स्वरका निश्चय करे।) स्वरोंमें षड्ज, गान्धार तथा पञ्चम शुभदायक हैं। [पाँचसे भाग देनेपर जो शेष बचे, उसके अनुसार पृथ्वी आदि भूतोंका निश्चय करे।] भूतोंमें पृथ्वी ही शुभ है। [तीनसे भाग देनेपर जो शेष रहे, तदनुसार अग्नि जाने।] अग्नियोंमें आहवनीय अग्नि ही शुभ है।
१. 'समराङ्गणसूत्रधार' में कहा है कि दो-दो अंशकी वृद्धि करते हुए तीन हाथकी लंबाई-तक पहुँचते-पहुँचते नौ लिङ्ग निर्मित हो सकते हैं-'द्व्यंशवृद्ध्या नवैवं स्युराहस्तत्रितयावधेः।'
२. 'अपराजितपृच्छा' के 'आयाधिकार' नामक चौंसठवें सूत्रमें आयोंके नाम इस प्रकार दिये गये हैं-ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वान, वृष, गर्दभ, गज और ध्वांक्ष (काक)। इनकी स्थिति पूर्वादि दिशाओंमें प्रदक्षिण-क्रमसे है। देवालयके लिये ध्वज, सिंह, वृष और गज-ये आय श्रेष्ठ कहे गये हैं। अधमोंके लिये शेष आय सुखावह हैं। सत्ययुगमें ध्वज, त्रेतामें सिंह, द्वापरमें वृषभ और कलियुगमें गजी नामक आयका प्राधान्य है। सिंह नामक आय मुख्यतः राजाओंके लिये कल्याणकारक है; ब्राह्मणके लिये ध्वज प्रशस्त है तथा वैश्यके लिये वृष। ध्वज आयमें अर्थलाभ होता है और धूम्रमें संताप। सिंह आयमें विपुल भोग उपस्थित होते हैं। श्वान नामक आयमें कलह होता है। वृषभमें धन-धान्यकी वृद्धि होती है। गर्दभमें स्त्रियोंका चरित्र दूषित होता है। हाथी नामक आयमें सब लोग शुभ देखते हैं और काक नामक आय होनेपर निश्चय ही मृत्यु होती है। (श्लोक ९-१६)
- अध्याय ५४ * १०९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
उक्त लिङ्गकी लंबाईको आधा करके उसमें आठसे भाग देनेपर यदि शेष सातसे अधिक हो तो वह लिङ्ग ‘आढ्य’ कहा जाता है। यदि पाँचसे अधिक शेष रहे तो वह ‘अनाढ्य’ है। यदि छः अंशसे अधिक शेष हो तो वह लिङ्ग ‘देवेज्य’ है और यदि तीन अंशसे अधिक शेष हो तो उस लिङ्गको ‘अर्कतुल्य’ माना जाता है। ये चारों ही प्रकारके लिङ्ग चतुष्कोण होते हैं। पाँचवाँ ‘वर्धमान’ संज्ञक लिङ्ग है, उसमें व्याससे नाह बढ़ा हुआ होता है। व्यासके समान नाह एवं व्याससे बढ़ा हुआ नाह—इस प्रकार इन लिङ्गोंके दो भेद हो जाते हैं। विश्वकर्म-शास्त्रके अनुसार इन सबके बहुत-से भेद बताये जायँगे। आढ्य आदि लिङ्गोंकी स्थूलता आदिके कारण तीन भेद और होते हैं। उनमें एक-एक यवकी वृद्धि करनेसे वे सब आठ प्रकारके लिङ्ग होते हैं। फिर हस्तमानसे ‘जिन’ संज्ञक लिङ्गके भी तीन भेद होंगे। उसको सर्वसम लिङ्गमें जोड़ लिया जायगा॥ २५—२९॥
अनाढ्य, देवार्चित तथा अर्कतुल्यमें भी पाँच-पाँच भेद होनेसे ये पच्चीस होंगे। ये सब एक, जिन और भक्त—भेदोंसे पचहत्तर हो जायँगे। सबका आकलन करनेसे पंद्रह हजार चार सौ शिवलिङ्ग हो सकते हैं।* इसी तरह आठ अङ्गुलके विस्तारवाला लिङ्ग भी एकाङ्गुल मान, हस्तमान एवं गर्भमानके अनुसार नौ भेदोंसे युक्त है। इन सबके कोण तथा अर्द्धकोणस्थ सूत्रोंद्वारा कोणोंका छेदन (विभाजन) करे। लिङ्गके मध्यभागके
* अग्निपुराण अध्याय ५४ के २८वें श्लोकमें विश्वकर्माके कथनानुसार लिङ्ग-भेदोंकी परिगणना की गयी है और सब मिलाकर चौदह हजार चौदह सौ भेद कहे गये हैं। इस प्रकरणका मूल पाठ अपने शुद्धरूपमें उपलब्ध नहीं हो रहा है; अतएव यहाँ दी हुई गणना बैठ नहीं रही है। परंतु विश्वकर्माके शास्त्र ‘अपराजितपृच्छा’ के अवलोकनसे इन भेदोंपर विशेष प्रकाश पड़ता है। उसके अनुसार समस्त लिङ्ग-भेद १४४२० होते हैं। किस प्रकार, सो बताया जाता है—प्रस्तरमय लिङ्ग कम-से-कम एक हाथका होता है, उससे कम नहीं। उसका अन्तिम आयाम नौ हाथका बताया गया है। इस प्रकार एक हाथसे लेकर नौ हाथतकके लिङ्ग बनाये जायँ तो उनकी संख्या नौ होती है। इनका प्रस्तार यों समझना चाहिये।
एक हाथसे तीन हाथतकके शिवलिङ्ग ‘कनिष्ठ’ कहे गये हैं। चारसे छः हाथतकके ‘मध्यम’ माने गये हैं और सातसे नौतकके ‘उत्तम’ या ‘ज्येष्ठ’ कहे गये हैं। इन तीनोंके प्रमाणमें पादवृद्धि करनेसे कुल ३३ शिवलिङ्ग होते हैं। यथा—
एक हाथ¹, सवा हाथ², डेढ़ हाथ³, पौने दो हाथ⁴, दो हाथ⁵, सवा दो हाथ⁶, ढाई हाथ⁷, पौने तीन हाथ⁸, तीन हाथ⁹, सवा तीन हाथ¹⁰, साढ़े तीन हाथ¹¹, पौने चार हाथ¹², चार हाथ¹³, सवा चार हाथ¹⁴, साढ़े चार हाथ¹⁵, पौने पाँच हाथ¹⁶, पाँच हाथ¹⁷, सवा पाँच हाथ¹⁸, साढ़े पाँच हाथ¹⁹, पौने छः हाथ²⁰, छः हाथ²¹, सवा छः हाथ²², साढ़े छः हाथ²³, पौने सात हाथ²⁴, सात हाथ²⁵, सवा सात हाथ²⁶, साढ़े सात हाथ²⁷, पौने आठ हाथ²⁸, आठ हाथ²⁹, सवा आठ हाथ³⁰, साढ़े आठ हाथ³¹, पौने नौ हाथ³², नौ हाथ³³।
इन तैंतीसोंके नाम विश्वकर्माने क्रमशः इस प्रकार बताये हैं—१. भव, २. भवोद्भव, ३. भाव, ४. संसारभयनाशन, ५. पाशयुक्त, ६. महातेज, ७. महादेव, ८. परात्पर, ९. ईश्वर, १०. शेखर, ११. शिव, १२. शान्त, १३. मनोल्हादक, १४. रुद्रतेज, १५. सदात्मक (सद्योजात), १६. वामदेव, १७. अघोर, १८. तत्पुरुष, १९. ईशान, २०. मृत्युंजय, २१. विजय, २२. किरणाक्ष, २३. अघोरास्त्र, २४. श्रीकण्ठ, २५. पुण्यवर्धन, २६. पुण्डरीक, २७. सुवक्त्र, २८. उमातेजः, २९. विश्वेश्वर, ३०. त्रिनेत्र, ३१. त्र्यम्बक, ३२. घोर, ३३. महाकाल।
| पूर्वोक्त | क्रमसे | पादार्धवृद्धि करनेपर | ६५ | तक | संख्या | पहुँचेगी। |
|---|---|---|---|---|---|---|
| ” | ” | दो अङ्गुल वृद्धि करनेपर | ९७ | तक | ” | ” |
| ” | ” | एक अङ्गुल वृद्धि करनेपर | १९३ | तक | ” | ” |
| ” | ” | अर्द्धाङ्गुल वृद्धि करनेपर | ३८५ | तक | ” | ” |
| ” | ” | अङ्गुलका चतुर्थांश बढ़ानेपर | ७६९ | तक | ” | ” |
| ” | ” | एक-एक मूूँगके मानकी वृद्धि करनेपर | १४४२ | तक | ” | ” |
| ” | ” | मुद्ग-प्रमाण लिङ्गोंमें प्रत्येकके दस भेद करनेपर | १४४२० | तक | ” | ” |
११० * अग्निपुराण *
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विस्तारको ही प्रत्येक विभागका विस्तार मानकर, तदनुसार मध्य, ऊर्ध्व और अधः—इन विभागोंकी स्थापना करे। मध्यम विभागसे ऊपरका अष्टकोण या षोडश कोणवाला विभाग शिवका अंश है। पाद या मूलभागसे जानुपर्यन्त लिङ्गका अधोभाग है, यह ब्रह्माका अंश है तथा जानुसे नाभिपर्यन्त लिङ्गका मध्यम भाग है, जो भगवान् विष्णुका अंश है॥ ३०—३३॥
मूर्द्धान्तभाग भूतभागेश्वरका है। व्यक्त-अव्यक्त सभी लिङ्गोंके लिये ऐसी ही बात है। जिस शिवलिङ्गमें पाँच लिङ्गकी व्यवस्था है, वहाँ शिरोभाग गोलाकार होना चाहिये—ऐसा बताया जाता है। वह गोलाई छत्राकार हो, मुर्गीके अंडेके समान हो; नवोदित चन्द्रके सदृश हो या पुरुषके आकारकी हो। [‘पुरुषाकृति’ के स्थानमें ‘त्रपुषाकृति’ पाठ हो तो गोलाई त्रपुषके समान आकारवाली हो—ऐसा अर्थ लेना चाहिये।] इस प्रकार एक-एकके चार भेद होते हैं। कामनाओंके भेदसे इनके फलमें भी भेद होता है, यह बताऊँगा। लिङ्गके मस्तक-भागका विस्तार जितने अङ्गुलका हो, उतनी संख्यामें आठसे भाग दे। इस प्रकार मस्तकको आठ भागोंमें विभक्त करके आदिके जो चार भाग हैं, उनका विस्तार और ऊँचाईके अनुसार ग्रहण करे। एक भागको छाँट देनेसे ‘पुण्डरीक’ नामक लिङ्ग होता है, दो भागोंको लुप्त कर देनेसे ‘विशाल’ संज्ञक लिङ्ग होता है, तीन भागोंका उच्छेद कर देनेपर उसकी ‘श्रीवत्स’ संज्ञा होती है तथा चार भागोंके लोपसे उस लिङ्गको ‘शत्रुकारक’ कहा गया है। शिरोभाग सब ओरसे सम हो तो श्रेष्ठ माना गया है। देवपूज्य लिङ्गमें मस्तक-भाग कुक्कुटके अण्डकी भाँति गोल होना चाहिये॥ ३४—३८॥
चतुर्भागात्मक लिङ्गमेंसे ऊपरका दो भाग मिटा देनेसे ‘त्रपुष’ नामक लिङ्ग होता है। यह (त्रपुष) अनाढ्यसंज्ञक शिवलिङ्गका सिर माना गया है। अब अर्द्ध-चन्द्राकार सिरके विषयमें सुनो—शिवलिङ्गके प्रान्तभागमें एक अंशके चार अंश करके एक अंशको त्याग दिया जाय तो वह ‘अमृताक्ष’ नाम धारण करता है। दूसरे, तीसरे और चौथे अंशका लोप करनेपर क्रमशः उन शिवलिङ्गोंकी ‘पूर्णेन्दु’, ‘बालेन्दु’ तथा ‘कुमुद’ संज्ञा होती है। ये क्रमशः चतुर्मुख, त्रिमुख और एकमुख होते हैं। इन तीनोंको ‘मुखलिङ्ग’ भी कहते हैं। अब मुखलिङ्गके विषयमें सुनो—पूजाभागकी त्रिविध कल्पना करनी चाहिये—मूर्तिपूजा, अग्निपूजा तथा पदपूजा। पूर्ववत् द्वादशांशका त्याग करके छः भागोंद्वारा छः स्थानोंकी अभिव्यक्ति करे। सिरको ऊँचा करना चाहिये तथा ललाट, नासिका, मुख, चिबुक तथा ग्रीवाभागको भी स्पष्टतया व्यक्त करे। चार भागों (या अंशों)-द्वारा दोनों भुजाओं तथा नेत्रोंको प्रकट करे। प्रतिमाके प्रमाणके अनुसार मुकुलाकार हाथ बनाकर विस्तारके अष्टमांशसे चारों मुखोंका निर्माण करे। प्रत्येक मुख सब ओरसे सम होना चाहिये। यह मैंने चतुर्मुखलिङ्गके विषयमें बताया है; अब त्रिमुखलिङ्गके विषयमें बताया जाता है, सुनो—॥ ३९—४४॥
त्रिमुखलिङ्गमें चतुर्मुखकी अपेक्षा कान और पैर अधिक रहेंगे। ललाट आदि अङ्गोंका पूर्ववत् ही निर्देश करे। चार अंशोंसे दो भुजाओंका निर्माण करे, जिनका पिछला भाग सुदृढ़ एवं सुपुष्ट हो। विस्तारके अष्टमांशसे तीनों मुखोंका विनिर्गम (प्राकट्य) हो। [अब एकमुखलिङ्गके विषयमें सुनो—] एकमुख पूर्व दिशामें बनाना चाहिये; उसके नेत्रोंमें सौम्यभाव रहे। (उग्रता न हो।) उसके ललाट, नासिका, मुख और ग्रीवामें विवर्तन (विशेष उभार) हो। बाहु-विस्तारके पञ्चमांशसे पूर्वोक्त
* अध्याय ५५ * १११
अङ्गोंका निर्माण होना चाहिये। एकमुखलिङ्गको बाहुरहित बनाना चाहिये। एकमुखलिङ्गमें विस्तारके छठे अंशसे मुखका निर्गमन हितकर कहा गया है। मुखयुक्त जितने भी लिङ्ग हैं, उन सबका शिरोभाग त्रपुषाकार या कुक्कुटाण्डके समान गोलाकार होना चाहिये ॥ ४५–४८ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'लिङ्गमान एवं व्यक्ताव्यक्त लक्षण आदिका वर्णन' नामक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥
पचपनवाँ अध्याय
पिण्डिकाका लक्षण
श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं—ब्रह्मन्! अब मैं प्रतिमाओंकी पिण्डिकाका लक्षण बता रहा हूँ। पिण्डिका लंबाईमें तो प्रतिमाके बराबर होनी चाहिये और चौड़ाईमें उससे आधी। उसकी ऊँचाई भी प्रतिमाकी लंबाईसे आधी हो और उस अर्द्धभागके बराबर ही वह सुविस्तृत हो। अथवा उसका विस्तार लंबाईके तृतीयांशके तुल्य हो। उसके एक तिहाई भागको लेकर मेखला बनावे। पानी बहनेके लिये जो खात या गर्त हो, उसका माप भी मेखलाके ही तुल्य रहे। वह खात उत्तर दिशाकी ओर कुछ नीचा होना चाहिये। पिण्डिकाके विस्तारके एक चौथाई भागसे जलके निकलनेका मार्ग (प्रणाल) बनाना चाहिये। मूल भागमें उसका विस्तार मूलके ही बराबर हो, परंतु आगे जाकर वह आधा हो जाय। पिण्डिकाके विस्तारके एक तिहाई भागके अथवा पिण्डिकाके आधे भागके बराबर वह जलमार्ग हो। उसकी लंबाई प्रतिमाकी लंबाईके तुल्य ही बतायी गयी है। अथवा प्रतिमा ही उसकी लंबाईके तुल्य हो। इस बातको अच्छी तरह समझकर उसका सूत्रपात करे ॥ १–५ ॥
प्रतिमाकी ऊँचाई पूर्ववत् सोलह भागकी संख्याके अनुसार करे। छः और दो अर्थात् आठ भागोंको नीचेके आधे अङ्गमें गतार्थ करे। इससे ऊपरके तीन भागको लेकर कण्ठका निर्माण करे। शेष भागोंको एक-एक करके प्रतिष्ठा, निर्गम तथा पट्टिका आदिमें विभाजित करे। यह सामान्य प्रतिमाओंमें पिण्डिकाका लक्षण बताया गया है। प्रासादके द्वारके दैर्घ्य-विस्तारके अनुसार प्रतिमा-गृहका भी द्वार कहा गया है। प्रतिमाओंमें हाथी और व्याल (सर्प या व्याघ्र आदि)-की मूर्तियोंसे युक्त तत्तत्-देवताविषयक शोभाकी रचना करे ॥ ६–८ ॥
श्रीहरिकी पिण्डिका भी सदा यथोचित शोभासे सम्पन्न बनायी जानी चाहिये। सभी देवताओंकी प्रतिमाओंके लिये वही मान बताया जाता है, जो विष्णु-प्रतिमाके लिये कहा गया है तथा सम्पूर्ण देवियोंके लिये भी वही मान बताया जाता है, जो लक्ष्मीजीकी प्रतिमाके लिये कहा गया है ॥ ९-१० ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पिण्डिकाके लक्षणका वर्णन' नामक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥
११२ * अग्निपुराण *
छप्पनवाँ अध्याय
प्रतिष्ठाके अङ्गभूत मण्डपनिर्माण, तोरण-स्तम्भ, कलश एवं ध्वजके स्थापन तथा दस दिक्पाल-यागका वर्णन
श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं—ब्रह्मन्! मैं प्रतिष्ठाके पाँच अङ्गोंका वर्णन करूँगा। प्रतिमा पुरुषका प्रतीक है तो पिण्डिका प्रकृतिका, अथवा प्रतिमा नारायणका स्वरूप है तो पिण्डिका लक्ष्मीका। उन दोनोंके योगको 'प्रतिष्ठा' कहते हैं। इसलिये इच्छानुरूप फल चाहनेवाले मनुष्योंद्वारा इष्टदेवताकी प्रतिष्ठा (स्थापना)-की जाती है। आचार्यको चाहिये कि वह मन्दिरके सामने गर्भसूत्रको निकालकर आठ, सोलह अथवा बीस हाथका मण्डप तैयार करे। इनमें आठ हाथका मण्डप 'निम्न', सोलह हाथका 'मध्यम' और बीस हाथका 'उत्तम' माना गया है। मण्डपमें देवताके स्नानके लिये, कलश-स्थापनके लिये तथा याग-सम्बन्धी द्रव्योंको रखनेके लिये आधा स्थान सुरक्षित कर ले। फिर मण्डपके आधे या तिहाई भागमें सुन्दर वेदी बनावे। उसे बड़े-बड़े कलशों, छोटे-छोटे घड़ों और चँदोवे आदिसे विभूषित करे। पञ्चगव्यसे मण्डपके भीतरके स्थानोंका प्रोक्षण करके वहाँ सब सामग्री रखे। तत्पश्चात् गुरु वस्त्र एवं माला आदिसे अलंकृत हो, भगवान् विष्णुका ध्यान करके उनका पूजन करे॥ १-५॥
अँगूठी आदि भूषणों तथा प्रार्थना आदिसे मूर्तिपालक विद्वानोंका सत्कार करके कुण्ड-कुण्डपर उन्हें बिठावे। वे वेदोंके पारंगत हों। चौकोर, अर्धचन्द्र, गोलाकार अथवा कमल-सदृश आकारवाले कुण्डोंपर उन विद्वानोंको विराजमान करना चाहिये। पूर्व आदि दिशाओंमें तोरण (द्वार)-के लिये पीपल, गूलर, वट और प्लक्षके वृक्षके काष्ठका उपयोग करना चाहिये। पूर्व दिशाका द्वार 'सुशोभन' नामसे प्रसिद्ध है। दक्षिण दिशाका द्वार 'सुभद्र' कहा गया है, पश्चिमका द्वार 'सुकर्मा' और उत्तरका 'सुहोत्र' नामसे प्रसिद्ध है। ये सभी तोरण-स्तम्भ पाँच हाथ ऊँचे होने चाहिये। इनकी स्थापना करके 'स्योना* पृथिवि नो—' (शु० यजु० ३६। १३) इस मन्त्रसे पूजन करे। तोरण-स्तम्भके मूलभागमें मङ्गल अङ्कुर (आम्र-पल्लव, यवाङ्कुर आदि)-से युक्त कलश स्थापित करे॥ ६-९॥
तोरणस्तम्भके ऊपरी भागमें सुदर्शनचक्रकी स्थापना करे। इसके अतिरिक्त विद्वान् पुरुषोंको वहाँ पाँच हाथका ध्वज स्थापित करना चाहिये। उस ध्वजकी चौड़ाई सोलह अङ्गुलकी हो। सुरश्रेष्ठ! उस ध्वजका दण्ड सात हाथ ऊँचा होना चाहिये। अरुणवर्ण, अग्निवर्ण (धूम्रवर्ण), कृष्ण, शुक्ल, पीत, रक्त तथा श्वेत—ये वर्ण क्रमशः पूर्वादि दिशाओंमें ध्वजमें होने चाहिये। कुमुद, कुमुदाक्ष, पुण्डरीक, वामन, शङ्कुकर्ण, सर्पनेत्र, सुमुख और सुप्रतिष्ठित—ये क्रमशः पूर्व आदि ध्वजोंके पूजनीय देवता हैं। इनमें करोड़ों दिव्य गुण विद्यमान हैं। कलश ऐसे पके हुए हों कि सुपक्व बिम्बफलके समान लाल दिखायी देते हों। वे एक-एक आढक जलसे पूर्णतः भरे हों। उनकी संख्या एक सौ अट्ठाईस हो। उनकी स्थापना ऐसे समय करनी चाहिये, जब कि 'कालदण्ड' नामक योग न हो। उन सभी कलशोंमें सुवर्ण डाला गया हो। उनके कण्ठभागमें वस्त्र लपेटे गये हों। वे जलपूर्ण कलश तोरणसे
* पूरा मन्त्र इस प्रकार है—ॐ स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरा निवेशनी। यच्छा नः शर्म सप्रथाः॥ (शु० यजु० ३६। १३)
- अध्याय ५६ * ११३
बाहर स्थापित किये जायँ॥ १०—१५॥
वेदीके पूर्व आदि दिशाओं तथा कोणोंमें भी कलश स्थापित करने चाहिये। पहले पूर्वादि चारों दिशाओंमें चार कलश स्थापित करे। उस समय ‘आजिघ्र$^१$ कलशम्’ आदि मन्त्रका पाठ करना चाहिये। उन कलशोंमें पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे इन्द्र आदि दिक्पालोंका आवाहनपूर्वक पूजन करे। इन्द्रका आवाहन करते समय इस प्रकार कहे—'ऐरावत हाथीपर बैठे और हाथमें वज्र धारण किये देवराज इन्द्र! यहाँ आइये और अन्य देवताओंके साथ मेरे पूर्व द्वारकी रक्षा कीजिये। देवताओंसहित आपको नमस्कार है।' इस तरह आवाहन करके विद्वान् पुरुष 'त्रातारमिन्द्रम्$^२$ ०'—इत्यादि मन्त्रसे उनकी अर्चना एवं आराधना करे॥ १६—१८॥
इसके बाद निम्नाङ्कितरूपसे अग्निदेवका आवाहन करे—'बकरेपर आरूढ शक्तिधारी एवं बलशाली अग्निदेव! आइये और देवताओंके साथ अग्निकोणकी रक्षा कीजिये। यह पूजा ग्रहण कीजिये। आपको नमस्कार है।' तदनन्तर ‘अग्निर्मूर्द्धा$^३$ ०’ इत्यादिसे अथवा ‘अग्नये नमः।’—इस मन्त्रसे अग्निकी पूजा करे। यमराजका आवाहन—'महिषपर आरूढ, दण्डधारी, महाबली सूर्यपुत्र यम! आप यहाँ पधारिये और दक्षिण द्वारकी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है।' इस प्रकार आवाहन करके ‘वैवस्वतं सङ्गमनम् ०’ इत्यादि मन्त्रसे यमराजकी पूजा करे। निर्ऋतिका आवाहन—'बल और वाहनसे सम्पन्न खड्गधारी निर्ऋति! आइये। आपके लिये यह अर्घ्य है, यह पाद्य है। आप नैर्ऋत्य दिशाकी रक्षा कीजिये।' इस तरह आवाहन करके ‘एष$^४$ ते निर्ऋते०’ इत्यादिसे मनुष्य अर्घ्य आदि उपचारोंद्वारा निर्ऋतिकी पूजा करे॥ १९—२२ $\frac{१}{२}$॥
वरुणका आवाहन—'मकरपर आरूढ पाशधारी महाबली वरुणदेव! आइये और पश्चिम द्वारकी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है।' इस प्रकार आवाहन करके, ‘उरुं$^५$ हि राजा वरुणः०’ इत्यादि मन्त्रोंद्वारा आचार्य वरुणदेवताका अर्घ्य आदिसे पूजन करे। वायुदेवताका आवाहन—'अपने वाहनपर आरूढ ध्वजधारी महाबली वायुदेव! आइये और देवताओं तथा मरुद्गणोंके साथ वायव्यकोणकी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है।' ‘वात$^६$ आवातु०’ इत्यादि वैदिक मन्त्रसे अथवा ‘ॐ नमो वायवे०।’ इस मन्त्रसे वायुकी पूजा करे॥ २३—२५ $\frac{१}{२}$॥
सोमका आवाहन—'बल और वाहनसे सम्पन्न गदाधारी सोम! आप यहाँ पधारिये और उत्तर द्वारकी रक्षा कीजिये। कुबेरसहित आपको नमस्कार है।' इस प्रकार आवाहन करके, ‘सोमं$^७$ राजानम्०’ इत्यादिसे अथवा ‘सोमाय नमः।’ इस मन्त्रसे सोमकी पूजा करे। ईशानका आवाहन—'वृषभपर आरूढ़ महाबलशाली शूलधारी ईशान! पधारिये और यज्ञ-मण्डपकी ईशान-दिशाका संरक्षण कीजिये। आपको नमस्कार है।' इस प्रकार आवाहन
१-आजिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः। पुनरूर्जा निवर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्माविशताद्रयिः॥ (यजु० ८।४२)
२-त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रꣳ हवे हवे सुहवꣳशूरमिन्द्रम्। हृयामि शक्रं पुरुहूतमिन्द्रꣳ स्वस्ति नो मधवा धात्विन्द्रः॥ (यजु २०।५०)
३-अग्निर्मूर्द्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्। अपाꣳ रेताꣳसि जिन्वति॥ (यजु० ३।१२)
४-एष ते निर्ऋते भागस्तं जुषस्व स्वाहा। (यजु० ९।३५)
५-उरुꣳ हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थामन्वेतवा उ। अपदे पादा प्रतिधातवेऽकरुतापवक्ता हृदयाविधश्चित्। (ऋ० मं० १ सू०२४।८)
६-वात आवातु भेषजं शम्भुमय भु नो हृदे। प्र ण आयूंषि तारिषत्॥ (ऋ० मं० १० सू० १८६।१)
७-सोमꣳ राजानमवसेऽग्निं गीर्भिर्हवामहे। आदित्यान् विष्णुं सूर्यं ब्रह्माणं च बृहस्पतिम्। (ऋ० मं० १० सू० १४१।३ तथा यजु० ९।२६)
११४ * अग्निपुराण *
करके ‘ईशानमस्य०’ इत्यादिसे अथवा ‘ईशानाय नमः।’ इस मन्त्रसे ईशानदेवताका पूजन करे। ब्रह्माका आवाहन—‘हाथके अग्रभागमें स्रुक् और स्रुवा लेकर हंसपर आरूढ हुए अजन्मा ब्रह्माजी! आइये और लोकसहित यज्ञमण्डपकी ऊर्ध्व-दिशाकी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है।’ इस प्रकार आवाहन करके ‘हिरण्यगर्भः०’$^१$ इत्यादिसे अथवा ‘नमस्ते ब्रह्मणे’ इस मन्त्रसे ब्रह्माजीकी पूजा करे॥ २६—३०॥
अनन्तका आवाहन—‘कच्छपकी पीठपर विराजमान, नागगणोंके अधिपति, चक्रधारी अनन्त! आइये और नीचेकी दिशाकी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। अनन्तेश्वर! आपको नमस्कार है।’ इस प्रकार आवाहन करके ‘नमोऽस्तु$^२$ सर्पेभ्यः०’ इत्यादिसे अथवा ‘अनन्ताय नमः।’ इस मन्त्रसे भगवान् अनन्तकी पूजा करे॥ ३१-३२॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘दस दिक्पालोंके पूजनका वर्णन’ नामक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५६॥
सत्तावनवाँ अध्याय
कलशाधिवासकी विधिका वर्णन
श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं—ब्रह्मन्! प्रतिष्ठाके लिये अथवा देवपूजनके लिये जिस भूमिको ग्रहण करे, वहाँ नारसिंह-मन्त्रका पाठ करते हुए राक्षसोंका अपसारण करनेवाले अक्षत और सरसों छींटे तथा पञ्चगव्यसे उस भूमिका प्रोक्षण करे। रत्नयुक्त कलशपर अङ्ग-देवताओंसहित श्रीहरिका पूजन करके, वहाँ अस्त्र-मन्त्रसे एक सौ आठ करकों (कमण्डलुओं)-का पूजन करे। अविच्छिन्न धारासे वेदीका सेचन करके वहाँ व्रीहि (धान, जौ आदि)-को संस्कारपूर्वक बिखेरे तथा कलशको प्रदक्षिणाक्रमसे घुमाकर उस बिखेरे हुए अन्नके ऊपर स्थापित करे। वस्त्रवेष्टित कलशपर पुनः भगवान् विष्णु और लक्ष्मीकी पूजा करे। तत्पश्चात् ‘योगे योगे०’$^३$ इत्यादि मन्त्रसे मण्डपमें शय्या स्थापित करे। स्नान-मण्डपमें कुशके ऊपर शय्या और शय्याके ऊपर तूलिका (रूईभरा गद्दा) बिछाकर, दिशाओं और विदिशाओंमें विद्याधिपतियों (भगवान् विष्णुके ही विभिन्न विग्रहों)-का पूजन करे। पूर्वादि दिशाओंमें क्रमशः विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम और वामनका तथा अग्नि आदि कोणोंमें क्रमशः श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ एवं दामोदरका पूजन करे। दामोदरका पूजन ईशानकोणमें होना चाहिये॥ १—६॥
इस तरह पूजन करनेके पश्चात् स्नानमण्डपके भीतर ईशानकोणमें स्थित तथा वेदीसे विभूषित चार कलशोंमें स्नानोपयोगी सब द्रव्योंको लाकर डाले। उन कलशोंको चारों दिशाओंमें विराजमान कर दे। भगवान्के अभिषेकके लिये संचित किये गये वे कलश बड़े आदरके साथ रखने योग्य हैं। पूर्व दिशाके कलशमें बड़, गूलर, पीपल, चम्पा, अशोक, श्रीद्रुम (बिल्व), पलाश, अर्जुन, पाकड़, कदम्ब, मौलसिरी और आमके पल्लवोंको लाकर डाले। दक्षिणके कलशमें कमल, रोचना, दूर्वा, कुशकी मुट्ठी, जातीपुष्प, कुन्द, श्वेतचन्दन,
$^१$ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ (यजु ० १३।४)
$^२$ नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु। ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः॥ (यजु० १३।६)
$^३$ योगे योगे तवस्तरं बाजे बाजे हवामहे। सखाय इन्द्रमूतये॥ (यजु० ११।१४)
- अध्याय ५८ *
रक्तचन्दन, सरसों, तगर और अक्षत डाले। पश्चिमके कलशमें सोना, चाँदी, समुद्रगामिनी नदीके दोनों तटोंकी मिट्टी, विशेषतः गङ्गाकी मृत्तिका, गोबर, जौ, अगहनी धानका चावल और तिल छोड़े॥ ७—१२ $\frac{१}{२}$॥
उत्तरके कलशमें विष्णुपर्णी (भुईं आँवला), शालपर्णी (सरिवन), भृङ्गराज (भँगंरैया), शतावरी, सहदेवी (सहदेइया), बच, सिंही (कटेरी या अड़ूसा), बला (खरेटी), व्याघ्री (कटेहरी) और लक्ष्मणा—इन ओषधियोंको छोड़े। ईशानकोणवर्ती अन्य कलशमें माङ्गलिक वस्तुएँ छोड़े। अग्निकोणस्थ दूसरे कलशमें बाँबी आदि सात स्थानोंकी मिट्टी छोड़े। नैर्ऋत्यकोणवर्ती अन्य कलशमें गङ्गाजीकी बालू और जल डाले तथा वायव्यकोणवर्ती अन्य कलशमें सूकर, वृषभ और गजराजके दाँत एवं सींगोंद्वारा कोड़ी हुई मिट्टी, कमलकी जड़के पासकी मिट्टी तथा इतर कलशमें कुशके मूल भागकी मृत्तिका डाले। इसी तरह किसी कलशमें तीर्थ और पर्वतोंकी मृत्तिकाओंसे युक्त जल डाले, किसीमें नागकेसरके फूल और केसर छोड़े, किसी कलशमें चन्दन, अगुरु और कपूरसे पूरित जल भरे और उसमें वैदूर्य, विद्रुम, मुक्ता, स्फटिक तथा वज्र (हीरा)—ये पाँच रत्न डाले॥ १३—१८॥
इन सबको एक कलशमें डालकर उसीके ऊपर इष्ट-देवताकी स्थापना करे। अन्य कलशमें नदी, नद और तालाबोंके जलसे युक्त जल छोड़े। इक्यासी पदवाले वास्तुमण्डलमें अन्यान्य कलशोंकी स्थापना करे। वे कलश गन्धोदक आदिसे पूर्ण हों। उन सबको श्रीसूक्तसे अभिमन्त्रित करे। जौ, सरसों, गन्ध, कुशाग्र, अक्षत, तिल, फल और पुष्प—इन सबको अर्घ्यके लिये पात्रविशेषमें संचित करके पूर्व दिशाकी ओर रख दे। कमल, श्यामलतता, दूर्वादल, विष्णुक्रान्ता और कुश—इन सबको पाद्य-निवेदनके लिये दक्षिण भागमें स्थापित करे। मधुपर्क पश्चिम दिशामें रखे। कङ्कोल, लवङ्ग और सुन्दर जायफल—इन सबको आचमनके उपयोगके लिये उत्तर दिशामें रखे। अग्निकोणमें दूर्वा और अक्षतसे युक्त एक पात्र नीराजना (आरती उतारने)-के लिये रखे। वायव्यकोणमें उद्वर्तनपात्र तथा ईशानकोणमें गन्धपिष्टसे युक्त पात्र रखे। कलशमें सुरमांसी (जटामांसी), आँवला, सहदेइया तथा हल्दी आदि छोड़े। नीराजनके लिये अड़सठ दीपोंकी स्थापना करे। शङ्ख तथा धातुनिर्मित चक्र, श्रीवत्स, वज्र एवं कमलपुष्प आदि रंग-बिरंगे पुष्प सुवर्ण आदिके पात्रमें सज्जित करके रखे॥ १९—२६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कलशाधिवासकी विधिका वर्णन' नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५७॥
अट्ठावनवाँ अध्याय
भगवद्विग्रहको स्नान और शयन करानेकी विधि
**श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं—**ब्रह्मन्! आचार्य ईशानकोणमें एक होमकुण्ड तैयार करे और उसमें वैष्णव-अग्निकी स्थापना करे। तदनन्तर गायत्री-मन्त्रसे एक सौ आठ आहुतियाँ देकर सम्पात-विधिसे कलशोंका प्रोक्षण करे। तदनन्तर मूर्तिपालक विद्वानों तथा शिल्पियोंसहित यजमान बाजे-गाजेके साथ कारुशाला (कारीगरकी कर्मशाला)-में जाय। वहाँ प्रतिमावर्ती इष्टदेवताके दाहिने हाथमें कौतुक-सूत्र (कङ्कण आदि) बाँधे। उसे बाँधते समय 'विष्णवे शिपिविष्टाय नमः।'—
११६ * अग्निपुराण *
इस मन्त्रका पाठ करे। उस समय आचार्यके हाथमें भी ऊनी सूत, सरसों और रेशमी वस्त्रसे कौतुक बाँध देना चाहिये। मण्डलमें सवस्त्र प्रतिमाकी स्थापना और पूजा करके उसकी स्तुति करते हुए कहे—'विश्वकर्माकी बनायी हुई देवेश्वरि प्रतिमे! तुम्हें नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्को प्रभावित करनेवाली जगदम्ब! तुम्हें मेरा बारंबार प्रणाम है। ईश्वरि! मैं तुममें निरामय नारायणदेवका पूजन करता हूँ। तुम शिल्प-सम्बन्धी दोषोंसे रहित हो; अतः मेरे लिये सदा समृद्धिशालिनी बनी रहो'॥ १-५$\frac{१}{२}$॥
इस तरह प्रार्थना करके प्रतिमाको स्नान-मण्डपमें ले जाय। शिल्पीको यथेष्ट द्रव्य देकर संतुष्ट करे। गुरुको गोदान दे। 'चित्रं देवाना०'$^१$ इत्यादि मन्त्रसे प्रतिमाका नेत्रोन्मीलन करे। 'अग्निर्य्योतिः०'$^२$ इत्यादि मन्त्रसे दृष्टिसंचार करे। फिर भद्रपीठपर प्रतिमाको स्थापित करे। तत्पश्चात् आचार्य श्वेत पुष्प, घी, सरसों, दूर्वादल तथा कुशाग्र इष्टदेवके सिरपर चढ़ावे॥ ६-८॥
इसके बाद 'मधु$^३$ वाता०' इत्यादि मन्त्रसे गुरु प्रतिमाके नेत्रोंमें अञ्जन करे। उस समय 'हिरण्यगर्भः०'$^४$ इत्यादि तथा 'इमं मे वरुण०' (यजु० २१।१) इत्यादि मन्त्रोंका कीर्तन करे। तत्पश्चात् पुनः 'घृतवती०'$^५$ ऋचाका पाठ करते हुए घृतका अभ्यङ्ग लगावे। इसके बाद मसूरके बेसनसे उबटनका काम लेकर 'अतो देवाः०'$^६$ इत्यादि मन्त्रका कीर्तन करे। फिर 'सप्त$^७$ ते अग्ने०' इत्यादि मन्त्र बोलकर गुरु गर्म जलसे प्रतिमाका प्रक्षालन करे। तदनन्तर 'द्रुपदादिव०'$^८$ इत्यादि मन्त्रसे अनुलेपन और 'आपो$^९$ हि ष्ठा०' इत्यादिसे अभिषेक करे। अभिषेकके पश्चात् नदी एवं तीर्थके जलसे स्नान कराकर 'पावमानी' ऋचा (शु० यजु० ३९-४३)-का पाठ करते हुए, रत्न-स्पर्शसे युक्त जलद्वारा स्नान करावे। 'समुद्रं$^{१०}$ गच्छ स्वाहा०' इत्यादि मन्त्र पढ़कर तीर्थकी मृत्तिका और कलशके जलसे स्नान करावे। 'शं नो$^{११}$ देवीः०' इत्यादि तथा गायत्री-मन्त्रसे गरम जलके द्वारा इष्टदेवकी प्रतिमाको नहलावे॥ ९-१३॥
१. चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। आ प्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षꣳ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा॥
(यजु० ७।४२ तथा १३।४६)
२. अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा। अग्निवर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा। ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा॥
(यजु० ३।९)
३. मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥ मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवꣳरजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता॥ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँऽअस्तु सूर्यः॥ माध्वीर्गावो भवन्तु नः॥ (यजु० १३।२७, २८, २९)
४. (यजु० १३।४) यह मन्त्र अध्याय ५६ की टिप्पणीमें दिया जा चुका है।
५. घृतवती भुवनानामभिश्रियोर्वी पृथ्वी मधुदुघे सुपेशसा। द्यावा पृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कभिते अजरे भूरिरेतसा॥ (यजु० ३४।४५)
६. अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे पृथिव्याः सप्तधामभिः॥ (ऋ० म० १, सू० २२।१६)
७. सप्त ते अग्ने समिधः सप्त जिह्वाः सप्त ऋषयः सप्त धाम प्रियाणि। सप्त होत्राः सप्तधा त्वा यजन्ति सप्त योनीरापृणस्वा घृतेन स्वाहा। (यजु० १७।७९)
८. द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव। पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः॥ (यजु० २०।२०)
९. आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे॥ यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः॥ तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जनयथा च नः॥ (यजु० ११। ५०, ५१, ५२)
१०. समुद्रं गच्छ स्वाहान्तरिक्षं गच्छ स्वाहा देवꣳ सवितारं गच्छ स्वाहा मित्रावरुणौ गच्छ स्वाहाहोरात्रे गच्छ स्वाहा छन्दाꣳसि गच्छ स्वाहा द्यावापृथिवी गच्छ स्वाहा यज्ञं गच्छ स्वाहा सोमं गच्छ स्वाहा दिव्यं नभो गच्छ स्वाहाग्निं वैश्वानरं गच्छ स्वाहा। मनो मे हार्दि यच्छ दिवं ते धूमो गच्छतु स्वर्ज्योतिः पृथिवीं भस्मनापृण स्वाहा॥ (यजु० ६।२१)
११. शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये शं योरभि स्रवन्तु नः।
(अथर्ववेद १।६।१)
- अध्याय ५८ * ११७
‘हिरण्यगर्भः०’ इत्यादि मन्त्रसे पाँच प्रकारकी मृत्तिकाओंद्वारा परमेश्वरको स्नान करावे। इसके बाद ‘इमं मे गङ्गे यमुने०’ इत्यादि मन्त्रसे बालुकामिश्रित जलके द्वारा तथा ‘तद् विष्णोः०’ इत्यादि मन्त्रसे बाँबीकी मिट्टी मिले हुए जलसे पूर्ण घटके द्वारा भगवान्को स्नान करावे। ‘या ओषधीः०<sup>२</sup>’ इत्यादि मन्त्रसे ओषधिमिश्रित जलके द्वारा, ‘यज्ञा<sup>३</sup> यज्ञा०’ इत्यादि मन्त्रसे आँवले आदि कसैले पदार्थोंसे मिश्रित जलके द्वारा, ‘पयः<sup>४</sup> पृथिव्याम्०’ इत्यादि मन्त्रसे पञ्चगव्योंद्वारा तथा ‘याः फलिनीः०<sup>५</sup>’ इत्यादि मन्त्रसे फलमिश्रित जलके द्वारा भगवान्को नहलावे। ‘विश्वतश्चक्षुः०<sup>६</sup>’ इत्यादि मन्त्रसे उत्तरवर्ती कलशद्वारा, ‘सोमं<sup>७</sup> राजानम्०’ इस मन्त्रसे पूर्ववर्ती कलशद्वारा, ‘विष्णो<sup>८</sup> ररातमसि०’ इत्यादि मन्त्रसे दक्षिणवर्ती कलशद्वारा तथा ‘हंसः<sup>९</sup> शुचिषद०’ इत्यादि मन्त्रसे पश्चिमवर्ती कलशद्वारा भगवान्को उद्वर्तन-स्नान करावे ॥ १४–१७ ॥
‘मूर्द्धानं<sup>१०</sup> दिवो०’ इत्यादि मन्त्रसे आँवले मिले हुए जलके द्वारा, ‘मा नस्तोके०<sup>११</sup>’ इत्यादि मन्त्रसे जटामांसीमिश्रित जलके द्वारा, ‘गन्धद्वारां०<sup>१२</sup>’ इत्यादि मन्त्रसे गन्धमिश्रित जलके द्वारा तथा ‘इदमपः०<sup>१३</sup>’ इत्यादि मन्त्रसे इक्यासी पदोंवाले वास्तुमण्डलमें रखे गये कलशोंद्वारा भगवान्को नहलावे। इस प्रकार स्नानके पश्चात् भगवान्को सम्बोधित करके कहे—‘भगवन्! समस्त लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले सर्वव्यापी वासुदेव! आइये, आइये, इस यज्ञभागको ग्रहण कीजिये। आपको नमस्कार है।’ इस प्रकार देवेश्वरका आवाहन करके उनके हाथमें बँधा हुआ मङ्गलसूत्र खोल दे। उसे खोलते समय ‘मुञ्चामि<sup>१४</sup> त्वा०’ इस मन्त्रका पाठ करे। इसी मन्त्रसे आचार्यका भी कौतुकसूत्र खोल दे। तदनन्तर ‘हिरण्मयेन०<sup>१५</sup>’ इत्यादि मन्त्रसे पाद्य और ‘अतो देवाः०’ (ऋक्० १।१३।६) इत्यादि मन्त्रसे अर्घ्य दे। फिर ‘मधु वाताः०’ इत्यादि मन्त्रसे मधुपर्क देकर ‘मयि गृह्णामि०<sup>१६</sup>’ इत्यादि मन्त्रसे आचमन करावे। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष ‘अक्षन्नमीमदन्त०<sup>१७</sup>’
१. तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ (यजु० ६।५)
२. या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा। मनै नु बभ्रूणामहᳵ शतं धामानि सप्त च॥ (यजु० १२।७५)
३. यज्ञा यज्ञा वो अग्नये गिरा गिरा च दक्षसे। प्र प्र वयममृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न शꣳ सिषम्॥ (यजु० २७।४२)
४. पयः पृथिव्यां पय ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धाः। पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम्॥ (यजु० १८।३६)
५. याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः। बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वꣳहसः॥ (यजु० १२।८९)
६. विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्। सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः॥ (यजु० १७।१९)
७. सोमꣳ राजानमवसेऽग्निमन्वारभामहे। आदित्यान्विष्णुꣳ सूर्यं ब्रह्माणं च बृहस्पतिꣳ स्वाहा॥ (यजु ९।२६)
८. विष्णो रराटमसि विष्णोः श्नप्त्रे स्थो विष्णोः स्यूरसि विष्णोर्ध्रुवोऽसि वैष्णवमसि विष्णवे त्वा॥ (यजु० ५।२१)
९. हꣳसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्। नृषद्वरसद्दृतसदव्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत्॥ (यजु०१०। २४)
१०. मूर्द्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरममृत आ जातमग्निम्। कविꣳ सम्राजमतिथिं जनानामासन्ना पात्रं जनयन्त देवाः॥ (यजु० ७।२४)
११. मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः। मा नो वीरान् रुद्र भामिनो वधीर्हविष्मन्तः सदमि त्वा हवामहे॥ (यजु० १६।१६)
१२. गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्। ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥ (श्रीसूक्त)
१३. इदमपः प्रवहतावद्यं च मलं य यत्। यच्चाभिदुद्रोहानृतं यच्च शेपे अभीरुणम्। आपो मा तस्मादेनसः पवमानश्च मुञ्चतु॥ (यजु० ६।१७)
१४. मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्। ग्राहिर्जग्राह यदि वैतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम्॥ (ऋ० मं० १०, सू० १६१।१)
१५. हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम्। (यजु० ४०।१७)
१६. मयि गृह्णाम्यग्रे अग्निꣳ रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय। मामु देवताः सचन्ताम्॥ (यजु० १३।१)
१७. अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत। अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी॥ (यजु० ३।५१)
| ११८ | * अग्निपुराण * |
|---|
इत्यादि मन्त्र पढ़कर भगवान्के श्रीअङ्गोंपर दूर्वा एवं अक्षत बिखेरे॥ १८-२२॥
'काण्डात्०'¹ इत्यादि मन्त्रसे निर्मञ्छन करे। 'गन्धवती०'² इत्यादिसे गन्ध अर्पित करे। 'उन्नयामि०' इस मन्त्रसे फूल-माला और 'इदं विष्णुः०'³ इत्यादि मन्त्रसे पवित्रक अर्पित करे। 'बृहस्पते०'⁴ इत्यादि मन्त्रसे एक जोड़ा वस्त्र चढ़ावे। 'वेदाहमेतम्०'⁵ इत्यादिसे उत्तरीय अर्पित करे। 'महाव्रतेन०' इस मन्त्रसे फूल और औषध—इन सबको चढ़ावे। तदनन्तर 'धूरसि०'⁶ इस मन्त्रसे धूप दे। 'विभ्राट्०'⁷ सूक्तसे अञ्जन अर्पित करे। 'युञ्जन्ति०'⁸ इत्यादि मन्त्रसे तिलक लगावे तथा 'दीर्घत्वाय०' (अथर्व० २।४।१) इस मन्त्रसे फूलमाला चढ़ावे। 'इन्द्र क्षत्रमभि०' (अथर्व० ७।४।२) इत्यादि मन्त्रसे छत्र, 'विराट्०'⁹ मन्त्रसे दर्पण, 'विकर्ण०' मन्त्रसे चँवर तथा 'रथन्तर०' साम-मन्त्रसे आभूषण निवेदित करे॥ २३-२६॥
वायुदेवता-सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा व्यजन, 'मुञ्चामि त्वा०' (ऋक् १०।१६१।१) इस मन्त्रसे फूल तथा वेदादि (प्रणव)-युक्त पुरुषसूक्तके मन्त्रोंद्वारा श्रीहरिकी स्तुति करे। ये सारी वस्तुएँ पिण्डिका आदिपर तथा शिव आदि देवताओंपर इसी प्रकार चढ़ावे। भगवान्को उठाते समय 'सौपर्ण' सूक्तका पाठ करे। 'प्रभो! उठिये' ऐसा कहकर भगवान्को उठावे और मण्डपमें शय्यापर ले जाय। उस समय 'शकुनि' सूक्तका पाठ करे। ब्रह्मरथ एवं पालकी आदिके द्वारा भगवान्को शय्यापर ले जाना चाहिये। 'अतो देवाः' (ऋक्० १।२२।१६) इस सूक्तसे तथा 'श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च०' (यजु० ३१।२२)-से प्रतिमा एवं पिण्डिकाको शय्यापर पधरावे। तदनन्तर भगवान् विष्णुके लिये निष्कली-करणकी क्रिया सम्पादित करे॥ २७-३०॥
सिंह, वृषभ, हाथी, व्यजन, कलश, वैजयन्ती (पताका), भेरी तथा दीपक—ये आठ मङ्गलसूचक वस्तुएँ हैं। इन सब वस्तुओंको अश्वसूक्तका पाठ करते हुए भगवान्को दिखावे। 'त्रिपात्०'¹⁰ इत्यादि मन्त्रसे भगवान्के चरण-प्रान्तमें उखा (पात्रविशेष), उसका ढक्कन, अम्बिका (कड़ाही), दर्बिका (करछुल), पात्र, ओखली, मूसल, सिल, झाडू, भोजन-पात्र तथा घरके अन्य सामान रखे। उनके सिरकी ओर वस्त्र और रत्नसे युक्त एक कलश स्थापित करे, जो खाँड और खाद्य-पदार्थसे भरा हुआ हो। उस घटकी 'निद्रा' संज्ञा होती है। इस प्रकार भगवान्के शयनकी विधि बतायी गयी है॥ ३१-३४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'स्नपनकी विधि आदिका वर्णन' नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५८॥
१. काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि। एवा नो दूर्वे प्रत्तनु सहस्रेण शतेन च॥ (यजु० १३।२०)
२. 'गन्धद्वारां०' इत्यादि मन्त्र ही यहाँ गन्धवती नामसे गृहीत होते हैं।
३. इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूढमस्य पाꣳ सुरे स्वाहा॥ (यजु० ५।१५)
४. बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्। उपयामगृहीतोऽसि बृहस्पतये त्वैष ते योनिर्बृहस्पतये त्वा॥ (यजु० २६।३)
५. वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्। तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥ (यजु० ३१।१८)
६. धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व तं योऽस्मान्धूर्वति तं धूर्वयं वयं धूर्वामः। देवानामसि वह्नितमꣳ सस्नितमं पप्रितमं जुष्टतमं देवहूतमम्॥ (यजु० १।८)
७. विभ्राड् बृहत्पिबतु सोम्यं मध्वायुर्दधद्यज्ञपतावविह्रुतम्। वातजूतो यो अभिरक्षति त्मना प्रजाः पुपोष पुरुधा वि राजति॥ (यजु० ३३।३०)
८. युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः। रोचन्ते रोचना दिवि॥ (यजु० २३।५)
९. विराट् ज्योतिरधारयत्स्वराड् ज्योतिरधारयत्। प्रजापतिष्ट्वा सादयतु पृष्ठे पृथिव्या ज्योतिष्मतीम्। विश्वस्मै प्राणायापानाय व्यानाय विश्वं ज्योतिर्यच्छ। अग्निष्टेऽधिपतिस्तया देवतयाङ्गिरस्वद् ध्रुवासीद॥ (यजु० १३।२४)
१०. त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः। ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि॥ (यजु० १३।४)
* अध्याय ५९ * । ११९
उनसठवाँ अध्याय
अधिवास-विधिका वर्णन
श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं— ब्रह्मन्! श्रीहरिका सांनिध्यकरण 'अधिवासन' कहलाता है। साधक यह चिन्तन करे कि 'मैं अथवा मेरा आत्मा सर्वज्ञ सर्वव्यापी पुरुषोत्तमरूप है।' इस प्रकार भावना करके आत्माकी 'ॐ' इस नामके द्वारा प्रतिपादित होनेवाले परमात्माके साथ एकता करे। तदनन्तर चैतन्याभिमानिनी जीव-शक्तिको पृथक् करके आत्माके साथ उसकी एकता करे। ऐसा करके स्वात्मरूप सर्वव्यापी परमेश्वरमें उसे जोड़ दे। तत्पश्चात् प्राणवायुद्वारा ('लं' बीजात्मक) पृथ्वीको अग्निबीज (रं)-के चिन्तनद्वारा प्रकट हुई अग्निमें जला दे, अर्थात् यह भावना करे कि पृथ्वीका अग्निमें लय हो गया। फिर वायुमें अग्निको विलीन करे और आकाशमें वायुका लय कर दे। अधिभूत, अधिदैव तथा अध्यात्म-वैभवके साथ समस्त भूतोंको तन्मात्राओंमें विलीन करके विद्वान् पुरुष आकाशमें उन सबका क्रमशः संहार करे। इसके बाद आकाशका मनमें, मनका अहंकारमें, अहंकारका महत्तत्त्वमें और महत्तत्त्वका अव्याकृत प्रकृतिमें लय करे॥ १—५॥
अव्याकृत प्रकृति (अथवा माया)-को ज्ञानस्वरूप परमात्मामें विलीन करे। उन्हीं परमात्माको 'वासुदेव' कहा गया है। उन शब्दस्वरूप भगवान् वासुदेवने सृष्टिकी इच्छासे उस अव्याकृत मायाका आश्रय ले स्पर्शसंज्ञक संकर्षणको प्रकट किया। संकर्षणने मायाको क्षुब्ध करके तेजोरूप प्रद्युम्नकी सृष्टि की। प्रद्युम्नने रसस्वरूप अनिरुद्धको और अनिरुद्धने गन्धस्वरूप ब्रह्माको जन्म दिया। ब्रह्माने सबसे पहले जलकी सृष्टि की। उस जलमें उन्होंने पाँच भूतोंसे युक्त हिरण्मय अण्डको उत्पन्न किया। उस अण्डमें जीव-शक्तिका संचार हुआ। यह वही जीव-शक्ति है, जिसका आत्मामें पहले उपसंहार बताया गया है। जीवके साथ प्राणका संयोग होनेपर वह 'वृत्तिमान्' कहलाता है। व्याहृतिसंज्ञक जीव प्राणोंमें स्थित होकर 'आध्यात्मिक पुरुष' कहा गया है। उससे प्राणयुक्त बुद्धि उत्पन्न हुई, जो आठ वृत्तिवाली बतायी गयी है। उस बुद्धिसे अहंकारका और अहंकारसे मनका प्रादुर्भाव हुआ। मनसे संकल्पादियुक्त पाँच विषय प्रकट हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध॥ ६—१२॥
इन सबने ज्ञानशक्तिसे सम्पन्न पाँच इन्द्रियोंको प्रकट किया, जिनके नाम हैं—त्वक्, श्रोत्र, घ्राण, नेत्र और जिह्वा। इन सबको 'ज्ञानेन्द्रिय' कहा गया है। दो पैर, गुदा, दो हाथ, वाक् और उपस्थ—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। अब पञ्चभूतोंके नाम सुनो। आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये पाँच भूत हैं। इनके ही द्वारा सबका आधारभूत स्थूल शरीर उत्पन्न होता है। इन तत्त्वोंके वाचक जो उत्तम बीज-मन्त्र हैं, उनका न्यासके लिये यहाँ वर्णन किया जाता है। 'मं' यह बीज जीवस्वरूप (अथवा जीवतत्त्वका वाचक) है। वह सम्पूर्ण शरीरमें व्यापक है—इस भावनाके साथ उक्त बीजका सम्पूर्ण देहमें व्यापक-न्यास करना चाहिये। 'भं' यह प्राणतत्त्वका प्रतीक है। यह जीवकी उपाधिमें स्थित है, अतः इसका वहीं न्यास करना चाहिये। विद्वान् पुरुष बुद्धितत्त्वके बोधक बकार अथवा 'बं' बीजका हृदयमें न्यास करे। फकार (फं) अहंकारका स्वरूप है, अतः उसका भी हृदयमें ही न्यास करे। संकल्पके कारणभूत मनस्तत्त्वरूप पकार (पं)-का भी वहीं न्यास करे॥ १३—१८॥
१२० * अग्निपुराण *
शब्दतन्मात्रतत्त्वके बोधक नकार (नं)-का मस्तकमें और स्पर्शरूप धकार (धं)-का मुखप्रदेशमें न्यास करे। रूपतत्त्वके वाचक दकार (दं)-का नेत्रप्रान्तमें और रसतन्मात्राके बोधक थकार (थं)-का वस्तिदेश (मूत्राशय)-में न्यास करे। गन्धतन्मात्रस्वरूप तकार (तं)-का पिण्डलियोंमें न्यास करे। णकार (णं)-का दोनों कानोंमें न्यास करके ढकार (ढं)-का त्वचामें न्यास करे। डकार (डं)-का दोनों नेत्रोंमें, ठकार (ठं)-का रसनामें, टकार (टं)-का नासिकामें और जकार (जं)-का वागिन्द्रियमें न्यास करे। विद्वान् पुरुष पाणितत्त्वरूप झकार (झं)-का दोनों हाथोंमें न्यास करके, जकार (जं)-का दोनों पैरोंमें, 'छं' का पायुमें और 'चं' का उपस्थमें न्यास करे। ङकार (ङं) पृथ्वीतत्त्वका प्रतीक है। उसका युगल चरणोंमें न्यास करे। घकार (घं)-का वस्तिमें और तेजस्तत्त्वरूप (गं)-का हृदयमें न्यास करे। खकार (खं) वायुतत्त्वका प्रतीक है। उसका नासिकामें न्यास करे। ककार (कं) आकाशतत्त्वरूप है। विद्वान् पुरुष उसका सदा ही मस्तकमें न्यास करे॥ १९-२५॥
हृदय-कमलमें सूर्य-देवता-सम्बन्धी 'यं' बीजका न्यास करके, हृदयसे निकली हुई जो बहत्तर हजार नाड़ियाँ हैं, उनमें षोडश कलाओंसे युक्त सकार (सं)-का न्यास करे। उसके मध्यभागमें मन्त्रज्ञ पुरुष बिन्दुस्वरूप वह्निमण्डलका चिन्तन करे। सुरश्रेष्ठ! उसमें प्रणवसहित हकार (हं)-का न्यास करे। १. ॐ आं नमः परमेष्ठ्यात्मने। २.ॐ आं नमः पुरुषात्मने। ३.ॐ वां नमो नित्यात्मने। ४.ॐ नां नमो विश्वात्मने। ५. ॐ वं नमः सर्वात्मने। ये पाँच शक्तियाँ बतायी गयी हैं। 'स्नानकर्म' में प्रथमा शक्तिकी योजना करनी चाहिये। 'आसनकर्म' में द्वितीया, 'शयन' में तृतीया, 'यानकर्म' में चतुर्थी और 'अर्चनाकाल'में पञ्चमी शक्तिका प्रयोग करना चाहिये—ये पाँच उपनिषद् हैं। इनके मध्यमें मन्त्रमय श्रीहरिका ध्यान करके क्षकार (क्षं)-का न्यास करे॥ २६-३१॥
तदनन्तर जिस मूर्तिकी स्थापना की जाती है, उसके मूल-मन्त्रका न्यास करना चाहिये। (भगवान् विष्णुकी स्थापनामें) 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'—यह मूल-मन्त्र है। मस्तक, नासिका, ललाट, मुख, कण्ठ, हृदय, दो भुजा, दो पिण्डली और दो चरणोंमें क्रमशः उक्त मूल-मन्त्रके एक-एक अक्षरका न्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् केशवका मस्तकमें न्यास करे। नारायणका मुखमें, माधवका ग्रीवामें और गोविन्दका दोनों भुजाओंमें न्यास करके विष्णुका हृदयमें न्यास करे। पृष्ठभागमें मधुसूदनका, जठरमें वामनका और कटिमें त्रिविक्रमका न्यास करके जंघा (पिण्डली)-में श्रीधरका न्यास करे। दक्षिण भागमें हृषीकेशका, गुल्फमें पद्मनाभका और दोनों चरणोंमें दामोदरका न्यास करनेके पश्चात् हृदयादि षडङ्गन्यास करे॥ ३२-३६॥
सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजी! यह आदिमूर्तिके लिये न्यासका साधारण क्रम बताया गया है। अथवा जिस देवताकी स्थापनाका आरम्भ हो, उसीके मूल-मन्त्रसे मूर्तिके सजीवकरणकी क्रिया होनी चाहिये। जिस मूर्तिका जो नाम हो, उसके आदि अक्षरका बारह स्वरोंसे भेदन करके अङ्गोंकी कल्पना करनी चाहिये। देवेश्वर! हृदय आदि अङ्गोंका तथा द्वादश अक्षरवाले मूल-मन्त्रका एवं तत्त्वोंका जैसे देवताके विग्रहमें न्यास करे, वैसे ही अपने शरीरमें भी करे। तत्पश्चात् चक्राकार पद्ममण्डलमें भगवान् विष्णुका गन्ध आदिसे पूजन करे। पूर्ववत् शरीर और वस्त्राभूषणोंसहित भगवान्के आसनका ध्यान करे। ऊपरी भागमें बारह अरोंसे युक्त सुदर्शनचक्रका चिन्तन करे। वह चक्र तीन नाभि और दो
- अध्याय ५९ * १२१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
नेमियोंसे युक्त है। साथ ही बारह स्वरोंसे सम्पन्न है। इस प्रकार चक्रका चिन्तन करनेके पश्चात् विद्वान् पुरुष पृष्ठदेशमें प्रकृति आदिका निवेश करे। फिर अरोंके अग्रभागमें बारह सूर्योंका पूजन करे। तदनन्तर वहाँ सोलह कलाओंसे युक्त सोमका ध्यान करे। चक्रकी नाभिमें तीन वसन (वस्त्र या वासस्थान)—का चिन्तन करे। तत्पश्चात् श्रेष्ठ आचार्य पद्मके भीतर द्वादशदल-पद्मका चिन्तन करे॥ ३७—४४॥
उस पद्ममें पुरुष-शक्तिका ध्यान करके उसकी पूजा करे। फिर प्रतिमामें श्रीहरिका न्यास करके गुरु वहाँ श्रीहरि तथा अन्य देवताओंका पूजन करे। गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंसे अङ्ग और आवरणोंसहित इष्टदेवका भलीभाँति पूजन करना चाहिये। द्वादशाक्षर-मन्त्रके एक-एक अक्षरको बीजरूपमें परिवर्तित करके उनके द्वारा केशव आदि भगवद्विग्रहोंकी क्रमशः पूजा करे। द्वादश अरोंसे युक्त मण्डलमें लोकपाल आदिकी भी क्रमसे अर्चना करे। तदनन्तर द्विज गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंद्वारा पुरुषसूक्तसे प्रतिमाकी पूजा करे और श्रीसूक्तसे पिण्डिकाकी। इसके बाद जनन आदिके क्रमसे वैष्णव-अग्निको प्रकट करे। तदनन्तर विष्णुदेवता-सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा अग्निमें आहुति देकर विद्वान् पुरुष शान्ति-जल तैयार करे और उसे प्रतिमाके मस्तकपर छिड़ककर अग्निका प्रणयन करे। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि ‘अग्निं दूतम्०’$^१$ इत्यादि मन्त्रसे दक्षिण-कुण्डमें अग्नि-प्रणयन करे। पूर्वकुण्डमें ‘अग्निमग्निम्०’$^२$ इत्यादि मन्त्रसे और उत्तर-कुण्डमें ‘अग्निमग्निं$^३$ हवीमभिः०’ इत्यादि मन्त्रसे अग्निका प्रणयन करे। अग्निप्रणयन-कालमें ‘त्वमग्ने$^४$ द्युभिः०’ इत्यादि मन्त्रका पाठ किया जाता है॥ ४५—५१॥
प्रत्येक कुण्डमें प्रणवके उच्चारणपूर्वक पलाशकी एक हजार आठ समिधाओंका तथा जौ आदिका भी होम करे। व्याहृति-मन्त्रसे घृतमिश्रित तिलोंका और मूलमन्त्रसे घीका हवन करे। तत्पश्चात् मधुरत्रय (घी, शहद और चीनी)—से शान्ति-होम करे। द्वादशाक्षर-मन्त्रसे दोनों पैर, नाभि, हृदय और मस्तकका स्पर्श करे। घी, दही और दूधकी आहुति देकर मस्तकका स्पर्श करे। तत्पश्चात् मस्तक, नाभि और चरणोंका स्पर्श करके क्रमशः गङ्गा, यमुना, गोदावरी और सरस्वती—इन चार नदियोंकी स्थापना करे। विष्णु-गायत्रीसे$^५$ अग्निको प्रज्वलित करे और गायत्री-मन्त्रसे उस अग्निमें चरु पकावे। गायत्रीसे ही होम और बलि दे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन करावे॥ ५२—५६॥
मासाधिपति बारह आदित्योंकी तृप्तिके लिये आचार्यको सुवर्ण और गौकी दक्षिणा दे। दिक्पालोंको बलि देकर रातमें जागरण करे। उस समय वेदपाठ और गीत, कीर्तन आदि करता रहे। इस प्रकार अधिवासन-कर्मका सम्पादन करनेपर मनुष्य सम्पूर्ण फलोंका भागी होता है॥ ५७—५९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘देवाधिवास-विधिका वर्णन’ नामक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५९॥
१. अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे॥ देवाँ २॥ आसादयादिह॥ (यजु० २२। १७)
२. अग्निमग्निं वः समिधा दुवस्यत प्रियं प्रियं वो अतिथिं गृणीषणि। उप वो गीर्भिरमृतं विवासत देवो देवेषु वनते हि वार्यं देवो देवेषु वनते हि नो दुवः॥ (ऋ० सं० ६। १५। ६)
३. अग्निमग्निं हवीमभिः सदा हवन्त विश्पतिम्। हव्यवाहं पुरुप्रियम्॥ (ऋ० मं० १, सू० १२। २)
४. त्वमग्ने द्युभिस्त्वमाशुशुक्षणिस्त्वमद्भ्यस्त्वमश्मनस्परि। त्वं वनेभ्यस्त्वमोषधीभ्यस्त्वं नृणां नृपते जायसे शुचिः॥ (यजु० ११। २७)
५. नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।
१२२ * अग्निपुराण *
साठवाँ अध्याय
वासुदेव आदि देवताओंके स्थापनकी साधारण विधि
श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं— ब्रह्मन्! पिण्डिकाकी स्थापनाके लिये विद्वान् पुरुष मन्दिरके गर्भगृहको सात भागोंमें विभक्त करे और ब्रह्मभागमें प्रतिमाको स्थापित करे। देव, मनुष्य और पिशाच-भागोंमें कदापि उसकी स्थापना नहीं करनी चाहिये। ब्रह्मन्! ब्रह्मभागका कुछ अंश छोड़कर तथा देवभाग और मनुष्य-भागोंमेंसे कुछ अंश लेकर, उस भूमिमें यत्नपूर्वक पिण्डिका स्थापित करनी चाहिये। नपुंसक शिलामें रत्नन्यास करे। नृसिंह-मन्त्रसे हवन करके उसीसे रत्नन्यास भी करे। व्रीहि, रत्न, लोह आदि धातु और चन्दन आदि पदार्थोंको पूर्वाद दिशाओं तथा मध्यमें बने हुए नौ कुण्डोंमें अपनी रुचिके अनुसार छोड़े। तदनन्तर इन्द्र आदिके मन्त्रोंसे पूर्वाद दिशाओंके गर्तको गुग्गुलसे आवृत करके, रत्नन्यासकी विधि सम्पन्न करनेके पश्चात्, गुरु शलाकासहित कुश-समूहों और ‘सहदेव’ नामक औषधके द्वारा प्रतिमाको अच्छी तरह मले और झाड़-पोंछ करे। बाहर-भीतरसे संस्कार (सफाई) करके पञ्चगव्यद्वारा उसकी शुद्धि करे। इसके बाद कुशोंदक, नदीके जल एवं तीर्थ-जलसे उस प्रतिमाका प्रोक्षण करे॥ १—७॥
होमके लिये बालूद्वारा एक वेदी बनावे, जो सब ओरसे डेढ़ हाथकी लंबी-चौड़ी हो। वह वेदी चौकोर एवं सुन्दर शोभासे सम्पन्न हो। आठ दिशाओंमें यथास्थान कलशोंको भी स्थापित करे। उन पूर्वाद कलशोंको आठ प्रकारके रंगोंसे सुसज्जित करे। तत्पश्चात् अग्नि ले आकर वेदीपर उसकी स्थापना करे और कुशखण्डिकाद्वारा संस्कार करके उस अग्निमें ‘त्वमग्ने द्युभिः०’ (यजु० ११। २७) इत्यादिसे तथा गायत्री-मन्त्रसे समिधाओंका हवन करे। अष्टाक्षर-मन्त्रसे अष्टोत्तरशत घीकी आहुति दे, पूर्णाहुति प्रदान करे। तत्पश्चात् मूल-मन्त्रसे सौ बार अभिमन्त्रित किये गये शान्तिजलको आम्रपल्लवोंद्वारा लेकर इष्टदेवताके मस्तकपर अभिषेक करे। अभिषेक-कालमें ‘श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च०’$^१$ इत्यादि ऋचाका पाठ करता रहे। ‘उत्तिष्ठ$^२$ ब्रह्मणस्पते०’ इस मन्त्रसे प्रतिमाको उठाकर ब्रह्मरथपर रखे और ‘तद्$^३$ विष्णोः०’ इत्यादि मन्त्रसे उक्त रथद्वारा उसे मन्दिरकी ओर ले जाय। वहाँ श्रीहरिकी उस प्रतिमाको शिविका (पालकी)-में पधराकर नगर आदिमें घुमावे और गीत, वाद्य एवं वेदमन्त्रोंकी ध्वनिके साथ उसे पुनः लाकर मन्दिरके द्वारपर विराजमान करे॥ ८—१३॥
इसके बाद गुरु सुवासिनी स्त्रियों और ब्राह्मणोंद्वारा आठ मङ्गल-कलशोंके जलसे श्रीहरिको स्नान करावे तथा गन्ध आदि उपचारोंसे मूल-मन्त्रद्वारा पूजन करनेके पश्चात् ‘अतो देवाः०’ (ऋक्० १।२२।१६) इत्यादि मन्त्रसे वस्त्र आदि अष्टाङ्ग अर्घ्य निवेदन करे। फिर स्थिर लग्नमें पिण्डिकापर ‘देवस्य त्वा०’$^४$ इत्यादि मन्त्रसे इष्टदेवताके उस अर्चा-विग्रहको स्थापित कर दे। स्थापनाके पश्चात् इस प्रकार कहे— ‘सच्चिदानन्दस्वरूप त्रिविक्रम! आपने तीन पगोंद्वारा समूची त्रिलोकीको आक्रान्त कर लिया था।
१. श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम्। इष्णन्निषाणामुं म इषाण सर्वलोकं म इषाण॥ (यजु० ३१।२२)
२. उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे। उप प्रयन्तु मरुतः सुदानव इन्द्र प्राशूर्भवा सचा॥ (यजु० ३४।५६)
३. तद् विष्णोः परमं पदᳵ सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ (यजु० ६।५)
४. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्। अग्नये जुष्टं गृहाम्यग्नीषोमाभ्यां जुष्टं गृह्णामि॥ (यजु० १।१०)