भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 592 में से

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पृष्ठ 86

७२ [ प्रथम पञ्चिका वृत्र को मारा था। सोम की क्षति को पूरा करने के लिये सोम पर जल छिड़कते हैं। और इस मंत्र को पढ़ते हैं :- अंशुंरंशुष्टे देव सोमाप्या यतामिन्द्रायैकधनविद आतुभ्यमिन्द्रः प्याय- तामात्वमिन्द्राय प्यायस्वाप्याययास्मान् त्सखीन्। सन्यामेधया स्वस्ति ते देव सोम सुत्यामुदृचम शीय । (तै० १।२।११।२ ) जब वह सोम के पास घृत छूने का कृत्य करके उसके साथ क्रूरता करते हैं तो उस पर जल छिड़क कर उसकी क्षति को पूरा कर देते हैं और उसको बढ़ा देते हैं। वह जो सोम राजा है वह द्यौ और पृथिवी का गर्भ है। नीचे का मंत्र पढ़ के :- एष्टा राय एष्टा वामानि प्रेषे भगाय। ऋतमृतवादिभ्यो नमो दिवे नमः पृथिव्या इति। प्रस्तर अर्थात् कुशों के दो बंडलों को (वेदी के दक्षिण कोने में) फेंक देते हैं। द्यौ और पृथ्वी को नमस्कार करते हैं। इस प्रकार वह उन दोनों को बढ़ाते हैं।(६) ऐतरेय ब्राह्मण की पहली पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त।

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