अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
अकबर बीरबल विनोद १६३
अकबर बीरबल विनोद १६३
भी करनी पड़ेगी। लोगों में तुमको मेरा छोटा भाई होना विख्यात करना पड़ेगा, बल्कि यत्र तत्र इसका प्रचार भी काफी तौर से करना होगा, वह लड़का बहुत प्रसन्न हुआ और बीरबल का छोटा भाई बनना सहर्ष स्वीकार किया। “मरत रहे एक चना के, पाय गये दो दाल।” भला इस जमाने में ऐसा कौन होगा जिसको अपना विवाह होना न भावे। अब दोनों तरफ से विवाह की तय्यारी होने लगी। जब अच्छा मुहूर्त आया तो बाजे गाजे के साथ उसका गठबन्धन हो गया। लड़की के बिदाई की शायत शोधकर पुरोहित फिर रामबाई से मिला और उसे कन्या के रुखसती का दिन बतला कर बोला-“बाईजी! मैं चाहता हूँ कि आप जैसी मिजाज की तेज हैं और अपने पति को दबाकर उसपर अपना पूरा प्रभाव जमाये रहती हैं; उसी प्रकार आपकी लड़की आपसे भी बढ़कर हो, तब तो तुम्हारा नाम, नहीं तो सब व्यर्थ होगा।” इतना कहकर पुरोहितजी अपने घर चले गये। रामबाई बड़े चिड़चिड़े मिजाज की औरत थी उसने अपनी लड़की को बुलाकर समझाया-“देखना बेटी! तुम हमारे नाम को कायम रखना; अपने पति को हर समय दबाये रहना, मैं तो अपने पतिको प्रतिदिन दस ही जूते मारती हूँ, तुम पन्द्रह का हिसाब रखना। अगर मेरे कहे अनुसार न चलेगी तो मैं फिर आजन्म तेरा मुख नहीं देखूँगी।” क्रमशः लड़की के बिदाई की घड़ी भी आ पहुँची। रामबाई ने अपने पति को उसे ससुराल पहुँचाने के लिये
१६४ अकबर बीरबल विनोद
१६४ अकबर बीरबल विनोद भेजा। लड़की को घर आते ही बीरबल ने अपना रुख ऐसा बनाया कि वह कन्या बीरबल के सामने गाय की तरह काँपने लगी। इधर बीरबल ने अपने बनावटी भाई को भी उससे चिड़चिड़ा बनकर रहने की सीख पहले से ही दे रक्खी थी। इन दोनों के चिड़चिड़ेपन को देखकर बिचारी कन्या का जूता जड़नेका भाव काफूर होगया और डरके कारण अपने माँ के दिये जूते को एक कोनेमें गुप्त रीति से छिपा कर रख दिया। बीरबल ने लड़की के बाप यानी अपने ससुर को कुछ दिन वहीं ठहरने का आग्रह किया जिस कारण वह कुछ दिनों के लिये वहीं रुक गया। बीरबलने देखा कि अब यहाँ तो सफलता मिल गई, दूसरी तरफ भी हाथ साफ करना चाहिये। एक दिन अपने भाई के श्वसुर विटोकड़ा विष्णु से वार्तालाप करता हुआ प्रेम से गदगद होकर उनके पीठ पर हाथ फेरने लगा। पीठ में गढ़े तो पड़े ही थे, उसने द्रवित होकर पूछा-हैं ! आपकी पीठ में ये गढ़े कैसे हैं?" लड़की का पिता दुखित होकर अपना सारा समाचार कह सुनाया। बीरबलने कहा-"भाई दुख मनाने से दुख न छूटेगा, बल्कि वृवृत्ति के लिये कुछ उपाय करना चाहिये। यदि आप करें तो मैं एक रास्ता बतलाऊँ, उससे आप का दुःख अवश्य छूट जायगा।" उसने बीरबलकी बात मान ली। तब बीरबलने कहा- "आपको मेरे यहाँ लगातार चार महीने रहना पड़ेगा और नित्य सूर्य के सामने मुख कर के इतने दण्डवत करने होंगे कि जिससे आपका शरीर पसीने से तर न हो जाय। वह नित्य
अकबर बीरबल विनोद १६५
अकबर बीरबल विनोद १६५ बीरबल के बतलाये क्रमानुसार सूर्य्य को दण्ड प्रणाम करने लगा । उधर बीरबलने उसके खाने पीने का अच्छा प्रबन्धकर दिया। पौष्टिक पदार्थ खाने को मिलने से चार महीने में वह मुटाकर लड़की का कुन्दा हो गया। तब बीरबल ने लुहार को आर्डर देकर एक सुन्दर डंडा बनवाया, उसमें स्थान २ पर ऐसे लोहे जड़वा दिये कि वह खासा लुहाँगी बन गया। बीरबल उस लुहांगी को उसे देकर बोला- “देखो लोगों के पूछने पर इस लुहांगी को अपना गुरुभाई बतलाना । फिर उसे भलीभाँति शिक्षित कर उसको घर भेज दिया। इधर रामबाई नित्य के जूतों का हिसाब जोड़कर उसका घाटा जोड़ा करती थी। जब उसका पति पाँच महीने में हृष्टपुष्ट होकर आया तो वह देखकर बड़ी प्रसन्न हुई। कहाँ तो बिचारा थकामांदा मंजिल मार कर आया था, कहाँ उसे जूता जमाने की सूझी। वह कुल्टा पतिको जूता खानेके निश्चित स्थान पर ले गई, वह चुप चाप बैठा रहा, परन्तु अपने गुरुभाई यानी लुहाँठी को नहीं भूला। ज्योंही उसकी स्त्री ने उसके सिरपर पहला जूता लगाया कि वह उठकर लुहाँठी को तानकर उसके सिर पर ऐसा जमाया कि उसका सिर भन्नाने लगा-वह बोली-“अरे ! राम राम यह तो मार ली रे।” पति ने थोड़ा अन्तर देकर एक दण्डा और जमाया। अभी तीसरा मारने ही जा रहा था कि इतने ही में अड़ोस पड़ोस के कुछ लोग जमा हो गये और पीछे से उसका हाथ पकड़ लिये। स्त्री डर के कारण काँपने लगी और उसने
१६६ अकबर बीरबल विनोद
१६६ अकबर बीरबल विनोद उठकर !अपने पति से क्षमा प्रार्थना की। वह सदैव के लिये उसकी चेलिन हो गई। बीरबल के द्वेषियों का दिल टूट गया और उसी तारीख से लोगों ने उसका अनिष्ट सोचना छोड़ दिया। ———०*०——— गद्दी पर पाखाना सिंहल द्वीप का बादशाह् दिल्लीधीश्वर से कुछ भीतर २ कुढ़ा करता था। एक दिन उसे नीचा दिखानेके अभिप्राय से एक वेश्या को कुछ सिखला पढ़ाकर दिल्ली भेजा। वह वारांगना महासुन्दरी और नृत्य कला की पूर्ण पण्डिता थी। उसने दिल्ली नगर में पहुँचकर एक बढ़िया मकान सड़क के चौराहे पर किराये में लिया और उसमें नित्य सायंकाल में श्रृङ्गार कर गायन वाद्य किया करती थी। तबला और सारंगी बजाने वाले भी सिंहल द्वीप ही से अपने साथ लायी थी। धीरे २ इसकी शोहरत नागरिकों में फैली। वे उसके पास अधिक संख्या में आने जाने लगे, वह किसी से कुछ नहीं लेती थी बल्कि आगतोंकी बड़ी प्रीतिपूर्वक स्वागत करती थी। इसकी ऐसी प्रतिष्ठा सुनकर बादशाह के कितने दरबारी भी गुप्तरूप से उसके पास आये और उसकी आवभगत और कलावि- शेषता से मुग्ध होकर लौटे। यह बात बड़े तेजी से अमीर गरीबके कानों तक फैल गई। जब बादशाह ने इस नवयौवना वेश्या की प्रशंसा अपने दरबारियों के मुख से सुनी तो उसे भी उसको देखने की इच्छा हुई। वह उसके मकान पर नहीं जा सकता।
अकबर बीरबल विनोद १६७
अकबर बीरबल विनोद १६७ था अतएव उसे अपने यहाँ बुलवाने का निश्चय किया। दूसरे दिन दीवानखाना खूब सजाया गया। उस कमरे में भारतवर्ष की एक से एक सजावट की वस्तुएँ अपने २ करीने से सजाकर रख दी गईं। दरबारियों के बैठने के लिये आसन भी खूब सजाकर लगाया गया। जब इस प्रकार से बादशाह ने अपने यहाँ तय्यारी कर ली तो एक चपरासी द्वारा उस नवागत बारांगणा को बुलावा भेजा। वह भला कब नहीं करने वाली थी यह तो उसकी मनचाही बात थी। उसने बादशाह के दरबार में जाना सहर्ष स्वीकार किया। फिर सायंकाल में खूब सार श्रृङ्गार कर अपने सफरदाइयों को लिये हुये दरबार में दाखिल हुई। उसकी लुनाई से दिल्ली दर्बार रौशन हो गया। बादशाह ने चपरासी भेजकर अपने सब दरबारियों को बुलवाया। वे बादशाह का निमंत्रण पाकर नवीन वेश्या का नृत्य देखने की इच्छा से आये। यह नायका अपने रूप लावण्य और कला कौशल से कितनों को मोहित कर चुकी थी, फिर बादशाह क्यों न मुग्ध होता-“उसने बड़ी निपुणता से लगातार छः सात घण्टों तक नृत्य गान किया। सभी लोग उसकी तारीफ करने लगे। बादशाह ने भी मुक्तकंठ से प्रसंशा की। बादशाह ने अपने मन में अनुमान किया कि यह द्रव्योपार्जन के निमित्त यहाँ आई है इसलिये इसको द्रव्या- भूषण देकर संतुष्ट करना चाहिये। बादशाह दीवान से राय मिलाकर उसके लिये बहुत सी अशर्फियाँ और सुन्दर २ वस्त्र देने के लिये मँगवाया। वह उनको देखकर विनम्रता से बोली-“पृथ्वीनाथ ! मैं यह नृत्य गान आपको गुणग्राही
१६८ अकबर बीरबल विनोद
१६८ अकबर बीरबल विनोद समझकर किया है, मुझे अपना मन प्रसन्न करना अभीष्ठ था, इनाम की चाहना नहीं है।" बादशाहने मनमें सोचा-"शायद इतने पारितोषिकको न्यून समझकर यह संतुष्ट नहीं हुई है अतएव इसे कुछ और धन पाने की लिप्सा है। वह उस वेश्या से बोला-"यदि तुझे और कुछ माँगने की इच्छा हो तो उसे भी माँग सकती हो?" वेश्या ने कहा-"पृथ्वीनाथ ! मुझे केवल एक वस्तु माँगने की इच्छा है, परन्तु आप पहले बचनबद्ध हों तो माँगू।" बाद- शाह कुछ सोंच विचार के बाद बोला-"मेरी घर की निजी वस्तुओं के अतिरिक्त जो कुछ माँगोगी तुझे दिया जायगा। मैं अपनी बात एक बार कहकर फिर लौटाता नहीं हूँ।" वह कुछ देर खामोश रहकर फिर बोलो-"गरीबपरवर ! मैं आपके गद्दी पर पाखाना फिरने की इच्छा रखती हूँ।" उस वेश्या की इस ढिठाई पर सब दरबारी सन्न हो गये। उसने खुल्लमखुल्ला बादशाह का अपमान किया था। बादशाह भीतर २ बड़ा क्रोधित हुआ, परन्तु चूँकि बचनबद्ध हो चुका था इसलिये प्रगट रूप से खामोश रहा। सबको बड़ा सोच हुआ। किसी की अकल काम नहीं करती थी। आखिर बीरबल से राय मिलाई गई। बीरबल ने बादशाह को ढाढ़स दिलाया। वह वेश्या लोगों को फुस-फुस करते देखकर बड़ी प्रसन्न हुई और उसके चेहरे पर हठात् हँसी आने लगी। बीरबल बोला-"इसको बचन दिया जा चुका है इसलिये उसका पालन किया जायगा।" वेश्या बोली-"मैंने पहले ही आपसे आज्ञा प्राप्त करली है तब माँगा है। यदि नहीं
अकबर बीरबल विनोद १६६
अकबर बीरबल विनोद १६६ कर दिया जायगा तो मैं बिना उज्र चली जाऊँगी ।” बीरबल उसे डाँटकर बोला-“ऐ वेश्या ! तुझे ज्ञात होना चाहिये था कि यह दिल्लीधीश्वर का दरबार है और ये जगत विजयी बादशाह हैं; यहाँ पर आकर यह क्या गंदी बात मुँह से निकालती है, यदि तुझे माँगना ही था तो कोई अलभ्य वस्तु माँगती जिससे तू अजाचक हो जाती और तेरी कीर्ति देशदेशान्तर में फैलती।” वह बोली-“दीवान महोदय ! मैंने जिस चीज को आप से माँगा है यदि उसे देना मंजूर हो तब तो देवें नहीं तो इन्कार करें, मैं अपने घर लौट जाऊँगी । आगा पीछा करने से क्या लाभ ? हाँ तो हाँ, नहीं तो नहीं ।” बीरबल ने बादशाह से कहा-“पृथ्वीनाथ ! मैंने इस विदेशी वेश्याको आगा पीछा दिखलाकर बहुत कुछ समझाया, परन्तु वह एक भी मानने को राजी नहीं है, बचन का पालन करना आवश्यक है, नहीं तो संसार में आपकी बड़ी अपकीर्ति फैलेगी। बादशाह ने बीरबल के मत को स्वीकार किया। तब कौल बीरबल ने वेश्या से कहा-“बादशाह की आज्ञा है, तू अपना मनोभिलषित पूर्ण कर ले। यानी गद्दी पर पाखाना कर ले। हाँ एक बात याद रखना कि पाखाना के समय पेशाब न निकले। जो तू इस बात में जरा भी चूकेगी तो तुरत जान से मार डाली जायगी।” अब तो उस भठियारिन के कान खड़े हो गये; कुछ देर तक आगा पीछा करती रही, फिर बादशाह को सलाम कर चुपके से चली गई । उसका काम समाप्त हो गया इसलिये वह अब दिल्ली
१७० \hfill अकबर बीरबल विनोद
१७० \hfill अकबर बीरबल विनोद शहर में टिककर निरर्थक समय खोना अच्छा नहीं समझती थी। डेरे पर पहुँचकर तुरत स्वदेश लौटने की तैयारी कर सिंहलद्वीप चली गई। पहुँचकर दिल्लीधीश्वर के दरबार का सब समाचार यथातथ्य कहकर अपने राजा को सुनाया। वहाँ के लोग बीरबल की बुद्धि की सराहना करने लगे। झख मार रहे हैं एक दिन जमुना किनारे एक मल्लाह मछलियों का शिकार कर रहा था उसी समय बीरबल को लिये दिये बादशाह भी वहीं पर जा पहुँचा “देखा-देखी पाप, देखा-देखी पुन्य।” बादशाह को भी शौक हुआ और वह वहीं बैठकर मछलियाँ मारने लगा। मछली मारते-मारते उसे कोई ऐसा काम स्मरण हो आया कि उससे बीरबल को बेगम के पास भेजना पड़ा। बीरबल हुक्म पाकर बेगम से जा मिला। कुशल भलाई के बाद बेगम ने पूछा-“बादशाह क्या कर रहे हैं?” बीरबल ने कहा-“कर क्या रहे हैं, जमुना जी के किनारे बैठे २ झख मार रहे हैं।” बीरबल के मुख से उपरोक्त उत्तर पाकर बेगम भीतर २ बड़ी नाराज हुई, परन्तु बीरबल से कुछ बोल न सकी। जब रात्रि समय में बादशाह आया तो वह कुपित होकर बोली- “पृथ्वीनाथ! बीरबल को आपने बहुत सिर चढ़ा लिया है जिस कारण वह बड़ा ढीठ होता जा रहा है। वह आपके निस्वत पूछने पर मुझसे कह गया है कि झख मार रहे हैं; आपको उचित है
अकबर बीरबल विनोद १७१
अकबर बीरबल विनोद १७१ कि उसको ऐसा कठोर दण्ड दें ताकि वह फिर ऐसी गुस्ताखी न करे।” यह सुनकर बादशाह को बड़ा विस्मय हुआ और उसी क्षण बीरबल को दण्ड देने का प्रण किया। कुछ समय बाद चपरासी द्वारा बीरबल को बुलवाया। जब वह आया तो बादशाह ने कहा-“बीरबल ! तुम बड़े घमंडी होगये हो?” बीरबल बोला-“पृथ्वीनाथ ! मैं तो अपने को ऐसा अनुमान नहीं करता, परन्तु यदि मुझसे कोई अपराध हुआ हो तो आपको अधिकार है कि मुझे दंड दें।” बादशाह तो बेगम से सब सुनही चुका था। वह बोला-“तुमने बेगम से मेरे निस्बत क्या कहा था, मुझसे झख मरवाते थे, क्या यह सही नहीं है?” बीरबल बाअदब हाथ जोड़कर बोला-“पृथ्वीनाथ ! मेरी गुस्ताखी माफ की जावे तो कहूँ। मेरी जबान में यानी संकृत में मछली को झख कहते हैं और आप उस समय मछली ही मार रहे थे। अतएव मैंने बेगम के पूछने पर आपको झख मारना बतलाया था।” बीरबल के इस उत्तर से बादशाह और बेगम दोनों ही प्रसन्न हो गये और बीरबल को पुरस्कार देकर बिदा किया। काली ही न्यामत है एक दिन सन्ध्या समय बादशाह और बीरबल हवा सेवन के लिये कहीं जा रहे थे। नगर के बाहर जाकर बाद- शाह ने देखा कि एक कुत्ता एक फूली और कई दिन की
१७२ अकबर बीरबल विनोद सड़ी होने के कारण काली पड़ी हुई रोटी को बड़ी चाव से खा रहा है। उसे देख बादशाह को मजाक करने की सूझी और बीरबल को सम्बोधन कर बोला-“देखो बीरबल ! कुत्ता काली को खा रहा है।” बीरबल अपने हाजिर जवाबी के लिये तो विख्यात ही था, वह झट बोला-“पृथ्वीनाथ ! उसे वही न्यामत है।” इसपर बादशाह कुछ चिड़चिड़ा सा गया क्योंकि नियामत उसकी माता का नाम था और काली बीरबल की माता का नाम था। उसने कहा-“बीरबल तुम मेरी माता को कुत्तेको खिला रहा है।” बीरबल ने उत्तर दिया- “क्या आप ने मेरी माता से पहले कुत्तेको नहीं खिलाया था?” बादशाह ने उत्तर दिया-“मैं तुम्हारी माता को नहीं उस काली रोटी के लिये कह रहा था।” बीरबल बोला-“मैं भी तो यही कहा था कि रोटी चाहे कैसी भी सड़ी गली क्यों न हो; परन्तु उसके लिये तो वही नियामत है।” बाद- शाह संतुष्ट हो गया और उस समय से फिर बीरबल से कोई दूसरा मजाक नहीं किया।
और क्या ? कढ़ी एक दिन बीरबल को बिरादरी भोज में जाना था, अतएव वह बादशाह से अवकाश लेकर भोज में शामिल हुआ। जब भोजन करके लौटकर आया तो बादशाह ने उससे पूछा- “क्यों बीरबल ! आज भोज में कौन २ सा पदार्थ खाये हो।” बीरबल ने पहले तो उस जगह की सुन्दरता का वर्णन किया
अकबर बीरबल विनोद १७३
अकबर बीरबल विनोद १७३ फिर भोजन की सामग्री बतलाने लगा। वह क्रमशः सारी चीजों का नाम बतला कर चुप हो गया। बादशाह को इतने पर भी सन्तोष नहीं हुआ इसलिये बीरबल से फिर पूछा- “और क्या था” बीरबल याद कर और दो चार चीजों का नाम बतलाया। परन्तु बात की श्रृंखला न टूटी बीरबल ज्यों-ज्यों अधिक बतलाता बादशाह बराबर और और की धुन बाँधे रहता। हरेच्छा से वह बात अधूरी ही रह गई, बीच में एक ऐसा जरूरी काम आ पड़ा कि दोनों पृथक २ चले गये। कई महीने बाद एक दिन वह बात बादशाह को फिर स्मरण हो आई अतएव बीरबल की याददास्त समझने के लिये बोला-“बीरबल ! और ?” बीरबल ने तत्काल उत्तर दिया- “पृथिवीनाथ ! और क्या, कढ़ी।” बादशाह बीरबल की याददास्त से बड़ा सन्तुष्ट हुआ और उसे तत्क्षण एक सुन्दर मोती की माला प्रदान की। दूसरे सभासद् इस बात को देखकर बड़े चकित हुए, उन लोगों ने अपनी अकल लड़ायी- “हो न हो बादशाह को कढ़ी से बड़ा प्रेम है, तभी तो कढ़ी का नाम लेते ही खुश होकर बीरबल को मोती की माला दी। दूसरे दिन मोती की माला के लालच से दरबारी लोग भी अपने २ घरों से उत्तमोत्तम मट्ठे की कढ़ी बनवा लाये। उनके साथ नौकर भी थे। वे कढ़ी का पात्र सिरों पर लिये हुए खड़े थे। यह दृश्य देखकर बादशाह ने दरबारियों से इस समारोह का कारण पूछा-वे उत्तर दिये-“गरीबपरवर ! आपके लिये हम लोग कढ़ी बनवा कर लाये हैं?” बादशाह उनकी ऐसी मूर्खता पर बहुत चिड़चिड़ा गया और कढ़ी लाने वालों के हाथ
१७४ अकबर बीरबल विनोद
१७४ अकबर बीरबल विनोद और पैरों में बेड़ियाँ जकड़ने की आज्ञा दी। वह बोला- "ये महामूर्ख हैं, केवल नकल करना जानते हैं। बीरबल ने जो कढ़ी का नाम लिया था उसका तात्पर्य दूसरा ही था। बादशाह के क्रोध के सामने सबका छक्का छूट गया और सबों ने एक साथ करबद्ध प्रार्थना कर अपने अपराधों की माफी माँगी। —:*:— माला दे ? एक दिन बीरबल को जमुना नहाने की इच्छा जागृत हुई इसलिये वह तड़के उठकर जमुना जी नहाने गया। स्ना- नोपरान्त एक जगह आसन बिछाकर रुद्राक्ष की माला जपने लगा। उसी समय हवा खोरी से लौटकर घूमता २ घोड़े पर सवार बादशाह भी वहीं जा पहुँचा। वह घोड़े से उतर पड़ा और बीरबल से बोला- "बीरबल ! मुझे मा ला दे।" बीरबल बड़ा लाल बुझकड़ था, वह तुरत ताड़ गया कि बादशाह दुअर्थी कहकर मजाक कर रहे हैं। वह मुँह से तो कुछ न बोला परन्तु उसी समय अपना दुपट्टा नदी के जल में छोड़ दिया-बादशाह यह देखकर फिर बोला- "बीरबल ! देखो दुपट्टा बहता है।" अब बीरबल को औसर मिला वह तुरत बोल उठा-"पृथिवीनाथ ! बहने दो।" बादशाह बीरबल के दुअर्थक उत्तर को समझ कर बड़ा नाराज हुआ और भृकुटी बदलकर बीरबल से पूछा- "क्यों बीर- बल ! तू हँसी हँसी में मेरी बहन माँग रहा है?" बीरबल बोला- "पृथिवीनाथ ! आप भी तो हमारी माँ माँगते हैं।" बादशाह
अकबरबीरबल विनोद १७५
अकबरबीरबल विनोद १७५ जरा नरमा कर फिर बोला- "मैंने तेरी माँ कब माँगी है, क्या मैंने किसी का नाम लिया था ?" बीरबल ने कहा- "गरीबपरवर ! मैंने आपके बहन का नाम कब लिया था और कब उसे माँगा था । मैंने तो आपसे केवल दुपट्टा बहने देने की अर्ज करी थी । आपकी बहन मेरे बहन के समान है। मैं उसका नाम अपनी जबान पर कैसे ला सकता हूँ।" बादशाह को आगे बढ़ने का कोई मार्ग नहीं मिला अतएव खामोश रह गया ।
भाग्य बड़ी है कि उद्योग एक दिन बादशाह ने अपने दरबारियों से भरी सभा में पूछा- "भाग्य बड़ी है कि उद्योग।" सब दरबारियों ने एक मत होकर बतलाया- "पृथिवीनाथ ! उद्योग बड़ा है ?" परन्तु बीरबल की राय सबसे भिन्न थी। वह अपनी तरफ से अकेला होकर बोला- "महाराज ! मेरी सम्मति से भाग्य बड़ी है।" बादशाह ने बीरबल से पूछा- "यदि उद्योग न किया जाय तो भाग्य क्या कर सकती है, भला उस मनुष्य को जो भाग्य के भरोसे बैठ रहे, कभी खाना नसीब हो सकता है ?" बीरबल ने उत्तर दिया- "चाहे कोई कितना ही उद्योग क्यों न करे, परन्तु जो बात उसके भाग्य में लिखी न होगी, कदापि नहीं मिल सकती। यह सब देखते हुए भाग्य को ही प्रधानता मिलनी चाहिये ।" एक दरबारी को बीरबल की यह दलील बहुत खटकी
जब बीरबल को भाग्य की प्रधानता मालूम है तो
[Header] १७६ अकवर बीरबल बिनोद
और वह बादशाह से निवेदन कर बोला-“पृथिवीनाथ! जब बीरबल को भाग्य की प्रधानता मालूम है तो इसका कोई सबूत भी होगा। बादशाह ने झट बीरबल से पूछा-“हाँ बीरबल ! इस बात का कोई सबूत दो ।” बीरबल बोला-“पृथिवीनाथ ! यह कोई ऐसी वैसी बात नहीं है जो कोई गाँठ में बाँधे फिर रहा हो और तुरत खोलकर दिखला दे, आपकी ऐसी ही इच्छा है तो कुछ दिनों में सिद्ध कर के दिखला दूँगा ।” उस दिन का कार्य्य समाप्त हुआ और लोग अपने २ घर गये । एक दिन बादशाह को जमुना में सैर करने की इच्छा हुई अतएव कुछ दरबारियों को साथ ले एक खास नौका पर बैठकर यमुनाजी में जल विहार करने लगा-बीच दरिया में पहुँच कर फिर उसे भाग्य और उद्योगवाली बात स्मरण हो आई, उसने बीरबल से कहा-“क्यों बीरबल! अभी तुम्हारा दिमाग ठिकाने आया की नहीं-“बोलो उद्योग को प्रारब्ध से प्रधान मानते हो वा नहीं ?” इस बार भी बीरबल ने पहले ही सा उत्तर दिया । बीरबल की इस हठधर्मी पर बादशाह चिढ़ गया और तत्क्षण अपने हाथ की अँगूठी निकालकर जमुना जलके मध्य में छोड़ दिया और बोला-“अच्छा बीरबल ! यदि अपनी भाग्य की प्रधानता से तू एक मास के अन्तरगत यह अँगूठी मुझे न मिला सकेगा तो तेरी गर्दन उड़ा दी जायगी ।” बादशाह के उस आकस्मिक कोप से सब लोग थर्रा गये । सब लोगों ने देखा कि यहाँ पर जमुना जी का जल बहुत गहरा है। यहाँ से अँगूठी का मिलना असम्भव हो
१७७ अकबर बीरबल विनोद
१७७ अकबर बीरबल विनोद नहीं बल्कि नितान्त असम्भव है। अब बीरबल की जान नहीं बच सकती, परन्तु बीरबल ने कुछ जवाब नहीं दिया । वह चुपचाप बैठा रहा । नाव किनारे पर आ लगी । घर लौटते समय बादशाह ने उस जगह अपने सिपाहियों की पहरा चौकी बाँध दी ताकि बीरबल किसी प्रकार उस अँगूठी को जल से बाहर न निकाल सके । बीरबल प्रारब्ध के भरोसे चुप्पी साधकर बैठा रहा। जब सत्ताइस दिन व्यतीय हो गये तो बादशाह ने बीरबल से पूछा-“ क्यों बीरबल अँगूठी मिली ?' बीरबल ने इन्कार किया। तब बादशाह ने कहा--“देखो बीरबल ! अब भी उद्योग की प्रधानता स्वीकार करलो मैं तुम्हें माफी दे दूँगा।” बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथ्वीनाथ ! भाग्य के सामने उद्योग नहीं टिक सकता, मशल मशहूर है-“घड़ी में घर जले नौ घड़ी भद्रा ।” अभी तीन दिन का समय और है इतने में तो कितना उलट फेर हो सकता है।” बादशाह के क्रोध रूपी अग्नि में और भी आहुति पड़ गई, वह एक दम क्रोधित हो गये । जब अवधि का दिन बीत गया तो चौथे दिन फिर बादशाहने बीरबलसे अपनी अँगूठी माँगी । बीरबल ने कहा-“पृथ्वीनाथ ! मेरे भाग्यसे अँगूठी नहीं मिली।” बादशाह क्रोधित होकर बोला- “तबमरने के लिये प्रस्तुत हो जाओ।” बीरबल तो पहले से ही कमर कस चुका था, वह बादशाहके सामने निर्भय खड़ा हो गया । उसकी मुस्कें कसकर बाँध दी गईं । बीरबल की दशापर बादशाह को फिर तरस आ गई और बोले-“बीरबल ! अब भी मौक़ा है, तुम उद्योग की प्रधानता स्वीकार कर लो, मैं तुम्हें १२
[Page Header: अकबर बीरबल विनोद १७८]
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माफ कर दूँगा।” बीरबल ने उत्तर दिया-“गरीबपरवर ! मरते को मारना अच्छा नहीं, आप तुरत मुझे मारे जाने की आज्ञा दीजिये।” बादशाह ने कहा-अच्छी बात है, तब तो आगे ही आ रहा है।” बादशाहने वधिक को बीरबल को फाँसीघर ले जाने की आज्ञा दी। वह घर मकान के चौक के पास ही बना हुआ था। बीरबल की यह दशा देख समस्त प्रजा घबड़ा उठी क्योंकि बीर- बल।के समय में सबको रामराज्य था। न राजा का जुल्म प्रजा पर चलने पाता था और न प्रजा का राजा पर। सबके चेहरे पर मुरदनी छा गई। बीरबल के घर वाले भी चुपचाप मलीन मुख किये सब कार्य कलाप देख रहे थे, वे अब अपना धैर्य कायम न रख सकें और सबके सब सुसक सुसक कर रोने लगे। बीरबल फाँसी के तख्ते पर चढ़ाया गया। नियम के अनुसार वधिकों ने बीरबल से पूछा-“आप की अन्तिम इच्छा क्या है, उसको पूरी करने के लिये दस मिनट का समय और दिया जाता है। बीरबल अभी कुछ कहने भी नहीं पाया था कि एक फकीर प्रगट हुए। उनको आते किसी ने नहीं देखा था जिससे ऐसा प्रतीत हुआ मानो जमीन को फाड़ कर प्रगट हुए हों। फकीर ने कहा-“बीरबल ! यह तुम्हारे फाँसी का समय है अतएव मरने से पहले एक पुण्य कर्म करता जा। यह सबेरे सबेरे का समय है और मुझे भूख बहुत लगी है इससे तू मेरे भोजन का प्रबन्ध कर। इससे बढ़कर दूसरा दान नहीं है, सा सदा ऐसे लोग कहते आये हैं। मैं मछली खाना चाहता हूँ, इसलिये एक अच्छी मछली पका कर खिला
अकबर बीरबल विनोद
१७६ अकबर बीरबल विनोद और मुझ क्षुधित का आशीर्वाद ले ।” बीरबल बड़ी असमंजस में पड़ गया एक तो मरण काल दूसरे फकीर की याचना सो भी मछली । वह बोला—“शाह साहब ! आपको ज्ञात होना चाहिये कि मैं एक कुलीन ब्राह्मण हूँ; हमलोग अपने चौके में मछली माँस का प्रयोग नहीं करते फिर आपको क्योंकर खिलाऊँ ।” फकीर बोला-“यह सब सही है, परन्तु यदि तू इस मरणकाल में मेरी क्षुधा मिटायेगा तो इस पुण्य से तेरा बालबच्चों के सहित कल्याण होगा । वहाँ पर उस समय जितने लोग एकत्रित थे सभी ने बीरबल से फकीर की इच्छा पूर्ति का अनुरोध किया । कुछ काल तो योंही बात चीत में टल गया अन्त में मत विशेषता के कारण बीरबल को अपनी जिद्द छोड़नी पड़ी । एक आदमी बाजार जाकर एक मल्लाह से एक खूब मोटी और बड़ी मछली खरीद लाया । जब उस मछली को बीरबल छूड़ी लेकर चीरने बैठा तो उसके पेट में कोई ठोस चीज दिखाई पड़ी, उसका संपूर्ण पेट काटते ही बादशाह की वह जलमें फेकी हुई अँगूठी बाहर निकल आई । बादशाह अपनी खिरकी से गरदन निकाल कर बीरबल की फाँसी का दृश्य देख रहा था । उसने देखा कि बीरबल एक मछली फाड़ रहा है, परन्तु उसके और उस फकीर के अन्तर्गत क्या क्या बातें हुईं इसका उसे कुछ भी गम न था । बीरबल उस अँगूठी को हाथ में लेकर खड़ा हो गया और शाह साहब को देखने लगा । वे उसके खड़ा होने से पहले ही अन्तर्ध्यान हो गये थे ।
अकबर बीरबल विनोद १८०
अकबर बीरबल विनोद १८० बीरबल ने एकत्रित मंडली से कहा-“आप लोगों की अनुमति प्राप्त कर मैं एक बार पुनः बादशाह से मिलना चाहता हूँ, कृपाकर मुझे फिर बादशाह के समीप ले चलें। उन लोगों ने मछली का पेट फाड़ते समय कुछ निकलते हुये अवश्य देखा था पर क्या निकला सो कोई नहीं जानता था। वे बड़ी प्रसन्नता से कर्मचारियों के सहारे बीरबल को बादशाह के पास ले गये। बीरबल को अपने समीप आते हुये देखकर बादशाह ने अनुमान किया-“हो न हो बीरबल डरकर अब उद्योग की प्रधानता स्वीकार करने के लिये मेरे पास आ रहा हो परन्तु अब मैं अपनी आज्ञा भंग न करूँगा। इसी लिये इसके पहले ही मैंने उसे कई बार मौका दिया था, परन्तु उस समय उसने मेरी बातों पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया।” बीरबल पास पहुँचकर बादशाह को सलाम किया। तब बादशाहने कहा-“बीरबल ! अब तुम्हारा प्रयास करना वृथा है, इस समय चाहे तुम उद्योग की प्रधानता मान भी लो परन्तु मैं अपनी आज्ञा रद्द नहीं करूँगा। बीरबलने कहा-“प्रभु ! जरा पहले मेरी बातें सुन लें; मैं उद्योग की प्रधानता मानने नहीं आया हूँ।” बादशाह ने कहा-“अच्छा कहो।” तब बीरबल बोला-“आपकी अँगूठी देने आया हूँ इसे पहन लीजिये।” बादशाह ने उसे हाथ में लेकर देखा तो सचमुच वही राज मुहर वाली अँगूठी थी। उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि वे उसे जमुना के अगाध जल में फेंक आये थे। कई बार खूब उलट पलट कर देखा जब उसके निस्वत कुछ
१८१ अकबर बीरबल विनोद
१८१ अकबर बीरबल विनोद सन्देह न रहा तो बोले-“बीरबल यह अँगूठी कैसे प्राप्त हुई?” बीरबल ने जवाब दिया-“गरीबपरवर ! मेरा प्रारब्ध घसीट लाया है। तब उसके मिलने का सब किस्सा बीरबलने बादशाह को सुनाया। बादशाह बीरबल से बहुत प्रसन्न हुए और दस हजार मुहरें, एक सुन्दर वस्त्र तथा कई बाहन पुरस्कार में दिये। उसके घर वालों को भी सुन्दर २ वस्त्र दिये गये। उप- स्थित जनता के सहित बादशाह ने प्रसन्नता से प्रारब्ध की प्रबलता स्वीकार कर ली। ─━o:*:o━─ बादशाह और कवि गंग एक दिन बादशाह जनाने महल में गाना सुन रहे थे, उसके कुटुम्ब की सारी स्त्रियाँ उपस्थित थीं। वहाँ पर सिवा बादशाह के दूसरा कोई मर्द नहीं था। यह जुमावड़ा बादशाह की बेगमों के मत से हुआ था। उनका विचार था कि बादशाह प्रेम में फाँसकर कुछ दिनों तक महल में रक्खे जायें। उनका उद्योग भी कुछ २ सफल होते दिखलाई पड़ा, बादशाह उनके प्रेम में फँस गये। एक बेगम जिसका कोकिल कंठा नाम था, सब के अन्त में एक वियोग मिश्रित गजल गाना शुरू किया। उसकी ऐसी दीनता भरी गजल से बादशाह पिघल गये और उससे पूछे “इस गाने से तुम्हारा क्या तात्पर्य है ?” बेगम ने कहा- “प्रभु आपका अधिकतर समय लड़ाई ही में बीतता है और यहाँ हम घर में पड़ी २ आपके वियोग की एक एक
अकबर बीरबल विनोद १८२
अकबर बीरबल विनोद १८२ घड़ियों को वर्ष के समान काटती हैं। प्रभु क्या यह अनुचित नहीं है? मैं अपने हृदय की गवाही अपने मुख से कहाँ तक दें, उसे या तो हमारा मन या अन्तर्यामी ईश्वर ही जान सकता है। क्या आप बतलाने की कृपा करेंगे कि इस समय आप कितने समय के बाद लड़ाई से फुरसत पाकर महल में आये हुए हैं?" अब यदि न्याय की दृष्टि से देखें तो आपको हमें छोड़कर जाना उचित नहीं है। बादशाह ने कहा- "बेगम साहिबा! आप समझती हैं कि मैं एक लड़ाई ही के काम से बाहर रह जाता हूँ परन्तु दर- असल ऐसा नहीं होता, लड़ाई में तो कभी २ जाने का मौका लगता है। जो मैं अपनी प्रजाओं की देखरेख न करूँ तो भला इतना बड़ा साम्राज्य कभी टिक सकता है, मेरी अपकीर्ति संसार में फैल जावे। दो चार दिनों की तो तुम्हारी प्रार्थ- नाएँ भले ही स्वीकृत की जा सकती हैं। परन्तु एक साल, वा छ मास की गुंजायश नहीं है। मेरी अयोग सेवाओं से चिढ़कर मेरे सरदार और शाहजादे मुझ से गदर मचा सकते हैं, फिर मैं कितनी कठिनाई में पड़ जाऊँगा; क्या कभी इसपर भी विचार दौड़ाती हो? हाँ इतना भले ही कर सकता हूँ कि जो समय राजकीय कामों से बचाकर शिकार आदि में लगाता हूँ वह तुम्हारे पास ही रहकर बिताऊँगा। अब इससे अधिक और क्या चाहिये।" बादशाह के ऐसे रूखे उत्तर से सकुचाकर बड़ी बेगम साहिबा ने कहा- "प्रभु आप सारी बातें भले ही सही २ कहते हों, परन्तु फिर यह भी विचार करें कि हम घर में रहने वाली बेगमों