भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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[Header] मलखानका बिवाह । १६३ ३७

धन्य सराही त्यहि ठाकुर को तुम सों मिलैं नात समरस्त ॥ क्यहु अभिलाषा कछु बाकीना द्वैगे सबै ज्वान अब पस्त ८१ बातैं सुनिकै ये राजा की आल्हा हुकुम दीन फर्माय ॥ बारह ठाकुर गे मौरिन में तेई फेरि सजे सब भाय ८२ भाला बरछी औ ढालै लै हाथ म लई सबन तलवार ॥ नाई दारी गडुवा लीन्हेनि चलिभे सबै शूर सरदार ८३ मलखे बैठे फिरि पलकी में बाजन सबै रहे लहराय ॥ एकपहर के फिरि अर्सा में राजा भवन पहुंचे जाय ८४ नाई आवा फिरि भीतर सों आल्है शीश नवावा आय ॥ जल्दी चलिये अब भोजनको करिये न देर बनाफरराय ८५ इतना सुनिकै सब क्षत्रिनने अपने कपड़ा धरे उतार ॥ ढालैं धरिकै गैंड़ावाली हाथ म लई नाँगि तलवार ८६ तब गजराजा कह आल्हा सों ठाकुर मोहबे के सरदार ॥ हमरे कुलकी यह रीती ना भोजन करत गहै हथियार ८७ एकरीति नहिं सब देशन में अपने कुला कुला व्यवहार ॥ बातैं सुनिकै ये राजा की सबहिन धराफेरि हथियार ८८ चलिकै ठाकुर गे चौका में पीढ़न उपर बैठिगे जाय ॥ षटरस व्यंजन सब परसेगे उत्तम भातगयो फिरिआय ८९ लक्ष्मी बोलत परलै द्वैगै आये सबै शूर समुदाय ॥ जान न पावैं मुहबेवाले सबका कटा देव करवाय ९० बातें सुनिकै गजराजा की आल्हा गये सनाकाखाय ॥ गडुवा लैंकै ऊदन ठाढ़े मलखे पाटा लीन उठाय ९१ बड़ी मारु भै फिरि चौका में अद्भुत समर कहा ना जाय ॥ पाटा लागै ज्यहि ठाकुर के घुर्मित गिरै मूर्च्छा खाय ९२