आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ आल्हखण्ड । १६२ ब्रह्मा सूरज दोऊ ठाकुर रणमाँ घोर कीन घमसान ॥ बड़ा लड़ैया गजराजा यहु नाहर समरधनी मैदान ६६ कांतामलहू आँगन लडिकै अपने तजी प्राण की आश ॥ सातसै क्षत्री आँगन लड़िकै तुरतै भये तहाँपर नाश ७० कांतामल औ फिरि सूरज की आल्हा मुशकें लीन बँधाय ॥ कठिन लड़ाई भै माड़ोतर सातो भाँवरि लीन डराय ७१ तब गजराजा पाँयन परिकै सब को बार बार शिरनाय ॥ हारि देखिकै अपने दिशिकी कन्यादान दीनाफिरिआय ७२ ऊदन बोले फिरि राजा ते मानों कही बिसेनेराय ॥ आल्हा गर्जी हैं दायज के मलखेदुलहिनिकोललचायँ७३ भातके गर्जी हम सब ठाकुर सो अब बेगि होय तय्यार ॥ छोरिकै मुशकें दोउ पुत्रन की चलिभे मोहबे के सरदार ७४ ई सब पहुंचे जनवासे में माहिल तुरत भयो तैयार ॥ आयके पहुंच्यो सुन्नागढ़ माँ राजै कीन्हो रामजुहार ७५ राजा बोले तब माहिल ते ठाकुर उरई के सरदार ॥ बड़े लड़ैया मुहवे वाले नाहर कठिन करें तलवार ७६ माहिल बोले तब राजा ते मानों कही बिसेनेराय ॥ भातखान को अब बुलवावो चौका मूड लेउ कटवाय ७७ यह मन भाई महराजा के लाग्यो भात होन तय्यार ॥ विदा माँगिकै महराजा ते चलिभा उरई का सरदार ७८ राजा चलिभे जनवासे में आल्हा पास पहुँचे जाय। त्यार भातहै मोरे महलन में जल्दी चलो बनाफरराय ७९ कहा मानिकै हम लुम्बनको तुमन सरिस कीन सब काम ॥ तुम सों दूजी अब राखै ना सोऊ जान रहे श्रीराम ८०