आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
३६ आल्हखण्ड । १६२ ब्रह्मा सूरज दोऊ ठाकुर रणमाँ घोर कीन घमसान ॥ बड़ा लड़ैया गजराजा यहु नाहर समरधनी मैदान ६६ कांतामलहू आँगन लडिकै अपने तजी प्राण की आश ॥ सातसै क्षत्री आँगन लड़िकै तुरतै भये तहाँपर नाश ७० कांतामल औ फिरि सूरज की आल्हा मुशकें लीन बँधाय ॥ कठिन लड़ाई भै माड़ोतर सातो भाँवरि लीन डराय ७१ तब गजराजा पाँयन परिकै सब को बार बार शिरनाय ॥ हारि देखिकै अपने दिशिकी कन्यादान दीनाफिरिआय ७२ ऊदन बोले फिरि राजा ते मानों कही बिसेनेराय ॥ आल्हा गर्जी हैं दायज के मलखेदुलहिनिकोललचायँ७३ भातके गर्जी हम सब ठाकुर सो अब बेगि होय तय्यार ॥ छोरिकै मुशकें दोउ पुत्रन की चलिभे मोहबे के सरदार ७४ ई सब पहुंचे जनवासे में माहिल तुरत भयो तैयार ॥ आयके पहुंच्यो सुन्नागढ़ माँ राजै कीन्हो रामजुहार ७५ राजा बोले तब माहिल ते ठाकुर उरई के सरदार ॥ बड़े लड़ैया मुहवे वाले नाहर कठिन करें तलवार ७६ माहिल बोले तब राजा ते मानों कही बिसेनेराय ॥ भातखान को अब बुलवावो चौका मूड लेउ कटवाय ७७ यह मन भाई महराजा के लाग्यो भात होन तय्यार ॥ विदा माँगिकै महराजा ते चलिभा उरई का सरदार ७८ राजा चलिभे जनवासे में आल्हा पास पहुँचे जाय। त्यार भातहै मोरे महलन में जल्दी चलो बनाफरराय ७९ कहा मानिकै हम लुम्बनको तुमन सरिस कीन सब काम ॥ तुम सों दूजी अब राखै ना सोऊ जान रहे श्रीराम ८०
[Header] मलखानका बिवाह । १६३ ३७
धन्य सराही त्यहि ठाकुर को तुम सों मिलैं नात समरस्त ॥ क्यहु अभिलाषा कछु बाकीना द्वैगे सबै ज्वान अब पस्त ८१ बातैं सुनिकै ये राजा की आल्हा हुकुम दीन फर्माय ॥ बारह ठाकुर गे मौरिन में तेई फेरि सजे सब भाय ८२ भाला बरछी औ ढालै लै हाथ म लई सबन तलवार ॥ नाई दारी गडुवा लीन्हेनि चलिभे सबै शूर सरदार ८३ मलखे बैठे फिरि पलकी में बाजन सबै रहे लहराय ॥ एकपहर के फिरि अर्सा में राजा भवन पहुंचे जाय ८४ नाई आवा फिरि भीतर सों आल्है शीश नवावा आय ॥ जल्दी चलिये अब भोजनको करिये न देर बनाफरराय ८५ इतना सुनिकै सब क्षत्रिनने अपने कपड़ा धरे उतार ॥ ढालैं धरिकै गैंड़ावाली हाथ म लई नाँगि तलवार ८६ तब गजराजा कह आल्हा सों ठाकुर मोहबे के सरदार ॥ हमरे कुलकी यह रीती ना भोजन करत गहै हथियार ८७ एकरीति नहिं सब देशन में अपने कुला कुला व्यवहार ॥ बातैं सुनिकै ये राजा की सबहिन धराफेरि हथियार ८८ चलिकै ठाकुर गे चौका में पीढ़न उपर बैठिगे जाय ॥ षटरस व्यंजन सब परसेगे उत्तम भातगयो फिरिआय ८९ लक्ष्मी बोलत परलै द्वैगै आये सबै शूर समुदाय ॥ जान न पावैं मुहबेवाले सबका कटा देव करवाय ९० बातें सुनिकै गजराजा की आल्हा गये सनाकाखाय ॥ गडुवा लैंकै ऊदन ठाढ़े मलखे पाटा लीन उठाय ९१ बड़ी मारु भै फिरि चौका में अद्भुत समर कहा ना जाय ॥ पाटा लागै ज्यहि ठाकुर के घुर्मित गिरै मूर्च्छा खाय ९२
३८ आल्हखण्ड । १६४ को गति बर्णै तहँ ऊदन की गडुवन मारि कीन खरिहान ॥ लाखनि ब्रह्मा के मुर्चा में सम्मुख लड़ै न एकोजवान ६३ कांतामल औ सूरज ठाकुर दोऊ हाथ करैं तलवार ॥ बड़े लड़ैया मोहबे वाले ठाकुर समरधनी सरदार ६४ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ मारे मारे तलवारिन के चौका बही रक्तकी धार ६५ जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिडोरै गाय ॥ तैसे ठाकुर मोहबे वाले मारिकैदीन्हों समरसोवाय ६६ बहुतक जूझे भुन्नागढ़ के रानी राजै लीन बुलाय ॥ रानी बोली फिरि राजा सों मानों कही त्रिसैनेराय ६७ बड़े लड़ैया मोहबे वाले ओ महाराजा बात बनाय ॥ लड़िकैजिनिहौनहिंआल्हा सों तुम करि थाके सबै उपाय ६८ कहा न मानो तुम माहिल को नहिं सब जैहैं काम नशाय ॥ हँसी खुशी सों बेटी पठवो याहि में भला परै दिखराय ६६ बातें सुनिके ये रानी की राजा समर पहुँचा आय ॥ भुजा उठाये फिरि बोलत भा अबहीं मारु बन्द है जाय १०० मारु बन्द भै दोऊ दिशिसों राजा बोला वचन सुनाय ॥ बिदा करावो अब बेटी को नहिं कछु देर बनाफरराय १०१ बातें सुनिकै गजराजा की द्वारेगये बराती आय ॥ कपड़ा पहिरे अपने अपने सीताराम चरण मनध्याय १०२ हुकुम लगायो हाँ गजराजा बेटी बेगि होय तय्यार ॥ हुकुम पायकै गजराजा को सोलह करनलागि श्रृंगार १०३ सवैया ॥ मज्जेन चीर ओ कुण्डैल अंजन नाक में मोक्तिक बेसे सवाँरी ।
मलखानका विवाह । १६५ ३६
कंचुकि औ क्षुद्रावलि कंकण कुसुमित अम्बर चन्दन धारी ॥ खायकै पाने औ धारिमैंनैनको हौर औ नूपुरैंकी झनकारी । सेंदुरै भाल बिशाललखे ललिते मनलज्जित मन्मथनारी १०४ ग्वरिग्वरिबहियाँ हरिहरिचुरियाँ सो मनिहारिनि दी पहिराय ॥ पहिरि मुँदरियाँ अठो अँगुरियाँ ऊपर छल्ला लये दबाय १०५ पहिरि आरसी ली अँगुठा में सीसा उपर तासु के भाय ॥ अगे अगेला पिछे पछेला बीचम छन्न रही दर्शाय १०६ टाड़ैं पहिरी सोने वाली जोसन पट्टी करैं बहार ॥ दुलरी तिलरी पंचलरीलों तापर परा मोतियन हार १०७ नथुनी लटकन की शोभाअति कानन करनफूल शृङ्गार ॥ गैरे गुज्भी ढउकानन में बँदियाँ मस्तक करै वहार १०८ बिछिया पहिरी पद अँगुरिन में अनवट सखी दीन पहिराय ॥ कड़ाके ऊपर छड़ा बिराजै तापर पायजेब लहराय १०६ लहँगा पहिरयो कीनखाब को चादर ओढ़िलीन फिरिभाय ॥ जैसे बादल बिजुली चमकै तसगजमोतिनिपरै दिखाय ११० तहिले राजा फिरि आवत भे औ रानी सों कह्यो सुनाय ॥ बिदा कि बिरिया अब आई है जल्दी बेटी देउ पठाय १११ सुनिकै बातें ये राजा की रानी बेटी लीन बुलाय ॥ सीतामाता अनुसूया की सबियाँकथाकहीसमुझाय ११२ कहा न मानै जो पूरुष को नारी घोर नर्क को जाय ॥ चोर कुकर्मी जो पतिहोवै सेवा किहे नारि तरिजाय ११३ विनापराधे नारी त्यागै सो पति मरै भूखके घाय ॥ ऐसे कहिकै गजमोतिनि सों माता रोई हृदय लगाय ११४
४० आल्हखण्ड । १६६ मिला भेट करि सब काहू सों फुलियामालिनिलीनबुलाय ॥ बहुधनदीन्ह्यो फिरिफुलियाको रोवत चढ़ी पालकीजाय ११५ बड़ी खुशहाली आल्हा कीन्ह्यो बहुधन द्वारे दीन लुटाय ॥ विदा मांगिकै गजराजा सों लश्कर कूच दीनकरवाय ११६ सात रोज को धावा करिकै पहुँचे नगर मोहोवा जाय ॥ सखियाँ मंगल गावन लागीं परछन भई द्वारपर आय ११७ विदा मांगिकै न्यवतहरी सब निज निज देशगये हर्षाय ॥ चील्ह रूप धरि सुनवाँ आई मल्हनाखुशीभई अधिकाय ११८ देवलि बिरमा त्यहि औसर में फूली अंग न सकैं समाय ॥ को गति बर्णै परिमालिक की मानों इन्द्रलोक गे पाय ११९ पिता आपने की दाया सों मलखे ब्याह गयौ सब गाय ॥ नही भरोसा निज भुजबलका किरपाशंकर करैं सहाय १२० आशिर्वाद देऊँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो होतो ना ललितेकहतकौनविधिगाय १२१ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललितेके तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १२२ इष्ट देवना मम एकै हैं पूरण ब्रह्म राम भगवन्त । चरणकमल तिन धरि हिरदे में ह्याँसों करौं तरंग को अन्त १२३ इति श्रीलखनऊ निवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुध कृपाशंकरसूनु पं० ललिताप्रसादकृत मलखेपाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः ॥ ३ ॥ मलखे विवाहसमाप्त ॥ इति ॥
अथ आल्हखण्ड ॥ ब्रह्माका विवाह अथवा दिल्लीकी लड़ाई ॥ सवैया ॥ हैकर दीन गह्यों तुमको रघुनाथ करो अबतो रखवारी । पायके शाप पषाण भई मुनिनारि दयालु दियो तुम तारी ॥ हा राम कह्यो यवनो यकबार गयो तब धामहि वेगि खरारी । दीन पुकार करै ललिते प्रभु चूक क्षमो रघुनाथ हमारी १ सुमिरन ॥ पहिले सुमिरों पद गणेश के गौरा पारवती के बाल ॥ हाथी आनन सम आनन है सेंदुर सदा विराजै भाल १ बड़ी पियारी जिन दुर्वा है फूलो बड़े पियारे लाल ॥ भोग लगावै जो लड्डू को तापर खुशी रहें सब काल २ हैं शिवशङ्कर के लरिका ते अरिका करैं सदा जे नाश ॥ विधिवत पूजनजोकोउ कीन्हो पूरी सदा तासुकी आश ३ बड़ो भरोसो तिन गणेश को अपने हृदय करौ सब काल ॥ करो मनोरथ पूरण हमरो गौरा पारवती के लाल ४ छूटि सुमिरनी गै गणेशकै सुनिये बेला केर हवाल ॥
[Header] ३ आल्हखण्ड । १९८ ब्याह बखानौं त्यहि ब्रह्माको ज्यहिका पिता राजा परिमाल ५
[Section Title] अथ कथाप्रसंग ॥
पृथीराज दिल्ली को राजा ज्यहिका जानै सकल जहान ॥ कन्या उपजी जब त्यहिके घर तारा टूटि तैवै असमान १ थर थर थर थर पृथ्वी कांपी दर दर बोले श्वान श्रृगाल ॥ भन् भन् भन् भन् वायू डोलीं अशकुन बहुत भये त्यहिकाल २ अशकुन दीख्यो पृथीराज ने तुरतै पंडित लीन बुलाय ॥ लै कै पोथी ज्योतिष वाली पंडित हाल दीन बतलाय ३ गौना हैहै जब कन्या का हैहै तबै घोर घमसान ॥ बहुतक क्षत्री तब नशिजैहैं झुझिहैं बड़े बड़े ह्याँ ज्वान ४ ताते बेला यहि कन्या का राखो नाम आप महराज ॥ पाय दक्षिणा पंडित चलिभो होवन लागि और फिरिकाज ५ छठी बारहौं पसनी हैगै बेला परो तासु को नाम ॥ सात वरस की जब बेला भइ खेलत फिरै सखिन के धाम ६ कोउ कोउ सखियां तहँ ब्याहीर्थी बेंदी दिये आपने भाल ॥ क्वारी पूछैं तिन ब्याहिन ते सखि तुम कहौ श्वशुरपुर हाल ७ ब्याही बोलीं अनव्याहिन ते मानो सखी बचन तुम साँच ॥ जब सुधि आवत है बालम कै तब उर जरै विरहकी आँच ८ सुरपुर नरपुर अहिपुर माहीं सो सुख नहीं परै दिखराय ॥ जो सुख पावा हम श्वशुरे में बालम छाती लीन लगाय ६ कटिगहि मसरूँ हम नहिंटसरूँ कसकै हृदय किये सुधि आज ॥ का सुख जानो तुम अनुब्याहिउ बैरिनि भई हमारी लाज १० सुनि सुनि बातें ये ब्याहिनकी सब अनब्यही गईं शर्माय ॥ बढ़ी लालसा तब ब्याहे की व्याला घरै पहुंची आय ११
ब्रह्माका विवाह । १६६ ३ खयो मिठाई औ मेवा कछु पलँगा सोय रही फिरिजाय ॥ फिकिरि लगाये सो ब्याहे की एका एकी उठी कन्वाय १२ हम नहिं जैहैं अब श्वशुरे को यह कहि रोय उठी चिल्लाय ॥ रानी अगमा तहँ ठाढ़ी थी तुरतै छाती लीन लगाय १३ धीरज दैके माता पूछे बेटी स्वपन दीख का आज ॥ इतना सुनिकै बेटी बोली माता कहतलगै बड़िलाज १४ माता बोली फिरि बेटी सों बेटी सत्य देउ बतलाय ॥ कैसो स्वपना तुम दीख्यो है हमरे धीर धरा ना जाय १५ सुनिकै बातें ये माता की बेटी कहन लागि त्यहि बार ॥ मोहिं बियाहनजन्तु कोउआयो हाथ म लिये ढाल तलवार १६ फिरि बैठायो मोहिं डोला पर अपने घरे लिये सो जाय ॥ ऐसा दीख्यों जब माता मैं तबहीं रोय उठिउँ चिल्लाय १७ इतना कहिकै बेला चलि भै खेलन लागि सखिन के साथ ॥ महलन आये पिरथी राजा रानी गहाजाय तब हाथ १८ स्वपन बतायो सब बेला को सो सुनि लीन पिथौराराय ॥ ब्याहन लायक अब कन्या है बोली बार बार समुझाय १६ रानी अगमा की बातें सुनि बोले पृथीराज महराज ॥ कहे अधीरज तुम होतीहौ रानी कहा न टारौं आज २० इतना कहिकै पिरथी चलिभे औ दरबार पहुंचे आय ॥ ताहर बेटा को बुलवायो चौंड़ा बाम्हन लीन बुलाय २१ कलम दवाइति कागज लैके चिट्ठी लिखन लाग सरदार ॥ शिरी सरखऊ शिरिपत्री करि पाछे आपन राम जुहार २२ पहिलि लड़ाई है द्वारेपर मड़ये कठिन चली तलवार ॥ खान कलेवा लड़िका आई तबहूँ मूड़ कटावब यार २३
[Header] ३ आल्हखण्ड । २००
इतनी जुरैति ज्याहिके होवै टीका लेय हमारो सोय ॥ नहीं विधाता की मर्जी ना कन्या व्याह और विधिहोय २४ इतना लिखिकै पृथीराज ने नाई बारी लीन बुलाय ॥ साल दुसाला मोतिन माला चीरा कलँगी लीन मँगाय २५ तिरपन पलकी अस्सी गजरथ उम्दा घोड़ा सवाहजार ॥ धरिकै तोड़ा दो मुहरन का अच्छा थार सूवरण क्यार २६ तीनि लाखको टीका दैकै सबको हाल दीन समुझाय ॥ नगर मोहोवे कोउ जायो ना ओछी जाति बनाफरराय २७ चिट्ठी दीन्ह्यो फिरि ताहर को ताहर चलिभे शीश नवाय ॥ नाई बारी चौंड़ा ताहर फाटक पार पहुंचे आय २८ ताहर बैठे दलगंजन पर चौंड़ा एकदन्त असवार ॥ कूच करायो फिरि दिल्ली ते दूनों चलत भये सरदार २६ आठ रोज को धावा करिकै सुन्नागढ़ै पहुंचे जाय ॥ लड़का खारो गजराजा को पाती तुरत दीन पकराय ३० पढ़िकै चिट्ठी गजराजा ने टीका तुरत दीन लौटार ॥ तहँते पहुँचे फिरि वौरीगढ़ जहँपर रहैं यादवा यार ३१ तिनहुन टीका जब लीन्ह्यो ना नरवर फेरि पहुंचे जाय ॥ नरपति राजा नरवरवाला सोऊ टीका दीन फिराय ३२ गंगाधर बूँदी का राजा त्यहि दरबार गये फिरि धाय ॥ चिट्ठी पढ़िकै सोऊ ठाकुर टीका तुरत दीन लौटाय ३३ ताहर बोले फिरि चौंड़ाते दादा कही हमारी मान ॥ चार महीना घूमत द्वैगे अब हम भये बहुत हैरान ३४ जल्दी चलिये अब उरई को जहँपर बसै महिल परिहार ॥ यह मन भाय गई चौंड़ा के हाथी उपर भयो असवार ३५
ब्रह्माका विवाह । २०९ ५ चढ़ि दलगंजन की पीठि पर ताहर नाहर भयो तयार ॥ नाई बारी सँग में लीन्हे पहुँचे माहिल के दरबार ३६ आवत दीख्यो जब ताहर को माहिल बहुत गयो घबड़ाय ॥ माहिल बोले फिरि ताहर ते बेटा कुशल देउ बतलाय ३७ ताहर बोले फिरि माहिल ते ठाकुर उरई के सरदार ॥ टीका लाये हम बहिनी का घूमत बिते महीना चार ३८ कुँवर बनावो क्यहु क्षत्री का मोको पूत आपनो जान ॥ माहिल बोले तब ताहर ते मानो कही बीर चौहान ३६ अजयपाल कनउज का राजा राजन मध्य बीर सरदार ॥ ताको लड़का रतीभान भो जाकी जगजाहिर तलवार ४० ताको लड़का लाखनि राना टीका तासु चढ़ावो जाय ॥ इतना सुनिकै ताहर चौंड़ा तुरतै कूचदीन करवाय ४१ जायकै पहुँचे फिरि कनउज में जहँपर भरी लाग दरबार ॥ की गति बरणै चन्देले कै आली खानदान सरदार ४२ ताहर दीख्यो जब जयचँद को तुरतै कीन्ह्यो राम जुहार ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो फिरि जल्दी सों लीन्ह्यो कनउजके सरदार ४३ पढ़िकै चिट्ठी राहुट द्वैगा नैना अग्निबरण भे लाल ॥ लै जाव चिट्ठी कहूँ अनतै को मेरो बड़ो पियारो बाल ४४ ताहर चौंड़ा दूनो जरिकै तुरतै कूच दीन करवाय ॥ पार उतरिकै श्रीयमुना के उरई निकट पहुंचे आय ४५ मलखे ठाकुर त्यहि समया में मारन आयो तहां शिकार ॥ ताहर चौंड़ा मलखे ठाकुर मारग भेंटिगये सरदार ४६ कुशल प्रश्न ताहर सों कहिकै बोला बचन बीर मलखान ॥ कौने मतलब को निकरेहौ नाहर दिल्लीके चौहान ४७
६ आल्हखण्ड । २०२ सुनिकै बातें ई मलखे की ताहर हाल गयो सबगाय ॥ मलखे बोले फिरि ताहर सों लड़का तुम्हें देयँ बतलाय ४८ संग हमारे कछु दूरी तुम औरो चलो बीरचौहान ॥ इतना सुनिकै दूनों चलिभे मोहोबे गये तीनहू ज्वान ४६ ताहर बोले तहँ मलखे ते यहुहै कौन शहर मलखान ॥ मलखे बोले तहँ ताहर सों यहहै नगर मोहोबा ज्वान ५० यहँको राजा परिमालिक है ब्रह्मा लड़का तासु कुँवार ॥ तोरी बहिनी सों त्यहि ब्याहौं साँची बात मानु सरदार ५१ सुनिकै बातें ये मलखे की ताहर बहुत गयो शर्माय ॥ ऐसी बातें का तुम बोले ब्याह न करें बनाफरराय ५२ नहीं आज्ञा दिल्लीपति कै टीका नगर गोहोबे जाय ॥ सरबरि हमरी का नाहीं हैं ठाकुर काह गयो बौराय ५३ सुनिकै बातें ये ताहर की बोला बचन बीर मलखान ॥ धाँसि सिरोही मुँहमें देवों जोफिरि ऐस कहै चौहान ५४ इतनी सुनिकै ताहर ठाकुर पाती तुरत दीन पकराय ॥ मूड़ कटाई सो ब्याहे माँ नाहर जौन पिथौराराय ५५ ताका बाना जग मर्दाना मारै शब्द ताकिकै बान ॥ परै निशाना पूरशब्द पर ता सँग कौन लड़ैया ज्वान ५६ सुनिकै बातें ये ताहर की बोला तुरत बनाफरराय ॥ लड़ै मरैका कछु डर नाहीं यहही धर्म सनातन भाय ५७ रीछ बाँदरन सँग में लैके लङ्का विजय कीन भगवान ॥ ग्वालन बालन सँगमा लैके कंसै हना कृष्ण बलवान ५८ काह हकीकति है दिल्ली कै चलिकै बिल्ली देउँ बनाय ॥ पौर खशभिल्ली दिल्ली जाई किल्ली तुरतै देउँ नवाय ५९
ब्रह्माका बिवाह । २०३ ७ कैसो दिल्ली में गिल्ली सम पिल्ली पूत पिथौरा राय ॥ लिल्ली घोड़िन के चढ़वैया लड़िहैं कौन तहाँपर भाय ६० चौंड़ा बोला तहँ मलखे ते चलिये जहाँ चंदेलोराय ॥ सुनिकै बातें ये चौंड़ा की तीनों अटे महल में जाय ६१ देखिकै सूरति मलखाने कै बोला मोहबे का सरदार ॥ हाल बतावो सब सिरसा को ओ बिरमा के राजकुमार ६२ हाथ जोरिकै मलखे बोले दादा मोहबे के महराज ॥ मनोकामना सब पूरण हैं तुम्हरीकृपा सुफल सबकाज ६३ टीका लाये ये दिल्ली सों मैं ब्रह्माका करों बिवाह ॥ यही कामना यक बाकी है साँची मानु कही नरनाह ६४ पाती दीन्ह्यो मलखाने ने बांचन लाग रजापरिमाल ॥ डसै भुवंगम लहरैं आवैं कहरन लाग तुरत नरपाल ६५ हाथ जोरिकै ऊदन बोले दादा मोहबे के महराज ॥ टेक न टारैं मलखे दादा तासों करे बनी यहु काज ६६ सुनिकै बातें ये ऊदन की बोले तुरत रजापरिमाल ॥ हाल बतावो सब मल्हनाको वाको बड़ो पियारो बाल ६७ मोहिं बुढ़ापा की लाठी है ब्रह्मा बड़ा पियारा मान ॥ नामी राजा दिल्लीवाला ठाकुर समरधनी चौहान ६८ टेक कठिनहै मलखाने कै पूरण यहौ हृदय विश्वाश ॥ जियब न देखें हम काहू कर सबकर होय वहाँपर नाश ६६ पढ़िकै चिट्ठी पृथीराज की हमरे गई करेजे हूक ॥ जानि बूझिकै जस मलखे की ऐसी करै कौन नर चूक ७० सवैया ॥ सुनिकै नृपबैन तबै बलऐन बोले मलखे ललिते अनखाई ।
आल्हाखण्ड । २०४ कउनसो काज अकाज भयो महराज गयउ जहँ लाज गवाँई ॥ सुखको साज समाज करउ रघुराज सदा मम लाज बचाई । घबड़ानको आज न काज कछू हम ब्याहकरैं वछराजदुहाई ७१ सुनिकै बातैं मलखाने की राजा गयो सनाकाखाय । मलखे चलिभे फिरि महलनको मल्हना पास पहुंचे जाय ७२ चिट्ठी पढ़िकै पृथीराज की मलखे हाल दीन बतलाय । सुनिकै चिट्ठी पृथीराज की मल्हनागई तुरत कुँभिलाय ७३ तारा टूटे आसमान में थर थर धरा गई तब हाल । चील्हैं छाईं राजमहल में रोवन लागे श्वान श्रृगाल ७४ मल्हना बोली तब मलखे ते अशकुन बहुत परैं दिखलाय । छारो ब्रह्मा घरमें रहिहै टीका आप देउ लौटाय ७५ सुनिकै बातें ये मल्हना की मलखे बोले वचन रिसाय । ब्याह विधाता यह रचिराखा टीका कौन सकै लौटाय ७६ सदा न फूलै कहुँ वन तोरई माई सदा न सावन होय । सदा जवानी नहिं स्थिरहै माई सदा न वर्षा होय ७७ टीका फेरो जो दिल्ली का माता होउ जगत बदनाम । जातिके ओछे मोहवे वाले यह है देश-देश सरनाम ७८ होय नतैती जो दिल्ली में पूरण होयँ हमारे काम । भुन्ना नैनागढ़ माड़ो में हमपर कृपाकीन सियराम ७९ ये सब अशकुन हैं ताहर को माता कहां ज्ञान गा त्वार । अबै कबूतरी ना बुड्ढी भै ना बल खाय गई तलवार ८० बार जो बाँका जा ब्रह्मा का हमरो मूड़ लियो कटवाय । बातें सुनिकै ये मलखे की मल्हना दीन्ह्यो बाँह गहाय ८१
ब्रह्माका विवाह । २०५ जस मनभावै मलखाने के तैसी करो बनाफरराय ॥ बड़ी खुशीभै मलखाने के फूले अंग न सके समाय ८२ बड़ी प्रशंसाकी मल्हना की मलखे बार बार शिरनाय ॥ शाखा चलिहै महरानी तब ईजति हमरी लियो बचाय ८३ वारु न बांका इनका जैहै ओ महरानी बात बनाय ॥ जहाँ पसीना इनका गिरिहै तहँ मैं देहौं खून बहाय ८४ करो तयारी अब जल्दी सों ताहर टीका देय चढ़ाय ॥ बातें सुनिकै मलखानेकी मल्हना हुकुम दीन फर्माय ८५ बाँदी लीपन चौका लागी छींक्यो एक पुरुषने आय ॥ मल्हना बोली तब मलखे ते अशकुन बहुत परै दिखराय ८६ टीका फेरो तुम दिल्ली का मानो कही बनाफरराय ॥ बातें सुनिकै ये मल्हना की बोला तुरत लहुरवाभाय ८७ टीका फिरिहै जो दिल्ली का होई देश हँसौंवा माय ॥ कीन तयारी जब माड़ो की तबहूं छींक भई थी आय ८८ तबहूं रोंक्यो महरानी तुम माड़ो फते कीन हम जाय ॥ शकुन हमारो फिरि वैसे भा शंका कौन गई मन आय ८६ सुनिकै बातें उदयसिंह की मल्हना ठीक लीन ठहराय ॥ ऊदन मलखे द्वउ मनिहैं ना अब अनहोनी परै दिखाय ६० बड़ा लड़ैया दिल्ली वाला है सब राजन में शिरताज ॥ तुम्ही गोसइयाँ दीनबन्धुहौ स्वामी रामचन्द्र महराज ६१ परो साँकरो अब हमपर है राखन हार तुम्ही रघुराज ॥ हम सुनिराखा है विप्रन सों राख्यो सदा भक्तकी लाज ६२ गौतम नारी को तुम तारा केवट लीन्ह्यो हृदय लगाय ॥ मांस अहारी गृद्धै तारयो भीलिनिदर्श दिखायो जाय ६३
१० आल्हाखण्ड । २०६ सोई दशरथ के रघुरैया नैया तुही लगैया पार ॥ एक पूतकी मैं मैयाहौं ताकी कुशल किह्योकरतार ६४ सुमिरन करिकै रघुनन्दन को मल्हना करनलागि घरकाम ॥ मलखे ठाकुर त्यहिसमया में ताहर वेगि बुलावा धाम ६५ जितने वासी रहें मुहवे के आये सबै नारि नर द्वार ॥ सात सुहागिल त्यहि समयामें गावन लगीं मंगलाचार ६६ बड़ी भीर भै परिमालिक घर कहुँ तिलडरा भूमि ना जांय ॥ चूड़ामणि पण्डित तहँ आयो साइतिं तुरत दीन बतलाय ६७ नव पिचकारी भरिकेशरि रंग मारैं एक एक को धाय ॥ धूरि उड़ाई तहँ अबीर की महलन् गई लालरी छाय ६८ चौक पुराई गजमोतिन सों पीढ़ा तहाँ दीन धरवाय ॥ चौड़ा ताहर दउ ठाढ़े ये ब्रह्मा गये तहाँपर आय ६६ को गनि वरणै परिमालिक कै लोहा छुये सोन ह्वैजाय ॥ पारस पाथर ज्यहिके घरमाँ त्यहिकी द्रव्यसकैको गाय १०० ऊदन बोले तहँ ताहर सों अब तुम टीका देउ चढ़ाय ॥ साँगा गाड़ दइ तब ताहरने औयहबोल्यो भुजा उठाय १०१ साँग उखारैं ब्रह्मा ठाकुर तौ हम टीका देई चढ़ाय ॥ रीति हमारे यह घरकी है साँचे हाल दीन बतलाय १०२ सात तेवा लोहे के नीचे तापर साँग गाड़ि हम दीन ॥ साँग उखारैं ब्रह्मा ठाकुर तौहमब्याहबहिन काकीन१०३ देखि तमाशा बहु ताह रका मल्हना बोली वचन रिसाय ॥ अशकुनकीन्योम्परेमहलन्मां टीका तुरत देउ लौटाय १०४ बिना बियाहे ब्रह्मा रहि हैं तौ नहिं होय हमारी हान ॥ अक्लि तुम्हारी को लैलीन्ही मानौं नहीं कही मलखान १०५
ब्रह्माका बिवाह । २०७ ११ सुनिकै बातें ये मल्हना की ऊदन बोले माथ नवाय ॥ टीका फेरागा दिल्ली का. तौमुँहकौन दिखावाजाय १०६ इतना कहिकै ऊदन ठाकुर तुरतै डारा सांग उखार ॥ ऊदन बोले फिरि ताहर सों नाहर दिल्ली के सरदार १०७ हम तो नौकर परिमालिक के तिन यह डारा सांग उखार ॥ ऐसे नौकर जिनके घरमाँ तिनसे कौन करै तलवार १०८ सुनिकै बातें ये ऊदन की ताहर मनै गयो शर्माय ॥ बीरा दीन्ह्यो ताहर ठाकुर ब्रह्मा बीरागये चबाय १०६ छींक तड़ाका मै सम्मुखमाँ मल्हना रोय उठी घबड़ाय ॥ ब्याह न करिहौं मैं ब्रह्मा का मानो कही बनाफरराय ११० हमैं चाह है नहिं भौरिन कै ना कछु बहू केरि परवाह ॥ इकलौता यहु जीवै जग औ फिरि बनेरहै नरनाह १११ बहुतक अशकुन हम देखे हैं कैसे धरा जाय जिय धीर ॥ पुत्रघाव सों दशरथ मरिगे यासों और कौन जगपीर ११२ भला न देखें यहि ब्याहे में मानो कही वीर मलखान ॥ जो नहिं मानो मलखाने तुम हमरे जाय प्रानपर आन ११३ बातैं सुनिकै ये मल्हना की बोले फेरि बीर मलखान ॥ घरको आवो टीका फेरैं तौसब हँसिहैं देशजहान ११४ बिटिया आहिउ तुम ठाकुर की ठाकुर घरै बियाही माय ॥ नहिं क्यहु बनियाकी महतारी जो मन बारबार पछिताय ११५ हल्दी मिरचा हम बेचैं ना ना हम करैं वाणिज्य व्यापार ॥ हम तो लरिका हैं ठाकुर के औ दिनराति करैं तलवार ११६ धन्य सराहौं हम कुन्ती का आपन दीन्हे पुत्र पठाय ॥ युद्ध मचायो तिन कौरव ते औ यश रहा जगतमें छाय ११७
१२ आल्हखण्ड । २०८ बचे युधिष्ठिर समरभूमि ते पाँचो भाय कृष्ण महराज ॥ मैं ना रहिंगे त्यउ दुनिया माँ रहिगै एक जगतमें लाज ११८ जप तप होतै नहिं कलियुग में ना कछुदान पुण्य अधिकाय ॥ जो मरिजावैं समरभूमि में पावैं स्वर्गलोक को माय ११९ इतना कहिकै मलखे ठाकुर टीका तुरत दीन चढ़वाय ॥ चारो नेगिन को बुलवायो भूषण वस्त्र दीन पहिराय १२० बहुधन दीन्ह्यो फिरि चौंड़ा को अपने हाथ बनाफरराय ॥ चूड़ामणि पंडित ते बोल्यो अबतुम लगन देउ बतलाय १२१ सुनिकै बातें मलखाने की पंडित बोला लगन विचार ॥ माघ महीना कृष्ण पक्ष में तेरसि तिथी शुक्रको बार १२२ नीकी साइति मलखाने है सो हम तुमका दीन बताय ॥ सुनिकै बातें ये पंडित की औ ताहरको दीन सुनाय १२३ यादि राखियो यह दिन भाई दिल्ही ब्याहकरब हम आय ॥ बातें सुनिकै ये मलखे की ताहर चलिभेशीशनवाय १२४ दर्गी सलामैं सौ तोपन की धुवना रहा सरग मड़राय ॥ अद्भुत शोभा भै मोहबे के घर घर ढोलक परै सुनाय १२५ चलै पिचका कहूँ केशरि के कहूँकहूँ अबिरगुलाल उड़ाय ॥ पान मोहोबे के जग जाहिर लाली पीकैं परै दिखाय १२६ कहूँ कहूँ छैला गैला ठाढ़े बेला हार परैं दिखराय ॥ कहूँ चमेला के तेला को रहे अलबेला जुलुफलगाय १२७ कहूँ कहूँ हेला मेला कैकै बुलबुल बुलबुल रहे लड़ाय ॥ उड़ै तमाखू कहूँ हुकन में गुड़गुड़गुड़गुड़रहेमचाय १२८ मारु मारुकै मोहरि बाजै कहूँ कहूँ हाव हाव करनाल ॥ तहूँ पँतरह बालक बदलैं कहूँकहूँ लड़ैंमल्ल जसकाल १२६
ब्रह्माका विवाह । २०६ १३ पटा बनेटी बाना कहूँ कहूँ कहूँकहूँ गदका को घमसान ॥ बाढ़ि घरावैं कहूँ कहूँ क्षत्री कहूँकहूँ हँनैं निशाना जवान १३० देखि तमाशा चौंड़ा ताहर मनमें बड़े खुशी है जायें ॥ कूच कराये दउ मोहबे ते दिल्लीशहरगये नगच्याय १३१ ह्यौंसुधि पाई माहिल ठाकुर दिल्ली अटे अगाड़ी जाय ॥ माथनवायो जब माहिल ने खातिर कीन पिथौराराय १३२ सोने कि चौकी में बैठारयो राजा दिल्लीके महराज ॥ बोले पिरथी फिर माहिल ते तुम्हरोकौन करी हमकाज १३३ बोले माहिल फिर पिरथी ते मानो कही सत्य महराज ॥ ब्याहजो कीन्ह्यो तुम मोहबे में खोई सबै अपनी लाज १३४ जाति बनाफरकी ओछी है है सब जातिन केरि उतार ॥ इतना कहतै चौंड़ा ताहर दोऊ आयगये दरबार १३५ सूरति दीख्यो जब ताहर की गरई हाँक दीन ललकार ॥ हमजो वरजा तुमको ताहर ना तुम मानी कही हमार १३६ सुनिकै बातें ये राजा की ताहर हाथजोरि शिरनाय ॥ कही हकीकति सब मलखे की ताहर बारवार समुझाय १३७ माहिल बोले फिर राजा ते नाहर दिल्ली के सरदार ॥ टीका फेरो तुम जल्दी सों इतनी मानो कही हमार १३८ इतना सुनिकै चौंड़ा चलिभा ताहर बोले बचन उदार ॥ बड़े लड़ैया मोहबे वाले जिनके बाँट परी तलवार १३६ ब्याहन आवैं जब तुम्हरे घर तब तुम मूड़ लिह्यो कटवाय ॥ टीका फिरिहै अब दादा ना तुमते सत्यदीन बतलाय १४० यह मन भाय गई माहिल के तुरतै कीन्ह्यो रामजुहार ॥ बिदा माँगिकै पृथीराज सों चलिभा उरई का सरदार १४१ २४
१४ आल्हखण्ड । २१० खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय १४२ माथनवावों पितु अपने को ह्याँते करों तरंग को अन्त ॥ रामरमा मिलि दर्शन देबो इच्छा गही मोरि भगवन्त १४३ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागना- रायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलानिवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतब्रह्माटीकावर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥१॥ सवैया ॥ भो रघुनाथ अनाथन नाथ सनाथ करो अब तो भगवाना। और न आश निराशकरो नहिं देखिचुक सब ठौर ठिकाना ॥ मात पिता अरु भ्रातको नात सबै तुमहीं यहही मनजाना। गात सुखात सबै दिन जात नहीं लखितें कछु भूखबखाना १ सुमिरन ॥ दोउ पद ध्यावों रघुनन्दन के बन्दनकरों जोरि द्वउहाथ॥ नहीं सहायक कउ काको है स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ १ बिना तुम्हारे को परमारथ अन्त में देइ कौन को साथ ॥ ओ जगतारण भवभय हारण तुम्हीं सदा हमारे नाथ २ को अस दुनियामाँ पैदा भा जो तरिगयो बिना तव नाम॥ माता भ्राता अरु ताता ना अन्तम आवै अपने काम ३ तुम्ही गोसइयाँ दीनबन्धु हौ सीतापती चराचर नाथ॥ गालत हमरी द्विज देही का जावै समय हाथ बेहाथ ४ शिव औ ब्रह्मा कोउ पायो ना गाय कै पार तुम्हारी गाथ ॥ त्यहि को गावों कस मानुष मैं स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ ५
ब्रह्माका विवाह । २११ १५ छूटि सुमिरनी गै रघुबर कै सुनिये ब्रह्मा केर विवाह ॥ फौजें सजिहैं आल्हा ऊदन करि हैं समर केर उत्साह ६ अथ कथाप्रसंग ॥ माहिल चलिभे जब दिल्ली ते मलहना महल पहुंचे आय ॥ बड़ी खुशाली भै मलहना के हमरे बूत कही ना जाय १ मलहना बोली फिरि माहिल ते भैया उरई के सरदार ॥ टीका चढ़िगा है दिल्ली का ब्रह्मा भाने जौन तुम्हार २ बहुतक अशकुन त्यहिसमयाभे जियरा धीर धरा ना जाय ॥ मैं समझायों भल मलखे को पैना मन्यो बनाफरराय ३ त्यही समैया ते भैया अब रहि रहि मोर प्राण घबड़ायँ ॥ माह महीना जब ते आवा तब ते भूख नींद गै भाय ४ कलनहिं पावैं हम पलँगा में औ घरदीखे नित्त डेरायँ ॥ बिरमा द्यावलिके लड़िका सब हमको शत्रु रूप दिखरायँ ५ पै अब करतब कछु सूझैना साँचे हाल दीन बतलाय ॥ बातें सुनिकै ये मलहना की माहिल बोले बचन बनाय ६ काम हमारो रहै पिरथी ते हम दरबार मँझावा जाय ॥ सुनी हकीकति तहँ पिरथी की बहिनी सांच देयँ बतलाय ७ जाति बनाफर की ओछी है पिरथी बार बार पछितायँ ॥ ब्याहन अइहैं हमरे घरमाँ सबके मूड लेब कटवाय ८ चलिकै ब्रह्मा इकलो आवै तौ बिनब्याधि ब्याह है जाय ॥ चन्द्रवंश में उइ पैदा हैं नहिं कछुउजुरु हमारे भाय ६ हम समुझावा तब पिरथी को ऐसै करब मोहोबे जाय ॥ भाने हमरो ब्रह्माठाकुर औ बहनोई चँदेलोराय १० बड़ी खुशाली भै पिरथी के फूले अंग न सक्यो समाय ॥