भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 618 में से

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४० आल्हखण्ड । १६६ मिला भेट करि सब काहू सों फुलियामालिनिलीनबुलाय ॥ बहुधनदीन्ह्यो फिरिफुलियाको रोवत चढ़ी पालकीजाय ११५ बड़ी खुशहाली आल्हा कीन्ह्यो बहुधन द्वारे दीन लुटाय ॥ विदा मांगिकै गजराजा सों लश्कर कूच दीनकरवाय ११६ सात रोज को धावा करिकै पहुँचे नगर मोहोवा जाय ॥ सखियाँ मंगल गावन लागीं परछन भई द्वारपर आय ११७ विदा मांगिकै न्यवतहरी सब निज निज देशगये हर्षाय ॥ चील्ह रूप धरि सुनवाँ आई मल्हनाखुशीभई अधिकाय ११८ देवलि बिरमा त्यहि औसर में फूली अंग न सकैं समाय ॥ को गति बर्णै परिमालिक की मानों इन्द्रलोक गे पाय ११९ पिता आपने की दाया सों मलखे ब्याह गयौ सब गाय ॥ नही भरोसा निज भुजबलका किरपाशंकर करैं सहाय १२० आशिर्वाद देऊँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो होतो ना ललितेकहतकौनविधिगाय १२१ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललितेके तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १२२ इष्ट देवना मम एकै हैं पूरण ब्रह्म राम भगवन्त । चरणकमल तिन धरि हिरदे में ह्याँसों करौं तरंग को अन्त १२३ इति श्रीलखनऊ निवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुध कृपाशंकरसूनु पं० ललिताप्रसादकृत मलखेपाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः ॥ ३ ॥ मलखे विवाहसमाप्त ॥ इति ॥

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