भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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१४ आल्हखण्ड । २१० खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय १४२ माथनवावों पितु अपने को ह्याँते करों तरंग को अन्त ॥ रामरमा मिलि दर्शन देबो इच्छा गही मोरि भगवन्त १४३ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागना- रायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलानिवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतब्रह्माटीकावर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥१॥ सवैया ॥ भो रघुनाथ अनाथन नाथ सनाथ करो अब तो भगवाना। और न आश निराशकरो नहिं देखिचुक सब ठौर ठिकाना ॥ मात पिता अरु भ्रातको नात सबै तुमहीं यहही मनजाना। गात सुखात सबै दिन जात नहीं लखितें कछु भूखबखाना १ सुमिरन ॥ दोउ पद ध्यावों रघुनन्दन के बन्दनकरों जोरि द्वउहाथ॥ नहीं सहायक कउ काको है स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ १ बिना तुम्हारे को परमारथ अन्त में देइ कौन को साथ ॥ ओ जगतारण भवभय हारण तुम्हीं सदा हमारे नाथ २ को अस दुनियामाँ पैदा भा जो तरिगयो बिना तव नाम॥ माता भ्राता अरु ताता ना अन्तम आवै अपने काम ३ तुम्ही गोसइयाँ दीनबन्धु हौ सीतापती चराचर नाथ॥ गालत हमरी द्विज देही का जावै समय हाथ बेहाथ ४ शिव औ ब्रह्मा कोउ पायो ना गाय कै पार तुम्हारी गाथ ॥ त्यहि को गावों कस मानुष मैं स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ ५