भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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ब्रह्माका विवाह । २११ १५ छूटि सुमिरनी गै रघुबर कै सुनिये ब्रह्मा केर विवाह ॥ फौजें सजिहैं आल्हा ऊदन करि हैं समर केर उत्साह ६ अथ कथाप्रसंग ॥ माहिल चलिभे जब दिल्ली ते मलहना महल पहुंचे आय ॥ बड़ी खुशाली भै मलहना के हमरे बूत कही ना जाय १ मलहना बोली फिरि माहिल ते भैया उरई के सरदार ॥ टीका चढ़िगा है दिल्ली का ब्रह्मा भाने जौन तुम्हार २ बहुतक अशकुन त्यहिसमयाभे जियरा धीर धरा ना जाय ॥ मैं समझायों भल मलखे को पैना मन्यो बनाफरराय ३ त्यही समैया ते भैया अब रहि रहि मोर प्राण घबड़ायँ ॥ माह महीना जब ते आवा तब ते भूख नींद गै भाय ४ कलनहिं पावैं हम पलँगा में औ घरदीखे नित्त डेरायँ ॥ बिरमा द्यावलिके लड़िका सब हमको शत्रु रूप दिखरायँ ५ पै अब करतब कछु सूझैना साँचे हाल दीन बतलाय ॥ बातें सुनिकै ये मलहना की माहिल बोले बचन बनाय ६ काम हमारो रहै पिरथी ते हम दरबार मँझावा जाय ॥ सुनी हकीकति तहँ पिरथी की बहिनी सांच देयँ बतलाय ७ जाति बनाफर की ओछी है पिरथी बार बार पछितायँ ॥ ब्याहन अइहैं हमरे घरमाँ सबके मूड लेब कटवाय ८ चलिकै ब्रह्मा इकलो आवै तौ बिनब्याधि ब्याह है जाय ॥ चन्द्रवंश में उइ पैदा हैं नहिं कछुउजुरु हमारे भाय ६ हम समुझावा तब पिरथी को ऐसै करब मोहोबे जाय ॥ भाने हमरो ब्रह्माठाकुर औ बहनोई चँदेलोराय १० बड़ी खुशाली भै पिरथी के फूले अंग न सक्यो समाय ॥