आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ आल्हखण्ड । १६४ को गति बर्णै तहँ ऊदन की गडुवन मारि कीन खरिहान ॥ लाखनि ब्रह्मा के मुर्चा में सम्मुख लड़ै न एकोजवान ६३ कांतामल औ सूरज ठाकुर दोऊ हाथ करैं तलवार ॥ बड़े लड़ैया मोहबे वाले ठाकुर समरधनी सरदार ६४ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ मारे मारे तलवारिन के चौका बही रक्तकी धार ६५ जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिडोरै गाय ॥ तैसे ठाकुर मोहबे वाले मारिकैदीन्हों समरसोवाय ६६ बहुतक जूझे भुन्नागढ़ के रानी राजै लीन बुलाय ॥ रानी बोली फिरि राजा सों मानों कही त्रिसैनेराय ६७ बड़े लड़ैया मोहबे वाले ओ महाराजा बात बनाय ॥ लड़िकैजिनिहौनहिंआल्हा सों तुम करि थाके सबै उपाय ६८ कहा न मानो तुम माहिल को नहिं सब जैहैं काम नशाय ॥ हँसी खुशी सों बेटी पठवो याहि में भला परै दिखराय ६६ बातें सुनिके ये रानी की राजा समर पहुँचा आय ॥ भुजा उठाये फिरि बोलत भा अबहीं मारु बन्द है जाय १०० मारु बन्द भै दोऊ दिशिसों राजा बोला वचन सुनाय ॥ बिदा करावो अब बेटी को नहिं कछु देर बनाफरराय १०१ बातें सुनिकै गजराजा की द्वारेगये बराती आय ॥ कपड़ा पहिरे अपने अपने सीताराम चरण मनध्याय १०२ हुकुम लगायो हाँ गजराजा बेटी बेगि होय तय्यार ॥ हुकुम पायकै गजराजा को सोलह करनलागि श्रृंगार १०३ सवैया ॥ मज्जेन चीर ओ कुण्डैल अंजन नाक में मोक्तिक बेसे सवाँरी ।