आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
३८ आल्हखण्ड । १६४ को गति बर्णै तहँ ऊदन की गडुवन मारि कीन खरिहान ॥ लाखनि ब्रह्मा के मुर्चा में सम्मुख लड़ै न एकोजवान ६३ कांतामल औ सूरज ठाकुर दोऊ हाथ करैं तलवार ॥ बड़े लड़ैया मोहबे वाले ठाकुर समरधनी सरदार ६४ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ मारे मारे तलवारिन के चौका बही रक्तकी धार ६५ जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिडोरै गाय ॥ तैसे ठाकुर मोहबे वाले मारिकैदीन्हों समरसोवाय ६६ बहुतक जूझे भुन्नागढ़ के रानी राजै लीन बुलाय ॥ रानी बोली फिरि राजा सों मानों कही त्रिसैनेराय ६७ बड़े लड़ैया मोहबे वाले ओ महाराजा बात बनाय ॥ लड़िकैजिनिहौनहिंआल्हा सों तुम करि थाके सबै उपाय ६८ कहा न मानो तुम माहिल को नहिं सब जैहैं काम नशाय ॥ हँसी खुशी सों बेटी पठवो याहि में भला परै दिखराय ६६ बातें सुनिके ये रानी की राजा समर पहुँचा आय ॥ भुजा उठाये फिरि बोलत भा अबहीं मारु बन्द है जाय १०० मारु बन्द भै दोऊ दिशिसों राजा बोला वचन सुनाय ॥ बिदा करावो अब बेटी को नहिं कछु देर बनाफरराय १०१ बातें सुनिकै गजराजा की द्वारेगये बराती आय ॥ कपड़ा पहिरे अपने अपने सीताराम चरण मनध्याय १०२ हुकुम लगायो हाँ गजराजा बेटी बेगि होय तय्यार ॥ हुकुम पायकै गजराजा को सोलह करनलागि श्रृंगार १०३ सवैया ॥ मज्जेन चीर ओ कुण्डैल अंजन नाक में मोक्तिक बेसे सवाँरी ।
मलखानका विवाह । १६५ ३६
कंचुकि औ क्षुद्रावलि कंकण कुसुमित अम्बर चन्दन धारी ॥ खायकै पाने औ धारिमैंनैनको हौर औ नूपुरैंकी झनकारी । सेंदुरै भाल बिशाललखे ललिते मनलज्जित मन्मथनारी १०४ ग्वरिग्वरिबहियाँ हरिहरिचुरियाँ सो मनिहारिनि दी पहिराय ॥ पहिरि मुँदरियाँ अठो अँगुरियाँ ऊपर छल्ला लये दबाय १०५ पहिरि आरसी ली अँगुठा में सीसा उपर तासु के भाय ॥ अगे अगेला पिछे पछेला बीचम छन्न रही दर्शाय १०६ टाड़ैं पहिरी सोने वाली जोसन पट्टी करैं बहार ॥ दुलरी तिलरी पंचलरीलों तापर परा मोतियन हार १०७ नथुनी लटकन की शोभाअति कानन करनफूल शृङ्गार ॥ गैरे गुज्भी ढउकानन में बँदियाँ मस्तक करै वहार १०८ बिछिया पहिरी पद अँगुरिन में अनवट सखी दीन पहिराय ॥ कड़ाके ऊपर छड़ा बिराजै तापर पायजेब लहराय १०६ लहँगा पहिरयो कीनखाब को चादर ओढ़िलीन फिरिभाय ॥ जैसे बादल बिजुली चमकै तसगजमोतिनिपरै दिखाय ११० तहिले राजा फिरि आवत भे औ रानी सों कह्यो सुनाय ॥ बिदा कि बिरिया अब आई है जल्दी बेटी देउ पठाय १११ सुनिकै बातें ये राजा की रानी बेटी लीन बुलाय ॥ सीतामाता अनुसूया की सबियाँकथाकहीसमुझाय ११२ कहा न मानै जो पूरुष को नारी घोर नर्क को जाय ॥ चोर कुकर्मी जो पतिहोवै सेवा किहे नारि तरिजाय ११३ विनापराधे नारी त्यागै सो पति मरै भूखके घाय ॥ ऐसे कहिकै गजमोतिनि सों माता रोई हृदय लगाय ११४
४० आल्हखण्ड । १६६ मिला भेट करि सब काहू सों फुलियामालिनिलीनबुलाय ॥ बहुधनदीन्ह्यो फिरिफुलियाको रोवत चढ़ी पालकीजाय ११५ बड़ी खुशहाली आल्हा कीन्ह्यो बहुधन द्वारे दीन लुटाय ॥ विदा मांगिकै गजराजा सों लश्कर कूच दीनकरवाय ११६ सात रोज को धावा करिकै पहुँचे नगर मोहोवा जाय ॥ सखियाँ मंगल गावन लागीं परछन भई द्वारपर आय ११७ विदा मांगिकै न्यवतहरी सब निज निज देशगये हर्षाय ॥ चील्ह रूप धरि सुनवाँ आई मल्हनाखुशीभई अधिकाय ११८ देवलि बिरमा त्यहि औसर में फूली अंग न सकैं समाय ॥ को गति बर्णै परिमालिक की मानों इन्द्रलोक गे पाय ११९ पिता आपने की दाया सों मलखे ब्याह गयौ सब गाय ॥ नही भरोसा निज भुजबलका किरपाशंकर करैं सहाय १२० आशिर्वाद देऊँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो होतो ना ललितेकहतकौनविधिगाय १२१ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललितेके तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १२२ इष्ट देवना मम एकै हैं पूरण ब्रह्म राम भगवन्त । चरणकमल तिन धरि हिरदे में ह्याँसों करौं तरंग को अन्त १२३ इति श्रीलखनऊ निवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुध कृपाशंकरसूनु पं० ललिताप्रसादकृत मलखेपाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः ॥ ३ ॥ मलखे विवाहसमाप्त ॥ इति ॥
अथ आल्हखण्ड ॥ ब्रह्माका विवाह अथवा दिल्लीकी लड़ाई ॥ सवैया ॥ हैकर दीन गह्यों तुमको रघुनाथ करो अबतो रखवारी । पायके शाप पषाण भई मुनिनारि दयालु दियो तुम तारी ॥ हा राम कह्यो यवनो यकबार गयो तब धामहि वेगि खरारी । दीन पुकार करै ललिते प्रभु चूक क्षमो रघुनाथ हमारी १ सुमिरन ॥ पहिले सुमिरों पद गणेश के गौरा पारवती के बाल ॥ हाथी आनन सम आनन है सेंदुर सदा विराजै भाल १ बड़ी पियारी जिन दुर्वा है फूलो बड़े पियारे लाल ॥ भोग लगावै जो लड्डू को तापर खुशी रहें सब काल २ हैं शिवशङ्कर के लरिका ते अरिका करैं सदा जे नाश ॥ विधिवत पूजनजोकोउ कीन्हो पूरी सदा तासुकी आश ३ बड़ो भरोसो तिन गणेश को अपने हृदय करौ सब काल ॥ करो मनोरथ पूरण हमरो गौरा पारवती के लाल ४ छूटि सुमिरनी गै गणेशकै सुनिये बेला केर हवाल ॥
[Header] ३ आल्हखण्ड । १९८ ब्याह बखानौं त्यहि ब्रह्माको ज्यहिका पिता राजा परिमाल ५
[Section Title] अथ कथाप्रसंग ॥
पृथीराज दिल्ली को राजा ज्यहिका जानै सकल जहान ॥ कन्या उपजी जब त्यहिके घर तारा टूटि तैवै असमान १ थर थर थर थर पृथ्वी कांपी दर दर बोले श्वान श्रृगाल ॥ भन् भन् भन् भन् वायू डोलीं अशकुन बहुत भये त्यहिकाल २ अशकुन दीख्यो पृथीराज ने तुरतै पंडित लीन बुलाय ॥ लै कै पोथी ज्योतिष वाली पंडित हाल दीन बतलाय ३ गौना हैहै जब कन्या का हैहै तबै घोर घमसान ॥ बहुतक क्षत्री तब नशिजैहैं झुझिहैं बड़े बड़े ह्याँ ज्वान ४ ताते बेला यहि कन्या का राखो नाम आप महराज ॥ पाय दक्षिणा पंडित चलिभो होवन लागि और फिरिकाज ५ छठी बारहौं पसनी हैगै बेला परो तासु को नाम ॥ सात वरस की जब बेला भइ खेलत फिरै सखिन के धाम ६ कोउ कोउ सखियां तहँ ब्याहीर्थी बेंदी दिये आपने भाल ॥ क्वारी पूछैं तिन ब्याहिन ते सखि तुम कहौ श्वशुरपुर हाल ७ ब्याही बोलीं अनव्याहिन ते मानो सखी बचन तुम साँच ॥ जब सुधि आवत है बालम कै तब उर जरै विरहकी आँच ८ सुरपुर नरपुर अहिपुर माहीं सो सुख नहीं परै दिखराय ॥ जो सुख पावा हम श्वशुरे में बालम छाती लीन लगाय ६ कटिगहि मसरूँ हम नहिंटसरूँ कसकै हृदय किये सुधि आज ॥ का सुख जानो तुम अनुब्याहिउ बैरिनि भई हमारी लाज १० सुनि सुनि बातें ये ब्याहिनकी सब अनब्यही गईं शर्माय ॥ बढ़ी लालसा तब ब्याहे की व्याला घरै पहुंची आय ११
ब्रह्माका विवाह । १६६ ३ खयो मिठाई औ मेवा कछु पलँगा सोय रही फिरिजाय ॥ फिकिरि लगाये सो ब्याहे की एका एकी उठी कन्वाय १२ हम नहिं जैहैं अब श्वशुरे को यह कहि रोय उठी चिल्लाय ॥ रानी अगमा तहँ ठाढ़ी थी तुरतै छाती लीन लगाय १३ धीरज दैके माता पूछे बेटी स्वपन दीख का आज ॥ इतना सुनिकै बेटी बोली माता कहतलगै बड़िलाज १४ माता बोली फिरि बेटी सों बेटी सत्य देउ बतलाय ॥ कैसो स्वपना तुम दीख्यो है हमरे धीर धरा ना जाय १५ सुनिकै बातें ये माता की बेटी कहन लागि त्यहि बार ॥ मोहिं बियाहनजन्तु कोउआयो हाथ म लिये ढाल तलवार १६ फिरि बैठायो मोहिं डोला पर अपने घरे लिये सो जाय ॥ ऐसा दीख्यों जब माता मैं तबहीं रोय उठिउँ चिल्लाय १७ इतना कहिकै बेला चलि भै खेलन लागि सखिन के साथ ॥ महलन आये पिरथी राजा रानी गहाजाय तब हाथ १८ स्वपन बतायो सब बेला को सो सुनि लीन पिथौराराय ॥ ब्याहन लायक अब कन्या है बोली बार बार समुझाय १६ रानी अगमा की बातें सुनि बोले पृथीराज महराज ॥ कहे अधीरज तुम होतीहौ रानी कहा न टारौं आज २० इतना कहिकै पिरथी चलिभे औ दरबार पहुंचे आय ॥ ताहर बेटा को बुलवायो चौंड़ा बाम्हन लीन बुलाय २१ कलम दवाइति कागज लैके चिट्ठी लिखन लाग सरदार ॥ शिरी सरखऊ शिरिपत्री करि पाछे आपन राम जुहार २२ पहिलि लड़ाई है द्वारेपर मड़ये कठिन चली तलवार ॥ खान कलेवा लड़िका आई तबहूँ मूड़ कटावब यार २३
[Header] ३ आल्हखण्ड । २००
इतनी जुरैति ज्याहिके होवै टीका लेय हमारो सोय ॥ नहीं विधाता की मर्जी ना कन्या व्याह और विधिहोय २४ इतना लिखिकै पृथीराज ने नाई बारी लीन बुलाय ॥ साल दुसाला मोतिन माला चीरा कलँगी लीन मँगाय २५ तिरपन पलकी अस्सी गजरथ उम्दा घोड़ा सवाहजार ॥ धरिकै तोड़ा दो मुहरन का अच्छा थार सूवरण क्यार २६ तीनि लाखको टीका दैकै सबको हाल दीन समुझाय ॥ नगर मोहोवे कोउ जायो ना ओछी जाति बनाफरराय २७ चिट्ठी दीन्ह्यो फिरि ताहर को ताहर चलिभे शीश नवाय ॥ नाई बारी चौंड़ा ताहर फाटक पार पहुंचे आय २८ ताहर बैठे दलगंजन पर चौंड़ा एकदन्त असवार ॥ कूच करायो फिरि दिल्ली ते दूनों चलत भये सरदार २६ आठ रोज को धावा करिकै सुन्नागढ़ै पहुंचे जाय ॥ लड़का खारो गजराजा को पाती तुरत दीन पकराय ३० पढ़िकै चिट्ठी गजराजा ने टीका तुरत दीन लौटार ॥ तहँते पहुँचे फिरि वौरीगढ़ जहँपर रहैं यादवा यार ३१ तिनहुन टीका जब लीन्ह्यो ना नरवर फेरि पहुंचे जाय ॥ नरपति राजा नरवरवाला सोऊ टीका दीन फिराय ३२ गंगाधर बूँदी का राजा त्यहि दरबार गये फिरि धाय ॥ चिट्ठी पढ़िकै सोऊ ठाकुर टीका तुरत दीन लौटाय ३३ ताहर बोले फिरि चौंड़ाते दादा कही हमारी मान ॥ चार महीना घूमत द्वैगे अब हम भये बहुत हैरान ३४ जल्दी चलिये अब उरई को जहँपर बसै महिल परिहार ॥ यह मन भाय गई चौंड़ा के हाथी उपर भयो असवार ३५
ब्रह्माका विवाह । २०९ ५ चढ़ि दलगंजन की पीठि पर ताहर नाहर भयो तयार ॥ नाई बारी सँग में लीन्हे पहुँचे माहिल के दरबार ३६ आवत दीख्यो जब ताहर को माहिल बहुत गयो घबड़ाय ॥ माहिल बोले फिरि ताहर ते बेटा कुशल देउ बतलाय ३७ ताहर बोले फिरि माहिल ते ठाकुर उरई के सरदार ॥ टीका लाये हम बहिनी का घूमत बिते महीना चार ३८ कुँवर बनावो क्यहु क्षत्री का मोको पूत आपनो जान ॥ माहिल बोले तब ताहर ते मानो कही बीर चौहान ३६ अजयपाल कनउज का राजा राजन मध्य बीर सरदार ॥ ताको लड़का रतीभान भो जाकी जगजाहिर तलवार ४० ताको लड़का लाखनि राना टीका तासु चढ़ावो जाय ॥ इतना सुनिकै ताहर चौंड़ा तुरतै कूचदीन करवाय ४१ जायकै पहुँचे फिरि कनउज में जहँपर भरी लाग दरबार ॥ की गति बरणै चन्देले कै आली खानदान सरदार ४२ ताहर दीख्यो जब जयचँद को तुरतै कीन्ह्यो राम जुहार ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो फिरि जल्दी सों लीन्ह्यो कनउजके सरदार ४३ पढ़िकै चिट्ठी राहुट द्वैगा नैना अग्निबरण भे लाल ॥ लै जाव चिट्ठी कहूँ अनतै को मेरो बड़ो पियारो बाल ४४ ताहर चौंड़ा दूनो जरिकै तुरतै कूच दीन करवाय ॥ पार उतरिकै श्रीयमुना के उरई निकट पहुंचे आय ४५ मलखे ठाकुर त्यहि समया में मारन आयो तहां शिकार ॥ ताहर चौंड़ा मलखे ठाकुर मारग भेंटिगये सरदार ४६ कुशल प्रश्न ताहर सों कहिकै बोला बचन बीर मलखान ॥ कौने मतलब को निकरेहौ नाहर दिल्लीके चौहान ४७
६ आल्हखण्ड । २०२ सुनिकै बातें ई मलखे की ताहर हाल गयो सबगाय ॥ मलखे बोले फिरि ताहर सों लड़का तुम्हें देयँ बतलाय ४८ संग हमारे कछु दूरी तुम औरो चलो बीरचौहान ॥ इतना सुनिकै दूनों चलिभे मोहोबे गये तीनहू ज्वान ४६ ताहर बोले तहँ मलखे ते यहुहै कौन शहर मलखान ॥ मलखे बोले तहँ ताहर सों यहहै नगर मोहोबा ज्वान ५० यहँको राजा परिमालिक है ब्रह्मा लड़का तासु कुँवार ॥ तोरी बहिनी सों त्यहि ब्याहौं साँची बात मानु सरदार ५१ सुनिकै बातें ये मलखे की ताहर बहुत गयो शर्माय ॥ ऐसी बातें का तुम बोले ब्याह न करें बनाफरराय ५२ नहीं आज्ञा दिल्लीपति कै टीका नगर गोहोबे जाय ॥ सरबरि हमरी का नाहीं हैं ठाकुर काह गयो बौराय ५३ सुनिकै बातें ये ताहर की बोला बचन बीर मलखान ॥ धाँसि सिरोही मुँहमें देवों जोफिरि ऐस कहै चौहान ५४ इतनी सुनिकै ताहर ठाकुर पाती तुरत दीन पकराय ॥ मूड़ कटाई सो ब्याहे माँ नाहर जौन पिथौराराय ५५ ताका बाना जग मर्दाना मारै शब्द ताकिकै बान ॥ परै निशाना पूरशब्द पर ता सँग कौन लड़ैया ज्वान ५६ सुनिकै बातें ये ताहर की बोला तुरत बनाफरराय ॥ लड़ै मरैका कछु डर नाहीं यहही धर्म सनातन भाय ५७ रीछ बाँदरन सँग में लैके लङ्का विजय कीन भगवान ॥ ग्वालन बालन सँगमा लैके कंसै हना कृष्ण बलवान ५८ काह हकीकति है दिल्ली कै चलिकै बिल्ली देउँ बनाय ॥ पौर खशभिल्ली दिल्ली जाई किल्ली तुरतै देउँ नवाय ५९
ब्रह्माका बिवाह । २०३ ७ कैसो दिल्ली में गिल्ली सम पिल्ली पूत पिथौरा राय ॥ लिल्ली घोड़िन के चढ़वैया लड़िहैं कौन तहाँपर भाय ६० चौंड़ा बोला तहँ मलखे ते चलिये जहाँ चंदेलोराय ॥ सुनिकै बातें ये चौंड़ा की तीनों अटे महल में जाय ६१ देखिकै सूरति मलखाने कै बोला मोहबे का सरदार ॥ हाल बतावो सब सिरसा को ओ बिरमा के राजकुमार ६२ हाथ जोरिकै मलखे बोले दादा मोहबे के महराज ॥ मनोकामना सब पूरण हैं तुम्हरीकृपा सुफल सबकाज ६३ टीका लाये ये दिल्ली सों मैं ब्रह्माका करों बिवाह ॥ यही कामना यक बाकी है साँची मानु कही नरनाह ६४ पाती दीन्ह्यो मलखाने ने बांचन लाग रजापरिमाल ॥ डसै भुवंगम लहरैं आवैं कहरन लाग तुरत नरपाल ६५ हाथ जोरिकै ऊदन बोले दादा मोहबे के महराज ॥ टेक न टारैं मलखे दादा तासों करे बनी यहु काज ६६ सुनिकै बातें ये ऊदन की बोले तुरत रजापरिमाल ॥ हाल बतावो सब मल्हनाको वाको बड़ो पियारो बाल ६७ मोहिं बुढ़ापा की लाठी है ब्रह्मा बड़ा पियारा मान ॥ नामी राजा दिल्लीवाला ठाकुर समरधनी चौहान ६८ टेक कठिनहै मलखाने कै पूरण यहौ हृदय विश्वाश ॥ जियब न देखें हम काहू कर सबकर होय वहाँपर नाश ६६ पढ़िकै चिट्ठी पृथीराज की हमरे गई करेजे हूक ॥ जानि बूझिकै जस मलखे की ऐसी करै कौन नर चूक ७० सवैया ॥ सुनिकै नृपबैन तबै बलऐन बोले मलखे ललिते अनखाई ।
आल्हाखण्ड । २०४ कउनसो काज अकाज भयो महराज गयउ जहँ लाज गवाँई ॥ सुखको साज समाज करउ रघुराज सदा मम लाज बचाई । घबड़ानको आज न काज कछू हम ब्याहकरैं वछराजदुहाई ७१ सुनिकै बातैं मलखाने की राजा गयो सनाकाखाय । मलखे चलिभे फिरि महलनको मल्हना पास पहुंचे जाय ७२ चिट्ठी पढ़िकै पृथीराज की मलखे हाल दीन बतलाय । सुनिकै चिट्ठी पृथीराज की मल्हनागई तुरत कुँभिलाय ७३ तारा टूटे आसमान में थर थर धरा गई तब हाल । चील्हैं छाईं राजमहल में रोवन लागे श्वान श्रृगाल ७४ मल्हना बोली तब मलखे ते अशकुन बहुत परैं दिखलाय । छारो ब्रह्मा घरमें रहिहै टीका आप देउ लौटाय ७५ सुनिकै बातें ये मल्हना की मलखे बोले वचन रिसाय । ब्याह विधाता यह रचिराखा टीका कौन सकै लौटाय ७६ सदा न फूलै कहुँ वन तोरई माई सदा न सावन होय । सदा जवानी नहिं स्थिरहै माई सदा न वर्षा होय ७७ टीका फेरो जो दिल्ली का माता होउ जगत बदनाम । जातिके ओछे मोहवे वाले यह है देश-देश सरनाम ७८ होय नतैती जो दिल्ली में पूरण होयँ हमारे काम । भुन्ना नैनागढ़ माड़ो में हमपर कृपाकीन सियराम ७९ ये सब अशकुन हैं ताहर को माता कहां ज्ञान गा त्वार । अबै कबूतरी ना बुड्ढी भै ना बल खाय गई तलवार ८० बार जो बाँका जा ब्रह्मा का हमरो मूड़ लियो कटवाय । बातें सुनिकै ये मलखे की मल्हना दीन्ह्यो बाँह गहाय ८१
ब्रह्माका विवाह । २०५ जस मनभावै मलखाने के तैसी करो बनाफरराय ॥ बड़ी खुशीभै मलखाने के फूले अंग न सके समाय ८२ बड़ी प्रशंसाकी मल्हना की मलखे बार बार शिरनाय ॥ शाखा चलिहै महरानी तब ईजति हमरी लियो बचाय ८३ वारु न बांका इनका जैहै ओ महरानी बात बनाय ॥ जहाँ पसीना इनका गिरिहै तहँ मैं देहौं खून बहाय ८४ करो तयारी अब जल्दी सों ताहर टीका देय चढ़ाय ॥ बातें सुनिकै मलखानेकी मल्हना हुकुम दीन फर्माय ८५ बाँदी लीपन चौका लागी छींक्यो एक पुरुषने आय ॥ मल्हना बोली तब मलखे ते अशकुन बहुत परै दिखराय ८६ टीका फेरो तुम दिल्ली का मानो कही बनाफरराय ॥ बातें सुनिकै ये मल्हना की बोला तुरत लहुरवाभाय ८७ टीका फिरिहै जो दिल्ली का होई देश हँसौंवा माय ॥ कीन तयारी जब माड़ो की तबहूं छींक भई थी आय ८८ तबहूं रोंक्यो महरानी तुम माड़ो फते कीन हम जाय ॥ शकुन हमारो फिरि वैसे भा शंका कौन गई मन आय ८६ सुनिकै बातें उदयसिंह की मल्हना ठीक लीन ठहराय ॥ ऊदन मलखे द्वउ मनिहैं ना अब अनहोनी परै दिखाय ६० बड़ा लड़ैया दिल्ली वाला है सब राजन में शिरताज ॥ तुम्ही गोसइयाँ दीनबन्धुहौ स्वामी रामचन्द्र महराज ६१ परो साँकरो अब हमपर है राखन हार तुम्ही रघुराज ॥ हम सुनिराखा है विप्रन सों राख्यो सदा भक्तकी लाज ६२ गौतम नारी को तुम तारा केवट लीन्ह्यो हृदय लगाय ॥ मांस अहारी गृद्धै तारयो भीलिनिदर्श दिखायो जाय ६३
१० आल्हाखण्ड । २०६ सोई दशरथ के रघुरैया नैया तुही लगैया पार ॥ एक पूतकी मैं मैयाहौं ताकी कुशल किह्योकरतार ६४ सुमिरन करिकै रघुनन्दन को मल्हना करनलागि घरकाम ॥ मलखे ठाकुर त्यहिसमया में ताहर वेगि बुलावा धाम ६५ जितने वासी रहें मुहवे के आये सबै नारि नर द्वार ॥ सात सुहागिल त्यहि समयामें गावन लगीं मंगलाचार ६६ बड़ी भीर भै परिमालिक घर कहुँ तिलडरा भूमि ना जांय ॥ चूड़ामणि पण्डित तहँ आयो साइतिं तुरत दीन बतलाय ६७ नव पिचकारी भरिकेशरि रंग मारैं एक एक को धाय ॥ धूरि उड़ाई तहँ अबीर की महलन् गई लालरी छाय ६८ चौक पुराई गजमोतिन सों पीढ़ा तहाँ दीन धरवाय ॥ चौड़ा ताहर दउ ठाढ़े ये ब्रह्मा गये तहाँपर आय ६६ को गनि वरणै परिमालिक कै लोहा छुये सोन ह्वैजाय ॥ पारस पाथर ज्यहिके घरमाँ त्यहिकी द्रव्यसकैको गाय १०० ऊदन बोले तहँ ताहर सों अब तुम टीका देउ चढ़ाय ॥ साँगा गाड़ दइ तब ताहरने औयहबोल्यो भुजा उठाय १०१ साँग उखारैं ब्रह्मा ठाकुर तौ हम टीका देई चढ़ाय ॥ रीति हमारे यह घरकी है साँचे हाल दीन बतलाय १०२ सात तेवा लोहे के नीचे तापर साँग गाड़ि हम दीन ॥ साँग उखारैं ब्रह्मा ठाकुर तौहमब्याहबहिन काकीन१०३ देखि तमाशा बहु ताह रका मल्हना बोली वचन रिसाय ॥ अशकुनकीन्योम्परेमहलन्मां टीका तुरत देउ लौटाय १०४ बिना बियाहे ब्रह्मा रहि हैं तौ नहिं होय हमारी हान ॥ अक्लि तुम्हारी को लैलीन्ही मानौं नहीं कही मलखान १०५
ब्रह्माका बिवाह । २०७ ११ सुनिकै बातें ये मल्हना की ऊदन बोले माथ नवाय ॥ टीका फेरागा दिल्ली का. तौमुँहकौन दिखावाजाय १०६ इतना कहिकै ऊदन ठाकुर तुरतै डारा सांग उखार ॥ ऊदन बोले फिरि ताहर सों नाहर दिल्ली के सरदार १०७ हम तो नौकर परिमालिक के तिन यह डारा सांग उखार ॥ ऐसे नौकर जिनके घरमाँ तिनसे कौन करै तलवार १०८ सुनिकै बातें ये ऊदन की ताहर मनै गयो शर्माय ॥ बीरा दीन्ह्यो ताहर ठाकुर ब्रह्मा बीरागये चबाय १०६ छींक तड़ाका मै सम्मुखमाँ मल्हना रोय उठी घबड़ाय ॥ ब्याह न करिहौं मैं ब्रह्मा का मानो कही बनाफरराय ११० हमैं चाह है नहिं भौरिन कै ना कछु बहू केरि परवाह ॥ इकलौता यहु जीवै जग औ फिरि बनेरहै नरनाह १११ बहुतक अशकुन हम देखे हैं कैसे धरा जाय जिय धीर ॥ पुत्रघाव सों दशरथ मरिगे यासों और कौन जगपीर ११२ भला न देखें यहि ब्याहे में मानो कही वीर मलखान ॥ जो नहिं मानो मलखाने तुम हमरे जाय प्रानपर आन ११३ बातैं सुनिकै ये मल्हना की बोले फेरि बीर मलखान ॥ घरको आवो टीका फेरैं तौसब हँसिहैं देशजहान ११४ बिटिया आहिउ तुम ठाकुर की ठाकुर घरै बियाही माय ॥ नहिं क्यहु बनियाकी महतारी जो मन बारबार पछिताय ११५ हल्दी मिरचा हम बेचैं ना ना हम करैं वाणिज्य व्यापार ॥ हम तो लरिका हैं ठाकुर के औ दिनराति करैं तलवार ११६ धन्य सराहौं हम कुन्ती का आपन दीन्हे पुत्र पठाय ॥ युद्ध मचायो तिन कौरव ते औ यश रहा जगतमें छाय ११७
१२ आल्हखण्ड । २०८ बचे युधिष्ठिर समरभूमि ते पाँचो भाय कृष्ण महराज ॥ मैं ना रहिंगे त्यउ दुनिया माँ रहिगै एक जगतमें लाज ११८ जप तप होतै नहिं कलियुग में ना कछुदान पुण्य अधिकाय ॥ जो मरिजावैं समरभूमि में पावैं स्वर्गलोक को माय ११९ इतना कहिकै मलखे ठाकुर टीका तुरत दीन चढ़वाय ॥ चारो नेगिन को बुलवायो भूषण वस्त्र दीन पहिराय १२० बहुधन दीन्ह्यो फिरि चौंड़ा को अपने हाथ बनाफरराय ॥ चूड़ामणि पंडित ते बोल्यो अबतुम लगन देउ बतलाय १२१ सुनिकै बातें मलखाने की पंडित बोला लगन विचार ॥ माघ महीना कृष्ण पक्ष में तेरसि तिथी शुक्रको बार १२२ नीकी साइति मलखाने है सो हम तुमका दीन बताय ॥ सुनिकै बातें ये पंडित की औ ताहरको दीन सुनाय १२३ यादि राखियो यह दिन भाई दिल्ही ब्याहकरब हम आय ॥ बातें सुनिकै ये मलखे की ताहर चलिभेशीशनवाय १२४ दर्गी सलामैं सौ तोपन की धुवना रहा सरग मड़राय ॥ अद्भुत शोभा भै मोहबे के घर घर ढोलक परै सुनाय १२५ चलै पिचका कहूँ केशरि के कहूँकहूँ अबिरगुलाल उड़ाय ॥ पान मोहोबे के जग जाहिर लाली पीकैं परै दिखाय १२६ कहूँ कहूँ छैला गैला ठाढ़े बेला हार परैं दिखराय ॥ कहूँ चमेला के तेला को रहे अलबेला जुलुफलगाय १२७ कहूँ कहूँ हेला मेला कैकै बुलबुल बुलबुल रहे लड़ाय ॥ उड़ै तमाखू कहूँ हुकन में गुड़गुड़गुड़गुड़रहेमचाय १२८ मारु मारुकै मोहरि बाजै कहूँ कहूँ हाव हाव करनाल ॥ तहूँ पँतरह बालक बदलैं कहूँकहूँ लड़ैंमल्ल जसकाल १२६
ब्रह्माका विवाह । २०६ १३ पटा बनेटी बाना कहूँ कहूँ कहूँकहूँ गदका को घमसान ॥ बाढ़ि घरावैं कहूँ कहूँ क्षत्री कहूँकहूँ हँनैं निशाना जवान १३० देखि तमाशा चौंड़ा ताहर मनमें बड़े खुशी है जायें ॥ कूच कराये दउ मोहबे ते दिल्लीशहरगये नगच्याय १३१ ह्यौंसुधि पाई माहिल ठाकुर दिल्ली अटे अगाड़ी जाय ॥ माथनवायो जब माहिल ने खातिर कीन पिथौराराय १३२ सोने कि चौकी में बैठारयो राजा दिल्लीके महराज ॥ बोले पिरथी फिर माहिल ते तुम्हरोकौन करी हमकाज १३३ बोले माहिल फिर पिरथी ते मानो कही सत्य महराज ॥ ब्याहजो कीन्ह्यो तुम मोहबे में खोई सबै अपनी लाज १३४ जाति बनाफरकी ओछी है है सब जातिन केरि उतार ॥ इतना कहतै चौंड़ा ताहर दोऊ आयगये दरबार १३५ सूरति दीख्यो जब ताहर की गरई हाँक दीन ललकार ॥ हमजो वरजा तुमको ताहर ना तुम मानी कही हमार १३६ सुनिकै बातें ये राजा की ताहर हाथजोरि शिरनाय ॥ कही हकीकति सब मलखे की ताहर बारवार समुझाय १३७ माहिल बोले फिर राजा ते नाहर दिल्ली के सरदार ॥ टीका फेरो तुम जल्दी सों इतनी मानो कही हमार १३८ इतना सुनिकै चौंड़ा चलिभा ताहर बोले बचन उदार ॥ बड़े लड़ैया मोहबे वाले जिनके बाँट परी तलवार १३६ ब्याहन आवैं जब तुम्हरे घर तब तुम मूड़ लिह्यो कटवाय ॥ टीका फिरिहै अब दादा ना तुमते सत्यदीन बतलाय १४० यह मन भाय गई माहिल के तुरतै कीन्ह्यो रामजुहार ॥ बिदा माँगिकै पृथीराज सों चलिभा उरई का सरदार १४१ २४
१४ आल्हखण्ड । २१० खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय १४२ माथनवावों पितु अपने को ह्याँते करों तरंग को अन्त ॥ रामरमा मिलि दर्शन देबो इच्छा गही मोरि भगवन्त १४३ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागना- रायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलानिवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतब्रह्माटीकावर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥१॥ सवैया ॥ भो रघुनाथ अनाथन नाथ सनाथ करो अब तो भगवाना। और न आश निराशकरो नहिं देखिचुक सब ठौर ठिकाना ॥ मात पिता अरु भ्रातको नात सबै तुमहीं यहही मनजाना। गात सुखात सबै दिन जात नहीं लखितें कछु भूखबखाना १ सुमिरन ॥ दोउ पद ध्यावों रघुनन्दन के बन्दनकरों जोरि द्वउहाथ॥ नहीं सहायक कउ काको है स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ १ बिना तुम्हारे को परमारथ अन्त में देइ कौन को साथ ॥ ओ जगतारण भवभय हारण तुम्हीं सदा हमारे नाथ २ को अस दुनियामाँ पैदा भा जो तरिगयो बिना तव नाम॥ माता भ्राता अरु ताता ना अन्तम आवै अपने काम ३ तुम्ही गोसइयाँ दीनबन्धु हौ सीतापती चराचर नाथ॥ गालत हमरी द्विज देही का जावै समय हाथ बेहाथ ४ शिव औ ब्रह्मा कोउ पायो ना गाय कै पार तुम्हारी गाथ ॥ त्यहि को गावों कस मानुष मैं स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ ५
ब्रह्माका विवाह । २११ १५ छूटि सुमिरनी गै रघुबर कै सुनिये ब्रह्मा केर विवाह ॥ फौजें सजिहैं आल्हा ऊदन करि हैं समर केर उत्साह ६ अथ कथाप्रसंग ॥ माहिल चलिभे जब दिल्ली ते मलहना महल पहुंचे आय ॥ बड़ी खुशाली भै मलहना के हमरे बूत कही ना जाय १ मलहना बोली फिरि माहिल ते भैया उरई के सरदार ॥ टीका चढ़िगा है दिल्ली का ब्रह्मा भाने जौन तुम्हार २ बहुतक अशकुन त्यहिसमयाभे जियरा धीर धरा ना जाय ॥ मैं समझायों भल मलखे को पैना मन्यो बनाफरराय ३ त्यही समैया ते भैया अब रहि रहि मोर प्राण घबड़ायँ ॥ माह महीना जब ते आवा तब ते भूख नींद गै भाय ४ कलनहिं पावैं हम पलँगा में औ घरदीखे नित्त डेरायँ ॥ बिरमा द्यावलिके लड़िका सब हमको शत्रु रूप दिखरायँ ५ पै अब करतब कछु सूझैना साँचे हाल दीन बतलाय ॥ बातें सुनिकै ये मलहना की माहिल बोले बचन बनाय ६ काम हमारो रहै पिरथी ते हम दरबार मँझावा जाय ॥ सुनी हकीकति तहँ पिरथी की बहिनी सांच देयँ बतलाय ७ जाति बनाफर की ओछी है पिरथी बार बार पछितायँ ॥ ब्याहन अइहैं हमरे घरमाँ सबके मूड लेब कटवाय ८ चलिकै ब्रह्मा इकलो आवै तौ बिनब्याधि ब्याह है जाय ॥ चन्द्रवंश में उइ पैदा हैं नहिं कछुउजुरु हमारे भाय ६ हम समुझावा तब पिरथी को ऐसै करब मोहोबे जाय ॥ भाने हमरो ब्रह्माठाकुर औ बहनोई चँदेलोराय १० बड़ी खुशाली भै पिरथी के फूले अंग न सक्यो समाय ॥
१६ आल्हखण्ड । २१२ भलो आपनो जो तुम चाहौ इकलो ब्रह्मा देउ पठाय ११ हमहूं जैबे त्यहि संगैमाँ तुम्हरे काज सिद्ध हैजायँ ॥ सुनिकै बातें ये माहिल की मल्हना बोली मन हर्षाय १२ कहा तुम्हारो हम टारब ना भैया उरई के सरदार ॥ इकलो ब्रह्मा तुम लै जावो जामें होय नहीं तहँ मार १३ माहिल बोले फिरि मल्हनाते बहिनी मानो कही हमार ॥ चोरी चोरा काम निकालो नाकछु रीतिभांति की ब्यार १४ यह मन भायगई मल्हना के चुप्पे पलकी लीन मँगाय ॥ ब्रह्माठाकुर को बुलवायो औ पलकीमों दीन बिठाय १५ लैकै पलकी माहिल चलिभे ऊदन अटा तहाँ पर आय ॥ हाल जानिकै सब माहिल को चुप्पै धावन लीन बुलाय १६ लिखिकै चिट्ठी मलखाने को ऊदन तुरतै दीन पठाय ॥ चिट्ठी पढ़िकै मलखाने ने औ सुलखेको लीन बुलाय १७ कहि समुझायो सब सुलखेको सोऊ चला बेगिही धाय ॥ जायकै पकरयो सो माहिलको तुरतै कैद लीन करवाय १८ लैकै पलकी औ माहिल को सिरसागढ़ै पहुँचा आय ॥ बाँधि जँजीरन फिरि माहिलको फाटक पास दीन बैठाय १६ ऊदन चलिभे फिरि महलनको मल्हनै शीश झुकावा जाय ॥ हाथ जोरिकै ऊदन बोले माता साँच देयँ बतलाय २० माहिल मामा की बातन में इकलो ब्रह्मा दियो पठाय ॥ कुशल न होइहै तहँ ब्रह्माकी साँची बात कहैं हम माय २१ इतना कहिकै ऊदन चलिभे दशहरिपुरै पहुँचे आय ॥ कही हकीकति सब आल्हासों ऊदन बार बार समुझाय २२ चिट्ठी लिखिकै मलखाने ने औ परिमालै दीन जनाय ॥
ब्रह्माका विवाह । २१३ १७ नेवता पठवो सब राजन को यहँहीं कुँवाँ बियाहैं माय २३ धायकै चिट्ठी मलखाने की सोई कीन रजापरिमाल ॥ गायके नेवता परिमालिक का आये सबै तहाँ नरपाल २४ तम्बू गड़िगे महराजन के झण्डा आसमान फहरायँ ॥ सुनवाँ बोली हाँ ऊदन ते तुम सुनिलेउलहुरवाभाय २५ ब्याह नगीचे है ब्रह्माका ना मोहबे का भयो तयार ॥ काह तुम्हारे मनमाँ ब्यापी देवर बेंदुल के असवार २६ सुनिकै बातें ये भौजी की बोले उदयसिंह सरदार ॥ हम नहिं जावैं अब मोहबे का भौजी मानों कही हमार २७ सुनिकै बातें ये ऊदन की सुनवाँ कहे बचन मुसुकाय ॥ दूध पियायो मल्हना रानी सेयो तुम्हें बनाफरराय २८ तुम्हें न चाहिये अस बघऊदन धोखा देउ समय पर आय ॥ धोखो दीन्हो माहिल मामा मलखे कैद लीन करवाय २६ कुशल आपने सब लड़काकी चाहैं सदा लहुरवा भाय ॥ को जगरक्षक है जननी सम ऊदन काह गये बौराय ३० करो तयारी अब भैया सँग मानो कही बनाफरराय ॥ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे आल्है खबरिजनायोजाय ३१ बातें सुनिकै बघऊदन की आल्हा लश्करलियोसजाय ॥ बैठे हाथी आल्हा ठाकुर मनमें सुमिरि शारदामाय ३२ चढ़ा बेंदुला की पीढ़ी पर नाहर उदयसिंह सरदार ॥ दशहरिपुरवा ते चलिकै फिरि पहुंचे मोहबे के दरबार ३३ खातिर कीन्ह्यो परिमालिक ने दोऊ भाय बैठि शिरनाय ॥ भई तयारी फिर सिरसा की सबकोउ अटे तहाँपर जाय ३४ गई पालकी तहँ मल्हना की सिरसा भीर भई अधिकाय ॥