आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
१८ आल्हाखण्ड । २१४ आल्हा दीख्यो जब माहिल को मनमें गई दया तब आय ३५ फिरि ललकार्यो मलखाने को यहुका कीन लहुरवा भाय ॥ जल्दी छोड़ो तुम मामा को हमसों विपति दीखि ना जाय ३६ सुनिकै बातें ये आल्हा की मलखे तुरतै दीन छुड़ाय ॥ कुँवाँ बियाहउ ब्रह्मा ठाकुर पलकी चढ़यो गणेश मनाय ३७ भई तयारी फिरि विवाह की सबियाँ क्षत्री भये तयार ॥ हम ना जैबे अब दिल्ली को बोला उरई का सरदार ३८ बातैं सुनिकै ये माहिल की बोला उदयसिंह त्यहिबार ॥ तुम ना जैहौ जो दिल्ली को तौ को करिहै काम हमार ३६ बाँधि जंजीरन हम लैजैहैं मामा उरई के सरदार ॥ बातैं सुनिकै ये ऊदन की माहिल तुरत भये तय्यार ४० हाथी सजिकै आगे चलि भे पाछे चले घोड़ असवार ॥ पैदल सेना त्यहि पाछे सों तोपैं चलिभइँ पांच हजार ४१ आगे हाथी परिमालिक का पाछे सबै शूर सरदार ॥ पाग बैजनी शिरपर बाँधे ऊदन बेंदुलपर असवार ४२ कूच कराये सिरसागढ़ सों दिल्लीशहर गये नगच्याय ॥ दिल्ली केरे फिरि डाँड़ेपर तम्बू तुरत दीन गड़वाय ४३ ध्वजपताका एकमिल व्हैगै नभमाँ गई लालरी छाय ॥ लागि कचहरी परिमालिककी शोभा कही बून ना जाय ४४ आल्हा बोले चूड़ामणि सों पंडित साइति देउ बताय ॥ लैके पत्रा पंडित बोले मानो कही बनाफरराय ४५ भौनलगन की अब बिरिया है ऐपनबारी देउ पठाय ॥ बातैं सुनिकै चूड़ामणि की मलखे रूपना लीन बुलाय ४६ ऐपनबारी बारी लैके दिल्ली तुरत देउ पहुंचाय ॥
ब्रह्माका बिवाह । २१५ १६ बातें सुनिकै मलखाने की रूपना हाथजोरि शिर नाय ४७ उत्तर दीन्ह्यो मलखाने को मानो कही बनाफरराय ॥ नैनागढ़ भुन्नागढ़ नाहीं ह्याँपर बसै पिथौराराय ४८ लौटब मुशकिल है दिल्ली ते पिरथी मूड़ लेइ कटवाय ॥ औरो बारी हैं मोहेबे के तिनका आप देयँ पठवाय ४६ बातें सुनिकै ये रुपना की बोले उदयसिंह सरदार ॥ तेहा राखो रजपूती का बाँधो सदा ढाल तलवार ५० जौन गोसइयाँ पैदा कीन्ह्यो सोई सदा बचावनहार ॥ बातें सुनिकै उदयसिंह की रूपन बोला बचन उदार ५१ घोड़ा पावैं हरनागर को औ मलखे कि ढाल तलवार ॥ ऐपनवारी हम लै जावैं लावैं नहीं नेकहू बार ५२ सुनिकै बातें ये रूपन की मलखे दीन ढाल तलवार ॥ ऐपनवारी रूपन लैकै हरनागर पर भयो सवार ५३ माथनाय कै सब क्षत्रिन को तुरतै कूच दीन करवाय ॥ पिरथी केरे फिर फाटकपर रूपन तुरत पहूंचा जाय ५४ तब ललकारा दरबानी ने बारी बड़ो के असवार ॥ कहाँते आयो औ कहँ जैहो ताहर समरथ रावरे क्यार ५५ सुनिकै बातें द्वारपाल्जादे रूपन पास बचन ततकाल ॥ आई बरातें हैं मोहेंबे के फाटकपार निकसजापरिमाल ५६ ब्याहन आये हैं ब्रह्माको रूपनवारी नाम हमार ॥ ऐपनवारी हम लाये हैं चाहिये नेग म्हार अब द्वार ५७ सुनिकै बातें ये रूपन की बोला द्वारपाल त्यहिबार ॥ नेगु तुम्हारो का द्वारे का बोलो घोड़े के असवार ५८ सुनिकै बातें द्वारपाल की रूपन कहा बचन ललकार ॥
चारघरी भर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकीधार ५६ जौन शूरमाहो दिल्ली को द्वारे देवै नेग हमार ॥ ऐसे वैसे हम नेगी ना कम्मर बँधी ढाल तलवार ६० शूर सराही हम ऊदन का मलखे सिरसा के सरदार ॥ का गति वरणैं हम आल्हा की जिनसों हारिगई तलवार ६१ तिनके नेगी हम रूपन हैं राजै खबरि जनावो जाय ॥ सुनिकै बातें ये रूपन की रहिगा द्वारपाल सन्नाय ६२ सोचिसमझिकै फिरि बोलनभा रूपन काह गये बौराय ॥ दहीके धोखे कहुँ भूले ना ओतैं जाय कपास चबाय ६३ एक तो ऊदन कै गिनती ना बावन चढ़ैं उदयसिंह आय ॥ ह्यॉपर मलखे सब घर घर हैं आल्हा कौनवस्तु हैं भाय ६४ है परिमालिक अस ठाकुर बहु जिनसे पोत तसीला जाय ॥ जूठनि खावै घर घर बारी सो का रारि मचावै आय ६५ पीकै दारू को आवा है की वश सन्निपात के भाय ॥ झूरिभांग जो तू खावा हो तौ हम औषधि देयँ बताय ६६ ज्ञान ठिकाने करि सागढ़ सों राजै काह सुनावैं जाय ॥ सुनिकै बातें करि डाँड़ेपर रूना बोला क्रोध बढ़ाय ६७ आयगयो तब परिमालिक कौ तहाँ यों कोऊ कहुँ देखि परैना। जानत नाहिन रूपन को अरु नाहक दुष्ट बकै बहु बैना ॥ ताहर नाहर को गहि कै इकलो मलखान जिता बिन सैना। का बड़िवात करै ललिते दिनही नहिं देखिपरै तब नैना ६८ बातें सुनिकै ये बारी की चलिभा द्वारपाल ततकाल ॥
ब्रह्मका विवाह । २१७ २१ हाथ जोरिकै महराजा को सब बारीके कहे हवाल ६९ सुनिकै बातें द्वारपाल की यहु महराज पिथौराराय ॥ सूरज लड़का को बुलवायो औ सबहाल कह्यो समुझाय ७० पकरिकै लावो त्यहि बारी को हमको बेगि दिखावो आय ॥ सुनिकै बातें महराजा की सूरज चलिभा शीशनवाय ७१ दीख दुआरेपर बारी को नाहर घोड़े पर असवार ॥ शंका जाके कछु नाहीं है हाथ म लिये नाँगि तलवार ७२ हुकुम लगावा द्वारपाल को फाटक बंद लेउ करवाय ॥ फिरि लयलकारा रजपूतन को लावो पकरि शूरमाँ जाय ७३ हुकुम पायकै तब सूरज को तुरतै चले सिपाही धाय ॥ ऍंड़ लगायो हरनागर के टापन क्षत्री दीन गिराय ७४ बहुतन मार्यो रूपनबारी हाहाकार शब्द गा छाय ॥ देखि तमाशा सूरज ठाकुर मनमाँ बार बार पछिताय ७५ रूपनबारी के मुर्चा माँ कोऊ शूर न रोँकै पायँ ॥ उड़न बछेड़ा हरनागर ने बहुतक क्षत्री दीन गिराय ७६ फिरि फिरि मारै औ ललकारै बारी बड़ा लड़ैया ज्वान ॥ देखि तमाशा यहुबारी का ताहर समरधनी चौहान ७७ सूरज ताहर दुउ शहजादे रूपन पास पहुंचे जाय ॥ ऍंड़ लगायो हरनागर के फाटकपार निकरिगा साय ७८ मारो मारो हल्ला कैकै क्षत्री सबै चले बिरझाय ॥ नेग लेब अब हम भौरिन में गरई हाँक दीन गुहराय ७९ इतना कहिकै ऍड़ लगायो फौजन तुरत पहुंचा आय ॥ जैसे फागुन फगुई खेलैं लोहू छीटन गयो अन्हाय ८० तैसे दीख्यो जब रूपन का बोल्यो उदयसिंह सरदार ॥
२२ आल्हखण्ड । २१८ कहौ हकीकत सब दिल्ली कै द्वारे भली कीन तलवार =१ बातैं सुनिकै उदयसिंह की रूपन यथातथ्य गा गाय ॥ सुनिकै बातें ये रूपन की माहिल बोले वचन बनाय =२ यह नहिं चाहिये पृथीराज को जो अब रारि बढ़ावत जायँ ॥ कौन दुसरिहा है आल्हा का सम्मुख लड़ै समर में आय =३ जो मन पावै बघऊदन का राजै तुरत देयँ समुझाय ॥ नेग कराय देयँ द्वारे का सातो भाँवरि देयँ फिराय =४ भली भली कहि ऊदन बोले माहिल घोड़ी लीन मँगाय ॥ चढ़िकै घोड़ी माहिल ठाकुर दिल्ली शहर पहुँचे जाय ८५ को गति बरर्णै तहँ पिरथी कै भारी लाग राजदरबार ॥ खाँड़ेराय पिरथी का भाई धाँधू तासु पुत्र सरदार ८६ रहिमति सहिमति जिन्सीवाले औ रणधीर लहाउर क्यार ॥ भुर्रा सुगुलिया काबुल वाला टिहुनन घरे नाँगि तलवार =७ देवी मरहटा दक्षिण वाला आला समरथनी मैदान ॥ अंगद राजा ग्वालियर का जगनिकक्यारभुरंगताज्वान== सातो लड़िका पृथीराज के तेऊ बैठि राजदरबार ॥ मोती जवाहर, गोपी, ताहर, सूरज, चन्दन ये सरदार =८ मर्दन, सर्दन, सातो लड़िका ये रणबाघ लड़ैया बाल ॥ सोने सिंहासन पिरथी सोहैं त्यहिमाँ जड़े जवाहरलाल ९० औरो ठाकुर बहु बैठे हैं एकते एक शूर सरदार ॥ तहँही पहुँचे उरई वाला तुरतै कीन्ह्यो राम जुहार ६१ कियो खातिरी पृथीराजने अपने पास लीन बैठाय ॥ माहिल बोला तब पिरथी ते मानो कही पिथौरागाय ६२ काम न सरिहै लड़े भिड़ेते दूनों तरफ हानिहै आप ॥
[Header] ब्रह्माका बिवाह । २१६ २३
जहर घुरावो तुम शरबत में औ लशकरमें देउ पठाय ६३ बिना बयारी जूना टूटे औ बिन औषधि बहै बलाय ॥ यहै तयारी अब करिदारो तौ सबकाम सिद्ध है जाय ६४ साम दाम औ दण्ड भेद सों क्षत्री करें आपनो काम ॥ छल बल क्षत्री का धर्म है तुमको कौन करै बदनाम ६५ बातें सुनिकै ये माहिल की भा मन बड़ा खुशी नरनाह ॥ स्याबासि स्याबासि उरई वाले हमका नीकि दीन सलाह ६६ बिदा मांगिकै पृथीराज सों तम्बुन फेरि पहुंचा आय ॥ हाल बतायो परिमालिक को चेउँ न करी पिथौराराय ६७ जैसे पियासा पानी पावै सूखे धान परै जस नीर ॥ बातें सुनिकै ये माहिल की तैसे आय गयो मनधीर ६८ घड़ा मँगायो ह्वाँ पिरथी ने तामें जहर दीन डरवाय ॥ चारो नेगिन को बुलवायो सूरज पूत लीन बुलवाय ६६ कह्यो हकीकति सब सूरज सों पिरथी बार बार समुझाय ॥ तुरत कहारन को बुलवायो सूरज घड़ा लीन उठवाय १०० माथनायकै फिरि पिरथी को मनमें श्रीगणेश पद ध्याय ॥ सूरज चलिभा फिरि दिल्ली सों लश्कर तुरत पहुंचा आय १०१ जहँना तम्बू परिमालिक का बहिँगी तहाँ दीन धरवाय ॥ माथ नायकै परिमालिक को आपो बैठिगयो तहँ जाय १०२ मलखे बैठे हैं दहिने पर बायें बैठ उदयसिंहराय ॥ बैठ बराबर आल्हा ठाकुर शोभाकही बूत ना जाय १०३ सूरज बोले तहँ राजा सों शरबंत आप देउ बँटवाय ॥ करो तयारी फिरि द्वारे की साइति आयगईनगच्याय १०४ देवा बोला महराजा सों मानो कही चँदेलो राय ॥
२४ आल्हखण्ड । २२० पहिले शरबत माहिल पीवैं पाछे सब को देउ बताय १०५ इतना सुनिकै सूरज चलिभे तुरतै काने जनो चढ़ाय ॥ माहिल बोले तब देबाते क्षत्री काह गये बौराय १०६ पान बड़ेको पानी छोटे यहहै रीति सदा की भाय ॥ भाय लहुरवा शरबत पीवै औरो पियैं बनाफरराय १०७ माघ महीना दिन शरदी के हमरो शरबत पियै बलाय ॥ शिरमें पीड़ा ऐसे होवै औ फिरिसन्निपातहै जाय १०८ बातैं सुनिकै ये माहिल की देवा कुत्ता लीन बुलाय ॥ पीतै शरबत कुत्ता मरिगा तब सब गये तहां सन्नाय १०६ जितना शरबत रहै बहिंगिनमें सो सब खन्दक दीन डराय ॥ भागिकै सूरज दिल्ली आये औ दरबार पहुंचे आय ११० खबरि जनाई सब राजा को नेगी चले यहां ते धाय ॥ भागत नेगिन ऊदन देखा पकरा तुरत सबनको जाय १११ दया आयगै तब आल्हा के तुरतै नेगी दीन छुड़ाय ॥ नेगी चलिभे सब दिल्ली को औ दरबार पहुंचे आय ११२ कही हकीकति सब पिरथी ते नेगिन बार बार शिरनाय ॥ माहिल बोले परिमालिक ते मानो कही चँदेलेराय ११३ यह नहिं करतब है पिरथी कै लरिकन घाटि कीन ह्याँ आय ॥ रक्षक ज्यहिको है परमेश्वर त्याहिकोबार न बाँका जाय ११४ पै रिस हमरे अस आई है सबियाँ दिल्ली डेरैं खुदाय ॥ काह बतावैं हम जीजा ते तुम सुनिलेउ लहुरवाभाय ११५ शङ्का हमपर है देवा की साँचे हाल देयँ बतलाय ॥ हम नहिं जानत यह करतबरहैं मानो कही बनाफरराय ११६ बड़ी पियारी मल्हना बहिनी औ नित खातिर करै हमारि ॥
[Header] ब्रह्माका विवाह । २२१ २५
सगो भानजो ब्रह्मा हमरो तासौं कौनि हमारी रारि ११७ सुनिकै बातें ये माहिल की बोले उदयसिंह त्यहिबार ॥ अब तुम जावो फिरि दिल्लीको मामा उरई के सरदार ११८ शंका तुमपर नहिं काहूकी मामा मानो कही हमारि ॥ रक्षक ज्यहिकी जगदम्बा है त्यहिकोसकै कौनजगमारि ११९ सुनिकै बातें ये ऊदन की माहिल घोड़ी लीन मँगाय ॥ चढ़िकै घोड़ी माहिल ठाकुर फिरि दरबार पहुंचे जाय १२० बड़ी खातिरी राजा कीन्ह्यो माहिल बैठिगयो शिरनाय ॥ माहिल बोले फिरि राजा ते मानो कही पिथौराराय १२१ खंभ गड़ावो दरवाजे पर तिनपर कलश देउ धरवाय ॥ जाँरा भौंरा दोनों हाथी तिनके आगे देउ छुड़ाय १२२ प्यायकै दारू तिन हाथिन को तुरतै मस्त देउ करवाय ॥ द्वारे आवैं जब परिमालिक तबयह बोल्योवचनसुनाय १२३ हाथी पछारो म्वरे द्वार में तुरतै भाँवरि देयँ डराय ॥ कुल की हमरे यह रीती है मानो कही चँदेलेराय १२४ अवती बचिहैं नहिं द्वारे पर मानो कही पिथौराराय ॥ इतना कहिकै माहिल चलिभे तम्बुन फेरि पहुंचे आय १२५ भई तयारी ह्वाँ दिल्ली में द्वारे खम्भ दीन गड़वाय ॥ जो कुछ माहिल बतलावाथा सो सब सामा दीन कराय १२६ गाड़ो छावा गा जल्दी सों जल्दी चौक भई तय्यार ॥ अई सुहागिल बहु दिल्ली की गावनलगीं मंगलाचार १२७ देखिकै सूरति ह्वाँ माहिल की मलखे कहे वचन यहिबार ॥ खवरि बनावो सब दिल्ली की मामा उरई के सरदार १२८ सुनिकै बातें ये मलखे की माहिल बोले वचन बनाय ॥
[Header] ३६ आल्हखण्ड । २२२
करो तयारी अब द्वारे की मानो कही बनाफरराय १२६ मलखे बोले परिमालिक ते दूनो हाथ जोरि शिरनाय ॥ हुकुम जो पावैं महराजा को ह्योते कूच देयँ करवाय १३० बातें सुनिकै मलखाने की राजा हुकुम दीन फरमाये ॥ बाजे डंका अहलंका के हाहाकारी शब्द सुनाय १३१ रथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़नपर असवार ॥ जितनी फौजें परिमालिक की सबियाँ वेगि भई तय्यार १३२ मनियादेवन को सुमिरन करि गजपर बैठि रजापरिमाल ॥ मारु मारुकै मौहरि बाजी बाजी हावहाव करनाल १३३ गर्द उड़ानी तब पिरथी माँ लोपे अन्धकारसों भान ॥ मारू तुरही बाजन लागीं घूमनलागे लालनिशान १३४ आगे पलकी भै ब्रह्माकै पाछे चले सिपाही ज्वान ॥ घोड़ी कबूतरी के ऊपरमाँ दहिने चला वीरमलखान १३५ बँयें बेंदुला को चढ़वैया नाहर लिये नाँगि तलवार ॥ पाग बैंजनी शिरपर सोहै तापर कलँगी करै बहार १३६ गर्द न समझैक्यहु डशमनको क्षत्री उदयसिंह सरदार ॥ शोभा वरणै को आल्हा की साँचो धर्मरूप अवतार १३७ भा खलभट्टा औ हल्ला अति दिल्ली पास गये नगच्याय ॥ चन्दन बेटा को बोलवायो यहु महराज पिथौराराय १३८ भई तयारी अगवानी की दिल्ली सजन लागि सरदार ॥ रथ औ हाथिन में बहु बैठे छैला घोड़न भे असवार १३६ बड़ी सजाई भे ठकुरनक छैला चलिभे बाँधि कतार ॥ भाला बल्छी फरसा बाँधे कोऊ लिये ढाल तलवार १४० दगी सलामी दुहुँ तरफन ते धुँवना छायगयो असमान ॥
ब्रह्माका विवाह । २२३ २६ आतशबाजी की शोभा अति भाला तारा के अनुमान १-- कउँधालपकनि खड्गचमकनि हूकनि गुड़गुड़दीन मचाय ॥ पैग पैग पर दूनों चलि चलि रुकिरुकिपैगपैगपर जायँ १४२ को गति बरणै महराजन कै मानो देव भूमिगे आय ॥ दो बिचवानी दउ दिशि घूमें रुकिरुकिपैगपैगपर जायँ १४३ उठै सुगन्धैं तहँ अतरन की बेला और चमेला हार ॥ का गति बरणों मैं निवारि की क्षत्री किये फूल श्रृंगार १४४ नीली पीली जंगाली औ लाली पगड़िनकेरि कतार ॥ मुँदरी छल्ला मोहनमाला क्यहुगरपरामोतिनकाहार १४५ देखें तमाशा जे नारी नर तिनका लागै नीकि बहार ॥ शाल दुशाले नीले पीले चमकैं इन्द्रधनुष अनुहार १४६ बाल सूर्य्यसम मूंगा चमकैं दमकैं तहाँ जवाहरलाल ॥ जब अगवानी पूरण हैगै गावन लगीं द्वारपरबाल १४७ संगम हैगा दुहुँ तरफा ते दूनों तरफ भये सतकार ॥ दूनों मिलिकै संगम हैकै पहुँचे पृथीराज के द्वार १४८ जौरा भौंरा हाथी ठाढ़े ताहर बोले बचन पुकार ॥ जौन शूरमा हों मोहबे के द्वारे हाथी देयँ पछार १४६ सुनिकै बातें ये ताहर की चलिभा उदयसिंह झन्नाय ॥ जावत देख्यो उदयसिंह को मलख्यो चला तुरत ठन्नाय १५० को गति बरणै दोउ बीरन की मानो चले कृष्ण बलराम ॥ ऊदन सुमिरयो श्रीशारद को मलखेलीनशिवाशिवनाम १५१ ऊदन चलिभा जौरा दिशिको मलखे भौंरा की दिशिजाय ॥ पूँछ पकरिकै तिन हाथिन कै जैसे सिंह घसीटै गाय १५२ तैसे ऊदन मलखे ठाकुर दोऊ नाग घसीटैं धाय ॥
३६ आल्हखण्ड । २२४
करो तमाशा दिल्लीवाले अँगुरी दाँते लीन चपाय १५३ मलखे ऊदन दोऊ ठाकुर सम्मुख गही सूँढ़ को आय ॥ दाबिकै मस्तक तिन हाथिनका दूनों दीन्हों भूमि लुटाय १५४ दाँत तूरिकै तिन हाथिन का दोऊ चढ़े घोड़ पर आय ॥ ताहर बोले फिरि दोउन ते गानो कही बनाफरराय १५५ कलश गिरावो अब खम्भन ते तौ हम कही शूर फिरि भाय ॥ इतना सुनिकै जगनिक ठाकुर कलशन पासपहुँचा जाय १५६ ताहर बोला कमलापति सों मारो याहि दौरि सरदार ॥ इतना सुनिकै कमलापति फिरि दौरे लिहे नाँगितलवार १५७ क्रोगति बरखै जगनायक कै भैनो जौन चँदेले क्यार ॥ आवत दीख्यो कमलापति को गरुई हाँक दीन ललकार १५८ लौटिज ठाकुर म्वरे मुर्चाते नहिं शिर काटि देउँ भुइँ डारि ॥ सुनिकै बातें जगनायक की कमलापतिउ बढ़ायोरारि १५६ हथी बढ़ायो फिरि आगे को जगनिक पास पहुंच्यो जाय ॥ ऐँड़ लगायो हरनागर को हौदा उपर बिराजा आय १६० भाला मार्यो कमलापति को सोतो लीन ढाल पर वार ॥ रिसहा बैकै जगनायक फिरि तुरतै खैंचिलीन तलवार १६१ ऐंचि महाउत की मारत भा तुरतै भूमि दीन शिरडार ॥ आवा मस्तक ते भूमा फिरि गरुई हाँक दीन ललकार १६२ सँभरिकै बैठै अब हौदापर ठाकुर हाथी के असवार ॥ की भगि जावै म्वरे मुर्चा ते नहिंअबजानचहतयमद्वार १६३ बातें सुनिकै जगनायक की कमलापतिउ दीन ललकार ॥ काह गवाँरे तू बोलत है ठाकुर घोड़े के असवार १६४ तू अस छत्री हम संगर में केतन्यो डारे खेलि शिकार ॥
ब्रह्माका विवाह । २२५ २६' ऐसी बातें जो फिरि बोलै तौ मुहँ धाँसिदेउँ तलवार १६५ बातैं सुनिकै कमलापति की भैने जौनु चँदेले क्यार ॥ ऐँड़ लगायो हरनागर के हाथी उपर गयो सरदार १६६ भाला मार्यो कमलापति के तोंदी परा घाव सो जाय ॥ द्वार जूझिगा कमलापति जब रहिमतसहिमतचलेरिसाय१६७ ऊदन बोले तब देवा ते ठाकुर मैनपुरी चौहान ॥ देखो आवत दुइ लड़ने को उतसों समर भूमिमें ज्वान १६८ मन्नागूजर को सँग लै कै मारो समर भूमि मैदान ॥ तुम्हरी दूनन की बरणी है मानो कही बीर चौहान १६६ सुनिकै बातें बघऊदन की दोऊ बढ़े अगाड़ी ज्वान ॥ रहिमत सहिमतको ललकार्यो होवो खड़े समर मैदान १७० सुनिकै बातें इन दोउन की उनहुन खैंचि लीन तलवार ॥ उसरिन उसरिन दोऊ मारैं दोऊ लेयँ ढालपर वार १७१ बड़ी लड़ाई भै द्वारेपर औ बहि चली रक्तकी धार ॥ रहिमत सहिमत जिन्सीवाले घायल भये द्वऊ सरदार १७२ सुमिरि भवानी महिरवाली मनियादेव मोहेबे क्यार ॥ घोड़ बढ़ायो बघऊदन ने दोऊ कलशा लिये उतार १७३ देखि वीरता बघऊदन की भा मन खुशी पिथौराराय ॥ हँसिकै बोल्यो बघऊदन ते मानो कही बनाफरराय १७४ उलटी रीती हमरे घरकी ऐसो सदा क्यार व्यवहार ॥ हो समधवारो जब द्वारेपर तबफिरिभौरिनकाव्यवहार१७५ अब तुम लावो परिमालिक को यहहू नेग यहाँ द्वैजाय ॥ होय तयारी फिरि भौरिनकै साँचे हाल दीन बतलाय १७६ इतना सुनिकै ऊदन चलिभो पहुँचा जहाँ रजापरिमाल ॥ १५
३० | आल्हखण्ड । २२६
जो कछु भाषा पृथीराज ने | ऊदन जाय कह्यो सब हाल १७७ सुनी हकीकति जब माहिल सब | पहुंचा पृथीराज के पास। बड़ी उदासी सों बोलत भा | राजा करो बचन विश्वास १७८ ब्याह जो होइहै ब्रह्मानँद का | होइहै बड़ा जगत उपहास॥ भेटन आवैं परिमालिक जब | तब तुम करो द्वारपर नाश १७६ इतना कहिकै माहिल चलिभे | अब ऊदनके सुनो हवाल॥ सुनिकै बातें बघऊदन की | बोले तुरत रजा परिमाल १८० ताकत हमरे अस नाहीं है | जो हम मिलैं द्वार समध्वार॥ गजभर छाती पृथीराज की | क्यहिके जमे करजे बार १८१ रह्यो भरोसे तुम हमरे ना | मानो कही बनाफरराय॥ मलखे बोले तब आल्हा ते | दोऊ हाथ जोगि शिर नाय १८२ भयो हँसौवा अब दिल्ली माँ | दादा साँच परे दिखराय॥ ऐसी बातें राजा बोलैं | सो तुम सुनी रह्यो है भाय १८३ अब तुम चलिहौ समध्वारे को | तौ सब बात यहाँ रहिजाय॥ हँसिहैं दिल्ली में नरनारी | भारी विपति परी अब आय १८४ जेठो भाई बाप बरोबरि | तुम्हरे गये बात बनि जाय॥ सुनिकै बातें ये मलखे की | आल्हा हाथी दीन बढ़ाय १८५ ठाढ़े पृथीराज जहाँ | तहँपर गये बनाफरराय॥ उतरिकै हाथी के हौदा ते | मनमें सुमिरि शारदा माय १८६ गये सामने जब पिरथी के | दधि औ पान दीन चपकाय॥ लखैं तमाशा तहँ नारी नर | भा समध्वार द्वार पर याय १८७ पिरथी बोले तहँ आल्हा सों | मानो कही बनाफरराय॥ अब तुम जावो निज तम्बू को | भौरी समय गयोन गचयाय १८८ निकै बातें ये पिरथी की | लश्कर कूच दीन करवाय॥
ब्रह्माका बिवाह । २२७ ३१ बाजे डंका अहतंका के तम्बुन फेरि पहुंचे आय १८६ पिरथी पहुंचे राजमहल को सबियाँ झगड़ा गयो पटाय ॥ खेत छूटि गा दिननायक सों झंडागड़ा निशाको आय १६० करों बन्दना पितु अपने की जिन बल भयोतरँगकोअन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १६१
३० आल्हखण्ड जो कछु भाषा पृथ्वीराज ने सुनी हकीकति जब माहिल सबै बड़ी उदासी सों बोलत भा ब्याह जो होइहै ब्रह्मानँद का भेटन आवैं परिमालिक जब इतना कहिकै माहिल चलिभे सुनिकै बातें बघऊदन की ताकत हमरे अस नाहीं है गजभर छाती पृथ्वीराज की रह्यो भरोसे तुम हमरे ना मलखे बोले तब आल्हा ते भयो हँसौवा अब दिल्ली माँ ऐसी बातें राजा बोलैं अब तुम चलिहौ समध्वारे को हँसिहैं दिल्ली में नरनारी जेठे भाई बाप बरोबरि सुनिकै बातें ये मलखे की ... ठाढ़े पृथ्वीराज जहाँ उतरिकै हाथी के हौदा ते गये सामने जब पिरथी के लखैं तमाशा तहँ नारी नर पिरथी बोले तहँ आल्हा से अब तुम जावो निज तम्बू के सुनिकै बातें ये पिरथी कें
ब्रह्माका विवाह । २२७ ३१ बाजे डंका अहतंका के तम्बुन फेरि पहुंचे आय १८६ पिरथी पहुंचे राजमहल को सबियाँ झगड़ा गयो पटाय ॥ खेत छूटि गा दिननायक सों झंडागड़ा निशाको आय१६० करों बन्दना पितु अपने की जिन बल भयोतरँगकोअन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १६१ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी,आई,ई ) मुंशी नवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागना- रायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्र वंशोद्भवबुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसादकृतब्रह्माद्वारचार वर्णनौनामाद्वितीयस्तरंगः ॥ २ ॥
३६ आल्हखण्ड । २३२ पहिली भाँवरि के परतै खन ताहर हनी तुरत तलवार ४४ दहिने ठाढ़ो मलखे ठाकुर सो लैलीन ढाल पर वार ॥ आधे आँगन भौंरी होवैं आधे चलनलागि तलवार ४५ ब्रह्मा ठाकुर की रक्षा में आल्हा ठाकुर भये तयार ॥ मलखे सुलखे जगनिक देवा आँगन करैं भड़ाभड़ मार ४६ तेगा चटकै बर्दवान का ऊना चलै विलाइति क्यार ॥ छुरी छूरा कोउ कोउ मारैं कोताखानी चलैं कटार ४७ फिरि फिरि मारैं औ ललकारैं नाहर दिल्ली के सरदार ॥ आँगन थिरकै उदन बाँकुड़ा लीन्हे हाथ नाँगि तलवार ४८ मूड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुंडन के लगे पहार ॥ बड़ी लड़ाई भै आँगन में औ वहिचली रक्तकी धार ४६ अपन परावा कछु सूझै ना आमाझोर चलै तलवार ॥ बड़े लड़ैया मलखे सुलखे नामी सिरसा के सरदार ५० कोगति वरणै तहँ ताहर कै दूनों हाथ करै तलवार ॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै नाहर उदयसिंह सरदार ५१ कोगति वरणै तहँ देवाकै क्षत्री मैनपुरी चौहान ॥ मन्नागूजर जगना ठाकुर इनहुन खूबकीन मैदान ५२ मोहन ठाकुर बौरी वाला रणमाँ बड़ा लड़ैयाज्वान ॥ जोगा भोगा दोनों भाई मारिकै खूबकीन खरिहान ५३ विकट लड़ाई भै आँगन में साँगन खूब भई तहँ मार ॥ सातो लड़का पृथीराज के बाँध्यो सिरसाके सरदार ५४ सातो भँवरी ब्रह्मानँदकी आल्हा तुरत लीनकरवाय ॥ देखि तमाशा बघऊदन का पिरथी गये सनाकाखाय ५५ चौंड़ा बोला त्यहि समया में मानो कही पिथौरा राय ॥
ब्रह्माका विवाह। २३३ ३७ अबहीं जावैं हम मड़येतर सबके बन्धन देयँ छुड़ाय ५६ इतना कहिकै चौंड़ा चलिभा मड़ये तरे पहुँचा आय ॥ चौंड़ा बोला फिरि आल्हाते मानो कही बनाफरराय ५७ इकलो लड़का भीतर पठवो सो लहकौरि खानको जाय ॥ मुशकें छोड़ो सब लरिकन की यह कहिदीन पिथौराराय ५८ दया आयगै मलखाने के मुशकें तुरत दीन छुड़वाय ॥ अब तुम जावो जनवासे को बोला फेरि चौंडियाराय ५६ नाउनि आई फिरि भीतर सों औ आल्हासों कह्यो सुनाय ॥ इकलो दूलह अब पठवावो रानी भीतर रहीं बुलाय ६० ऊदन बोले तब नाइनिते सांची मानो कही हमार ॥ संग न छाँड़ै सहिबाला कहूँ यह है मोहबे का व्यवहार ६१ इतना सुनिकै नाइनि बोली जल्दी चलो करो नहिं बार ॥ आगे नाइनि फिरि दूलह भा पाछे बेंदुल का असवार ६२ और बीर सब तम्बुन आये ये दोउ महल पहुँचे जाय ॥ चौंड़ा बोला पृथीराज सों आयसु मोहिं देउ फरमाय ६३ मैं अब मारों बघऊदन को औसर नीक पहुँचा आय ॥ सुनिकै बातें ये चौंड़ा की आयसु दीन पिथौराराय ६४ बिछिया अँगुठा चौंड़ा पहिरयो लीन्ह्यो रूप जनाना धार ॥ ठुम्मुक ठुम्मुक चौंड़ा चलिभा बिषधर चापे बगलकटार ६५ जायकै पहुंच्यो त्यहि महलनमें ऊदन जहाँ करै ज्यउँनार ॥ इचिता दीख्यो जब ऊदन को चौंड़ा मारी तुरत कटार ६६ खाय मूर्च्छा ऊदन गिरिगे नारिन कीन तहाँ चिग्घार ॥ भये सनाका ब्रह्माठाकुर मनमाँ लागे करन विचार ६७ आजु बीरता गै मोहबे ते जो मरिगयो लहुरवा भाय ॥
३८ आल्हखण्ड । २३४ मई न ऐसो कहूँ पैदा भो जैसो रहै बनाफरराय ६८ सोच आयगा ब्रह्मानँद के मनमाँ बार बार पछिताय ॥ छाती पीटै रानी अगमा महलन गिरी पछाराखाय ६९ तोहिं चौंड़िया यह चाही ना कीन्हे घाटि महलमौँ आय ॥ नालति तेरी द्विज देही का चौंड़ा काहगये बौराय ७० घाव मूंदिकै बघऊदन का रानी औषध दीनलगाय ॥ कन्या राजनकी महरानी औ सब जानै भले उपाय ७१ मारु कूटकी घर घर चरचा क्षत्री बंश रहै तंत्र भाय ॥ राजा पिरथी की महरानी त्यहिबघऊदनदीनजियाय ७२ उठा दुलरूवा द्यावलिवाला बेला देखिगई हर्षाय ॥ ऐसि खुशहाली भै ब्रह्मा के जैसे योग सिद्धि है जाय ७३ गवैं सुहागिल दिल्ली वाली लैलै नाम बनाफरक्यार ॥ बड़ी खुशहाली भै महलन में होवन लाग मंगलाचार ७४ पायँ लागिकै महरानी के बोला उदयसिंह सरदार ॥ आयसु तुम्हरी जो हमपावैं तौ तम्बुन को होयँ तयार ७५ रूप देखिकै बघऊदन को नारी पीटन लगींकपार ॥ भई अभागिनिहमसब महलन अब ये चलन हेत तय्यार ७६ रूप न देखा क्यहु क्षत्री का जैसो उदयसिंह सरदार ॥ पाग बैंजनी शिरपर बाँधे ऊपर कलँगी करै बहार ७७ बेला चमेला के गजरा हैं तिनपर परा मोतियनहार ॥ बाँके नैना यहि क्षत्री के सखिया चुभै करेजे फार ७८ मन बौराना सहिवाला पर आला देवरूप अवतार ॥ दूसरि बाला त्यहि काला में बोली मानो कही हमार ७९ आगि तुम्हारी अस नाहीं है जो ये होयँ तोर भर्तार ॥
ब्रह्माका विवाह । २३५ १६ लालति तुम्हरे मन चब्बन को तुमका बार बार धिक्कार ८० त्यही समैया ऊदन चलिभा सबसों बिदा मांगि त्यहिबार ॥ चढ़ा पालकी ब्रह्मा ठाकुर ऊदन बेदुल भा असवार ८१ आयकै पहुंचे दूउ लश्कर में जहाँ दरबार चँदेले क्यार ॥ हाथ पकरिकै ब्रह्मा ऊदन तम्बुन गये दोऊ सरदार ८२ चरणन परिकै परिमालिक के बैठे दूऊ बीर बलवान ॥ पूंछन लागे बघऊदन ते तुरतै तहाँ बीर मलखान ८३ कहौ हकीकति सब महलनकी कैसी भई रीति ब्यवहार ॥ सुनिकै बातें मलखाने की कहिगा यथातथ्य सरदार ८४ सुनिकै बातें बघऊदन की आल्हा ठाकुर लीन बुलाय ॥ कमर बिलोकै बघऊदन की कैसा परा कटारी घाय ८५ चिह्न न पायो कहूं घाव को आल्हा बोल्यो बचनसुनाय ॥ झूठ न बोलत तुम ऊदन रहौ कैसी किह्यो दिल्लगी भाय ८६ ब्रह्मा बोले तब आल्हा ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ साँची दादा ऊदन बोल्यो झूठ न कह्यो लहुरवाभाय ८७ लीन्हे बूटी रानी आई सो ऊदन के दिह्यो लगाय ॥ घाव पूरिगा बघऊदन का औ उठि बैठ लहुरवा भाय ८८ सुनिकै बातें ब्रह्मानँद की गे परिमाल सनाकाखाय ॥ कूच कराओ अब लश्कर को बोला फेरि चँदेलाराय ८९ बातें सुनिकै महराजा की मलखे रुपना लीन बुलाय ॥ औ समझायो यह रुपना को यह तुम कहौ पिथौ रैजाय ९० कह्यो सँदेशा परिमालिक है बेटी बिदा देयँ करवाय ॥ इतना सुनिकै रुपना चलिभा औफिरि अटा द्वारपरजाय ९१ द्वारे ठाढे पिरथी राजा तिनसों बोला शीश नवाय ॥