भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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चारघरी भर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकीधार ५६ जौन शूरमाहो दिल्ली को द्वारे देवै नेग हमार ॥ ऐसे वैसे हम नेगी ना कम्मर बँधी ढाल तलवार ६० शूर सराही हम ऊदन का मलखे सिरसा के सरदार ॥ का गति वरणैं हम आल्हा की जिनसों हारिगई तलवार ६१ तिनके नेगी हम रूपन हैं राजै खबरि जनावो जाय ॥ सुनिकै बातें ये रूपन की रहिगा द्वारपाल सन्नाय ६२ सोचिसमझिकै फिरि बोलनभा रूपन काह गये बौराय ॥ दहीके धोखे कहुँ भूले ना ओतैं जाय कपास चबाय ६३ एक तो ऊदन कै गिनती ना बावन चढ़ैं उदयसिंह आय ॥ ह्यॉपर मलखे सब घर घर हैं आल्हा कौनवस्तु हैं भाय ६४ है परिमालिक अस ठाकुर बहु जिनसे पोत तसीला जाय ॥ जूठनि खावै घर घर बारी सो का रारि मचावै आय ६५ पीकै दारू को आवा है की वश सन्निपात के भाय ॥ झूरिभांग जो तू खावा हो तौ हम औषधि देयँ बताय ६६ ज्ञान ठिकाने करि सागढ़ सों राजै काह सुनावैं जाय ॥ सुनिकै बातें करि डाँड़ेपर रूना बोला क्रोध बढ़ाय ६७ आयगयो तब परिमालिक कौ तहाँ यों कोऊ कहुँ देखि परैना। जानत नाहिन रूपन को अरु नाहक दुष्ट बकै बहु बैना ॥ ताहर नाहर को गहि कै इकलो मलखान जिता बिन सैना। का बड़िवात करै ललिते दिनही नहिं देखिपरै तब नैना ६८ बातें सुनिकै ये बारी की चलिभा द्वारपाल ततकाल ॥