आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ आल्हखण्ड । २२० पहिले शरबत माहिल पीवैं पाछे सब को देउ बताय १०५ इतना सुनिकै सूरज चलिभे तुरतै काने जनो चढ़ाय ॥ माहिल बोले तब देबाते क्षत्री काह गये बौराय १०६ पान बड़ेको पानी छोटे यहहै रीति सदा की भाय ॥ भाय लहुरवा शरबत पीवै औरो पियैं बनाफरराय १०७ माघ महीना दिन शरदी के हमरो शरबत पियै बलाय ॥ शिरमें पीड़ा ऐसे होवै औ फिरिसन्निपातहै जाय १०८ बातैं सुनिकै ये माहिल की देवा कुत्ता लीन बुलाय ॥ पीतै शरबत कुत्ता मरिगा तब सब गये तहां सन्नाय १०६ जितना शरबत रहै बहिंगिनमें सो सब खन्दक दीन डराय ॥ भागिकै सूरज दिल्ली आये औ दरबार पहुंचे आय ११० खबरि जनाई सब राजा को नेगी चले यहां ते धाय ॥ भागत नेगिन ऊदन देखा पकरा तुरत सबनको जाय १११ दया आयगै तब आल्हा के तुरतै नेगी दीन छुड़ाय ॥ नेगी चलिभे सब दिल्ली को औ दरबार पहुंचे आय ११२ कही हकीकति सब पिरथी ते नेगिन बार बार शिरनाय ॥ माहिल बोले परिमालिक ते मानो कही चँदेलेराय ११३ यह नहिं करतब है पिरथी कै लरिकन घाटि कीन ह्याँ आय ॥ रक्षक ज्यहिको है परमेश्वर त्याहिकोबार न बाँका जाय ११४ पै रिस हमरे अस आई है सबियाँ दिल्ली डेरैं खुदाय ॥ काह बतावैं हम जीजा ते तुम सुनिलेउ लहुरवाभाय ११५ शङ्का हमपर है देवा की साँचे हाल देयँ बतलाय ॥ हम नहिं जानत यह करतबरहैं मानो कही बनाफरराय ११६ बड़ी पियारी मल्हना बहिनी औ नित खातिर करै हमारि ॥