भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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१८ आल्हाखण्ड । २१४ आल्हा दीख्यो जब माहिल को मनमें गई दया तब आय ३५ फिरि ललकार्यो मलखाने को यहुका कीन लहुरवा भाय ॥ जल्दी छोड़ो तुम मामा को हमसों विपति दीखि ना जाय ३६ सुनिकै बातें ये आल्हा की मलखे तुरतै दीन छुड़ाय ॥ कुँवाँ बियाहउ ब्रह्मा ठाकुर पलकी चढ़यो गणेश मनाय ३७ भई तयारी फिरि विवाह की सबियाँ क्षत्री भये तयार ॥ हम ना जैबे अब दिल्ली को बोला उरई का सरदार ३८ बातैं सुनिकै ये माहिल की बोला उदयसिंह त्यहिबार ॥ तुम ना जैहौ जो दिल्ली को तौ को करिहै काम हमार ३६ बाँधि जंजीरन हम लैजैहैं मामा उरई के सरदार ॥ बातैं सुनिकै ये ऊदन की माहिल तुरत भये तय्यार ४० हाथी सजिकै आगे चलि भे पाछे चले घोड़ असवार ॥ पैदल सेना त्यहि पाछे सों तोपैं चलिभइँ पांच हजार ४१ आगे हाथी परिमालिक का पाछे सबै शूर सरदार ॥ पाग बैजनी शिरपर बाँधे ऊदन बेंदुलपर असवार ४२ कूच कराये सिरसागढ़ सों दिल्लीशहर गये नगच्याय ॥ दिल्ली केरे फिरि डाँड़ेपर तम्बू तुरत दीन गड़वाय ४३ ध्वजपताका एकमिल व्हैगै नभमाँ गई लालरी छाय ॥ लागि कचहरी परिमालिककी शोभा कही बून ना जाय ४४ आल्हा बोले चूड़ामणि सों पंडित साइति देउ बताय ॥ लैके पत्रा पंडित बोले मानो कही बनाफरराय ४५ भौनलगन की अब बिरिया है ऐपनबारी देउ पठाय ॥ बातैं सुनिकै चूड़ामणि की मलखे रूपना लीन बुलाय ४६ ऐपनबारी बारी लैके दिल्ली तुरत देउ पहुंचाय ॥