आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 237, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें३८ आल्हखण्ड । २३४ मई न ऐसो कहूँ पैदा भो जैसो रहै बनाफरराय ६८ सोच आयगा ब्रह्मानँद के मनमाँ बार बार पछिताय ॥ छाती पीटै रानी अगमा महलन गिरी पछाराखाय ६९ तोहिं चौंड़िया यह चाही ना कीन्हे घाटि महलमौँ आय ॥ नालति तेरी द्विज देही का चौंड़ा काहगये बौराय ७० घाव मूंदिकै बघऊदन का रानी औषध दीनलगाय ॥ कन्या राजनकी महरानी औ सब जानै भले उपाय ७१ मारु कूटकी घर घर चरचा क्षत्री बंश रहै तंत्र भाय ॥ राजा पिरथी की महरानी त्यहिबघऊदनदीनजियाय ७२ उठा दुलरूवा द्यावलिवाला बेला देखिगई हर्षाय ॥ ऐसि खुशहाली भै ब्रह्मा के जैसे योग सिद्धि है जाय ७३ गवैं सुहागिल दिल्ली वाली लैलै नाम बनाफरक्यार ॥ बड़ी खुशहाली भै महलन में होवन लाग मंगलाचार ७४ पायँ लागिकै महरानी के बोला उदयसिंह सरदार ॥ आयसु तुम्हरी जो हमपावैं तौ तम्बुन को होयँ तयार ७५ रूप देखिकै बघऊदन को नारी पीटन लगींकपार ॥ भई अभागिनिहमसब महलन अब ये चलन हेत तय्यार ७६ रूप न देखा क्यहु क्षत्री का जैसो उदयसिंह सरदार ॥ पाग बैंजनी शिरपर बाँधे ऊपर कलँगी करै बहार ७७ बेला चमेला के गजरा हैं तिनपर परा मोतियनहार ॥ बाँके नैना यहि क्षत्री के सखिया चुभै करेजे फार ७८ मन बौराना सहिवाला पर आला देवरूप अवतार ॥ दूसरि बाला त्यहि काला में बोली मानो कही हमार ७९ आगि तुम्हारी अस नाहीं है जो ये होयँ तोर भर्तार ॥