आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 251, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें१० आल्हखण्ड । २४८ लाव मलाई अब जल्दी सों दौरति चली बजारे जाय ६१ इतना सुनिकै हिरिया बोली साँची सुनो बनाफरराय ॥ हार छोड़िकै जाउँ बजारे तौ तकसीर बड़ी है जाय ६२ तनकिउ देरी हमका लागी फुलवा जाई बेगि रिसाय ॥ बातें सुनिकै ये हिरिया की बोले फेरि बनाफरराय ६३ हार तुम्हारो हम गूंथत हैं मालिनि जाउ बजरिया धाय ॥ पांच अशर्फी ऊदन दीन्ह्यो मालिनिचली तड़ाकाजाय६४ बेला चमेली औ निवारिको ऊदन हार कीन तय्यार ॥ मालिनि आई जब बजारेते देखा चार लरिनको हार ६५ हिरिया बोली तब ऊदन ते देवर मानो कही हमार ॥ हार डुलरिया रोज बनावों चौलर आज भयो तय्यार ६६ कर्री गांठि तुम्हारी की फूनन खूब सटा है यार ॥ हाल जो पूँछी फुलहर सें उत्तर काह देब सरदार ६७ बातें सुनिकै ये मालिन की बोला उदयसिंह त्यहिंवार ॥ बिटिया आई म्वरि बहिनी कै ताने हार कीन तय्यार ६८ इतनासुनिकै हिरियामालिनि तुरतै डलिया लीन उठाय ॥ जहँना बेटी रह नरपति कै मालिनि तहाँ पहुंची जाय ६६ बैठि पलँगरा फुलवा बेटी मालिनि हार दीन पहिराय ॥ चार लरिन को हरवा दीख्यो फुलवा बोलीवचनरिसाय १०० रोज डुलरिया लै आवति थी कौने गूँधा चौलरहार ॥ साँच बतावै री मालिनि अब नाहीं पेट फोरैहौं त्वार १०१ इतना सुनिकै मालिनि बोली दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ बिटिया आई म्वरि बहिनी कै ताने हार बनायो आय १०२ वह तो ब्याही है मोहबे माँ जहँपर बसैं रजापरिमल ॥