भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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उदयसिंहका विवाह । २५३ १५ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १५१ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागना- रायणजीकी आज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशंकरसूनु पं० ललिताप्रसादकृत ऊदनफुलवामिलाप वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ -⁘- सवैया ॥ कौन कि आश सुपासमिलै नितहोत मनैमन याहि बिचारा । आशकि पाश सुपास कहाँ यह सोचत मोचत दुःख अपारा ॥ भीतररी यहि लोकहिकि शिर शास्त्र औ वेद पुराण निहारा । बाम भये रघुनाथ सों साँच करै ललिते फिरि कौन उबारा १ सुमिरन ॥ मैं पद बन्दौं रिपुसूदन के लवणासुरै पराजय कीन ॥ मानों शत्रुन के जीतै को साँचो जन्म शत्रुहन लीन १ काटिकै मधुबन पुरी बसायो मथुरापुरी परा त्यहि नाम ॥ अश्वमेध में सब जग जीत्यो कीन्ह्यो शम्भु साथ संग्राम २ छोटे भाई लपणलाल के साँचे भये भरत के दास ॥ इन यश बरणा अश्वमेध में पूरण भई हमारी आश ३ मातु सुमित्रा के बालक ये जग में भये सुयश की राश ॥ जो कोउ सुमिरै रिपुसूदन का साँचो करै प्रेम बिश्वास ४ प्यारो होवै रघुनन्दन का साँचो स्वै रामको दास ॥ छूटि सुमिरनी गै ह्याँते अब ऊदन ब्याह करौं परकाश ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उये दिवाकर जब पूरब में बालकरूप बिम्ब अतिलाल ॥