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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

उदयसिंहका विवाह । २५३ १५ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १५१ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागना- रायणजीकी आज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशंकरसूनु पं० ललिताप्रसादकृत ऊदनफुलवामिलाप वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ -⁘- सवैया ॥ कौन कि आश सुपासमिलै नितहोत मनैमन याहि बिचारा । आशकि पाश सुपास कहाँ यह सोचत मोचत दुःख अपारा ॥ भीतररी यहि लोकहिकि शिर शास्त्र औ वेद पुराण निहारा । बाम भये रघुनाथ सों साँच करै ललिते फिरि कौन उबारा १ सुमिरन ॥ मैं पद बन्दौं रिपुसूदन के लवणासुरै पराजय कीन ॥ मानों शत्रुन के जीतै को साँचो जन्म शत्रुहन लीन १ काटिकै मधुबन पुरी बसायो मथुरापुरी परा त्यहि नाम ॥ अश्वमेध में सब जग जीत्यो कीन्ह्यो शम्भु साथ संग्राम २ छोटे भाई लपणलाल के साँचे भये भरत के दास ॥ इन यश बरणा अश्वमेध में पूरण भई हमारी आश ३ मातु सुमित्रा के बालक ये जग में भये सुयश की राश ॥ जो कोउ सुमिरै रिपुसूदन का साँचो करै प्रेम बिश्वास ४ प्यारो होवै रघुनन्दन का साँचो स्वै रामको दास ॥ छूटि सुमिरनी गै ह्याँते अब ऊदन ब्याह करौं परकाश ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उये दिवाकर जब पूरब में बालकरूप बिम्ब अतिलाल ॥

[Header] १६ आल्हखण्ड । २५४

बेटी फुलवा के महलन में जागा देशराजका लाल १ देवा बोला ह्याँ हिरियाते मालिनि मानो कही हमार ॥ देर लगावो अब घरमाँ ना लावो उदयसिंह सरदार २ लै कै पलकी मालिनि चलि भै फुलवा पास पहुँची जाय ॥ फुलवा बोली तब हिरियाते अब यहि जावो तुरत लिवाय ३ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे पहुँचे तुरत द्वार में आय ॥ बैठ पालकी में बघऊदन मनमें सुमिरि शारदांमाय ४ आयकै पहुँचे जब मालिनिघर देवा बोला वचन सुनाय ॥ साथ जनाना का करिबे नाँ जैबे जहाँ चँदेलाराय ५ बन्यो जनाना तुम नरवर में कैहौं हाल जाय दरबार ॥ बाना छोड़े रजपूती का ऊदन जीवैका धिक्कार ६ इतना सुनतै कायल व्हैगा नाहर उदयसिंह सरदार ॥ पेट मारने के कारण सों ऊदन लीन्ही हाथ कटार ७ हाथ पकरिकै देवाठाकुर बोला सुनो बनाफरराय ॥ चरचा करिबे ना मोहबेमाँ ऊदन साँच देवँ बतलाय ८ भई लालसा हमरे मनमाँ फुलवा देखनको अधिकाय ॥ करु अभिलाषा पूरण हमरी आल्हाकेर ल्हुरवा भाय ६ ऊदन बोले तब देवाने तुमको कैसे लवँ दिखाय ॥ जैसे बताओ देवा ठाकुर तैसे साँचो करैं उपाय १० इतना सुनिकै देवा बोले योगी बनो बनाफरराय ॥ अलख जगैवें पुर घर घर में याही सीधोसाद उपाय ११ गइ मनभाई बघऊदन के दूनों लीन्ह्यो भस्म रमाय ॥ काँधे माला औ मृगछाला आला योगिरूप बनाय १२ गुदड़ी लीन्ही दोऊ ठाकुर तामें छिपी ढाल तलवार ॥

उदयसिंहका बियाह। २५५ १७ डमरू लीन्ह्यो देवा ठाकुर बंशी उदयसिंह सरदार १३ धुरपद, सोरठ, जैजैवन्ती, गावैं पूरराग कल्यान ॥ टप्पा ठुमरी भजन रेखता तोरैं गजल पर्ज पर तान १४ को गति बरौ तिन योगिनकै एकते एक रूप गुणवान ॥ ड्योढ़ी दाबे दोउ नरपति कै योगी चले तुरत बलवान १५ देखि तमाशा तिन योगिनका मारग भीर भई अधिकाय ॥ ता ता थेई ता ता थेई थेई थेई दीन मचाय १६ बाजै डमरू भल देवा का ऊदन बंशी रहा बजाय ॥ मोर कि नाचन ऊदन नाचै मारग भूलि गये सबभाय १७ मोहीं तिरिया भल नरवर की चढ़िचढ़ि लखैं अटरिन आय ॥ एक एक सों बोलन लागीं जैसे नारिन केर स्वभाव १८ धन्य बखानों इन मातन को जिनकी कोखिलिन अवतार ॥ देखो आली इन योगिन को कैसो रूप दीन करतार १६ ये दोउ बालक क्यहू राजा के बारे लीन योग को धार ॥ सब गुण आगर दोउ नागर हैं योगी कामरूप अवतार २० क्यहू पियासे लरिका घर में भोजन करैं क्यहू भरतार ॥ पै ते भूलीं दोउ योगिन में तन मन केरो नहीं सँभार २१ गावत नाचत दोऊ योगी पहुँचे नरपति के दरबार ॥ बाजा डमरू तहँ देवा का नाचा बेंदुल का असवार २२ कमर झुकावै भाव बतावै गावै देशराज का लाल ॥ देखि तमाशा यहु योगिन का भा मनवड़ा खुशीनरपाल २३ नरपति बोला तब योगिन ने साँचे हाल देउ बतलाय ॥ कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ चाहौ काह लेनको भाय २४ हम तो आये बंगाले ते जावैं हिंगलाज महराज ५

१८ . आल्हखण्ड । २५६ द्रव्य न चाहैं कछु महराजा केवल उदरभरनसों काज २५ सुनिकै बातें ये देवा की बोला नरवरका सरदार ॥ धुरपद गावो यहि समया में भोजन अबै होय तय्यार २६ बातें सुनिकै महराजा की बोला देशराज का लाल ॥ ब्याही नारी के हाथे का भोजन करें नहीं नरपाल २७ इतना सुनिकै राजा बोले योगी मानो कही हमार ॥ है जो कन्या उपरोहित कै भोजन सोई करी तैयार २८ देवा बोला तब राजा ते यह नहिं ठीक भूमिभरतार ॥ जरिजा अँगुरी जो बाम्हनिकै हमरो योगहोय सब छार २६ शास्त्र पुराणन को जानैं हम मानैं लिखा ठीक महराज ॥ मारै शापै गारी देवै तबहूँ बिप्र पूजने काज ३० होय जो कन्या तुम्हरे घर की भोजन करै स्वई तैयार ॥ तौ तौ योगी भोजन करि हैं नाहीं मांगैं और दुवार ३१ इतना सुनिकै फिरि बोलत भा राजा नरवर का सरदार ॥ बेटी हमरी जो फुलवा है सोई भोजन करी तयार ३२ इतना सुनिकै योगी बोले यहही ठीक रहा महराज ॥ धर्म न जैहै कछु योगिन का रहि है दऊ दिशाकीलाज ३३ पुत्र आपने मकरन्दा को तबहीं बोलि लीन नरपाल ॥ फुलवा बहिनी जो तुम्हरी है तासों कहौजाय यह हाल ३४ इतना सुनिकै मकरँद चलिभा औ फुलवा ते कहा सुनाय ॥ बातें सुनि है मकरन्दा की माता पास पहुँची आय ३५ आयसु लैके महतारी की भोजन करन लागि तैयार ॥ नाचैं गावैं दोऊ योगी मोहित भयो राजदरबार ३६ भयो बुलावा फिरि महलन में योगी करें चलैं ज्यँउनार ॥

उदयसिंहका विवाह। २५७ १६ ˙ इतना सुनिकै योगी चलिभे पीढ़न बैठिगये सरदार ३७ भोजन परसन फुलवा लागी देवा चितय दीन कईबार ॥ बैठे पाटापर बघऊदन मनमाँलाग्यो करनविचार ३८ किह्यो रसोई कारी कन्या भोजन केर नहीं अधिकार ॥ बनि बौराहा जो हम जावैं तौ रहिजावै धर्म हमार ३६ देवा बोला फिरि ऊदन ते यहही फुलवा है सरदार ॥ इनही कारण नाक छिदायो धारयो बेष जनाना यार ४० किह्यो बहाना ह्याँ ऊदन ने औ गिरि गयो पछाराखाय ॥ रानी चंपा दौरति आई योगिन पास पहुँची आय ४१ कौर डारिकै देवा योगी तहँपर बार बार पछिताय ॥ देखिकै सूरति लघुयोगी कै चंपा बोली बचन सुनाय ४२ पाप आयगा यहिके मनमाँ तांते गिरा पछाराखाय ॥ योगी नाहीं यहु भोगी है यहिका डारों पेट फराय ४३ मकरँद लरिका का बुलवावों यहिका योग सिद्ध हैजाय ॥ इतना सुनिकै देवा बोला रानी काह गई बौराय ४४ भूत चुरैलै यहि महलन में की क्यहु नजरि लगाई आय ॥ जो कछु होई यहिके जीका तौ फिरि योग देयँदिखराय ४५ ऐसे वैसे हम योगी ना ना हम माँगैं खेत खरिहान ॥ हमतो योगी संतोषी हैं जाने काह नारि बैलान ४६ सुनिकै बातें ये देवा की रानी गई सनाकाखाय ॥ जल के छीटा फुलवा मारे जागा तुरत बनाफरराय ४७ बड़ी खुशाली देवा कीन्ह्यो लीन्ह्यो तुरत ताहि लपटाय ॥ ऊदन बोले तब रानी ते तुमका साँचदेयँ बतलाय ४८ परिगै छाया क्यहु ब्याही कै ताते गई मूरछा आय ॥ १७

२० आल्हाखण्ड । २५८ फुलवा बोली तब माताते योगी साँच रहा बतलाय ४६ परिगै छाया जब बाँदी कै तबहीं गिरा मूरछाखाय ॥ ऊदन बोले तब रानी ते ह्याँते जान चहैं हम माय ५० इतना सुनिकै चम्पा बोली योगी मानो कही हमार ॥ भोजन दूसर हम परसावैं योगी जँयलेउ ज्यवनार ५१ देवा बोला तब रानी ते साँचे बचन करो परमान ॥ फिरिकै बैठें हम चौकाना पूरण नियम हमारो जान ५२ ऐसे योगी आगे हैं हैं भोगिहैं भोगस्वादवश आय ॥ तैसे योगी हम नाहीं हैं अपनो डारैं नियम नशाय ५३ योगी हैकै भोगी होवै शोचन योग सोय अधिकाय ॥ इतना कहिकै दोऊ योगी माँगिकै बिदा चले हर्षाय ५४ आयकै पहुँचे मालिनि घरमाँ योगिनबाना धरे उतार ॥ पाग बैंजनी शिरपर बाँधी नाहर उदयसिंह सरदार ५५ ऊदन बोले फिरि देवा ते ठाकुर मैनपुरी चौहान ॥ कई महीना ह्याँपर गुजरे ना अब रहिगा द्रव्यठिकान ५६ घोड़ खरीदन कासों जावैं यहही शोच होय अधिकाय ॥ पै कछु औषधि ह्याँ सूझैना कैसी करी यहांपर भाय ५७ का लै जावैं अब मोहबे को काबुल काह खरीदैं जाय ॥ इतना सुनिकै देवा बोले धीरज धरो लहुरवाभाय ५८ गत नहिंशोधैं कहुँ पण्डितजन मत यह ठीक हृदय ठहराय ॥ कूच करावो अब नरवरते चलिये नगरमोहोबे भाय ५६ यह हम कहिबे परिमालिकते नरवर टिक्यन चँदेलेराय ॥ भूज तुरैलै इनके लागीं ऊदन तहां गये बौराय ६० कछु नहिं आशा तहँ बचनेकी निश्चय गई प्राणपै आय ॥

उदयसिंहका विवाह । २५६ २१ कीन दवाई हम ऊदन की सब धन आये तहाँ गँवाय ६१ यह मन भाई उदयसिंह के तुरतै कूच दीन करवाय ॥ कीरतिसागर के डाँड़े पर पहुंचे फेरि बनाफर आय ६२ उतरि बेंदुला ते भुइँ आये तम्बू तुरत दीन गड़वाय ॥ परिगा पलँगा तहँ ऊदन का लेटे तहाँ बनाफरराय ६३ उबटन लाग्यो भल हल्दी का पीली देह परै दिखराय ॥ भोजन कमती कैदिन खायो तासोंबदनगयो कुम्हिलाय ६४ करिकै सूरति बीमरिहा कै बोला उदयसिंह सरदार ॥ बात बनावो परिमालिक ते तौ रहिजावै धर्म हमार ६५ गंगा कीन्ही हम फुलवा सँग तुम्हरो ब्याह करब ह्याँ आय ॥ टरै प्रतिज्ञा जो क्षत्री कै तौफिरि जहरखाय मरि जाय ६६ मित्र साँकरो फिरि ऐसो अब परिहै बार बार नहिं आय ॥ इतना सुनिकै देवा चलिभा पहुंचा जहाँ चँदेलोराय ६७ सूरति दीख्यो जब देवा की भा मन खुशी रजापरिमाल ॥ हाथ जोरिकै देवा बोल्यो औ ऊदनके कह्यो हवाल ६८ लगीं चुरैलैं नरवरगढ़ में ऊदन हैगे हाल बिहाल ॥ रूपिया पैसा सब खर्चा भे रहिगा कछू नहीं नरपाल ६६ कीरतिसागर तम्बू भीतर ब्याकुल परा लहुरवाभाय ॥ इतना सुनिकै परिमालिक जी तुरतै गये सनाकाखाय ७० लिखिकै पाती आल्हाजी को तुरतै धावन लीन बुलाय ॥ दैके पाती फिरि धावन को बाकी हाल कह्यो समुझाय ७१ लैंकै पाती धावन चलिभा दशहरिपुरै पहूँचा जाय ॥ दीन्ह्यो पाती जब आल्हा को बाँचा आंकु आंकु निरताय ७२ पढ़िकै पाती आल्हा ठाकुर तुरतै हाथी लीन मँगाय ॥

२२ आल्हखण्ड । २६० चढ़िकै हाथी आल्हा चलिभे मनमाँ सुमिरि शारदामाय ७३ कीरतिसागरपर पहुंचत भा यहु रणबाघु बनाफरराय ॥ चढ़े पालकी परिमालिकजी सोऊ अटे वहाँपर जाय ७४ पौढ़ा पलँगापर बघऊदन पागल बना बनाफरराय ॥ देखि सनाका परिमालिक भे मनमाँ बार बार पछिताय ७५ ऊदन ऊदनकै गोहरायो आल्हा बैठि पलँगपर जाय ॥ जब नहिं बोले बघऊदन हैं आल्हा बोले बचन रिसाय ७६ तुम्हीं पठायो है ऊदन को साँची सुनो चँदेलेराय ॥ जो कछु जीका यहिके होईहै मोहवा तुरत द्याव फूँकवाय ७७ बोलि न आवा परिमालिक ते हाँ अरु हूँव बन्दभा भाय ॥ ऊदन ऊदन कै गोहरायो बारम्बार चँदेलेराय ७८ तबहूं ऊदन कछु बोले ना आल्हा बहुत गये घबड़ाय ॥ उठिकै चुप्पे चढ़ि हाथीमाँ दशहरिपुरै पहुंचे आय ७६ हाल बतायो सब सुनवाँ को सुनतै गई सनाकाखाय ॥ सोचन लागी अपने मनमाँ साँची बात गई जिय आय ८० आँखि लागिगै तहँ फुत्तवाकै ब्याकुल भये लघुरवामाय ॥ पूरी गवाही मन यह दीन्ह्यो साँची ठीक लीन ठहराय ८१ यहै सोचिकै सुनवाँ बोली लीजै ऊदन यहाँ बुलाय ॥ करब दवाई हम ऊदन कै नीको होय बनाफरराय ८२ यह मन भायगई आल्हा के तुरतै पलकी दीन पठाय ॥ सौंपिकै देवा को ऊदन का औ चलिभयो चँदेलेराय ८३ खबरि फैलिगै यह मोहवेमाँ ब्याकुल उदयसिंह सरदार ॥ जितनी रानी परिमालिक की रोईं छाँड़ि सबै डिंडकार ८४ जितनी रय्यत रह मोहवे की कीरतिसागर चली बिहाल ॥

उदयसिंहका विवाह । २६१ २३ जायके देखें जब ऊदन को रोवैं तहाँ बृद्ध औ बाल ८५ गई पालकी जब आल्हा की चकरन जाय कहा सब हाल ॥ सुनवाँ भौजीने बुलवायो चलिये देशराज के लाल ८६ हमसोंफिरिफिरि यह समुझायो आवैं यहाँ लहुरवाभाय ॥ करब दवाई हम नीकी बिधि चंगे होयँ बनाफरराय ८७ सुनिकै बातें ये चकरन की ऊदन ठीक लीन ठहराय ॥ हाल बतावब जो भौजीते हैहैं काम सिद्धि तहँ जाय ८८ यहै सोचिकै मन अपने माँ पलकी चढ़ा लहुरवाभाय ॥ चारि कहरवा हुँकरत चलिगे दशहरिपुरै पहुंचे आय ८६ उतरि पालकी ते भुइँ आवा द्यावलि देखिगई घबड़ाय ॥ रानी सुनवाँ तहँ चलिआई औ करगहिकै गईलिवाय ६० जायकै पहुंची निजमहलन में पलँगा उपर दीन बैठाय ॥ पूँछन लागी बघऊदन ते साँचे हालदेउ बतलाय ६१ आँखि लागिगै का फुलवा कै द्यावर विकलभयो अधिकाय ॥ सुनिकै बातें ये भौजीकी बोला तुरत बनाफरराय ६२ जैसे साँची तुम पुछती हौ तैसे साँच देयँ बतलाय ॥ किरिया कीन्ही हम फुलवा तै भौरी करब तुम्हारी आय ६३ काह बतावैं हम भौजी ते नाकछु सूझा और उपाय ॥ तब बौराहा बैनिकै आयन तुमते साँचदीन बतलाय ६४ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली साँची सुनो लहुरवाभाय ॥ काठक घोड़ा बाण अजीता उनघर सेल शनीचर आय ६५ कैसे किरिया तुम कै लीन्ही देवर भूल भई अधिकाय ॥ तेहिते चुप्पे घरमाँ बैठो मानो कही बनाफरराय ६६ वैसी फुलवा लाखन मिलि हैं आपन साँच लहुरवा भाय ॥

२४ आल्हखण्ड । २६२ यह नहिं भाई मन ऊदन के सुनतै वदन गयो कुम्हिलाय ६७ जब रुख दीख्यो यह ऊदन का सुनवाँ चली महलते धाय ॥ जायकै पहुँची आल्हा ढिगमाँ औ सब हाल कहा समुझाय ६८ सुनिकै बोले आल्हा ठाकुर तिरिया काह गई बौराय ॥ बेढब राजा है नरवर का तहँ शिर कौन कटावै जाय ६६ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली क्षत्री पूत बनाफरराय ॥ तुमका बातें ये छाजैं ना कन्ता वार वार बलिजायँ १०० इतना सुनिकै आल्हा बोले तिरिया बिना बुद्धिकी आय ॥ नाहक हिंसा हम करिहैं ना मरिहैं जीवजन्तु अधिकाय १०१ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली दोऊ हाथ जोरि शिर नाय ॥ यह नहिं हिंसा है क्षत्री कै कीन्हेनि युद्ध कृष्ण यदुराय १०२ सोलह सहस आठ कन्यन को लड़िकै लीन कृष्ण महराज ॥ तिनकी बहिनी के पति अर्जुन कीन्हेनि युद्ध द्रौपदी काज १०३ धर्म धुरंधर भीषम हैगे लड़िगे काशिराज घर जाय ॥ अम्बा अम्बे अम्बालिका को लाये जीति नृपन समुदाय १०४ पै कछु हिंसा तिन मानी ना जानैं धर्म कर्म अधिकाय ॥ पढ़िकै भूल्यो तुम महराजा की यहि अवसर गयो डेराय १०५ लड़नो मरनो समरभूमि में यहही क्षत्री को बयपार ॥ लहँगा लुगरा हमरो पहिरो अपनी देउ ढाल तलवार १०६ मैं चढ़िजाऊँ नरवरगढ़ को व्याहूं जाय लहुरुवा भाय ॥ किरिया कीन्ही बघऊदन ने भौंरी करब यहाँ पर आय १०७ झूठी किरिया जो ह्वैजैहै तौ मरि जाय जहर को खाय ॥ ऐसो वैसो बघऊदन ना गंगा झूठ उलीचै जाय १०८ उदय दिवाकर हों पश्चिम में चन्दा चहौ रसातल जाय ॥

उदयसिंहका विवाह । २६३ २५ सोंकि समुन्दर चहु महि लेवै बिल्ली लड़ै सिंहसों आय १०६ ये अनहोनी चहु हैव जावै झूठ न कहै लहुरवा भाय ॥ इतना सुनिकै आल्हा बोले अब तू चुपसाधिरहिजाय ११० टरिजा टरिजा री सम्मुख ते काहे बार बार बकाय । ब्याहन जैबे हम नरवर में तहदिल होयँ बनाफरराय १११ इतना सुनिकै सुनवाँ चलि भै आल्हा रूपना लीन बुलाय ॥ लिखिकै चिट्ठी मलखानेको सिरसा तुरतदीन पठवाय ११२ खबरि पायकै मलखे ठाकुर दशहरिपुरै पहुँचे आय । हाथ जोरिकै द्वउ आल्हा के बोले चरण शीश नवाय ११३ काह आज्ञा है दादा कै जो सेवक का लीन बुलाय ॥ सुनिकै बातें मलखाने की आल्हाहाल कहासमुझाय ११४ घोड़ खरीदन गे काबुल को नरवर नैन खरीदनि जाय ॥ बनि बौगहा ऊदन बैठे चलिये ब्याहकरन अबभाय ११५ बड़ी खुशहाली भै मलखे के बोले हाथ जोरि शिरनाय ॥ न्यवत पठावो सब राजन को दादा भली बनी यह आय ११६ इतना सुनिकै आल्ही ठाकुर तुरतै धावन लीन बुलाय ॥ पाती लिखिकै सबराजन को तुरतै न्यवतं दीनपठवाय ११७ यक हरिकारा गा भुन्नागढ़ यक नैनागढ़ दीन पठाय ॥ यक हरिकारा गा बौरीगढ़ दिल्ली एक पहुँचा जाय ११८ उरई कनौउज सिरसा मोहबे सबने न्यवत दीन पठवाय ॥ खबरि पायकै सब राजागण दशहरिपुरै पहूंचे आय ११९ कीनि खातिरी सबके आल्हा डंका तुरत दीन बजवाय ॥ बाजे डंका अहर्तका के हाहाकार शब्दगा छाय १२० ब्यावलिबोली फिरि आल्हा ते मानो कही बनाफरराय ॥

२४ आल्हखण्ड । २६४ रीती भाँती मल्हना करि हैं पाल्यो बारे दूध पिलाय १२१ कौन हितैषी है मल्हना सम ह्याँते कूच देउ करवाय ॥ सुनिकै बातें ये माता की आल्हा कूचदीन करवाय १२२ कीरतिसागर मदनताल पर डेरा गड़े नृपन के आय ॥ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे मल्हना महल पहुँचेजाय १२३ द्यावलि बिरमा सुनवाँ आदिक येऊ गईं तहाँ पर आय ॥ बड़ी खुशहाली भै मल्हना के हमरे बूत कही ना जाय १२४ चूड़ामणि पण्डित को तुरतै आल्हा लीन तहां बुलवाय ॥ तेल कि साइति सो बतलायो सुवरणकलशलीनमँगाय १२५ घृतको दीपक धरि कलशापर चौकी तहाँ दीन डरवाय ॥ ऊदन बैठे फिरि चौकी पर मनमें सुमिरि शारदामाय १२६ एक कुमारी तेल चढ़ावै गावन लगीं तहाँ सब गीत ॥ आई विरिया फिरि नहखुर की पगियाधरी शीशपरपीत १२७ कङ्कण बांधा गा हाथेमाँ शिरपर मौरदीन धरवाय ॥ ब्याहके कपड़ा फिरि पहिरायो पलकीतुरतलीनमँगाय १२८ सुमिरि भवानी महिरवाली पलकी बैठ बनाफरराय ॥ बेटी बैठी चन्द्रावलि तहँ राईलोन उतारति जाय १२९ चली पालकी बघऊदन की कुँवना पास पहुँची आय ॥ इन्द्रसेन चन्द्रावलि दुलहा सोकुँवनापरगयोलिवाय १३० रानी मल्हना त्यहि समयामें दीन्ह्यो कुँवाँ पैर लटकाय ॥ पहिली भाँवरिके घूमत खन ऊदन लीन्ह्यो पैर उठाय १३१ प्राणनेग मैं तुमको दीन्हे माता कादु पैर डरपाय ॥ याविधि कहिकै सातों भाँवरि घूमे तहां बनाफरराय १३२ बैठे पलकी फिरि बघऊदन आल्हा नेगदीन चुकवाय ॥

[Header] उदयसिंहका विवाह । २६५ २७ [Body] भये अयाचक सब याचकगण जयजयकार रहे तहँगाय १३३ कूच के डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥ बैठे हाथी आल्हा ठाकुर करिकै रामचन्द्रको ध्यान १३४ मलखे सुलखे देवा ब्रह्मा मन्नागूजर भयो तयार ॥ औरो राजा न्योते आये तिनहुन बाँधिलीन हथियार १३५ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िंगे बाँके घोड़न भे असवार ॥ कूच कराय दयो मोहबेते चलिभे सबै शूर सरदार १३६ खर खर खर खर कै रथ दौरे चह चह धुरी रहीं चिल्लाय ॥ चलिभैं फौज दल बादल सों शोभाकही बूत ना जाय १३७ झम्झम्झम्झम् झीलमबोलैं मर्मर होयँ गैंड़की ढाल ॥ मारु मारु कै मौहरि बाजैं बाजैं हाव हाव करनाल १३८ छाय अँधेरिया गै मारग में छिपिगे अन्धकार सों भान ॥ को गति बरौ शहजाद्यन कै एकते एक रूप गुणखान १३६ तेगा लीन्हे बर्दवान के कोता खानी लिहे कटार ॥ यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कम्मर परी एक तलवार १४० आठरोज का धावा करिकै नरवर पास गये नगच्याय ॥ पांचकोस जब नरवर रहिगा मलखे डेरा दीन डराय १४१ ऊंची टिकुरिन तम्बू गड़िगे नीचे लागीं खूब बजार ॥ हौदा उतरे तहँ हाथिन के क्षत्रिन छोरिधरा हथियार १४२ जहँना तम्बूहै आल्हा का तहँना लाग खूब दरबार ॥ चूड़ामणि पण्डित तहँ बैठे साइतिलागे करनविचार १४३ ऐपनवारी की साइति है पण्डित कहा सुनो मलखान ॥ मलखे बोले तब रुपना ते हमरे करो बचन परमान १४४ ऐपनवारी बारी लैके नरपति द्वार देउ पहुँचाय ॥

२८ आल्हखण्ड । २६६ इतना सुनिकै रूपन बोले दोऊहाथजोरिशिरनाय १४५ ऐपनवारी बारी लै कै दूसर जाय आज महराज ॥ नैना भुन्ना औ दिल्ली में कीन्हे हमीं अकेले काज १४६ मूड़ कटावन हम जैबे ना मानो कही वीर मलखान ॥ इतना सुनिकै मलखे बोले ⁃हारीबात कहौ तुम ज्वान १४७ गदका बाना पटा बनेठी अइहैं कौन दिवस ये काज ॥ पहिले मुर्चा तुम्हीं कैकै राख्यो देशदेशमें लाज १४८ उदन वियाहे का रहिहैं ना बतियाँ कहिबे का रहिजायँ ॥ यहु दिनमिलिहैं फिरिकबहूंना तातेसोचिसमझिवतलाय १४६ इतना सुनिकै रूपन बोला ठाकुर सिरसा के सरदार ॥ घोड़ बेंडुला हमको देवो ऊदन केरि देउ तलवार १५० घोड़ बेंडुला को मँगवायो औ दैदीन ढाल तलवार ॥ ऐपनवारी बारी लै कै , बेंडुल ऊपर भयो असवार १५१ ऐंड़ा मसक्यो जब बेंडुलके तुरतै चला हवाकी चाल ॥ राजा नरपति के द्वारेपर रूपनपहुँचिगयोततकाल १५२ द्वारपालने तब ललकार्यो नाहर घोड़े के असवार ॥ कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ कहँ है देश रावरे क्यार १५३ इतना सुनिकै रूपन बोले तुम सुनि लेउ हमारो हाल ॥ देश हमारो नगर मोहोबा जहँपर बसैं रजा परिमाल १५४ छोटो भय्या जो आल्हा को बेटा देशराज को लाल ॥ कारी कन्या जो नरपति कै ब्याहनअयेरजापरिमाल १५५ ऐपनवारी हम लै आये रूपन बारी नाम हमार ॥ खबरि जनावो तुम राजा को बारी खड़ा तुम्हारे द्वार १५६ नेग आपने को झगरत है सो अब पड़े देयँ सरदार ॥

उदयसिंहका विवाह । २६७ २६ इतना सुनिकै द्वारपाल कह बारी घोड़े के असवार १५७ नेग बतावो तुम द्वारे का राजै सबऊ सुनावैं जाय ॥ इतना सुनिकै रूपन बोला तुमसों साँचदेयँ बतलाय १५८ चार घरीभर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ॥ नेग - हमारो यह साँचा है याँच आय तुम्हारे द्वार १५६ सुनिकै बातें ये रूपन की बोला द्वारपाल ततकाल ॥ पीकै दारू द्वारे आये टेढ़ी बात कहै मतवाल १६० टरिजा टरिजा अब द्वारे ते ओ मतवाले जाति गँवार ॥ असगति नाहीं क्यहुराजा की द्वारे करै आय तलवार १६१ काल गाल माँ तू बैठा है मानै साँच बात यहिवार ॥ हवा खायकै ठंढे ह्वैकै बोलै घोड़े के असवार १६२ इतना सुनिकै रूपन बोला गरुई हाँक दीन ललकार ॥ हाथ सिपाही पर डारै ना जबलग मिलै ढूँढ़िसरदार १६३ हमका जानैं दिल्ली वाले जिनके द्वारकीन तलवार ॥ भुन्नागढ़ औ नैनागढ़ में द्वारे बही रक्तकी धार १६४ चारि रुपल्ली का नौकर तू टिलटिलटिलटिल रहा मचाय ॥ इतना सुनिकै द्वारपाल चलि राजै खबरि सुनाई जाय १६५ जितनी गाथा रूपन बोले गासो यथातथ्य सब गाय ॥ सुनिकै बातें द्वारपाल की नरपति तुरतै उठा रिसाय १६६ हुकुम लगायो मकरन्दा ते बारी पकरि दिखावै आय ॥ विजयसिंह विजहट को राजा मकरँदसाथचला रिसियाय१६७ द्वारे दीख्यो जब रूपन को गरुई हाँक दीन ललकार ॥ खबरदार हो खबरदार हो बारी घोड़े के असवार १६८ काल गाल माँ तू बैठा है अबहीं जान चहत यमद्वार ॥

३० आल्हखण्ड । २६८ इतना सुनिकै विजयसिंहने अपनी खैंचिलई तलवार १६६ खैंचि सिरोही रूपन लीन्ह्यो द्वारे होन लगी तब मार ॥ अगल बगल में बेंदुल मारै रूपन खूब कीन तलवार १७० घायल ह्वैगे विजयसिंह जब तब सब बढ़े लड़ैया ज्वान ॥ दांतन काटै टापन मारै बेंदुल खूब कीन मैदान १७१ कोगति वरनै तहँाँ त्येनकै दोऊ हाथ करै तलवार ॥ रंग बिरंगे क्षत्री ह्वैगे मानो होली खेलैं गँवार १७२ कितन्यों क्षत्री घायल ह्वैगे कितन्यों गिरिगे खाय पछार ॥ मूंड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डनके लगे पहार १७३ बड़ी लड़ाई भै रूपन ते द्वारे बही रक्तकी धार ॥ देखि तमाशा त्यहि बारीका क्षत्री गये मनैमन हार १७४ ऐंड़ा मसक्यो फिरि बेंदुल कें फाटक पार पहुँचा जाय ॥ मारो मारो हल्ला कैकै क्षत्री चले पछारी धाय १७५ रूपन पहुँचा त्यहि तम्बू में जहँपर बैठि बनाफरराय ॥ जितने क्षत्री नरवरगढ़के आये लौटि सबैकिसियाय १७६ जितनी गाथा रह द्वारे की रूपन यथातथ्य गा गाय ॥ रूपन बारी की बातें सुनि भे मन खुशी बनाफररांय १७७ खेन छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशा को आय ॥ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय १७८ माथ नवायौं पितु अपने को ह्यँाँ ते करों तरँगको अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं माँगों यही भवानीकन्त १७६ इतिश्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भववुधकृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतरूपनबिजम वर्णनौनामद्वितीयस्तरंगः ॥ २ ॥

उदयसिंहका विवाह। २६६ ३१ सवैया ॥ दीनदयाल कृपाल भुवाल तुम्हीं सब काल करो रखवारी । मारीच सुबाहु सुरासुरनाहु तुम्हीं पल एकहि में संहारी ॥ बालिवली खरदूषण रावण आप हन्यो सबको धनुधारी । काम औ क्रोध औ लोभ हटाय करो ललिते रघुनाथ सुखारी १ सुमिरन ॥ दोउ पद वन्दौं भरतलालके जिनसम धन्यजगतकोआन ॥ बड़े पियारे रघुनन्दन के इनयशबालमीकि करगान १ भायप निबह्यो जस भारत जग आरत भये रामसों जाय ॥ राज्य न लीन्ही रघुनन्दन जब आपौ कीन योग घर आय २ सब जग ध्यावै रघुनन्दन को रघुवर करैं भरतको याद ॥ रघुवर लछिमन भरत शत्रुहन चहु ज्यहि भजैं छांड़िकै बाद ३ जो ज्यहि भावै सो त्यहि ध्यावै आवै सबै आपने काज ॥ क्यहू न ध्यावै सो दुखपावै औ बड़ होवै तासु अकाज ४ हमरे सर्वोपरि एकै हैं स्वामी रामचन्द्र महराज ॥ तिन्हें बिसारैं तौ दुखपावैं यह मन सदा हमारे राज ५ छूटि सुमिरनी गै रघुवर कै सुनिये नरवर केर हवाल ॥ ब्याह बखानैं उदयसिंह का लड़िहैं बड़े बड़े नरपाल ६ अथ कथाप्रसंग ॥ नरपति राजा नरवरगढ़ का भारी लाग राजदरवार ॥ बैठे छत्री अलबेला तहँ एकते एक शूर सरदार १ नरपति बोला मकरन्दा ते तुम सुत मानो कही हमार ॥ बड़े लड़ैया मोहबेवाले बारी भली कीन तलवार २ काह तुम्हारे अब मनमाँ है हमसे साँच देउ बतलाय ।

३२ आल्हखण्ड । २७० रारि बचैहौ की लड़िजैहौ तैसो जल्दी करी उपाय ३ इतना सुनिकै मकरँद बोला दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ हुकुम जो पावैं महाराजा को सबको बांधि दिखावैं आय ४ सुनिकै बातैं मकरन्दा की राजै हुकुम दीन फरमाय ॥ तुरत नगड़ची को बुलवायो पुरमें डौंडी दीन पिटाय ५ हुकुम पायकै मकरन्दा का फौजैं होन लगीं तय्यार ॥ रण की मौहरि बाजन लागी रणका होन लाग ब्यवहार ६ बाजे डंका अह्तंका के क्षत्री सबै भये हुशियार ॥ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन बेद उच्चार ७ पहिल नगाड़ा में जिनबन्दी दुसरे बांधि लीन हथियार ॥ तिसर नगाड़ा के बाजत खन क्षत्री सबै भये तय्यार ८ मारु मारु करि मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ॥ बैठ्यो घोड़ा पर मकरन्दा मनमें सुमिरि यशोदालाल ९ कूच करायो नरवरगढ़ ते पहुँच्यो समरभूमि मैदान ॥ गर्दा दीख्यो आसमान में बोल्यो यहां वीर मलखान १० यहु दल आवतहै नरपति का गर्दा छाय रही असमान ॥ सँभरो सँभरो ओ रजपूतौ हमरे करो बचन अब कान ११ इतना सुनिकै मोहबेवाले तुरतै बाँधि लीन हथियार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार १२ बड़िबड़ि तोपैं अष्टधातु की सो चरखिन में दीन चढ़ाय ॥ दुहूँ ओर ते गोला छूटे हाहाकार शब्द गा छाय १३ गोला लागै ज्यहि क्षत्री के आधे सरग लिहे मड़राय ॥ गोला लागै ज्यहि घोड़े के धुनकततूलसरिसउड़िजाय १४ गोला लागै ज्यहि हाथी के मानो गिरा धौरहर आय ॥

उदयसिंहका विवाह । २७१ ३३ गोला लागै ज्यहि साँड़िया के तुरतै गिरै भूमि अललाय १५ जौने बैलके गोला लागै मानो मगर फुल्यावै खायँ ॥ जौने रथमाँ गोला लागै ताके टूक टूक द्वैजायँ १६ बड़ी दुर्दशा भै तोपन में धुवना रहा सरग में छाय ॥ दूनों दल आगे को बढ़िगे तोपन मारु बन्द द्वैजाय १७ उठीं बँदूकै बादलपूर की जो नब्बे कै याक बिकाय ॥ मघा के बूंदन गोली बरसें झरसैं सबै शूर त्यहि घाय १८ दूनों दल आगे को बढ़िगे रहिगा एक खेत मैदान ॥ भाला बरछी तलवारिन का लाग्यो होन घोर घमसान १६ अपन परावा कछु चीन्हैंना मारैं एक एक को जवान ॥ सूंढ़ि लपेटा हाथी भिड़िगे घोड़न भिरी रान में रान २० कउँधालपकनिबिजुलीचमकनि कहुँ कहुँ देखि परै तलवार ॥ दूनों दिशिके रजपूतन ने कीन्ह्यो तहां भड़ामड़मार २१ चलै कटारी बूँदी वाली ऊना चलै विलाइति क्यार ॥ तेगा धमकैं बर्दवान के कटि कटि गिरैं शूरसरदार २२ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ रुधिर किसरिता तहँ बहिनिकरी जूझे क्षत्री अमित अपार २३ हाथी सोहैं त्यहि सरिता माँ छोटे दीपन्न के अनुमान ॥ परे बछेड़ा त्यहि नदिया माँ तिनको नदी कगाराजान २४ छुरी कटारी मछली ऐसीं ढालैं कछुवा परैं दिखाय ॥ वहैं सेवारा जस नदिया माँ तैसे बहे०गार तहँ जायँ २५ नचैं योगिनी खप्पर लीन्हे मज्जैं भूत प्रेत बैताल ॥ परीं लहासैं जो मनइन की तिनकाखावैं श्वानशृगाल २६ बड़ी सनेही नरदेही में कहुँ कहुँ चढ़े काक खगजायँ ॥

१४ आल्हाखण्ड । २७२ नदी नेवांरा जस नर ख्यालैं तैसे काक कंक गतिभाय २७ को गति बरणै समरभूमि कै हमरे बूत कही ना जाय ॥ जितने कायर रहें फौजन में तर लोथिन के रहे लुकाय २८ हेला आवै जब हाथिन का तब बिन मरे मौत व्हैजाय ॥ छाती धड़कै रण कायर कै सायरखुशीहोयअधिकाय २६ परम पियारी जिनके नारी आरी भये समर में आय ॥ कीरति प्यारी जिन क्षत्रिन के सम्मुख सहैं खड्ग के घाय ३० मकरँद ठाकुर मलखाने का परिगा समर बरोबरि आय ॥ दोऊ मारैं दोउ ललकारैं दोऊ लेवैं वार बचाय ३१ मकरँद बोले मलखाने ते ठाकुर लौटि धामको जाय ॥ वार हमारी ते बचिहै ना नाहक फँसे समर में आय ३२ सुनिकै बातें मकरन्दा की बोला बच्छराज को लाल ॥ बहिनि बियाहै तौ बचिजइहै नाहीं परे काल के गाल ३३ ज्यहिकी बिटिया सुन्दरि द्याखै त्यहिपर चढ़ै वीर मलखान ॥ बिना बियाहे घर नहिं जावै तजिकै कब्रों समर मैदान ३४ इतना सुनतै मकरँदठाकुर तुरतै खैंचि लीनि तलवार ॥ ऐंचिकै मारा मलखाने को मलखे लीन ढालपर वार ३५ सुमिरि भवानी शिवशङ्करको मारी साँग वीरमलखान ॥ मूड़ बिसानी सो घोड़ा के घोड़ा भाग्यो लिहे परान २६ सवैया ॥ भागिगयो [गोल्ह] तबै अरु जायकै धाममें बेगि विराजा । काटक छोड़ औ सेल शनीचर वाण अजीत लियो जय काजा ॥ मालिनि धाम गयो फिरि धाय बुलाय चल्यो रण साजिसमाजा । आगयो रणखेतन में ललिते मकरन्द बली फिरि गाजा ३७