भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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[Header] चन्द्रावलि की चौथ । २८६ ७

भलो बुरो कछु वै मानैं ना बेटा देशराज के लाल ५६ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ कीन प्रतिज्ञा हम महाराजा वहिनी विदा लेब करवाय ६० झूॅठि प्रतिज्ञा हम करिहैं ना चहुतनधजीधजी उड़िजाय ॥ करो आज्ञा अब जाने की आशिर्वाद देउ हरषाय ६१ इतना सुनिकै महाराजा तब चीराकलँगी दीन मँगाय ॥ शाल दुशाला मोहनमाला सबधनदीन लाखको भाय ६२ रानी अगमा यह सुनि पावा आये देशराज के लाल ॥ भयो बुलौवा जब महलन ते आयसु दीन तबै महिपाल ६३ तुरतै ऊदन तहँ ते चलिभे रानी भवन पहुँचे आय। आई नारी बहु दिल्ली की देखन हेतु लाहुरवा भाय ६४ रूप देखिकै बघऊदन को मनमें कहैं गिरीश मनाय ॥ मेरो बालम ऊदन होतो देतो शिव यह योगबनाय ६५ तौ मनभाती दिखलाती सब छाती फेरि यहाँलग कौन ॥ छाती खोले दिखलाती सो गाती गीत रँगीले जौन ६६ ऐसी नारी नहिं केहू युग कलियुगकुलटनको अधिकार। उलटन पुलटन कुलटन दीख्यो ऊदन जानिगयो बयपार ६७ भगिनी माता औ कन्या सम कीन्होतीनि भांति ब्यवहार ॥ रानी अगमा बोलन लागी मानों उदयसिंह सरदार ६८ तुम नहिं जावो गढ़बौरी को बेटा देशराज के लाल ॥ बिना बिचारे औ शोचे बिन कैसे पठै दीन परिमाल ६९ बिना दयाके बौरीवाले नित उठिकरैं निर्दयी काम ॥ जानि बूझिकै कैसे पठवैं ऊदनजाउ यमन के धाम ७० इतना सुनिकै ऊदन बोले माता साँच देयँ बतलाय ॥ १६