आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
[Header] चन्द्रावलि की चौथ । २८६ ७
भलो बुरो कछु वै मानैं ना बेटा देशराज के लाल ५६ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ कीन प्रतिज्ञा हम महाराजा वहिनी विदा लेब करवाय ६० झूॅठि प्रतिज्ञा हम करिहैं ना चहुतनधजीधजी उड़िजाय ॥ करो आज्ञा अब जाने की आशिर्वाद देउ हरषाय ६१ इतना सुनिकै महाराजा तब चीराकलँगी दीन मँगाय ॥ शाल दुशाला मोहनमाला सबधनदीन लाखको भाय ६२ रानी अगमा यह सुनि पावा आये देशराज के लाल ॥ भयो बुलौवा जब महलन ते आयसु दीन तबै महिपाल ६३ तुरतै ऊदन तहँ ते चलिभे रानी भवन पहुँचे आय। आई नारी बहु दिल्ली की देखन हेतु लाहुरवा भाय ६४ रूप देखिकै बघऊदन को मनमें कहैं गिरीश मनाय ॥ मेरो बालम ऊदन होतो देतो शिव यह योगबनाय ६५ तौ मनभाती दिखलाती सब छाती फेरि यहाँलग कौन ॥ छाती खोले दिखलाती सो गाती गीत रँगीले जौन ६६ ऐसी नारी नहिं केहू युग कलियुगकुलटनको अधिकार। उलटन पुलटन कुलटन दीख्यो ऊदन जानिगयो बयपार ६७ भगिनी माता औ कन्या सम कीन्होतीनि भांति ब्यवहार ॥ रानी अगमा बोलन लागी मानों उदयसिंह सरदार ६८ तुम नहिं जावो गढ़बौरी को बेटा देशराज के लाल ॥ बिना बिचारे औ शोचे बिन कैसे पठै दीन परिमाल ६९ बिना दयाके बौरीवाले नित उठिकरैं निर्दयी काम ॥ जानि बूझिकै कैसे पठवैं ऊदनजाउ यमन के धाम ७० इतना सुनिकै ऊदन बोले माता साँच देयँ बतलाय ॥ १६
८ आल्हाखण्ड । २६० ना मोहिं पठयो परिमालिक ने ना मोहिंमलहनादीनपठाय ७१ मनसे आई चन्द्रावलि को सावन मुहवा देउँ दिखाय ॥ राजा रानी की सम्मत ना अपने बूत चल्यनहममाय ७२ रीछ औ बाँदर सँगमा लैकै जीत्यो लङ्क राम महराज ॥ ग्वालनबालनयशुमति लालन लैकै हना कंस शिरताज ७३ छोटो अंकुश मानुष लैकै बैठै नित्त नाग शिर जाय ॥ जहँ मनभावै तहँ लैजावै तेजै सबल परै दिखलाय ७४ तेज न होई ज्यहि देही माँ सो लै करी फौज का माय ॥ दया धर्ममाँ कछु अन्तर ना मन्तर साँच देयं बतलाय ७५ धरम युधिष्ठिर का जाहिर है अधरम कौरौ गये नशाय ॥ लौटि बनाफर अब जाई ना बहुतनधजीधजीउड़िजाय ७६ इतना सुनिकै रानी अगमा मनमाँ ठीक लीन ठहराय ॥ क्यहु समुझायेते मानी ना साँचो । हठी बनाफरराय ७७ बहु धन दीन्ह्यो फिरि ऊदनको आशिर्वाद दीन हर्षाय ॥ पायँ लागिकै महरानी के ऊदन कूच दीन करवाय ७८ छाय उदासी गै महलन में तम्बुन अटा बनाफर आय ॥ कूच करायो फिरि बगिया ते औ बैरीगढ़ चला दबाय ७६ बारा दिनकी मैजलि करिकै बौरी पास पहुँचे आय ॥ एक कोस जब बौरी रहिगै ऊदन तम्बू दीन गड़ाय ८० परा पलँगरा त्यहि तम्बू माँ तापर बैठ बनाफरराय ॥ लिखिकै चिट्ठी वीरशाहको धावन हाथ दीन पठवाय ८१ बैठक बैठे तहँ क्षत्री सब एकते एक शूर सरदार ॥ चिट्ठी लैकै धावन दीन्ह्यो आवन पढ़ा बनाफर क्यार ८२ बड़ी खुशाली वीरशाह करि जोरावरको लीन बुलाय ॥
चन्द्रावलि की चौथ । २६१
तुम चलिजावो अब बगियाको जहँपर टिका बनाफरराय ८३ आदर करिकै नरनाहर को जल्दी लावो इहाँ बुलाय ॥ इतना सुनिकै बुला जुरावर अपने मित्रन सों हर्षाय ८४ पाग बैंजनी सब कोइ बाँधिये जामा हरे रंग को भाय ॥ एकै बाना एक निशाना मिलिये उदयसिंहकोजाय ८५ देखें किसको पहिले भेंटैं नाहर उदयसिंह सरदार ॥ इतना सुनिकै सब मित्रनने एकै रंग कीन श्रृङ्गार ८६ पंद्रा सोला एकै रंग के बगिया तुरत पहुँचे जाय ॥ एकै रंगके सब क्षत्री हैं नहिंकोउ रावरङ्ग दिखराय ८७ मिले जुरावरको ऊदन तब निश्चय राजपुत्र अनुमान ॥ देखि चतुरता उदयसिंह की सोऊ मनै बहुत शरमान ८८ औ फिरि बोला उदयसिंह ते तुमको नृपति बुलावा भाय ॥ इतना सुनिकै बघऊदन तब साथै कूच दीन करवाय ८६ नचै बेंदुला तहँ मारग में अद्भुत कला रहा दिखराय ॥ पाग बैंजनी शिरपर बाँधे यहु रणबाधु बनाफरराय ६० बैठ सिंहासन महराजा जहाँ पहुँचा उदयसिंह तहँ जाय ॥ चरण लागिकै महराजाके ठाढ़े भये शीशको नाय ६१ पकरिकै बाहू तब ऊदन की तुरतै लीन्ह्यो हृदय लगाय ॥ बड़ी खातिरी करि ऊदनकी अपने पास लीन बैठाय ६२ चिट्ठी दीन्ह्यो चंदेले की लीन्ह्यो बीरशाह हर्षाय ॥ पढ़िकै चिट्ठी परिमालिक की मनमाँ बड़ा खुशी द्वैजाय ६३ जो कछु सामा मर्दानाथी ऊदन सबै दीन मँगवाय ॥ बड़ी खुशहाली भै राजा के फूले अंग न सका समाय ६४ राजा बोला फिरि ऊदन ते मानो कही बनाफरराय ॥
[Header] १० आल्हखण्ड । २६९
दिन दश रहिकै तुम बौरी में पाछे विदा लिह्यो करवाय ६५ कबहूं आयो नहिं बौरी को नाहर उदयसिंह सरदार ॥ जायकै भेंटो अब बहिनी को इतनी मानो कही हमार ६६ इतना सुनिकै बघऊदन ने अपने साथ जुरावर लीन ॥ जाय बेंदुलापर चढ़िबौठा महलनगमन बेगिहीकीन ६७ आगे जुरावर पीछे ऊदन महलन बेगि पहुँचे जाय ॥ चरण लागिकै महरानी के ऊदन सामा दीन मँगाय ६८ देखैं सामा महरानी तहँ औरो नारिन लीन बुलाय ॥ देखिकै सामा चंदेले की सबके खुशीभई अधिकाय ६६ मटुका खुलिगे मेवावाले घर घर तुरत दीन बँटवाय ॥ दर दर गाथा चंदेले की घर घर रहे नारि नर गाय १०० यकटक देखें बघऊदन को क्षत्री बड़ा रँगीला ज्वान ॥ रूप देखिकै बघऊदन को नारिन छूटिगयो अरमान १०१ जिन नहिं देखा बघऊदन को तेऊ गईं तहाँपर आन ॥ जब मुख देखें बघऊदन को तब चुभि जाय करेजे वान १०२ बेटी प्यारी परिमालिक की भेंटी उदयसिंहको आय ॥ लाज समेटी बेटी भेंटी बैठा सकुचि बनाफरराय १०३ तवलों माहिल दाखिल हैगे औ दरबार पहुँचे आय ॥ किह्यो खातिरी वीरशाह ने अपने पास लीन बैठाय १०४ किह्यो बड़ाई जब ऊदन की माहिल ठाकुर सों महगज ॥ माहिल बोले महराजा ते आवत सुने हमारे लाज १०५ किह्यो प्रशंसा तुम ऊदन की जान्यो भेद नहीं महिपाल ॥ राज्यते बाहर इनको कीन्ह्यो क्रोधितभयो बहुतपरिमाल १०६ आल्हा रहिगे नैनागढ़ में ऊदन यहाँ पहुँचे आय ॥
चन्द्रावलि की चौथ। २६३ ११ बिदाकरैहैं ये बेटी को दासी अपनि बनैहैं जाय १०७ खबरि पायकै परिमालिक ने हमको तुरत दीन पठवाय ॥ बिदाकरैहैं जो बघऊदन तौ सब जैहैं काम नशाय १०८ ईजति जैहै दोऊ दिशिकी साँचे हाल दीन बतलाय ॥ जहर घोरावो तुम भोजन में औ ऊदन को देउ खवाय १०६ बिना बयारी जूना टूटै औ बिन औषधि वहै बलाय ॥ चरचा कीन्ह्यो नहिं ऊदन ते मानो साँच यादवाराय ११० इतना कहिकै माहिल ठाकुर चलिभा करिकै राम जुहार ॥ हुकुम लगायो महराजा ने महलन भोजन होयँ तयार १११ फेरि बुलायो सब पुत्रन को माहिल कथा कह्यो समुझाय ॥ बात लेन को ऊदन आयो भोजन जहर देउ डरवाय ११२ छली धूर्त्त को या बिधि मारै तौ नहिं दोष देय संसार ॥ खबरि जनाई फिरि महलन में भोजन बेगि भये तय्यार ११३ भयो बुलौवा फिरि भोजन का ऊदन लीन ढाल तलवार ॥ देश हमारे कै रीती ना भोजनकरै बाँधि हथियार ११४ शंका लावो कछु मन में ना नाहर उदयसिंह सरदार ॥ बातें सुनिकै बहनोई की ऊदन धरी ढाल तलवार ११५ जायकै पहुँचे फिरि चौकापर नाहर देशराज के लाल ॥ साथै बैठे बहनोई के रखे गये परोसे थाल ११६ रक्षक सबको जग एकै है पूरणब्रह्म चराचर सम ॥ करै चाकरी नहिं अजगर क्यहू पक्षी करै न केहू काम ११७ अथवा जानो यह साँची तुम मछलिन कौन देय आहार ॥ ताल सुखाने चर्पी भूमि में रक्षा करैं राम भर्त्तार ११८ भै रघुनन्दन कै दाया तब ऊदन लीन्ह्यो थाल उठाय ॥
१२ आल्हखण्ड । २६४ आपन दीन्ह्यो बहनोई को ताको लीन्ह आप सरकाय ११९ यह गति देख्यो बहनोई जब तब अतिबोल्यो क्रोध बढ़ाय ॥ हमरो भोजन तुम कस लीन्ह्यो अपनो दीन्ह्यो हमें उठाय १२० इतना सुनिकै ऊदन बोले ठाकुर साँच देयँ बतलाय ॥ उचित हमारे यही देशमें सोई कीन यहॉपर आय १२१ इतना सुनिकै इन्द्रसेन ने अपनो पाटा लीन उठाय ॥ पीठिम मारा बघऊदन के बोला यहै रीति है भाय १२२ देखि तमाशा ऊदन ठाकुर अपनो गडुवा लीन उठाय ॥ कुमक आयगै बीरशाह कै परिगो गाँस बनाफरराय १२३ मर्द मर्दईते चूकै ना चहु निर्दई दई है जाय ॥ नरपुर गाथा घर घर गावैं सुरपुर वास मर्दका आय १२४ कीन मर्दई बघऊदन ने बहुतक क्षत्री दिये गिराय ॥ कोठे परते तलवारी को चन्द्रावलिने दीन गहाय १२५ सो लै लीन्ह्यो बघऊदन ने मारन लाग बनाफरराय ॥ इकले ऊदन के मुर्चापर कोई शूर नहीं समुहाय १२६ उचित न मारब बहनोई का । ऊदन ठीक लीन ठहराय ॥ पाय दुचित्ता बघऊदन को बंधन तुरत लीन करवाय १२७ जायकै डाख्यो फिरि खन्दक में पहरा चौकी दीन कराय ॥ देखि दुर्दशा यह ऊदन कै बहिनी बारबार पछिताय १२८ मन में शोचै मनै विचारै कासों कहै दुःख अधिकाय ॥ तवलों मालिनि पोहपा आई ऊदन कथा गई सब गाय १२६ ऐसो पाहुन ऐसि दुर्दशा हमते कछू कहा ना जाय ॥ को समुझावै महराजा को आपन देवै प्राण गँवाय १३० सुनिकै बातें ये मालिनि की तब चन्द्रावलि कह्यो सुनाय ॥
चन्द्रावलि की चौथि । २६५ १३ मैं अब देखों जस ऊदन को मालिनितसतुमकरोउपाय १३१ बातें सुनिकै चन्द्रावलिकी मालिनि कहाबचनसमुझाय ॥ निशा अँधेरी है सावन की तुमको ऊदनलवैं दिखाय १३२ इतना सुनिकै मालिनि सँग में ऊदन पास पहुँची जाय ॥ बहिनी प्यारी चन्द्रावलि तहँ बोली सुनो बनाफरराय १३३ बाहर आवो तुम खन्दक के अपने घोड़ होउ असवार ॥ निर्भय जावो तुम मोहबे को भाई उदयसिंह सरदार १३४ इतना सुनिकै ऊदन बोले बहिनी साँच देयँ बतलाय ॥ चोरी चोरा जो घर जावैं तौ रजपूती धर्म नशाय १३५ खबरि जो पइहैं सिरसावाले अइहैं तुरत बीर मलखान ॥ सुखसों सोवो तुम महलन में करिहैंकुशलमोरिभगवान १३६ इतना सुनिकै बहिनी चलिभै महलन फेरि पहुँची आय ॥ लिखी हकीकति सब मलखेको खन्दक परे लहुरवाभाय १३७ लिखिकै पाती सुवना गरमें बांधिकै दीन्ह्यो तुरत उड़ाय ॥ जावो सुवना तुम मोहबे को मल्हना महल पहुँचोजाय १३८ उड़िकै सुवना तहँ ते चलिभा नरवरगढ़ै पहुँचा आय ॥ मकरँद घूमै ज्यहि बगियामें सुवना बैठ तहाँपर जाय १३६ चकित घूमै मकरन्दा तहँ परिगै दृष्टि सुवापर आय ॥ पाती दीख्यो गल सुवना के तुरतै लीन तहाँ पकराय १४० पढ़िकै पाती लै सुवना को सो नरपतिको दीन दिखाय ॥ पाछे पहुँचा फिरि महलन में रानी खबरि जनाई जाय १४१ सुनी हकीकति जब रानी ने पाती गले दीन बँधवाय ॥ सुवना चलिभा नरवरगढ़ ते पहुँचा नगर महोबेआय १४२ मल्हना ठाढ़ी रह अण्टापर सुवना बैठ तहाँपर जाय ॥
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:
१४ आल्हाखण्ड । २६६ पाती दीन्ही गल सुवना के मल्हना नाम दीन बतलाय १४३ सुन्यो जबानी जब मल्हना की सुवना बैठ हाथ पर आये ॥ छोरिकै पाती मल्हना रानी आँखि अँकुन जरिकै जाय १४४ पढ़िकै पाती रानी मल्हना रूपना बारी लीन बुलाय ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो महारानी ने औ सब हाल कह्यो समुझाय १४५ लै कै चिट्ठी रूपना चलिभा मलखे पास पहुँचा जाय ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो मलखाने को औरो हाल गयो सब गाय १४६ पढ़िकै चिट्ठी मलखाने ने तुरतै फौजन कीन तयार ॥ जितने क्षत्री रहें सिरसा में सबियाँ बाँधि लीन हथियार १४७ लै कै फौजैं मलखाने फिरि पहुँचा नगर मोहोबे आय ॥ खबरि पठाई फिरि आल्हा को राजा पास पहुँचे जाय १४८ हाथ जोरिकै मलखे बोले दोऊ चरणन शीश नवाय ॥ कीन तयारी हम बौरी को ब्रह्मै साथ देउ पठवाय १४६ सुनिकै बातें मलखाने की बोले तुरत चँदेलेराय ॥ शकुन उठावो देवा ठाकुर देषो हार जीत बतलाय १५० पाय निकै बातें महाराजा की ज्योतिष पुस्तक लीन उठाय ॥ जायक शकुन उठायो देवा ठाकुर बोल्यो हाथ जोरि शिर नाय १५१ देखि ह तुम्हारी बौरी द्वैहै राजन सत्य दीन बतलाय ॥ मन में फौजैं आल्हा ठाकुर तबल गगये तहाँ पर झाय १५२ तवलों मालिन दिननायक सों झण्डा गड़ा निशा को आय ॥ ऐसो पाहुन नत्र चमकन लागे पक्षी गये बसेरन धाय १५३ को समुझावै टिया तकि तकि घों घों कण्ठ रहा घर्षाय ॥ सुनिकै बातें ये रघुनन्दन के सन्त न धुनी दीन परचाय १५४ अपने को ह्याँ ते करौं तरँग को अन्त ॥
वन्दावलि की चौथि। २६७ १५ राम रमामिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १५५ इति श्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुन्शी नवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपेंड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत ऊदनबन्धनवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ सवैया ॥ ध्यावत तोहिं सरस्वति मातु करो निज सेवकपै अब दाया । शारद नारदके पद ध्याय मनावत तोहिं सदा रघुराया ॥ गावतहौं गुण गोबिंद के अरु पावतहौं नितही मनभाया । नावतहौं शिर बारहिं बार करो ललिते कर मातु सहाया १ सुमिरन ॥ दोउ पद ध्यावों जो बर पावों सो सुनिलेउ शारदा माय ॥ जस जस गावों मैं आल्हा को तसतस सुखी होउँ अधिकाय १ माता भ्राता त्राता ताता नाता तुममा दीन लगाय ॥ तारो बोरो जो अब चाहो हमतो शरण तुम्हारी माय २ बेद पुराण श्रुति असमृति में जाँचा साँचा हमअधिकाय ॥ तुम्ही भवानी शारद मइया सेबका सार परी दिखराय ३ तव पद बिछुरे उर हमरे ते मूरखचन्द कहैं सब गाय ॥ ताते बिछुरैं पद उरते ना यह बर मिलै शारदामाय ४ छूटि सुमिरनी गै शारद कै अब आगे के सुनो हवाल ॥ मलखे आल्हा बौरी जैहैं हैहैं तहां युद्ध विकराल ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उदय दिवाकर भे पूरबमें किरणनकीनजगत उजियार ॥ हुकुम पायकै मलखाने को सवियाँ फौज भई तय्यार १ सजि पचशब्दा गा आल्हाका तापर होत भयो असवार ॥
१६ आल्हखण्ड । २९८ घोड़ी कबूतरी की पीठि पर बैठ्यो सिरसा का सरदार २ चढ़ा मनोहर की पीठि पर देवा मैनपुरी चौहान ॥ ब्रह्मा ठाकुर हरनागर पर बैठे सुमिरि राम भगवान ३ गर्भ गिराविनि कुँवाँ सुखाविनि लक्षिमिनि तोप भई तय्यार ॥ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उच्चार ४ रणकी मौहरि बाजन लागी घूमन लागे लाल निशान ॥ छाय लालरी गै अकाश में लोपे अन्धकार सों भान ५ पहिल नगारा में जिन बन्दी दुसरे बांधिलीन हथियार ॥ तिसर नगाराके बाजत खन हाथी घोड़न भये सवार ६ चौथ नगारा बाजन लाग्यो मलखे कूच दीन करवाय ॥ हाथी चलिभे दल बादल सों घण्टा गरे रहे हहराय ७ कोउ कोउ घोड़ा हंस चालपर कोउ कोउ मोरचालपरजाय ॥ सरपट जावै कोउ कोउ घोड़ा केहू टाप न परै सुनाय ८ खर खर खर खर कै रथ दौरैं रब्बा चलैं पवनकी चाल ॥ मारु मारुकै मौहरि बाजै बाजैं हाव हाव करनाल ६ बाजै डङ्का अहतङ्का के बङ्का सबै शूर सरदार ॥ शङ्का नाहीं क्यहु जियरे में चहुदिन शक्तिचलै तलवार १० लश्कर पहुँचा सब दिल्ली में क्षत्रिन कीन तहाँ विश्राम ॥ इकलो मलखे त्यहि समया में पहुँचा पृथीराज के धाम ११ बड़ी खातिरी राजा कीन्ह्यो तहँ पर बैठ बीर मलखान ॥ सबियाँ गाथा बौरीगढ़ की मलखे कीन तहाँपर गान १२ सुनी हकीकति जब मलखे की चौंड़ा सूरज लीन बुलाय ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो पृथीराज नें चौंड़ै फेरि कह्यो समुझाय १३ कह्यो जबानी बीरशाह ते जल्दी विदा देयँ करवाय ॥
चन्द्रावलि की चौथ । २९९ १७ कलहा लरिका बच्छराज का नामी सबै बनाफरराय १४ लड़िकै जितिहौ तुम इनते ना मरिकै सात धरौ अवतार ॥ लैके फौजैं सूरज बेटा मलखे साथ होउ तय्यार १५ विदा माँगिकै महराजा ते सूरज सिरसा का सरदार ॥ आये फौजन में मलखाने सब दल बेगि भयो तय्यार १६ गज इकदन्ता चौंड़ा बैठ्यो सूरज सब्जा पर असवार ॥ कूच को डङ्का बाजन लाग्यो हाथिन घोर कीन चिग्घार १७ चलिभइँ फौजैं दल बादल सों बौरीगढ़ै गई नगच्याय ॥ आठकोस जब बौरी रहिगै आल्हा डेरा दीन गड़ाय १८ तम्बू गड़िगा तहँ आल्हाका बैठे सबै शूरमा आय ॥ आल्हा बोले तहँ देवा ते कहिये करिये कौन उपाय १६ इतना सुनिकै देवा बोला साँची तुम्हें देयँ बतलाय ॥ योगी बनिकै बौरी चलिये तौसबहालठीकमिलिजाय २० यह मन भाई मलखाने के गुदरी पहिरि लीनतत्काल ॥ आल्हा देवा ब्रह्मा ठाकुर इनहुनतिलक लगायोभाल २१ लीन बाँसुरी ब्रह्मा ठाकुर खँझरी मैनपुरी चौहान ॥ कर इकतारा आल्हा लीन्ह्यो डमरू लीन वीर मलखान २२ चारो चलिभे फिरि तम्बुन ते बौरीगढ़ै पहुँचे आय ॥ बजी बाँसुरी तहँ ब्रह्माकी देवा खँझरी रहा बजाय २३ टप्पा ठुमरी भजन रेखता मलखे गावैं मेघ मलार ॥ को गति बरवै इकतारा कै बाजैं खूब लोह के तार २४ रूप देखिकै तिन योगिन का मोहे सबै नारिनर बाल ॥ बात फैलिगै बौरीगढ़ में योगी आये खूब विशाल २५ भा खलभल्ला औ हल्लाअति पहुँचे वीर शाहके द्वार ॥
१८ आल्हखण्ड । ३०० तजिकै लज्जा चलीं इकल्ला बल्लन क्यार मनों त्यौहार २६ अटाके ऊपर कढा करनको नारिन पैन नैन हथियार ॥ कड़ाके ऊपर छड़ा विराजैं तिनपर पायजेब झनकार २७ कर इकत्तारा आल्हा लीन्हे नीचे करें तारसों रार ॥ बजै बाँसुरी भल ब्रह्माकै मानो लीन कृष्ण अवतार २८ उपमा नाहीं शिरीकृष्ण कै तीनों लोकन के कर्त्तार ॥ काह हकीकति है ब्रह्मा कै पै यह बँसुरी केरि बहार २६ बाजै खँझरी भल देवा कै मलखे करें तहाँ पर गान ॥ देखि तमाशा तहँ योगिनका लागे कहन परस्पर ज्वान ३० ऐसे योगी हम देखे ना दाढ़ी गई सपेदीछाय ॥ गङ्गासागर के संगमलौं देखा देश देश अधिकाय ३१ बीरशाह तब बोलन लाग्यो चारों योगिन ते मुसुकाय ॥ कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ आपन हाल देउ बतलाय ३२ सुनिकै बातें महराजा की मलखे बोले वचन बनाय ॥ हम तो आये प्रागराज ते जावैं हरद्वार को भाय ३३ भोजन पावैं हम क्षत्रिन घर बृत्ती यहै लीन ठहराय ॥ होय जनेऊ ज्यहि घर नाहीं छत्री कौन भांति सो आय ३४ जनमत ब्राह्मण क्षत्री बनियाँ तीनों शूद्र सरिस हैं भाय ॥ होय जनेऊ जब तीनों घर तब यह वर्ण ठीक ठहराय ३५ जो मर्यादा तुम छोड़ा ना तौ घर भोजन देउ कराय ॥ कलियुग आवा महराजा है ताते साफ दीन बतलाय ३६ हम नहिं भोजन करें शूद्र घर चहु मरि जायें पेटके घाय ॥ यकडस लंघन चहु दैजावें पैनहिं सिंहघासको खाय ३७ सुनिकै बातें ये योगी की भामन खुशी यादवाराम ॥
चन्द्रावलि की चौथि। ३०१ १६ ओ यह बोला फिरि योगिनते हमहूँ साँच देयँ बतलाय ३८ तुम्हरो हमरो मत एकै है शंका आप देउ बिसराय ॥ पतित न क्षत्री कोउ बौरीगढ़ यादव बंश यहां अधिकाय ३६ पापी आयो इक मोहबे ते ताको खन्दक दीन डराय ॥ औरन पापी कोउ बौरी में तुमको सांच दीन बतलाय ४० इतना सुनिकै मलखे बोले ओ महराज यादवराय ॥ कैसो खन्दक कैसो पापी दर्शन हमें देउ करवाय ४१ कबहुँ खन्दक हम देखाना तुमते साँच दीन बतलाय ॥ बड़ी लालसा भै जियरे माँ खन्दक आप देउ दिखलाय ४२ इतना सुनिकै महराजा तब योगिन लीन्ह्यो साथ लिवाय ॥ जौने खन्दक में ऊदन थे सो महराज दिखावा जाय ४३ ऊदन दीख्यो जब योगिन को नीचे लीन्ह्यो शीश नवाय ॥ चारो योगी तहँते चलिभे पहुँचे राजभवन में आय ४४ भयो बुलौवा फिरि भोजन को मलखे बोले वचन बनाय ॥ आजु यकादशि निर्जल बर्ते राजन साँच दीन बतलाय ४५ करैं बसेरो नहिं बस्ती में जंगल बास करैं सब काल ॥ बिदा मांगिकै महराजा ते चारो चलत भये ततकाल ४६ आयकै पहुँचे फिरि फौजनमें अंगड़ खंगड़ धरे उतार ॥ सुरंग खुदायो मलखाने ने क्षत्रिन तुरत कीन तय्यार ४७ जौने खन्दक में ऊदन थे फूटो सुरंग तहाँपर जाय ॥ सुरंग के भीतर सों बघऊदन पहुँचे फौज अपनी आय ४८ जैसे पियासा पानी पावै तैसे खुशी भये सब भाय ॥ बाजे डंका अहलंका के शंका सबन दीन बिसराय ४६ मलखे बोले तहँ आल्हा ते लश्कर कूच देउ करवाय ॥
२० आल्हखण्ड । ३०२ बिदा करावैं चन्द्रावलि को तव यश जाय जगतमैछाय ५० इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर बोले करौ यहै अब भाय ॥ हुकुम पायकै यहु आल्हा को मलखे कूच दीन करवाय ५१ चलिभैं फौजें दलबदल सों बौरीगढ़ै गई नगन्य्याय ॥ प्रलय मेघ सम बजैं नगारा हाहाकार शब्द गा छाय ५२ गा हरिकारा तब बौरी में राजनै खबरि जनाई जाय ॥ फौजै आई क्यहु राजा की बौरी डांड़ दबायनि आय ५३ सुनिकै बातें हरिकाराकी राजा गयो सनाकाखाय ॥ मलखे बोले ह्यां रूपन ते कहियो बीरशाह ते जाय ५४ सुरुँग खोदिकै बघऊदन को आल्हा ठाकुर लीन निकारि ॥ बिदा कराये बिन जैहैं ना ताते करो नहीं तुमरारि ५५ बहिनी व्याही तुम्हरे घरमाँ ताते क्षमाकीन यहिवार ॥ नहिं अस ठाकुर को जन्माजग जाते मानि लीन हमहार ५६ इतना सुनिकै रूपन चलिभा बौरीगढ़ै पहुॅँचा जाय ॥ खबरि सुनाई महराजा को, जो कछु कह्यो बनाफरराय ५७ सो नहिं भाई बीरशाह मन बोल्यो तुरत बचन ललकार ॥ काह हकीकति है आल्हा कै आवैं विदा करावन द्वार ५८ हठ नहिं छोड़्यो दुर्योधन ने औ मरिगयो सहित परिवार ॥ खबरि जनावो तुम आल्हा को हमरे साथ करैं तलवार ५६ इतना सुनिकै रूपन चलिभे फौजन फेरि पहुँचे आय ॥ कही हकीकति बीरशाह की सुनि जरि उठे बनाफरराय ६० हुकुम लगायो निज फौजनमें सबियां शूर होयँ तय्यार ॥ हुकुम पायकै मलखाने को क्षत्रिन बांधिलीन हथियार ६१ गजैं चढ़ैया गजपर चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार ॥
चन्द्रावलि की चौथि। ३०३ २१ झीलम बख्तर पहिरिसिपाहिन हाथम लीन ढाल तलवार ६२ यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कोताखानी लीन कटार ॥ रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग ब्यवहार ६३ सजा बेंदुला का चढ़वैया लाला-देशराज का लाल ॥ को गति बरणै मलखाने कै जाको डरै देखि नरपाल ६४ बड़ा लड़ैया भीषमवाला देवा मैनपुरी चौहान ॥ ब्रह्मा ठाकुर सजि ठाढ़ो भो करिकै रामचन्द्रको ध्यान ६५ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बन्दी कीन समरपद गान ॥ बाजे डंका अहलंका के घूमनलागे लाल निशान ६६ हिंया कि गाथा ऐसी गुजरी सुनिये बीरशाहको हाल ॥ सुरज जुरावर दोउ पुत्रन को तुरतै बोलि लीन नरपाल ६७ करो तयारी समरभूमिकै अपनी फौज लेउ सजवाय ॥ जान न पावैं मोहबेवाले सबकी कटा देउ करवाय ६८ हुकुम पायकै महराजा को डंका तुरत दीन बजवाय ॥ सजे सिपाही बौरी वाले मनमाँ श्रीगणेशपदध्याय ६९ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ सजि इकदन्ता दुइदन्ता गे तिनपर हौदा रहे बिराज ७० कच्छी मच्छी नकुला सब्जा हरियल मुश्की घोड़ अपार ॥ ताजी तुरकी पँचकल्यानी सुरखा सुरँगा भये तयार ७१ चढ़ि अलबेला तिन घोड़नपर अपने बांधि लये हथियार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे हाथम लिये ढाल तलवार ७२ वार्जी तुरही मुरही ऐसी पुप्पूं पुप्पूं परा सुनाय ॥ बाजे डफला अलबेला सब शूरन मेला दीन लगाय ७३ मारु मारु करि मौहरि वार्जी वार्जी हाय हाय करनाल ॥
२२ आल्हाखण्ड । ३०४ खर खर खर डर कै रथ दौरे रव्वा चले पवनकी चाल ७४ सुर्खा घोड़ा चढ़ जुरावर सूरज सब्जापर असवार ॥ सुमिरि भवानी सुत गणेश को दोऊ चलन भये सरदार ७५ घोड़न वरणों की असवारन पैदर सेना तीस हजार ॥ तीन सहस हाथिन पर सोहैं बाँके यादव परम जुझार ७६ बाम्हन थोरे क्षत्री ज्यादा लीन्हे कठिन धार तलवार ॥ गर्ज्जति आवैं समरभूमि को एकते एक शूर सरदार ७७ कायर हल्ला खलभल्ला में तल्ला छोड़ि प्राण के दीन ॥ खुशी छायगै मन शूरन के मानों जीति इन्द्रपुर लीन ७८ बजे नगारा ठनकारा के दारा गर्भपात सुनिकीन ॥ गये दरारा उर कायर के सायर सत्यसत्य कहिदीन ७६ उइ धिरकारैं अपने तनका मनमाँ बार बार पछितायँ ॥ भैंसि वियानी घर हमरे मा माठा दूध केर अधिकाय ८० हाय रुपैया मोरे डारैं लीन्हे समरभूमि को जायँ ॥ दैया मैया भैया कहिकै ज्वैया हेतु बहुत पछितायँ ८१ शूर यशोमति मैया वाले भैया गैयन के चरवाह ॥ नाव खिवैया भवसागर के नागर कृष्णचन्द्र नरनाह ८२ तिनका सुमिरण मन अन्तर करि तत्पर भये स्वामि के काज ॥ करि अभिलाषा समरभूमि कै राखे मनै धर्म की लाज ८३ पढ़ि अशलोक न तजि शोकन को लोकन केर मिले जनुराज ॥ तैसे गाने मनअन्तर में बाजे तहाँ शूर शिरताज ८४ बाजे बाजे बाजे सुनिकै लाजे मनै आपने बीच ॥ तिनको कहियत हम अपनी दिशि जानो सकल नरन में नीच ८५ इम अनुमाना मन अपने है जाना नारि वित्तको कीच ॥
चन्द्रावलि की चौथ । ३०५ २१ पै हम त्यागी अनुरागीना लागी आश नारिधनबीच ८६ आपै त्यागी अनुरागीना तौ कस कहै नारिधन कीच ॥ साँच बखानैं हम अपनीदिशि सोई सकल नरनमें नीच ८७ पै यहु कलियुग बाबा आयो छायो रहै मनै संताप ॥ मन नहिं इस्थिर क्षणहू होवै कैसे होय मुनिन में थाप ८८ जपतै माला गायत्री के आला परब्रह्म के ध्यान ॥ यहु मन काला भाला मारै जो सब इन्द्रिनमें बलवान ८६ नीच न कहिये यहि कालामें जो कोउ साँच बिप्रको बाल ॥ युग यहु पाजी बदिकै बाजी राजानको किह्योबिहाल ६० ऐसे पाजी की राजी में सूरज बीरशाह का लाल ॥ जायकै पहुँच्यो समरभूमि में अब मलखेका सुनो हवाल ६१ सो जब दीख्यो आसमानको छाई खूब गर्द गुब्बार ॥ हँसिकै बोला रणशूरन ते सँभरो सबै शूर सरदार ९२ इतना कहतै फौजैं आईं तोपन होनलागि तहँ मार ॥ अररर अररर तोपैं छूटीं हाथिन घोर कीन चिग्घार ६३ को गति बरणै त्यहि समयाकै भारी भयो भयङ्कर मार ॥ नावैं गोला जौनी दिशिको तौनी दिशिकोकरैं चिथार ९४ सवैया ॥ भभकार उठैं तहँ गोलन की फुफकार करैं रण में गजराजा । धुधकार नगारनकी गमकी चमकी तलवारि जुरे सबराजा ॥ अपार जुझार करैं तहँ मार न डरैं मन नेकहु एकहुसाजा । समाजऔसाजदोऊदिशिमें अबलैरैललितेसबहीजयकाजा६५ बड़ी लड़ाई भै तोपन कै लोपे अन्धकार सों भान ॥ २०
२४ आल्हखण्ड । ३०६ छाय अँधेरिया गै दशहूंदिशि कतहूँ न सूझै अपन विरान ६६ धावा ह्वैगा दोऊ दल का दोऊ भये बरोबरि आय ॥ सूरजठाकुर बौरी वाला सिरसा क्यार बनाफरराय ९७ दोऊ सोहैं भल घोड़नपर लीन्हे हाथ ढाल तलवार ॥ द्वउ ललकारन मारन लागे सम्मुख होत होत सरदार ९८ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़ा महौतनक्यार ॥ हौदा हौदा यकमिल ह्वैगा औ असवार साथ असवार ९९ कल्ला भिड़िगे असवारन के लागी होन भड़ाभड़ मार ॥ छूटे ऊना लण्डन वाले कोताखानी चलीं कटार १०० बिजुली दमकै कउँधा चमकै तैसे धमकिरही तलवार ॥ मलखे ठाकुर शूर जुरावर दोऊ लड़नलागि सरदार १०१ सूरज ऊदन की भेंटन में लेंटनलागि सिपाही ज्वान ॥ परे लपेटे भट भेटे जे लेटे समर भूमि मैदान १०२ मनो ससंटे यम भेटे में लेटे क्षत्री परम जुझार ॥ वहैं पनारा तहँ रक्तन के औ हिलकारा उठै अपार १०३ को गति बरौँ तहँ पैदल की बाजै घूमि घूमि तलवार ॥ अपन परावा कछु सूझैना जूझै जूझ जूझ त्यहिबार १०४ बड़ी लड़ाई भै बौरीगढ़ मलखे सूरज के मैदान ॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै नाहर समरधनी मलखान १०५ बड़ा लड़ैया सिरसा वाला ज्यहिते हारि गई तलवार ॥ घोड़ी कबूतरी रणमें नाचे साँचे शूरवीर सरदार १०६ सूरज बोले तिन मलखे ते ठाकुर मानो कही हमार ॥ लौटि महोबे जल्दी जावो तबहीं कुशलरखाकरतार १०७ इतना सुनिके मलखे बोले तुमते साँच देयँ बतलाय ॥
चन्द्रावलि की चौथ । ३०७ २५ बिदा कराये बिन जैबैना बहुतनधजीधजीउड़िजाय १०८ सूरज बोले मलखाने ते यह नहिं होनहार यहिबार ॥ इतना कहिकै सूरज ठाकुर अपनी खैंचिलीनतलवार १०६ ऐंचिकै मारा मलखाने के मलखे लीन ढालपर वार ॥ आल्हा बोले मलखाने ते ठाकुर सिरसा के सरदार ११० पकरिकै बाँधो तुम सूरज को इनपर करो नहीं अब वार ॥ गरुहर नाते के लड़िकाहैं मानों सिरसाके सरदार १११ सुनिकै बातें ये आल्हा की तुरतै उतरिपरा मलखान ॥ पकरिकै बाँध्यो रणमण्डल में देखें खड़े अनेकन ज्वान ११२ सूरज बन्धन दीख जुरावर पहुँचा तुरत तहाँ पर आय ॥ औ ललकारा मलखाने को ठाढ़े होउ बनाफरराय ११३ इतना सुनिकै बघऊदन ने तुरतै पकरि जुरावर लीन ॥ उतरि कबुतरी ते मलखाने बन्धनतुरत तहाँपर कीन ११४ दूनों लरिका बीरशाह के आल्हाठाकुर लीन बँधाय ॥ भागीं फौजैं बौरीगढ़ की काहू धरा धीर ना जाय ११५ खबरि सुनाई बीरशाह को क्षत्रिन नीचे शीश नवाय ॥ बन्धन सुनिकै दउ पुत्रन को दुखिया भयो यादवाराय ११६ इन्द्रसेन औ मोहन बेटा इनको तुरत लीन बुलवाय ॥ हाल बतायो समरभूमि को आशिर्वाद दीन हर्षाय ११७ करो तयारी सब भाइन सह आल्है पकरि दिखावो आय ॥ इतना सुनिकै सबियाँ बेटा चलिभे राजै शीश नवाय ११८ आयकै पहुँचे निज सेनन में डंका तुरत दीन बजवाय ॥ बाजे डंका अहर्तंका के हाहाकार शब्द गा छाय ११९ पहिल नगारा में जिन बन्दी डंके शूर भये हुशियार ॥
२६ आल्हाखण्ड । ३०८ तिसर नगारा के बाजत खन क्षत्री समर हेतु तैयार १२० ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उच्चार ॥ रण की मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग ब्यवहार १२१ चालिमै सेना बौरीगढ़ सों हाहाकारी परै सुनाय ॥ घरी मुहूरत के अन्तर में पहुँचे समरभूमिमें आय १२२ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे देवा मैनपुरी चौहान ॥ सब रणशूरन त्यहि समया में भारी भीर दीख मैदान १२३ उड़ी कबुतरी मलखाने की हौदन उपर पहुँची जाय ॥ मलखे मारै तलवारिन सों घोड़ी देय टापके घाय १२४ मोहन ठाकुर उदयसिंह को परिगा समर बरोबरि आय ॥ भई कसामसि समरभूमि में औ तिलडरा भुईं ना जाय १२५ को गति वरणै रजपूतन कै दूनों हाथ करैं तलवार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार १२६ जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिलारै गाय ॥ तैसे मारै मलखे ठाकुर कायर भागैं पीठ दिखाय १२७ है मर्दाना जिनको बाना ते नर करें तहाँ पर मार ॥ को गति वरणै इन्द्रसेन कै दूनों हाथ करैं तलवार १२८ बड़े लड़ैया बौरी वाले मानैं नहीं समर में हार ॥ ना मुँह फेरैं मोहबे वाले दोऊ कठिन मचाई रार १२६ गिरैं कगारा जस नदिया माँ तैसे गिरैं ऊंट गज धाय ॥ परीं लहासें रणशूरन की तिनपर रहे गीध मड़राय १३० गोली ओली कतहूँ बरसें कतहूँ कठिन चलै तलवार ॥ छुरी कटारी कोऊ मारैं कोऊ कड़ावीन की मार १३१ गदा के ऊपर गदा चलावैं ढालन मारैं ढाल घुमाय ॥