आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
चन्द्रावलि की चौथ। ३०६ .२७ झर सर मारैं तलवारिन सों तीरन मन्न मन्न गा छाय १३२ धम् धम् धम् धम् बजैं नगारा मारा मारा परै सुनाय ! भम्भम् भम्भम् झीलम झलकें नीलम रंग परै दिखराय १३३ चम् चम् चम् चम् भाला चमकैं दमकैं उडुगण मनों अका़श ॥ बम् बम् बम् बम् क्षंत्री बँचकें भभकैं शूरनकेर प्रकाश १३४ सवैया ॥ आश करें नहिं प्राणन की ललिते रणशूरन रीति सदाहै। प्राण कि नाश कि कीर्त्ति प्रकाश कि आश नहीं सुख या बिपदाहै ॥ बीर कि शान कि आन कि मान कि ठानठने मलखान यदाहै। शान कि आन करे रणज्वान सो प्राणपयान कियेयीतदाहै १३५ को गति बरणै मलखाने कै रणमाँ कठिन करै तलवार ॥ घोड़ बेंदुला का चढ़वैया नाहर उदयसिंह सरदार १३६ गनि गनि मारै राजपूतन का बेटा देशराज का लाल ॥ मोहनठाकुर बौरी वाला आला बीरशाहका बाल १३७ बिकट लड़ाई की संयुग में कायर भागे लिहे परान ॥ बड़ा लड़ैया भीषमवाला आला मैनपुरी चौहान १३८ लड़ै चौंड़िया दिल्लीवाला बेटा लड़ै पिथौराकयार ॥ को गति बरणै इन्द्रसेन कै दूनों हाथ करै तलवार १३६ मलखे बोले इन्द्रसेन से , जीजा मानों कही हमार ॥ बहिनी बेही तुम्हरे घरमाँ तुमते सदा हमारीहार १४० अबै मसाला कछु बिगराना अनभल नहीं कीन कर्त्तार ॥ बिदा कराये बिन जैबे ना मानो सत्यवचन सरदार १४१ फौजैं प्यारो समरभूमि ते बौरी जाउ आप ततकाल ॥
३८ आल्हखण्ड । ३१० तुम समुझावो महराजा को काहे रारि करें नरपाल १४२ इतना सुनिकै इन्द्रसेन ने गरुई हाँक कीन ललकार ॥ काह हकीकति तुम राखतिहौ जावो विदाकरावत द्वार १४३ इतना कहिकै इन्द्रसेन ने अपनी खैंचि लई तलवार ॥ दौरिकै पकरयो उदयसिंह ने मलखे बाँध लीन त्यहिबार १४४ देखिकै बन्धन इन्द्रसेन को मोहन आयगयो त्यहिकाल ॥ मारन लाग्यो रजपूतन को मोहन वीरशाहका लाल १४५ औरो भाई जे मोहन के तेऊ करनलागि तलवार ॥ झुके सिपाही बौरीवाले लागे करन भड़ाभड़मार १४६ पैदल पैदल कै बरणी भै औ असवार साथ असवार ॥ बड़ी लड़ाई हाथिन कीन्ह्यो घोड़न कीन टापकीमार १४७ लीन्हे साँकरि दल बादलसों हाथी करत फिरैं चिग्घार ॥ भाला छूटैं असवारन के पैदल खूब चलै तलवार १४८ झुके सिपाही मोहबेवाले इनहुन कीन घोर घमसान ॥ चौंड़ा बाम्हन के मोर्चा में कोऊ शूर नहीं समुहान १४६ सोहै चौंड़िया इकदान्ता पर हाथम लिये ढाल तलवार ॥ मोहन ठाकुर बौरी वाला सब्ज़ा घोड़ापर असवार १५० हनि हनि मारै रजपूतन का गरुई हाँक देय ललकार ॥ अभिरे क्षत्री अरुझ्वारा सों आमाझ्वारचलै तलवार १५१ जौनै हौदा ऊदन ताकैं बेंबुल तहाँ पहुँचै जाय ॥ ऊदन मारैं तलवारिन सों बेंबुल टापन देइँ गिराय १५२ भाला चमकै तहँ देवा का मोहन केरि चलै तलवार ॥ घोड़ी कबूतरी का चढ़वैया मलखे सिरसाका सरदार १५३ मारि गिराये रजपूतन का कायर भागे लिहे परान ॥
चन्द्रावलि की चौथ । ३११ २६ को गति बरर्णै रणशूरन कै सम्मुख करें समर मैदान १५४ मान न रहिगे क्यहु क्षत्रिनके सब के छूटि गये अरमान ॥ बहुतक करहैं समरभूमि में अधजलपरे अनेकन जवान १५५ बहुतक सुमिरैं घर अपने को औ मन परे परे पछितायँ ॥ बहुतक क्षत्री गिरैं समर में काटे वृक्ष सरिस भहराय १५६ नदी भयङ्कर बही रकत की त्यहिमाँ गिरे ऊंट गज धाय ॥ छुरी कटारी मछली ऐसी ढालैं कछुवा परैं दिखाय १५७ परीं लहासैं तहँ मनइन की छोटी डोंगिया सम उतरायँ ॥ बहैं सिवारा जस नदिया माँ तैसे बहे बाल तहँ जायँ १५८ भूत पिशाच योगिनी नाचैं गावैं गीत बीर बैताल ॥ श्वान शृगालन की बनिआई गीधन गरे परे जयमाल १५६ चिघरैं हाथी रणमण्डल में डगरैं बड़े बड़े सरदार ॥ भगरैं मत्तखे रणशूरन ते डगरैं डारि डारि हथियार १६० रहि अभिलाषा नहिं केहू के जो फिरि करै वहाँपर मार ॥ जितने लड़का वीरशाह के बाँधे सिरसा के सरदार १६१ रहें सिपाही जे बौरी के भागे डारि ढाल तलवार ॥ भागे क्षत्रिन का मारैं ना नाहर मोहबे के सरदार १६२ रीति पुरानी इन छोड़ी ना कतहूँ समर भूमि में ज्वान ॥ पूरो क्षत्रीपन करतीं ना मरतीं नहीं समर मैदान १६३ तौ यह गावत को गाथा फिरि तजिकै सकल आपनो काम ॥ यह सब जानत है अपने मन रहिहै एक रामको नाम १६४ तबहूँ मानत है जीवन बहु तजिकै कर्म्म धर्म्म इतमाम ॥ यह नहिं जानत है अपने मन साँचो धर्मकर्म सुखधाम १६५ गये सिपाही नृप द्वारे पर औ सब हाल बताये जाय ॥
२* आल्हखण्ड । ३१२ बन्धनसुनिकै सब लड़िकनको राजा गये सनाकाखाय १६६ खबरि पहुँचिगै रनिवासे में राजा रानी लीन बुलाय ॥ बौहर आई चन्द्रावलि तहँ सोऊगई कथा सब गाय १६७ 'हमरे घरके माहिल बैरी उनके चुगुलिनका वयपार ॥ कहा मानिकै तुम माहिल का दादा किह्योयहांलग रार १६८ ना सुनिपावा मैं पहिले ते माहिलदीन्ह्यो रारि लगाय ॥ तौ अस हालत कसहोतै अब तबहीं देति सबै समुझाय १६६ योगी बनिकै ब्रह्मा आये सूरति दीख दूरि ते माय ॥ होति खटपटी जो ऊदन ते ब्रह्माभाय न अउतोधाय १७० टेक कठिन है बघऊदन कै हम खूब जानैं ठीक स्वभाव ॥ मिलिये दादा अब आल्हा ते याही जानो नीक उपाव १७१ सुनि सुनि बातें सब बौहर की रानी नृपति दीन समुझाय ॥ सुनिकै बातें महरानी की राजा ठीक लीन ठहराय १७२ आगि लगाई माहिल ठाकुर नातेदारी दीन तुराय ॥ राजा सोचत यह अपने मन पहुँचातुरतसिंहासनआय १७३ कलम दवाइति कागज लैकै । चिट्ठी लिखनलाग ततकाल ॥ जितनी बातें माहिल कहिगा लिखिगेयथातथ्यनरपाल १७४ फिरि कछु बातें चन्द्रावलिकी लम्बो पत्तो लिखा बनाय ॥ बन्धन छोरो सब पुत्रन को तुरतै विदा लेउ करवाय १७५ कीनि घटिहई माहिल ठाकुर नाहक रैसा दीन लगाय ॥ कहा मानिकै हम माहिल का साँचोसाँच गयन बौराय १७६ लिखी विधाता कै मेटै को साँचो कहैं गीत सब गाय ॥ लिखिकै चिट्ठी दै धावन को राजा बैठिगये शिरनाय १७७ लैकै चिट्ठी धावन चलिभा पहुँचा जहाँ बनाफरराय ॥
चन्द्रावलि की चौथ । ३१३ ११ चिट्ठी दीन्ह्यो सो आल्हा को ठाढ़ो भयो शीशकोनाय १७८ लागि कचहरी तहँ आल्हा कै रुमि झुमि रहीं पतुरियानाच ॥ आल्हा बाँचन चिट्ठी लागे हैगा रंग भंग तहँ साँच १७६ पढ़िकै चिट्ठी आल्हा ठाकुर सबको दीन्ह्यो हाल बताय ॥ माहिल ठाकुर की किरपा ते इतना परा परिश्रमआय १८० फिकिरिम माहिल हैं ऊदनकी निश्चय समुझि परै यहिबार ॥ जाको रक्षक रघुनन्दन है ताको जाय न बाँकोबार १८१ इतना कहिकै आल्हा ठाकुर बन्धन तुरत दीन छुड़वाय ॥ कहि समुझायो सबलरिकन ते राजै खबरि जनावो जाय १८२ ब्रह्मा आवत इन्द्रसेन सँग इनका बिदा देयँ करवाय ॥ माहिल मामा हमरे लागैं तातेकिहिनिदिल्लगीआय १८३ त्यहिमा सज्जन तुम महराजा सोऊ दया दीन बिसराय ॥ क्षम्यो ढिठाई अब हमरी तुम तुम्हरीशरणगये हमआय १८४ नातेदारी में उत्तमहौ आहिउ कृष्णबंश महराज ॥ गुरू श्वशुर सों संगर ठानैं क्षत्री जन्म युद्धके काज १८५ इतना कहिकै आल्हा ठाकुर सबको बिदा कीन ततकाल ॥ ब्रह्मा पहुँचे बीरशाह घर औसबकह्यो बनाफरहाल १८६ सुनिकै बातें सब आल्हा की राजा बिदा दीन करवाय ॥ बैठि पालकी में चन्द्रावलि गौरा पारवती को ध्याय १८७ बहुधन दीन्हो ब्रह्मा ठाकुर महरन पलकी लीन उठाय ॥ दशहूँ लरिकिन सों महराजा आये जहाँ बनाफरराय १८८ आवत दीख्यो बीरशाह को आल्हा मिले अगारी आय ॥ मिला भेंटकरि सबसों राजा अपने धाम गये हर्षाय १८६ बाजे डंका भहतंका के आल्हा कूच दीन करवाय ॥
३१ आल्हखण्ड । ३१४ चौंड़ा सूरज दिल्ली पहुँचे आल्हा गये मोहोबे आय १६० बेटी पहुँची जब महलन में मल्हना मिली अगाड़ी धाय ॥ बारह रानी परिमालिक की बेटी देखि गई हरषाय १६१ सावन भावन गावन लागीं आवन लागि विदेशी ज्वान ॥ मल्लन कल्लन फरकन लागे थिरकनलागिमेघअसमान १६२ दादुर बोलन जलमें लागे विरहिन उठी करेजे पीर ॥ बिना पियारे घर पीतम के कैसे धरै नारि मनधीर १६३ सवैया ॥ कैसे धरै मनधीर तिया परदेश पिया ज्यहि सावन छाये । राग औरङ्ग अनंग कि जंग उमंग भरै पियकी सुधिआये ॥ गात सबै तियके सकुचात बिदेश परे पिय पेट खलाये । कहाकहूँ ललिते विधिप्रीति अनीति किरीति सदादरशाये १६४ गवैं सुहागिल सब सावन में बारामासी मेघ मलार ॥ गड़े हिंडोला हैं घर घर में दर दर सावन केरि बहार १६५ काग उड़ावन उनघर लागीं जिन घर परे पिया परदेश ॥ सावन रावन उनके लागै जिनके चिट्ठीके अन्देश १६६ नहीं तो सावन अतिपावन है गावन गीत क्यार त्यवहार ॥ हमें सुहावन मनभावन है सावनक्यारसकलव्यवहार १६७ चौथि पूरिभै चन्द्रावलि कै ह्योति होय तरंग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त १६८ सेन छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशा को आय ॥ तारागण सब चमकन लागे सावन मेघ रहे घहराय १६६ कहुँ कहुँ तारा कहुँ कहुँ वादल नभहू भयो कलियुगी आय ॥
चन्द्रावलि की चौथि। ३१५ ५३ आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवौ प्रागनारायणभाय २०० रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चंद औ सूर ॥ मालिक ललिते के तवलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर २०१ माथ नवावों पितु अपने को मन में रामचन्द्र को ध्याय ॥ तुम्ही खेवैया हौ नैयाके ओ रघुरैया होउ सहाय २०२ माघ कृष्ण तिथि श्रीगणेशकी ताते वार वार पदध्याय ॥ सम्बत वनइस सै पचपन में पूरों भयो आज अध्याय २०३ इति श्रीलखनऊनिवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण जीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलानिवासि मिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत चन्द्रावलिचौथिपूर्णवर्णनंनाम द्वितीयस्तरंगः ॥ २ ॥ चन्द्रावलि की चौथि सम्पूर्ण ॥ ॥ इति ॥
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अथ आल्हखण्ड ॥ बलखबुखारे की लड़ाई अथवा इन्दल हरण व विवाह वर्णन ॥ सवैया ॥ बाजत झांझ मृदंग तहाँ औ सबै मुरचंगनसों स्वर गावैं । बाजत तार सितारनके यकत इनकी गति कौन बतावैं ॥ राजत बीण तहाँ तबला अवर जहँ झुंडन झुंडन आवैं । गाजत कृष्ण तहाँ ललिते अब जहाँ शिव गोपीरूप बनावैं १ सुमिरन ॥ मैया भैया और बपैया सब दिशि देखा खूब निहार ॥ बिना चरैया गैयावाला दैया कौन होय रखवार १ बूड़ै नैया भवसागर में कोउ न मिलै खिवैया हाल ॥ मैया यशुमति केर कन्हैया भैया साँच कहैं सुरपाल २ पारलगैया म्वरि नैया के गैयापाल कृष्ण महराज ॥ और खेवैया को नैया का जाकीशरण लेयँ हम आज ३
२ आल्हखण्ड । ३१८ तुम्ही गुसैयाँ दीनबन्धु हौ ओ ब्रह्मण्यदेव ब्रजराज ॥ लाज रखैया बाम्हन तनकी साँचे एक कृष्ण महराज ४ शरणहि ताकत विप्र सुदामा पायो सकल सम्पदा राज ॥ छूटि सुमिरनी गई कृष्ण की इन्दल ब्याह बखानों आज ५ अथ कथाप्रसंग ॥ परब दशहरा की जग जाहिर बुड़की हेतु जाय संसार ॥ भारी मेला श्रीगंगा को हिंडनक्यार पूर त्यवहार १ बहुतक छैला अलबेला तहँ घोड़न उपर भये असवार ॥ करी तयारी श्रीगंगा की चक्कस लिये बुलबुलनक्यार २ जेठदुपहरी भारी ह्वैकै ब्यारी करैं वृक्षतर आय ॥ देखि गँवाँरी तहँ नारी नर बोला तुरत बनाफरराय ३ कहाँ तयारी नर नारी करि ब्यारी किह्यो यहाँपर आय ॥ देखि बनाफर को नर नारी बोले साँच देयँ बतलाय ४ कीन तयारी हम विठूर की भारी पर्ब दशहरा केरि ॥ चकित ह्वैकै ऊदन दीख्य चारिउ दिशातर्फ फिरिहेरि ५ भारी मेला अलबेला तहँ रेला चला जाय सबराह ॥ घोड़ बेंदुला का चढ़वैया आयो जहाँ बैठ नरनाह ६ हाथ जोरिकै तहँ आल्हा के ऊदन बोले शीश नवाय ॥ करें तयारी हम गंगा की दादा हुकुमदेउ फरमाय ७ इतना सुनिकै आल्हा बोले साँची सुनो लहुरवा भाय ॥ देश देशके राजा अइहैं होई भीर भार अधिकाय ८ रारि मचैहौ तुम मेला में हमपर ऐरी आपदा आय ॥ ताते जावो नहिं मेला को मानो कही लहुरवा भाय ९ इतना सुनिकै माहिल बोले तुम सुनिलेउ बनाफरराय ॥
इन्दलहरण । २१६ ३. लड़िका ऊदन अब नाहीं हैं जो तहँ रारि मचैहैं जाय १० बातें सुनिकै ये माहिल की आल्हा बोले बचन बनाय ॥ तुम चलिजावो माहिल मामा तौ हम ऊदन देयँ पठाय ११ इतना सुनिकै माहिल बोले हम तो करब जाय असनान ॥ करो तयारी ऊदनठाकुर आल्हाबचन मानिपरमान १२ आल्हा बोले फिरि देबाते तुमहूं जाउ साथ यहिकाल ॥ पै तुम बच्यो बघऊदन को जहँपर होय रारिको हाल १३ इतना कहिकै आल्हाठाकुर महलन फेरिगयो अलसाय ॥ करै तयारी ऊदन लागे बाँके घोड़ लीन कसवाय १४ कच्छी मच्छी हरियल मुश्की सुर्खा सुरंगा रङ्ग बिरंग ॥ तुर्का गर्रा पँचकल्यानी सब्ज़ा स्याह एकही रंग १५ चुने सिपाही लिये संग में जिनते हारिगई तलवार ॥ संजा रिसाला घोड़नवाला लग भग जानो एक हजार १६ सजे सिपाही पंद्रासौ लग एकते एक लड़ैया ज्वान ॥ बाजे डंका अहर्तंका के घूमन लागे लाल निशान १७ इन्दल आये त्यहि समया में ऊदन पास पहुंचे आय ॥ हमहूं चलिबे श्री गंगा को चाचा लेवो साथ लिवाय १८ इतना सुनिकै ऊदन बोले बेटा मानो कही हमार ॥ दादा भौजी जो रोकैं ना हमरे साथ होउ तय्यार १६ इन्दल चलिभे तब महलन को माता पास पहुंचे जाय ॥ हाथ जोरिकै इन्दल बोले मातैं बार बार शिरनाय २० हुकुम कराय देउ दडुवा सों आवों चाचा साथ नहाय ॥ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली बेटै बारबार समुझाय २१ पर्व दशहरा की टरिजावै फिरि तुम आयो गङ्ग नहाय ॥
४ आल्हखण्ड । ५२० भारी मेला है बिठूर का जो तुम जेहो पूत हिराय २२ हौ इकलौता म्वरी कोखि में ताते मोर प्राण घबड़ाय ॥ इतना सुनिकै इन्दल बोले माता साँच देयँ बतलाय २३ जान न पावैं जो गंगा को तौ मरिजयँ जहरको खाय ॥ हुकुम देवावै की दइवाते की अब घेरै बैठि पछिताय २४ सुनिकै बातें ये इन्दल की सुनवाँ गई सनाका खाय ॥ गई तड़ाका ढिग आल्हा के इन्दल हाल बतावा जाय २५ बातें सुनिकै सब सुनवाँ की आल्हा बोले वचन सुनाय ॥ लिखी विधाता की मेटै को अब तुम देवो पूत पठाय २६ जहर खायकै जो मरिजाई तौहू शोच होय अधिकाय ॥ पार लगैहैं श्रीगंगाजी यहमत ठीक लीन ठहराय २७ इतना सुनिकै सुनवाँ चलिभै इन्दल पास पहुँची आय ॥ औ बुलवायो बघऊदन को सबियाँ हाल कह्यो समुझाय २८ इन्दल बिगरे हैं महलन में गंगा इन्हें देउ अन्हवाय ॥ पै हम सौंपति त्वहिं इन्दलको देवर बार बार शिरनाय २९ किह्यो बखेड़ा नहिं मेला मैं रेला होय तहाँ अधिकाय ॥ वहाँ न जायो इन्दल लैकेँ मान्यो कही वनाफरराय ३० इतना सुनिकै ऊदन इन्दल दोऊ चलिभे शीश नवाय ॥ जायकै पहुँचे फिरि फौजन में लश्कर कूच दीन करवाय ३१ बायें घोड़ा है देवा का दहिने बेंदुल का असवार ॥ बीच म जावै इन्दल ठाकुर कम्मर परी एक तलवार ३२ पांच दिनौना मारग लागे छठयें दिवस पहुंचे जाय ॥ भारी मेला भा बिठूर मौ आवा तहां कनौजीराय ३३ बाजै डंका तहँ ऊदन का लाखनि धावन लीन बुलाय ॥
[Page Header] इन्दलहरण । ३२१ ५
कहि समुझावा त्यहि धावनको डंका बन्द देउ करवाय ३४ हुकुम कनौजी का नाहीं है डंका कोऊ बजावै आय ॥ इतना सुनिकै धावन चलिकै डंका बजत दीन रुकवाय ३५ कहा न मान्यो जब बघऊदन देवा ठाकुर उठा रिसाय ॥ तुम्हें मुनासिव यह चहिये ना सबसों बैर बढ़ावो भाय ३६ चलिकै मिलिये अब लाखनिसों उनसों हुकुम लेउ करवाय ॥ हीनी तुम्हरी कछु हैहै ना मानो कही बनाफरराय ३७ सुनिकै बातें ये देवा की ऊदन मानिगयो त्यहिकाल ॥ पाँच दुमाला दुइ हीरा लै चलिभा देशराजका लाल ३८ नचै पतुरिया त्यहि तम्बूमें ज्यहिमें रहें कनौजीराय ॥ ऊदन ठाकुर तहँ पहुँचतभा राखी भेंट अगाड़ी जाय ३६ हाथ पकरिकै लाखनिराना अपने पास लीन बैठाय ॥ कही हकीकति बघऊदन ने लाखनिहुकुमदीनफरमाय ४० बाजै डंका इक ऊदन का औरन बन्द देउ करवाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे तम्बुन फेरि पहुंचे आय ४१ सुनो हकीकति अभिनन्दनकी हंसा ताको राजकुमार ॥ त्यहिकी बेटी चित्तरेखा मेला हेतु भई तय्यार ४२ नटिनी सँगमें त्यहि बेटी के जादू क्यार जिन्हें व्यपार ॥ बलखबुखारे को राजा जो त्यहिअभिनन्दननामउदार ४३ त्यहि का बेटा हंसाठाकुर चलिभा बहिनी साथलिवाय ॥ सवालाख लश्कर को लैके ब्रह्मावर्त्त पहुँचा आय ४४ तम्बू गड़िगे त्यहि रेती माँ भारी ध्वजारही फहराय ॥ संग सहेली त्यहि बहिनी की बोली बेटी बचन सुनाय ४५ चलिये हनवन जल्दी करिये अब दिनगयो यामभरआय ॥ २१
६ आल्हखण्ड । ३२२ सुनिकै बातें ये सखियन की बेटी चली तड़ाकाधाय ४६ भा भटभेरा तहँ इन्दल का देखत रूपगई ललचाय ॥ मन अरु नैना यकमिल ह्वैंगे सखियनदेखिगई सकुचाय ४७ फिरिफिरिचितवैदिशिइन्दलके हनवन करै गंगको वारि ॥ बिधिउ न जानै गति नारी की दशरथ मरे नारिसों हारि ४८ सोई नारी फिरि फिरि चितवै कैसी करै आजु त्रिपुरारि ॥ इन्दल निकले जलके बाहर सोऊनिकलिपरीसुकुमारि ४६ दिह्यो दक्षिणा द्विज देवन को दोऊ मोहबे के सरदार ॥ तहँते चलिभे फिरि तम्बू को देखत मेला केरि बहार ५० चचा भतीजे दोऊ ठाकुर तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ बेटी प्यारी अभिनन्दन की सोऊ चली तहाँ ते धाय ५१ आयकै पहुँची सो तम्बुन में औ सखियनसों लगीबतान ॥ ऐस रँगीला और सजीला मेला नहीं दूसरो ज्यान ५२ करिकै जादू याको हरिये करिये सखी सबई अबसाज ॥ मन नहिं हटको हमरो मानै ना अब करै तुम्हारी लाज ५३ सवैया ॥ होत अकाज न लाजरहै यह राज समाज लखे दुख छावै । जो कुलकानि न आनिकरौं कुलटा उलटा म्वहिंलोगबतावै॥ भावै यहै हमको सजनी रजनी बिन पीतम आनि मिलावै । पावै जबै ज्यहि नेहलग्गो ललिते मनमें तबहीं सुखआवै ५४ सुनिकै बातें चितरेखा की सखियनकहा बहुतसमुझाय ॥ धीरज राखो अपने मन माँ पीतम मिली तुम्हारो आय ५५ इतना कहिकै संग सहेली हेली तुरंत भई तय्यार ॥
इन्दलहरण । ३२३ ७ लय अलबेली संग सहेली आई देखन गङ्ग बहार ५६ ऊदन इन्दल देवा ठाकुर तीनों गये तहाँपर आय ॥ नाव मँगायो मल्लाहिन ते बैठयोसुमिरि शारदामाय ५७ बैठी नावन में चितरेखा बेखा नटिनिन केरि बनाय ॥ काह बतावैं हम लेखा त्यहि देखा रूप नहीं है भाय ५८ मै अवरेखा चितरेखा को लेखा कामदेव की नारि ॥ उठैं तरङ्गैं तहँ गंगा की जंगा करें वारिसों बारि ५६ लैकेँ पुरिया भैरोंवाली ऊदन उपर दीन सो डारि ॥ बीर महम्मद की पुरिया को देवा उपर चलावा नारि ६० नजर बन्दभै जब दूनों के तुरतै इन्दल लीन उतारि ॥ सुवा बनायो सो इन्दल को पिंजरा लीन तड़ाका डारि ६१ उतरिकै नावनसों जल्दी सो तम्बुन गई तड़ाका आय ॥ उतरी जादू जब ऊदन की तबनहिं इन्दल परे दिखाय ६२ जब नहिं दीख्यो तहँ इन्दलको ऊदन तुरत गये घबड़ाय ॥ जार मँगाये तहँ लोहे के सो गंगा माँ दये डराय ६३ मच्छ कच्छ बहुतक फँसिआये पै नहिं इन्दल परे दिखाय ॥ तिल तिल ढूंढ़ा भुइँ मेला में ऊदन देवा संग लिवाय ६४ पता न पायो जब इन्दल को तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ कही हकीकति तहँ माहिल ते नाहर उदयसिंह तहँ गाय ६५ सुनिकै बातें उदयसिंह की माहिल बोले वचन बनाय ॥ करो अँदेशा कछु जियरेना आल्है द्याव वहाँ समुझाय ६६ जादू कै कै कोउ इन्दल का साँचो लियो बनाफरराय ॥ घरने द्वैकै फिरि तुम ढूंढ़यो ह्वाँते कूच देउ करवाय ६७ इतना सुनिकै उदयसिंह ने डंका कूच दीन बजवाय ॥
.८ आल्हखण्ड । ३२४ पांच रोज को धावा करिकै दशहरिपुरै पहुँचे आय ६८ ऊदन रहिगे एक कोस में माहिल गये अगाड़ी धाय ॥ बड़ी खातिरी आल्हा करिकै अपने पास लीन बैठाय ६६ आल्हा बोले तहँ माहिल ते मामा हाल देउ बतलाय ॥ ऊदन देवा इन्दल बेटा तीनों रहे कहांपर भाय ७० दृग नहिं देखन इन तीनों को ताते चित्त बहुत घबड़ाय ॥ इतना सुनि कै माहिल बोले साँची सुनो बनाफरराय ७१ ख्यलै नेवारा गे नदिया में ऊदन इन्दल साथ लिवाय ॥ ऊदन देवा इकमिल हैकै औ इन्दलको दीन बहाय ७२ टरिजा टरिजा माहिल मामा धरती खोदि लेउँ गड़वाय ॥ ऐसी बातें फिरि बोले ना ठाकुर साँच दीन बतलाय ७३ है मर्दाना ऊदन बाना मामा काह गये बौराय ॥ किहे दिल्लगी की साँची है हमरोचित्त बहुत घबड़ाय ७४ इतना सुनिकै माहिल बोले साँची कहा बनाफरराय ॥ पोथा पढ़िकै धरिदीन्ह्यो सब अकिल तुम्हरी गई हिराय ७५ कौनिअदावति नलपुष्कलकी भारत पढ़े बनाफरराय ॥ कैसि दुर्दशा नलकी कीन्ह्यो पुष्कल नलको जुआँ खिलाय ७६ बिना वस्त्र के महराजा भे साजा सबै साज कर्तार ॥ तिनकी प्यारी दमयन्ती जो सोऊ छूटिगई त्यहि बार ७७ त्यहि दमयन्ती के ब्याहे में आये पवन अंग्नि सुरराज ॥ उद्यम कीन्ह्यो नल ब्याहे को चाहे दूत भये नलराज ७८ ब्याह न कीन्ह्यो दमयन्ती ने विन्ती बहुत कीन नलराज ॥ गन्ती कीन्ह्यो दमयन्ती ना लज्जितभये तहाँ सुरराज ७६ बारह बरसै वनवाजी मा राजी भये इन्द्र महराज ॥
इन्दलहरण । ३२५ ९ आल्हा मैने साँची जानो ऊदनकीन्ह साँचयहकाज ८० इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर गरुई हाँक दीन ललकार ॥ टरिजा टरिजा उरई वाले तोरे चुगुलिन का बयपार ८१ साँची साँची आल्हा ठाकुर तुम्हरे। इन्दल गयो हिराय ॥ कहौं असाँचा आल्हा ठाकुर साँचा सहों पुत्रका घाय ८२ करों दिल्लगी अस कबहुँ ना साँची सुनो बनाफरराय ॥ ऊदन बोले ह्याँ देवा ते हमरो चित्त बहुत घबड़ाय ८३ दशहरिपुरवा माहिल पहुँचे कैसी खबरि सुनावै जाय ॥ पुत्र शोक सम दुख दूसर ना जानतगाथ भली तुम भाय ८४ पुत्र शोक सों दशरथ मरिगे कीरति रही जगत में आज ॥ कीरतिसागर भट नागर जे आगर सबैग़ुणन रघुराज ८५ तेई खिवैया अब नैया के भैया काह करें धौं आज ॥ यहु दिन आये लग ध्यावै जो कलयुगसत्रुझकशिरताज ८६ सोई कलयुग के ऊदन हम साँचे कर्म्म कीन रघुराज ॥ दया न छोड़ा द्विज गाइन ते पीठि न दीन प्राणकेकाज ८७ नहिं अभिमानी बातें ठानी बालक विप्र साथ महराज ॥ परम पियारे द्विज तुम का हौ निर्मलएकक्षत्रराज्यहिभ्राज ८८ ऐसी स्तुति ऊदन कीन्ह्यो देवा चलत भयो ततकाल ॥ आयकै पहुँच्यो त्यहि मंदिर में ज्यहिमें देशराजको लाल ८६ ठाढ़े दीख्यो जब देवा को चलिभा उरई का सरदार ॥ भल भल रोंका आल्हा ठाकुर करिकै बहुतभांति सतकार ६० पै नहिं मान्यो जब माहिल ने आयसु दियो बनाफरराय ॥ देखिकै सूरति फिरि देवा की आल्हागये बहुत घबड़ाय ६१ कैसी गुजरी है तीरथ में देवा साँच देय बतलाय ॥
१० आल्हखण्ड । ३२६ परम पियारो पुत्र हमारो इन्दल राख्यो कहाँ छिपाय ६२ पूत न होवैं बहु कलयुग में यामें भूतन को अधिकार ॥ सेव करावैं बालापन में ज्वाने भये बसैं ससुराल ६३ पूत सपूतों इन्दल प्यारो कहँ पर मैनपुरी चौहान ॥ इतना सुनिकै देवा बोला साँची कहौं शपथभगवान ६४ बंश पिथौरा के नजदीकी आहिन सत्य बनाफरराय ॥ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे भाई सरिस चारिहू भाय ६५ कमती जानैं जो काहू को तो म्वहिं सजादेयँ भगवान ॥ कोऊ लैगा छलि जादू सों इन्दल तुम्हरौ पूत परान ६६ ऊदन बिगड़े तहँ मेला में जैबे पता लगावन काज ॥ तिल तिल पृथ्वी मेला ढूँढ़ा भारी भीर तहाँ महराज ६७ पता न लाग्यो जब इन्दल को माहिल कहा तवै समुझाय ॥ आल्हा ठाकुर को समुझावव ऊदन कूच देउ करवाय ६८ कहा मानिकै तब माहिल का डाँड़े परा लहुरवा भाय ॥ जौन देश में इन्दल बैठैं ऊदन लैहैं खोज लगाय ६६ बातैं सुनिकै ये देवा की आल्हा बहुत गये घबड़ाय ॥ जो कछु भाषा माहिल ठाकुर साँची जना बनाफरराय १०० पुत्र शोच सों उर धड़कत भो जियेर धीर धरा ना जाय ॥ आल्हा बोले तब देवा ते तुमऊदनको लवो बुलाय १०१ उनहीं पाँयन देवा चलिभा ऊदन खबरि दीन बतलाय ॥ बड़े शोच में बड़ भैया हैं तुमकोतुरतबुलानिभाय १०२ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे सम्मुख गये तड़ाका आय ॥ आवत जान्यो जब ऊदन को आल्हाशीशलीननिहुराय १०३ औ दिशि दीख्यो ना ऊदनके मानों शत्रु ठाढ़ भो आय ॥
इन्दलहरण । ३२७ ११ हाथ जोरिके ऊदन बोले चरणन वार बार शिरनाय १०४ मोहलति पावों छा महिना कै इन्दल खोजिदिखाओं आय ॥ इतना सुनिकै आल्हा जरिगे अपनो कोड़ा लीन उठाय १०५ पीटन लाग्यो जब ऊदन को सुनवाँ सुनत गेई तहँ आय ॥ कहि समुझायो सो आल्हाको आल्हा तुरत दीन डरियाय १०६ टरिजा टरिजा री सम्मुख ते नहिं शिरकाटि देउँ भुइँ डारि ॥ ऊदन मारा है इन्दल को साँची खबरि मिली म्वहिं नारि १०७ सुनवाँ बोली फिरि आल्हाते साँची सुनो बनाफरराय ॥ हम तुम जी हैं जो दुनिया में हैहैं पुत्र नाथ अधिकाय १०८ मिली सहोदर फिरि भाई ना आई कौन साँकरे काज ॥ सुन्दरगढ़ को चाचा हमरो तुमको कैद कीन महराज १०६ बनि सौदागर उदयसिंह ने तुम्हरी कैद दीन छुड़वाय ॥ बराबरस के ऊदन ठाकुर माड़ोली न वापका दायँ ११० लड़ि गजराजा सों ऊदन ने मलखे ब्याह दीन करवाय ॥ नरपति राजासों लड़िकै फिरि फुलवालये लहुरवा भाय १११ हथी पछारा इन दिल्ली में द्वारे पृथीराज के जाय ॥ ऐसे नामी इन ऊदन का मारब नहीं मुनासिब आय ११२ इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर जूरा पकड़ि तड़ाका लीन ॥ खैंचि तमाचा शिर माँ मारा सुनवाँ गमनमहल को कीन ११३ मारन लाग्यो फिरि ऊदन को द्यावलि सुनत पहुँची आय ॥ औ ललकारा फिरि आल्हाको मारो नहीं बनाफरराय ११४ इतना सुनिकै आल्हा बोले माता बैठु धाम में जाय ॥ जैसे ऊदन तुम को प्यारे तैसे पूत हमारो आय ११५ हम समुझावा भल ऊदन को तुम ना जाउ लहुरवा भाय ॥
१२ \qquad आल्हाखण्ड । ३२८ पूत हमारे के मारन को \qquad ऊदन मेला गये लिवाय ११६ बातें सुनिकै ये आल्हा की \qquad द्यावलि ठाढ़ि रही शिरनाय ॥ ऊदन ठाकुर को आल्हा ने \qquad कोड़न चर्सा दीनउड़ाय ११७ औ ललकारा फिरि ऊदन को \qquad आल्हा दाँतन ओठ चबाय ॥ धिक धिक तेरी रजपूती का \qquad इन्दल बिना पहुँचे आय ११८ दशहरिपुरवा अब आये ना \qquad नहिंहानिदरौं खङ्ग के घाय ॥ जहँ मनभावै तहँ चलिजावै \qquad साँची शपथ शारदामाय ११९ सुनिकै बातें ये आल्हा की \qquad ऊदन चला बहुत घबड़ाय ॥ सुनवाँ फुलवा द्यावलि तीनों \qquad पृथ्वी गिरीं पछारा खाय १२० देवा ऊदन दोऊ ठाकुर \qquad सिरसागढ़ै पहुँचे जाय ॥ खबरि पायकै मलखाने ने \qquad फाटकबन्दलीन करवाय १२१ यह गति देख्यो उदयसिंहने \qquad ठाढ़ो लाग तहाँ पछिताय ॥ कोऊ साथी नहिं विपदा में \qquad यह देवाते कह्यो सुनाय १२२ \qquad\qquad सवैया ॥ जाकि सुता हरिके गृह शोभित चन्द्रललाट महेश प्रवीनो । इन्द्र गयन्द दयो हय रबिको देवन धेनु द्रुमादिक दीनो ॥ शिरी मुनिरायजू कोपकियो तब गण्डकधारि सबै जलपीनो । एते बड़ेको विपत्तिपरी तब सिंधुकि काहु सहाय न कीनो १२३ इतना सुनिकै देवा बोला \qquad साँची सुनो लहुरवा भाय ॥ साथ तुम्हारो हम छाँड़व ना \qquad चहुतनधजीधजीउड़िजाय १२४ पै हम बांचे बहु पुराण हैं \qquad देखी कथा अनेकन भाय ॥ विपतिमें साथी कोउ विरलाहै \qquad साँची सुनो बनाफरराय १२५