भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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रेशम रसन सों कसिकै फिरि साँलों सीढ़ी दीन लगाय ॥ बारह कलशन की अम्बारी तिनपर धरी तुरतही जाय २१ घण्टा बांधे तिन के गर माँ क्षत्री होन लागि असवार ॥ भूरी हथिनी लखराना की सोऊ बेगि भई तय्यार २३ चन्दन सीढ़ी तामें लागी वामें लाखनि भये सवार ॥ हाथी सजिगा जब आल्हा का हाथ म लई ढाल तरवार २४ मनमाँ सुमिरयो जगदम्बा का अम्बा लाज तुम्होरे हाथ ॥ बैठ्यो हाथी पर आल्हा जब नायो रामचन्द्र को माथ २५ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे घोड़न होन लागि असवार ॥ घोड़ बेंदुला की पीढ़ी पर चढ़िगो द्यावलिकेर कुमार २६ घोड़ पपीहा मोहबे वालो तापर जोगा भयो सवार ॥ हंसामनि घोड़ा के ऊपर इन्दल आल्हा केर कुमार २७ घोड़ मनोहर पर देबा है भोगा सबजा पर असवार ॥ या बिधि सेना सब इकटौरी बारहलाख भई तय्यार २८ मारू डङ्का बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥ कऊ नालकिन कऊ पालकिन कोऊ चढ़े साँड़िया ज्वान २६ आगे हलका है हाथिन का बलका तिनके नाहिं ठिकान ॥ घण्टा बाजैं गल हाथिन के जहँ सुनिपरै बात नहिं कान ३० चिंघरति हाथी आगे चलि भे पाछे घोड़न चली कतार ॥ सरपट घोड़ा कोउ दउरावै कावा देवै कोऊ सवार ३१ कोउ मन पावै असवारे का तौ असमान पहुँचै जाय ॥ कोउ कोउ घोड़ा हंस चालपर कोउकोउमोरचालपरजाय ३२ खुर खुर खर खर कै रथ दौरैं चह चह रहीं धुरी चिल्लाय ॥ छाय अँधेरिया गै दशहू दिशि आपनपरै न हाथ दिखाय ३३