आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] गॉजरकीलड़ाई । ३६५ ५
डगमग डगमग धरती हाली थर थर शेष गये थर्राय ॥ देव सकाने बहु डरमाने पर्वत खोह छिपाने जाय ३४ को गति बरणै बघऊदन कै आगे घोड़ नचावत जाय ॥ धीरे धीरे छत्तीस दिन में गोरख पुरै पहुँचे आय ३५ पाँच कोस जब बिरिया रहिगइ डेरा तहाँ दीन डराय ॥ ऊँची टिकुरिन तम्बू गड़िगे नीचे लगीं बाजारें आय ३६ कम्मर छोरयो राजपूतन ने झीलम बखतर डरे उतार ॥ तंग बछेड़न के छोरेंगे हाथिन उतरिपरे असवार ३७ झण्डा गड़िगे तम्बुन ढिग में ते सब आसमान फहरायँ ॥ लागि कचहरी गै लाखनि कै बीच म बैठ बनाफरराय ३८ कलम दवाइत को मँगवायो कागज तुरतै लीन उठाय ॥ लिखी हकीकत सब हिरासिंहको अब तुम खबरदार है जाय ३६ बारह बरसै पूरी हुइगईं पैसा दिह्यो न कनउज जाय ॥ अब चढ़ि आये उदयसिंह हैं साथै लिहे कनउजीराय ४० धरम छत्तिरिन के नाहीं ये धोखे डाँड़ दवावैं आय ॥ लै कै पैसा बारह बरस का ह्याँपै बेगि देउ चुकवाय ४१ नहिं भोर भवरहरे पहके फाटत सबियाँ बिरिया लेउँ लुटाय ॥ बाँधिकै मुशकें मैं हिरासिंह की कनउज तुरत देंव पहुँचाय ४२ लिखि परवाना दै धावन को ऊदन करन लाग बिश्राम ॥ लै परवाना धावन चलिभो हिरासिंह बैठरहै निजधाम ४३ लै परवाना अटि धावन गो जायकै द्वारपाल को दीन ॥ लै परवाना द्वारपाल गो हिरासिंहबाम हाथ लैलीन ४४ खोलि लिफाफा सों कागजको आँकुइ आँकु बांचिसबलीन ॥ उत्तरलिखिकै हिरासिंह राजा तुरतै द्वारपालको दीन ४५