आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३ आल्हखण्ड । ३६६ उत्तर लैके द्वारपाल ने दीन्ह्यो धावन हाथ गहाय ॥ चलिकै धावन तब बिरिया ते पहुँचो उदयसिंहढिग आय ४६ शीश नवायो त्यहि ऊदन को कागज दिह्यो हाथ में जाय ॥ पढ़िकै कागज को बघऊदन औ लाखनिकोदीनसुनाय ४७ सुनिकै कागज को लखराना नैना अग्निवरण हैजायँ ॥ हुकुम लगायो निज फौजन में तोपन बिरिया देव उड़ाय ४८ हुकुम पायकै लखराना को झिलमैपहिरि सिपाहिनलीन॥ धरिकै कुंडी लोहेवाली पाछे ढाल गैंड़ की कीन ४६ यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कम्मर कसी तीन तलवारि ॥ जोड़ी तमंचा औ पिस्तौलैं बांधी छूरी और कटारि ५० धरि बंदूकन को कांधे पर क्षत्री भये बेगि तय्यार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बांके घोड़न भे असवार ५१ रणकी मौहरि बाजन लागी रणके होन लाग व्यवहार ॥ ढाढ़ी करखा बोलन लागे विप्रन कीन वेद उच्चार ५२ हिंया हकीकति ऐसी गुजरी अब बिरिया का सुनौहवाल ॥ तुरत नगड़ची को बुलवायो हिरसिंहबिरियाकोनरपाल ५३ हुकुम पायकै सो ठाकुर को तुरतै अटा भौन में जाय ॥ धर्यो नगाड़ा को सँड़ियापर डंका तुरत बजायो धाय ५४ पहिल नगाड़ा में जिनबन्दी दुसरे बांधि लीन हथियार ॥ तिसर नगाड़ा के बाजत खन क्षत्री भये सबै तय्यार ५५ हिरसिंह विरसिंह दूनों भाई हाथिन ऊपर भये सवार ॥ तोपें सजिकै आगे चलि भइँ पाछे हाथिन केर कतार ५६ चला रिसाला घोड़नवाला पाछे ऊँटन के असवार ॥ चले सिपाही त्यहिके पाछे खच्चर चलिभे डेढ़ हजार ५७