आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 398, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ेंगाँजरकीलड़ाई। ३६७ ७ कूच के डङ्का बाजन लाग्यो घूमनलाग्यो लालनिशान ॥ दाढ़ी करखा बोलन लागे बन्दी कीन समरपद गान ५८ मारु मारु करि मौहरि बाजीं बाजीं हाव हाव करनाल ॥ हिरासिंह बिरसिंह दोऊभाई पहुंचे समरभूमि ततकाल ५६ पहिले मारुइ भइँ तोपन की गोलंदाज भये हुशियार ॥ बम्ब के गोला छूटन लागे सीताराम लगैंहैं पार ६० जौने हाथी के गोला लागै मानो चोर सेंधि कैजाय ॥ जौने ऊंट के गोला लागै सारेक कूला जुदा हइजाय ६१ जौने बछेड़ा के गोला लागै मानों मगर कुल्याँचै खाय ॥ गोला लागै ज्यहि क्षत्री के साथै उड़ा चील्ह असजाय ६२ जौने रथमाँ गोला लागै ताके टूक टूक हैजाँय ॥ जौने बैलके गोला लागै मानों गिरह कबूतर खायँ ६३ जौने अँगमॉ गोला लागै तरुवर पात अइस गिरिजाय ॥ चुकीं बरुदैं जब तोपन की तब फिरि मारु बन्दहैंजाय ६४ उठीं बँदूकें बादलपुर की जो नब्बे की एक बिकाय ॥ मघाकी बूंदेन गोली बरषैं क्षत्रिन दीन्हों झरी लगाय ६५ सन् सन् सन् सन् गोली छूटैं क्षत्रिन लगैं करेजे जाय ॥ पार निकरिकै सो छातिन के देहीम करें अनेकन घाय ६६ गिरैं कगारा जस नदिया माँ तैसे गिरैं ऊँट गज धाय ॥ गिरै मुहभरा कितनेउँ क्षत्री कितनेउँ भाँगैं पीठिदिखाय ६७ दूनों दल आगे को बढ़िगे परिगो समर बरोबरि आय ॥ को गति बरणै त्यहि समया कै हमरे बूत कही ना जाय ६८ सूंड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतन केरि ॥ हौदा हौदा यकमिल हइगे मारैं एक एक को हेरि ६६