आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
रेशम रसन सों कसिकै फिरि साँलों सीढ़ी दीन लगाय ॥ बारह कलशन की अम्बारी तिनपर धरी तुरतही जाय २१ घण्टा बांधे तिन के गर माँ क्षत्री होन लागि असवार ॥ भूरी हथिनी लखराना की सोऊ बेगि भई तय्यार २३ चन्दन सीढ़ी तामें लागी वामें लाखनि भये सवार ॥ हाथी सजिगा जब आल्हा का हाथ म लई ढाल तरवार २४ मनमाँ सुमिरयो जगदम्बा का अम्बा लाज तुम्होरे हाथ ॥ बैठ्यो हाथी पर आल्हा जब नायो रामचन्द्र को माथ २५ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे घोड़न होन लागि असवार ॥ घोड़ बेंदुला की पीढ़ी पर चढ़िगो द्यावलिकेर कुमार २६ घोड़ पपीहा मोहबे वालो तापर जोगा भयो सवार ॥ हंसामनि घोड़ा के ऊपर इन्दल आल्हा केर कुमार २७ घोड़ मनोहर पर देबा है भोगा सबजा पर असवार ॥ या बिधि सेना सब इकटौरी बारहलाख भई तय्यार २८ मारू डङ्का बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥ कऊ नालकिन कऊ पालकिन कोऊ चढ़े साँड़िया ज्वान २६ आगे हलका है हाथिन का बलका तिनके नाहिं ठिकान ॥ घण्टा बाजैं गल हाथिन के जहँ सुनिपरै बात नहिं कान ३० चिंघरति हाथी आगे चलि भे पाछे घोड़न चली कतार ॥ सरपट घोड़ा कोउ दउरावै कावा देवै कोऊ सवार ३१ कोउ मन पावै असवारे का तौ असमान पहुँचै जाय ॥ कोउ कोउ घोड़ा हंस चालपर कोउकोउमोरचालपरजाय ३२ खुर खुर खर खर कै रथ दौरैं चह चह रहीं धुरी चिल्लाय ॥ छाय अँधेरिया गै दशहू दिशि आपनपरै न हाथ दिखाय ३३
[Header] गॉजरकीलड़ाई । ३६५ ५
डगमग डगमग धरती हाली थर थर शेष गये थर्राय ॥ देव सकाने बहु डरमाने पर्वत खोह छिपाने जाय ३४ को गति बरणै बघऊदन कै आगे घोड़ नचावत जाय ॥ धीरे धीरे छत्तीस दिन में गोरख पुरै पहुँचे आय ३५ पाँच कोस जब बिरिया रहिगइ डेरा तहाँ दीन डराय ॥ ऊँची टिकुरिन तम्बू गड़िगे नीचे लगीं बाजारें आय ३६ कम्मर छोरयो राजपूतन ने झीलम बखतर डरे उतार ॥ तंग बछेड़न के छोरेंगे हाथिन उतरिपरे असवार ३७ झण्डा गड़िगे तम्बुन ढिग में ते सब आसमान फहरायँ ॥ लागि कचहरी गै लाखनि कै बीच म बैठ बनाफरराय ३८ कलम दवाइत को मँगवायो कागज तुरतै लीन उठाय ॥ लिखी हकीकत सब हिरासिंहको अब तुम खबरदार है जाय ३६ बारह बरसै पूरी हुइगईं पैसा दिह्यो न कनउज जाय ॥ अब चढ़ि आये उदयसिंह हैं साथै लिहे कनउजीराय ४० धरम छत्तिरिन के नाहीं ये धोखे डाँड़ दवावैं आय ॥ लै कै पैसा बारह बरस का ह्याँपै बेगि देउ चुकवाय ४१ नहिं भोर भवरहरे पहके फाटत सबियाँ बिरिया लेउँ लुटाय ॥ बाँधिकै मुशकें मैं हिरासिंह की कनउज तुरत देंव पहुँचाय ४२ लिखि परवाना दै धावन को ऊदन करन लाग बिश्राम ॥ लै परवाना धावन चलिभो हिरासिंह बैठरहै निजधाम ४३ लै परवाना अटि धावन गो जायकै द्वारपाल को दीन ॥ लै परवाना द्वारपाल गो हिरासिंहबाम हाथ लैलीन ४४ खोलि लिफाफा सों कागजको आँकुइ आँकु बांचिसबलीन ॥ उत्तरलिखिकै हिरासिंह राजा तुरतै द्वारपालको दीन ४५
३ आल्हखण्ड । ३६६ उत्तर लैके द्वारपाल ने दीन्ह्यो धावन हाथ गहाय ॥ चलिकै धावन तब बिरिया ते पहुँचो उदयसिंहढिग आय ४६ शीश नवायो त्यहि ऊदन को कागज दिह्यो हाथ में जाय ॥ पढ़िकै कागज को बघऊदन औ लाखनिकोदीनसुनाय ४७ सुनिकै कागज को लखराना नैना अग्निवरण हैजायँ ॥ हुकुम लगायो निज फौजन में तोपन बिरिया देव उड़ाय ४८ हुकुम पायकै लखराना को झिलमैपहिरि सिपाहिनलीन॥ धरिकै कुंडी लोहेवाली पाछे ढाल गैंड़ की कीन ४६ यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कम्मर कसी तीन तलवारि ॥ जोड़ी तमंचा औ पिस्तौलैं बांधी छूरी और कटारि ५० धरि बंदूकन को कांधे पर क्षत्री भये बेगि तय्यार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बांके घोड़न भे असवार ५१ रणकी मौहरि बाजन लागी रणके होन लाग व्यवहार ॥ ढाढ़ी करखा बोलन लागे विप्रन कीन वेद उच्चार ५२ हिंया हकीकति ऐसी गुजरी अब बिरिया का सुनौहवाल ॥ तुरत नगड़ची को बुलवायो हिरसिंहबिरियाकोनरपाल ५३ हुकुम पायकै सो ठाकुर को तुरतै अटा भौन में जाय ॥ धर्यो नगाड़ा को सँड़ियापर डंका तुरत बजायो धाय ५४ पहिल नगाड़ा में जिनबन्दी दुसरे बांधि लीन हथियार ॥ तिसर नगाड़ा के बाजत खन क्षत्री भये सबै तय्यार ५५ हिरसिंह विरसिंह दूनों भाई हाथिन ऊपर भये सवार ॥ तोपें सजिकै आगे चलि भइँ पाछे हाथिन केर कतार ५६ चला रिसाला घोड़नवाला पाछे ऊँटन के असवार ॥ चले सिपाही त्यहिके पाछे खच्चर चलिभे डेढ़ हजार ५७
गाँजरकीलड़ाई। ३६७ ७ कूच के डङ्का बाजन लाग्यो घूमनलाग्यो लालनिशान ॥ दाढ़ी करखा बोलन लागे बन्दी कीन समरपद गान ५८ मारु मारु करि मौहरि बाजीं बाजीं हाव हाव करनाल ॥ हिरासिंह बिरसिंह दोऊभाई पहुंचे समरभूमि ततकाल ५६ पहिले मारुइ भइँ तोपन की गोलंदाज भये हुशियार ॥ बम्ब के गोला छूटन लागे सीताराम लगैंहैं पार ६० जौने हाथी के गोला लागै मानो चोर सेंधि कैजाय ॥ जौने ऊंट के गोला लागै सारेक कूला जुदा हइजाय ६१ जौने बछेड़ा के गोला लागै मानों मगर कुल्याँचै खाय ॥ गोला लागै ज्यहि क्षत्री के साथै उड़ा चील्ह असजाय ६२ जौने रथमाँ गोला लागै ताके टूक टूक हैजाँय ॥ जौने बैलके गोला लागै मानों गिरह कबूतर खायँ ६३ जौने अँगमॉ गोला लागै तरुवर पात अइस गिरिजाय ॥ चुकीं बरुदैं जब तोपन की तब फिरि मारु बन्दहैंजाय ६४ उठीं बँदूकें बादलपुर की जो नब्बे की एक बिकाय ॥ मघाकी बूंदेन गोली बरषैं क्षत्रिन दीन्हों झरी लगाय ६५ सन् सन् सन् सन् गोली छूटैं क्षत्रिन लगैं करेजे जाय ॥ पार निकरिकै सो छातिन के देहीम करें अनेकन घाय ६६ गिरैं कगारा जस नदिया माँ तैसे गिरैं ऊँट गज धाय ॥ गिरै मुहभरा कितनेउँ क्षत्री कितनेउँ भाँगैं पीठिदिखाय ६७ दूनों दल आगे को बढ़िगे परिगो समर बरोबरि आय ॥ को गति बरणै त्यहि समया कै हमरे बूत कही ना जाय ६८ सूंड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतन केरि ॥ हौदा हौदा यकमिल हइगे मारैं एक एक को हेरि ६६
८ आल्हखंड। ३६८ पहिया रथके रथमाँ भिड़िगे घोड़न भिड़ी रान में रान॥ भाला छूटे असवारन के मारैं एक एक को ज्वान ७० ऊँट चढ़ैया ऊँटन भिड़िगे पैदर चलन लागि तलवारि॥ भुजा औ छाती में हनि मारैं कउशिर काटिदेइँ भुइँडारि ७१ बड़ी लड़ाई भै क्षत्रिन कै नदिया बही रक्त की धार॥ लड़ि लड़ि हाथी तामें गिरिगे छोटे दीपन के अनुहार ७२ छुरी कटारी मछली जानो ढालैं कछुवा मनो अपार॥ कटि कटि बार बहैं शूरन के जस नदियामाँ बहै सिवार ७३ भुजा छत्तिरिन के ग्वाहैं जस ऊँटन बँधिगे नदी कगार॥ बिना पैरके बहैं बछेड़ा मानों घूमें मगर अपार ७४ बिना मूड़ के क्षत्री बहि बहि छोटीडोंगिया सम उतरायँ॥ गिद्ध काग सब तिन पर सो हैं मानों जल बिहारको जायँ ७५ नचैं योगिनी खप्पर भरि भरि मज्जैं भूत प्रेत बैताल॥ कुत्तन गरमा आँतनमाला स्यारनसबनकीन मुहँलाल७६ त्यही समइया त्यहिअवसर माँ यहु द्यावलिको राजकुमार॥ गरुई हाँकन सों ललकारै मारै भुजा ताकि तलवार ७७ द्यावा बोलै तब ऊदन ते ऊदन सुनिल्यो कानलगाय॥ भागे क्षत्रिन का मार्यो ना नहिं सब क्षत्रीधर्म नशाय ७८ हाथ सिपाहिन पर डार्यो ना जब लग ढूँढ़ि मिलै सरदार॥ कउँधालपकनिबिजुलीचमकनि आपौ खैंचिलीन तलवार७६ देवा ऊदन के मारुन मा क्षत्री होन लागि खरिहान॥ हिरसिंह विरसिंह दोऊ कोपे तिनहुनकीनघोरघमसान ८० बड़ी लड़ाई भै विरिया माँ हमरे बूतऋही ना जाय॥ जितने कायर रहें फौजन माँ तर लोथिनके रहे लुकाय ८१
हाला आवैं जब हाथिन के तब बिन मरे मौत है जाय॥ कोउ कोउ रोवैं महतारिन का. कोउ२दुलहिनिकालुलुआयँ ८२ कायर बिनवैं यह सुर्य्यन सों बाबा आजु अस्त हइजाउ॥ राति अँधेरिया जो कै पाउँ भागिकैतीसकोसघरजाउँ ८३ माठा रोटी घरमाँ खावैं आपनि भैंसि चरावन जायँ॥ ऐसि नौकरी हम करिहैं ना करडा बेंच शहरमाखायँ ८४ त्यही समय्या त्यहि अवसर माँ हिरसिंह बोल्यो भुजाउठाय॥ बनते कन्या धरि आईती त्यहिके अहिउ बनाफरराय ८५ अहिउ टुकरहा परिमालिक के औ चंदेले केर गुलाम॥ जाति गुलामन की हीनी है तुम्हरो नहीं लड़ैको काम ८६ यह कहिभाला नागदवनिको दूनो अँगुरिन लीनउठाय॥ दूनो अँगुरिन भाला तौले काली नाग ऐस मन्नाय ८७ तारा टूटै आसमान ते औ हिरगास भुई ना जायँ॥ छूटिग भाला जो हाथे ते कम्मर मचा ठनाका आय ८८ तेरते कटिगा यह मछरीबँद ऊपर कटिगा कुत्ताकबार॥ बचा दुलरुआ द्यावलि वाला ज्यहिका राखिलीन कर्त्तार ८९ औ ललकारा फिरि हिरसिंहको ठाकुर खबरदार हैजाउ॥ दूधु लरिकई मा पायो ना तुम्हरे मरे चढ़ै ना घाउ ६० वार हमारी सों बचिजायो घरमाँ छठी धरायो जाय॥ गर्दन ठोंक्यौ फिरि बेंदुल के हौदा उपर पहूंचो धाय ६१ ढालकी औफरिसों हनिमारा हिरसिंह गिरयो मूर्च्छाखाय॥ तब फिरि विरसिंह ने ललकारा ऊदन खबरदार है जाय ६२ भाला बरछिन को बहुमारा ऊदन लीन्ह्यो वार बचाय॥ वाकिकै मारा फिर विरसिंह को सोऊ गिरा मूर्च्छा खाय ६३
१० आल्हाखण्ड । ४०० बाँधिकै मुंशकै फिरि दोउनकी कनउज तुरत दीन पहुँचाया ॥ किला जीतिकैफिरि विरियाको आगे चला बनाफरराय ६४ चारिकोस जब पट्टी रहिगै ऊदन डेरा दीन गड़ाय ॥ सात निराजा पट्टी वालो ताको डाँड़ दवायो जाय ६५ तब हरिकारा पट्टी वाला सातनि खबरि सुनावाआय ॥ गाफिल बैठे तुम महाराजा डांड़े फौज परी अधिकाय ६६ इतना सुनिकै सातनि राजा गुसी धावन दीन पठाय ॥ हाल पायकै सो फौजन का राजै फेरि सुनावा आय ६७ सुनी हकीकति जब सातनिने डंका तुरतदीन बजवाय ॥ सजे सिपाही पट्टी वाले मनमें श्रीगणेशको ध्याय ६८ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बांके घोड़न भे असवार ॥ झीलमबखतरपहिरि सिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ६६ चढ़िगा हाथीपर महाराजा करिकै रामचन्द्र को ध्यान ॥ कूच कराय दयो पट्टी सों घूमतआवैं लाल निशान १०० घरी अढ़ाई के अरसा माँ सम्मुख गयो फौजके आय ॥ आवत दीख्यो जब फौजनको तुरतै उठा बनाफरराय १०१ भुजा उठाये ऊदन बोल्यो गरई हाँक देत ललकार ॥ सँभरो सँभरो ओ रजपूतो अपने बांधि लेउ हथियार १०२ इतना सुनिकै सब राजपूतन अपनी लई ढाल तलवार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार १०३ सजा बेंदुला का चढ़वैया लाला देशराज का लाल ॥ मारु मारु करि मौहरिबाजीं बाजीं हाउ हाउ करनाल १०४ बजे नगारा औ तुरही फिरि ढोलन शब्दकीन विकराल ॥ शूर सिपाही दुहुँ तरफा के लागेयुद्धकरनत्यहिकाल १०५
गाँजरकीलड़ाई। ४०१ ११ पैदल पैदल के बरणी मे औ असवार साथ असवार ॥ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुशभिड़े महौतनक्यार १०६ इतसों आगे पट्टी वाला उतसों उदयसिंह सरदार ॥ गज के हौदापर महराजा ऊदन बेंदुल पर असवार १०७ गर्दन ठोंकी जब बेंदुल की हौदा उपर पहुंचा जाय ॥ कलँगी पगड़ी महराजा की ऊदन दीन्ह्यो भूमिगिराय १०८ औ ललकारा महराजा को पैसा आजदेउ मँगवाय ॥ मारि सिरोहिन ते हनिडरिहौं नेका टकालेउँ निकराय १०६ धोखे जयचँद के भूलेना हमरो नाम बनाफरराय ॥ 'उदयसिंह दुनिया मा जाहिर सातनिसाँच दीनबतलाय ११० बारह बरसन की बाकी जो सो तू आज देय समुझाय ॥ नहीं तो बचिहै ना संगरमा जो विधि आपुनचावैआय १११ इतना सुनिकै सातनिराजा हौदा उपर ठाढ़ ह्वैजाय ॥ औ ललकारा बघऊदन का क्षत्री काह गये बौराय ११२ बतियाँ आहिन ना कुम्हड़ा की तर्जनि देखिजायँ कुम्हिलाय ॥ एक बनाफरकै गिन्ती ना लाखन चढ़ें बनाफरआय ११३ जबलग हडिन मा जी रैहै जबलग रही हाथ तलवार ॥ कौड़ी पैसन की बातैं ना देउँ न एक देहैं का बार ११४ जीना चाहै जो दुनियामा तौफिरि लौटिजाय सरदार ॥ नहिं शिरकटिहौं मैं संगर में ऊदन देखु मोरि तलवार ११५ इतना कहिकै सातनिराजा अपने शूरन कहा सुनाय ॥ जाय न पावैं कनउजवाले इनके देवो मूड़ गिराय ११६ सुनिकै बातैं महराजाकी क्षत्रिन कीन घोरघमसान ॥ भाला बलछी तलवारिन सों मारन लागि खूबतहूँज्वान ११७
१२ आल्हाखण्ड । ४०२ बहे पनारा नरदेहिन सों नदिया बही रक्त की धार ॥ लंबी धोतिन के पहिरैया क्षत्री जूझे तीनि हजार ११८ साल दुसाला मोहनमाला आला परे गले में हार ॥ ऐसे सुन्दर राजपूतन को नोचनलागे श्वानसियार ११९ गीधन केरी खूब बनिआई चील्हन भीर भई अधिकाय ॥ लगीं बजारैं तहँ कौवनकी कालीभूमि परै दिखलाय १२० लगी अथाई तहँ भूतन की प्रेतन कथा कही ना जाय ॥ यहु अलबेला आल्हा वाला गर्जा समर भूमिमाआय १२१ इन्दल ठाकुर के सम्मुख मा कोऊ शूर नहीं समुहाय ॥ चढ़ि पचशब्दा हाथी ऊपर आल्हागये समरमें आय १२२ यहु महराजा पट्टी वाला मारत फिरै शूर समुदाय ॥ आल्हा ठाकुर औ सातनि का परिगासमर बरोबरिआय १२३ सातनि बोला तब आल्हाते मानो कही बनाफरराय ॥ दीन न पैसा हम जयचंद को कैयो बार लड़ेते आय १२४ टका न पैहौ आल्हा ठाकुर याते कूच देउ करवाय ॥ इतना सुनिकै आल्हा बोले सातनि काहगयो बौराय १२५ बहुती बातें हम जानैं ना पैसा आज देउ मँगवाय ॥ नहिं दिखलावै अब संगर में जोकछुकीन बूततबजाय १२६ सुनिकै बातें ये आल्हा की सातनि खैंचि लीन तलवार ॥ हनिकै मारा सो आल्हा के आल्हालीन ढालपरवार १२७ भालामारा फिरि आल्हा के सोऊ लीन्ही वार बचाय ॥ गदा करावा सातनि राजा सो शिरपरी महाउतआय १२८ गिरा महाउत जब आल्हा का इन्दल दीन्ह्यो घोड़ उड़ाय ॥ पहुंचा घोड़ा जब हौदापर इन्दलमार्यो ढालघुमाय १२६
गाँजरकीलड़ाई । ४०३ १३ मुर्च्छित हैगा सातनि राजा तुरतै कैदलीन करवाय ॥ बांधिकै मुशकें महराजा की कनउजतुरतदीनपहुँचाय १३० जोगा भोगा दोउ मारेगे जखमी भयो पपीहा आय ॥ इतना शोचत उदयसिंह के मनमागयोक्रोधअतिछाय१३१ माल खजाना सब सातनि का ऊदन तुरत लीन लुटवाय ॥ कूच करायो फिरि पट्टी ते पहुँचे देश कामरू जाय १३२ गड़िगे तम्बू तहँ आल्हा के सब रंग ध्वजा रहे फहराय ॥ चला कामरू का हरिकारा राजै खबरि सुनाई जाय १३३ फौजै आई क्यहु राजा की डाँड़े भीर भार अधिकाय ॥ इतना सुनिकै कमलापति ने गुप्ती धावन दीन पठाय १३४ खबरिलायकै सो फौजन की राजै फेरि सुनावाआय ॥ सुनिकै बातें त्यहि धावन की डंका तुरत दीन बजवाय १३५ हाथी सजिगा कमलापति का तापर आपभयो असवार ॥ झीलमबखतरपहिरी सिपाहिन हाथ म लई ढालतलवार १३६ यक यक भाला दुइ दुइ बल्छी कोंताखानी लीन कटार ॥ हथीचढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न पर असवार १३७ बाजी तुरही तहँ सुरही सब पुप्पूं पुप्पूं परै सुनाय ॥ बाजे डङ्का अहतङ्का के राजा कूचदीन करवाय १३८ आयकै पहुँच्यो जब डाँड़े पर गरुई हाँकदीन ललकार ॥ को चढ़िआवा है डाँड़े पर सम्मुख जवाबदेय सरदार १३६ पाछे फौजै ऊदन करिकै आगे घोड़ नचावाजाय ॥ गरुई हाँकनते बोलत भा यहु रणबाधु बनाफरराय १४० तुमपर चढ़िकै लाखनि आये पैसा आपदेउ मँगवाय ॥ कुमक म आये आल्हा ठाकुर ऊदननाम हमारो आय १४१
१४ | आल्हाखण्ड । ४०४ छोटे भाई हम आल्हाके राजन साँच दीन बतलाय ॥ बाकी दैदो तुम जयचँद कै हम सब कूचदेयँ करवाय १४२ इतनी सुनिकै राजा बोले मानो कही बनाफरराय ॥ झंपी कौड़ी तुम पैहौ ना टेटुवा टायेर लेयँ लुटाय १४३ कहाँ मंसई तुम करिआये ऊदन नाम सुनावै भाय ॥ तुम अस ऊदन बहुतैरन को रणमा मारा खेत खिलाय १४४ सवैया ॥ सुनिकै यह वानि कहा बघऊदन साँचसुनै नृप बात हमारी । सेतु बँधा जहँ पय रघुनन्दन बेंदुल टाप तहाँलग धारी ॥ जयपुर जीति लुटाय लियों दतिया औ उरैछा भये सब आरी । पृथिराजकी शानकमान बढ़ी ललिते तिनद्वार गयंद पछारी १४५ झन्ना पन्ना को जीता हम जीता काश्मीर सुल्तान ॥ थहर थहर सब बूँदी काँपै झंडा अटकपार फहरान १४६ देश देश सब हम मथिडारे मारे हेरि हेरि नरपाल ॥ पैसा लेवैं जब संगर में तबहीं देशराज के लाल १४७ इतना कहिकै उदयसिंह ने तुरतै हुकुम दीन फर्माय ॥ जान कामरू के पावै ना इनके देवो मूड़ गिराय १४८ भा खलभल्ला औ हल्ला अति लागी चलन तहाँ तलवार ॥ पैदल पैदल कै बरणी मै औअसवार साथ असवार १४६ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतन केर ॥ हौदा हौदा यकमिल द्वैगे मारैं एक एक को हेर १५० गाफिलदेख्यो कमलापतिको ऊदन कैद लीन करवाय ॥ बांधिकै मुशकें महराजा की कनउज तुरत दीन पठवाय १५१
गौंजरकीलड़ाई । ४०५ १५ माल खजाना सब लुटवायो डंका फेरि दीन बजवाय ॥ जीति कामरू कामक्षा को तहँते कूच दीन करवाय १५२ जायकै पहुँचे बंगाले में झंडा तहाँ दीन गड़वाय ॥ बजे नगारा तहँ आल्हा के नभऔअवनिशब्दगाछाय१५३ गा हरिकारा तब जल्दी सों राजै खबरि सुनावा जाय ॥ भारी फौजै क्यहु राजा की डाँड़े परीं हमारे आय १५४ सुनिकै बातें हरिकारा की राजा गयो सनाकाखाय ॥ देखन पठवा क्यहु अफसर को त्यहिसबखबरिसुनावाआय १५५ गुरुखा राजा बंगाले का मन्त्रिन बोला बचन सुनाय ॥ तुरत नगाड़ा को बजवावो सबियाँफौजलेउसजवाय १५६ हुकुम पायके महराजा का सबियाँ फौज भई तैयार ॥ पहिल नगाड़ा मा जिनबंदी दुसरे फाँदिभये असवार १५७ हथी अगिनियाँ महराजा को सोऊ बेगि भयो तय्यार ॥ सुमिरि भवानी जगदम्बा का राजा तुरत भयो असवार १५८ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन बेद उच्चार ॥ रणकी मौहरि बाजन लागीं रणकाहोनलागब्यवहार १५६ पांच घरी के फिरि अर्सा मां राजा गयो समर में आय ॥ घोड़ बेंदुला को चढ़वैया यहु रणबाधु बनाफरराय १६० सम्मुख आवो महराजा के औ यह बोला भुजा उठाय ॥ बारह बरसन की बाकी अब राजन आप देउ मँगवाय१६१ लाखनि आये हैं कनउज ते आल्हा ऊदन साथ लिवाय ॥ छोटे भाई हम आल्हा के ऊदन नाम हमारो आय १६२ इतना सुनिकै गुरुखा राजा बोला महाक्रोध को पाय ॥ टरिजा टरिजा रे सम्मुख ते नहिंशिरदेवों भूमिगिराय १६३
१६ आल्हखण्ड । ४०६ तुइ अभिनन्दन के धोखे ते आये यहाँ बनाफरराय ॥ पैसा लेने की बातन को ऊदन चित्त देय बिसराय १६४ कूच करावै अब डाँड़े ते नाहीं गई प्राण पर आय ॥ इतना सुनिकै ऊदन जरिकै तुरतै दीन्ह्यो युद्ध मचाय १६५ सवैया ॥ रणशूरन की तलवार चलै अरु कूरन के उर होत दरारा । छप्प औ छप्प खपाखप शब्द बहै तहँ शोणित केर पनारा ॥ हाथ औ पाँव भुजा अरु जाँघ परे तहँ सर्प्पन के अनुहारा । मारु औ काटु उखारुभुजा ललिते इनशब्दनको अधिकारा १६६ मारु चपेट लपेट करें औ दपेट ससेट करें सरदारा । शूल औ सेल गदा अरु पट्टिश मारि रहे सब शूर उदारा ॥ हारि न मानत ठानत रारि पुरारि मुरारि खरारि अधारा । ललितेसुरबन्दिअनन्दि सबै रणशूरन युद्धकियोत्यहिबारा १६७ भई लड़ाई बंगाले में नदिया बही रक्तकी धार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार १६८ हाथी घोड़न कै गिन्ती ना पैदर जूझे पांच हजार ॥ घोड़ बेंदुला का चढ़वैया नाहर उदयसिंह सरदार १६६ ऐंड़ लगायो रसबेंदुल के हाथी ऊपर पहुँचा जाय ॥ गुर्ज चलायो बंगाली ने ऊदन लीन्ह्यो वार बचाय १७० ढाल कि औफड़ ऊदन मारी मुच्छाँ खाय गयो नरपाल ॥ मुशकें बाँधी तब राजा की नाहर देशराज के लाल १७१ रुपिया पैसा बंगाली के सब छकड़नमें लियो लदाय ॥ तुरतै चलिके बंगाले ते घेर्यो अटक बनाफर आय १७२
गॉजरकीलड़ाई । ४०७ १७ मुरली मनोहर दोउ भाइन को तहँ पर कैदलीन करवाय ॥ सुन्दर फाटक जौन अटकको त्यहिको तोपनदीनउड़ाय।७३ माल खजाना ताको लैकै तहँ ते कूच दीन करवाय ॥ आयकै पहुँचे फिरि जिन्सी में तम्बू तहाँ दीन गड़वाय ।७४ बाजे डंका अहर्तका के हाहाकार शब्द गा छाय ॥ राजा जगमनि जिन्सीवाला सोऊगयो समरको आय।७५ सवैया ॥ औ ललकार कियो रण में तुम ठाकुर काहे ग्रस्यो मम ग्रामा । काह तुम्हार चहैं रणनाहर तौन बताय कहौ यहि ठामा ॥ ऊदन बोलि उठा ततकाल सुनो नृप सुन्दरि बात ललामा । द्वादश अब्द भये तुमको नृप जयचंदको न दियो कछु दामा।७६ पैसा बाकी सब दैदेवौ तौ हम कूच देयँ करवाय ॥ इतना सुनिकै जिन्सी वाला शूरनबोला बचन सुनाय ।७७ मारो मारो ओ रजपूतो यहही ठीक लीन ठहराय ॥ झुके सिपाही दोनों दल मा मारैं एक एक को धाय ।७८ चली सिरोही भल जिन्सी मा लागे गिरन शूर सरदार ॥ को गति बरणै त्यहि समया कै आमा झोर चलै तलवार ।७६ मूड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार ।८० घोड़वेंदुला का चढ़वैया आल्हा केर लहुरवा भाय ॥ जीति लड़ाई मा जगमनि को तुरतै कैद लीन करवाय १८१ बांधिकै मुशकें तहँ जगमनि की तुरतै कनउज दीन पठाय ॥ मालखजाना सब जगमनि का ऊदनतुरत लीनलुटवाय १८२
१८ आल्हखण्ड। ४० = चिन्ता ठाकुर रुसनी वाला ताको जीति लीन फिरिजाय ॥ बजे नगारा हहकाराके तहँ ते चला बनाफरराय १८३ आयकै पहुँचा फिरि गोरखपुर सबियाँ शहर लीन घिरवाय ॥ सूरजठाकुर गोरखपुर का ऊदन लीन तहाँ बँधवाय १८४ तहँते चलिकै पटना आवा यहु रणबाघु बनाफरराय ॥ पूरन राजा पटना वाला ताको कैदलीन करवाय १८५ चला बनाफर फिरि तहँना ते काशीपुरी पहुँचा आय ॥ धन्य बखानैं हम काशी का मनमेंशिवाचरणकोध्याय१८६ अज अबिनाशी घट घट बासी पूरण ब्रह्म शम्भु करतार ॥ परम पियारी निज काशी के आजौ सत्य सत्य रखवार १८७ रहे भास्करानंद स्वामी हैं सबके माननीय शिरताज ॥ अब लग काशी हम देखी ना ना कछुपरा क्यहूने काज १८८ वर्ष अठारा कीन नौकरी बाबू प्रागनारायण धाम ॥ छपीं पुस्तकैं ह्याँ जितनी हैं ते सब पढ़ा पेटके काम १८६ सुनी बड़ाई भल काशी की दासी सरिस मुक्ति तहँ भाय ॥ तौनी काशी अविनाशी मा ऊदन तम्बू दीन गड़ाय १६० हंसामनि काशी का राजा ऊदन कैद लीन करवाय ॥ मारू डंका फिरि बजवाये कनउज चला बनाफरराय १६१ तीनि महीना औ तेरा दिन गाँजर खूब कीन तलवार ॥ बारह राजन को कैदी करि पठवा जयचंद के दरबार १६२ बोला मारग में लाखनि ते बेटा देशराज को लाल ॥ हम पर साँकर जहँ कहुँ परि है लाला रतीभानके लाल १६३ बदला देहौ की मुरिजैहौ लाखनि साँच देउ बतलाय ॥ सुनिकै बातें बघऊदन की लाखनिगंगशपथगाखाय १६४
गाँजरकीलड़ाई । ४०६ १६ साथ तुम्हारो साँचो देहैं प्यारे उदयसिंह तुम भाय ॥ करत बतकही द्वउ मारग में कनउजशहर पहूँचे आय १६५ अनँद बधैया घर घर बाजीं सबहिन कीन मंगलाचार ॥ पूरि लड़ाई भै गाँजर कै रक्षा करें सिया भर्त्तार १६६ खेत छूटिगा दिननायक सों झएडागड़ा निशाको आय ॥ आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनारायणभाय १६७ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १६८ माथ नवात्रों पितु अपने को जिन बल गाथ भई तय्यार ॥ बड़े यशस्वी पितु हमरे हौ साँचे धर्म कर्म रखवार १६६ करों तरंग यहाँ सों पूरण तवपद सुमिरि भवानीकन्त ॥ शम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त २०० इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलां निवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसाद कृत गाँजरयुद्धवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ गाँजर का युद्ध समाप्त ॥ इति ॥
४. चतुर्थ भाग: दिल्ली-महोबा महासंग्राम, पृथ्वीराज चौहान से युद्ध व ऊदल बलिदान
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॥ श्रीगणेशाय नमः॥ अथ आल्हखण्ड ॥ सिरसाकासमरवर्णन ॥ सवैया ॥ ध्यावत तब पद कंज शिवा मनभावत दे वरदान भवानी । तवपति भंग नशे में परे अरु गावत गीत हरी हरि वानी ॥ नाहिं सुनय बिनती ललिते यह साँचहु साँचहु साँच बखानी । दे मृगनयनी कि दे मृगछाल यहै हम चाहत हैं शिवरानी १ सुमिरन ॥ सुमिरि भवानी शिवरानी को सिरसा समर करौं विस्तार ॥ नैया डगमग भवसागर में माता तुम्ही निबाहन हार १ आदि भवानी महरानी तुम तुम बल सृष्टि रचैं करतार ॥ परम पियारी त्रिपुरारी की धारी देह जगत उपकार २ पुत्र षडानन गजआनन हैं हमरे माननीय शिरताज ॥ प्रथमँ सुमिरैं गजआनन को होवैं सकल तासु के काज ३ सुमिरि षडानन का दुनियामाँ लाखन सिद्धभये द्विजराज ॥ मलखे पृथ्वी के संगर को वर्णन करौं सुमिरि रघुराज ४
२ आल्हाखण्ड । ४१२ अथ कथाप्रसंग ॥ एक समैया माहिल ठाकुर लिल्ली घोड़ापर असवार ॥ तिकृतिकृतिकृतिकूघोड़ीहांकत पहुंचे दिल्ली के दर्बार १ आवत दीख्यो जब माहिल को पिरथी कीन बड़ा सत्कार ॥ आवो आवो बैठो बैठो ठाकुर उरई के सरदार २ कुशल बतावो अब मोहबेकी नीके राजकरैं परिमाल ॥ इतना सुनिकै माहिल बोले साँची सुनो आप नरपाल ३ अवसर नीको यहि समया माँ तुम्हरे हेतु रचा कर्त्तार ॥ आल्हा ऊदन गे कनउज का राजा जयचँद के दरबार ४ भले बुरे जो दिन बीतत हैं आवैं फेरि नहीं सो हाथ ॥ त्यहिते तुमका समुझावत हैं साँची सुनो धरणि के नाथ ५ सिरसा मोहबा यहि समया माँ दूनों आप लेउ लुटवाय ॥ सुनिकै बातें ये माहिल की भा मनखुशी पिथौराराय ६ सात लाख फिरि फौजैं लैंकै तुरतै कूचदीन करवाय ॥ चारकोस जब सिरसा रहिगा तम्बू तहाँ दीन गड़वाय ७ हुकुम लगायो महराजा ने सिरसा किला गिरावाजाय ॥ तब हरकारा सिरसा वाला मलखेखबरि जनावा आय ८ फौजैं आईं पृथीराज की ओ महराज बनाफरराय ॥ इतना सुनिकै मलखे ठाकुर डंका तुरत दीन बजवाय ६ हुकुम लगायो अपने दलमा फौजैं होन लगीं तय्यार ॥ तुरत कबूतरी पर चढ़िबैठा नाहर सिरसा का सरदार १० छींक तड़ाका भै सम्मुख मा माता बोली वचन सुनाय ॥ तुम नहिं जावो अब मुर्चा को मानो कही बनाफरराय ११ इतना सुनिकै मलखे बोले माता साँच देयँ बतलाय ॥
सिरसाकासमर । ४१३ ३
- आशिर्वाद देउ जल्दी सों जामें काम सिद्ध है जाय १२ चढ़ा पिथौरा है सिरसा पर माता हुकुम देउ फरमाय ॥ बिरमा बोली तब मलखे ते तुम्हरो बार न बाँका जाय १३ चरण लागिकै महतारी के मलखे कूच दीन करवाय ॥ चौंड़ा ताहर चन्दन बेटा तीनों परे तहाँ दिखलाय १४ चौंड़ा बोला मलखाने ते मानो कही बनाफरराय ॥ किला गिराय देउ सिरसा का दीन्ह्यो हुकुम पिथौराराय १५ इतना सुनिकै मलखे बोले चौंड़ा काह गये बौराय ॥ अपने हाथे हम बनवाया हमहीं देवैं किला गिराय १६ जो कछु ताकति हो पिरथीकी सो अब हमैं देयँ दिखलाय ॥ असगति नाहीं है पिरथी कै हमरो किला देयँ गिरवाय १७ सुनिकै बातें मलखाने की चौंड़ा लागु दीन लगवाव ॥ झुके सिपाही दुहुँतरफा के मारैं एक एक को धाय १८ पैदल पैदल कै बरणी मै और असवार साथ असवार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्त की धार १६ अपन परावा क्यहु सूझैना दूनों हाथ करैं तलवार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लाग पहार २० जैसे भेड़िन भेड़हा पैठे जैसे अहिर बिडारै गाय ॥ तैसे मारै मलखे ठाकुर रणमा क्षत्रिन खेलखिलाय २१ बहुतक घायल भे खेतनमों बहुतक हैगे बिना परान ॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै नाहर समरधनी मलखान २२ चढ़ा चौंड़िया इकदन्तापर गरुई हाँक देय ललकार ॥ मोरि लालसा यह छावति है ठाकुर सिरसा के सरदार २३ मेरे सिपाहिन का पैहौ तुम ठाकुर मोरि तोरि तलवार ॥