भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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पृष्ठ 408

गॉजरकीलड़ाई । ४०७ १७ मुरली मनोहर दोउ भाइन को तहँ पर कैदलीन करवाय ॥ सुन्दर फाटक जौन अटकको त्यहिको तोपनदीनउड़ाय।७३ माल खजाना ताको लैकै तहँ ते कूच दीन करवाय ॥ आयकै पहुँचे फिरि जिन्सी में तम्बू तहाँ दीन गड़वाय ।७४ बाजे डंका अहर्तका के हाहाकार शब्द गा छाय ॥ राजा जगमनि जिन्सीवाला सोऊगयो समरको आय।७५ सवैया ॥ औ ललकार कियो रण में तुम ठाकुर काहे ग्रस्यो मम ग्रामा । काह तुम्हार चहैं रणनाहर तौन बताय कहौ यहि ठामा ॥ ऊदन बोलि उठा ततकाल सुनो नृप सुन्दरि बात ललामा । द्वादश अब्द भये तुमको नृप जयचंदको न दियो कछु दामा।७६ पैसा बाकी सब दैदेवौ तौ हम कूच देयँ करवाय ॥ इतना सुनिकै जिन्सी वाला शूरनबोला बचन सुनाय ।७७ मारो मारो ओ रजपूतो यहही ठीक लीन ठहराय ॥ झुके सिपाही दोनों दल मा मारैं एक एक को धाय ।७८ चली सिरोही भल जिन्सी मा लागे गिरन शूर सरदार ॥ को गति बरणै त्यहि समया कै आमा झोर चलै तलवार ।७६ मूड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार ।८० घोड़वेंदुला का चढ़वैया आल्हा केर लहुरवा भाय ॥ जीति लड़ाई मा जगमनि को तुरतै कैद लीन करवाय १८१ बांधिकै मुशकें तहँ जगमनि की तुरतै कनउज दीन पठाय ॥ मालखजाना सब जगमनि का ऊदनतुरत लीनलुटवाय १८२