आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ आल्हखण्ड । ४०६ तुइ अभिनन्दन के धोखे ते आये यहाँ बनाफरराय ॥ पैसा लेने की बातन को ऊदन चित्त देय बिसराय १६४ कूच करावै अब डाँड़े ते नाहीं गई प्राण पर आय ॥ इतना सुनिकै ऊदन जरिकै तुरतै दीन्ह्यो युद्ध मचाय १६५ सवैया ॥ रणशूरन की तलवार चलै अरु कूरन के उर होत दरारा । छप्प औ छप्प खपाखप शब्द बहै तहँ शोणित केर पनारा ॥ हाथ औ पाँव भुजा अरु जाँघ परे तहँ सर्प्पन के अनुहारा । मारु औ काटु उखारुभुजा ललिते इनशब्दनको अधिकारा १६६ मारु चपेट लपेट करें औ दपेट ससेट करें सरदारा । शूल औ सेल गदा अरु पट्टिश मारि रहे सब शूर उदारा ॥ हारि न मानत ठानत रारि पुरारि मुरारि खरारि अधारा । ललितेसुरबन्दिअनन्दि सबै रणशूरन युद्धकियोत्यहिबारा १६७ भई लड़ाई बंगाले में नदिया बही रक्तकी धार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार १६८ हाथी घोड़न कै गिन्ती ना पैदर जूझे पांच हजार ॥ घोड़ बेंदुला का चढ़वैया नाहर उदयसिंह सरदार १६६ ऐंड़ लगायो रसबेंदुल के हाथी ऊपर पहुँचा जाय ॥ गुर्ज चलायो बंगाली ने ऊदन लीन्ह्यो वार बचाय १७० ढाल कि औफड़ ऊदन मारी मुच्छाँ खाय गयो नरपाल ॥ मुशकें बाँधी तब राजा की नाहर देशराज के लाल १७१ रुपिया पैसा बंगाली के सब छकड़नमें लियो लदाय ॥ तुरतै चलिके बंगाले ते घेर्यो अटक बनाफर आय १७२