भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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१० आल्हखण्ड । ४६ सुलखे पैदा भे विरमा के ताकी खुशी कही ना जाय ६० देवा पैदाभा भीषम के ठाकुर मैनपुरी चौहान ॥ सो भा साथी बघऊदन का ज्वानों सुनो चित्तदै कान ६१ याविधि लड़का इकठौरी है बाँधे छोटि छोटि तलवार ॥ छुटि छुटि ढालें सोहैं पीठि में शिरपर पगिया करैं बहार ६२ छुटि छुटि कलँगी तिनपरसोहैं छोटी बैसनके सरदार ॥ छुटि छुटि घोड़न के चढ़वैया बड़ बड़ ठकुरन केर कुमार ६३ रोज शिकारन को जावें ते बाँधे गूंरा और गुलेल ॥ जुलफै सोहैं तिन कुँवरन के जिनमाँ महकै अतरफुलेल ६४ आगे घोड़ा है आल्हा को पाछे जायँ वीर मलखान ॥ तिनके पीछे ब्रह्मा सोहैं पीछे उदयसिंह बलवान ६५ सुलखे भाई 'मलखाने का सोऊ लीन्हे हाँथ गुल्याल ॥ हिरना ढूंढें सब जंगल माँ एक ते एक दई के लाल ६६ हिरना पायो नहिं जंगल में लौटे फेरि महोबे बाल ॥ एक न लौट्यो उदयसिंह तहँ नाहर देशराजका लाल ६७ सो यह सोचै मन अपनेमाँ औ मनहीमाँ करै विचार ॥ हम कहिआये हैं माता सों माता लावैं आज शिकार ६८ हिरना मारे बिन जावें ना हमरो याही ठीक विचार ॥ यहै सोचि कै मन अपने माँ ढूंढ़न लाग्यो तहाँ शिकार ६६ हिरनादीख्यो इक झाबर में मारन चल्यो बनाफरराय ॥ हिरना भाग्यो तहँ उरईको माहिल बाग पहुँचा जाय १०० घोड़ बेंदुला को रपटाये पाछे चला बनाफर जाय ॥ खाँई ऊंची त्यहि बगियाकी ऊदन घोड़ा दीन फँदाय १०१ मारि बेंदुला की टापन सों सबियाँ बगिया दीन खुदाय ॥

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