भारतकोश
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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ, मंगलाचरण एवं बनाफर वंश परिचय

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आल्हखण्ड का सूचीपत्र । नं० शु० नाम लड़ाई पृष्ठसे पृष्ठतक [ १ ] संयोगिनि स्वयम्बर पृथ्वीराज जयचंदयुद्ध १ ३६ [ २ ] करिया करके देशराज बच्छराज मरण, महोबे का प्रथम युद्ध ... .... ३७ ४८ • [ ३ ] माड़ोमें आल्हादिकों का चढ़ाई करके माड़ो नृपति को कोल्हू में पिराना ... .... ४६ ११६ [ ४ ] आल्हा का विवाह .. .. ११७ १५६ [ ५ ] मलखान का विवाह .. .... १५७ १६६ [ ६ ] ब्रह्माका विवाह .... .... .... १६७ २३८ [ ७ ] उदयसिंहका विवाह .... .... २३६ २८२ [ ८ ] चन्द्रावलि चौथि.... .... ... २८३ ३१६ [ ९ ] इन्दलहरणब्याहताहीमा .... . ३१७ ३५२ [ १० ] आल्हा निकासी .... .... . ३५३ ३६६ [ ११ ] लाखनि का विवाह .... ... ३६७ ३९० [ १२ ] गॉजरकी लड़ाई .. ... ... ३९१ ४१० [ १३ ] सिरसा समर मलखे मरण .. .. ४११ ४२४ [ १४ ] कीरतिसागर का मैदान .... ... ४२५ ४६२ [ १५ ] आल्हा का मनावन ... .... ४६३ ४९२ [ १६ ] नदी वेतवाका समर .... ... ४९३ ५१६ [ १७ ] ठाकुर उदयसिंहका हरण .... .. ५१७ ५२८ [ १८ ] वेलाके गौनेका प्रथम युद्ध .... .... ५२६ ५४२ [ १९ ] वेलाके गौनेका द्वितीय युद्ध .... ... ५४३ ५६४ [ २० ] वेला ताहर का मैदान .... .... ५६५ ५८४ [ २१ ] चन्दनबागकेर मैदान .. . ५८५ ५९४ [ २२ ] चन्दन खम्भा का मैदान .. ... ५९५ ६०५ [ २३ ] वेलासती अन्त मैदान ... ... ६०५ ६१६

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॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अथ आल्हखण्ड ॥ संयोगिनि स्वयंम्बर पृथ्वीराज और जयचन्द का युद्ध वर्णन ॥ सिंहावलोकनछन्द ॥ बन्दत तोहिं सदा गणनायक जासु कृपा दुख दारिद नाशौ । नाशौ दारिद दोष सबै उर अन्तर आतमज्ञान प्रकाशै ॥ प्रकाशै आतमज्ञान जबै तब दुःख सबै जगको सुखभाषै । भाषै सुखको दुख सत्य जबै ललिते न तबै यमराजौ फाँशौ १ सुमिरन ॥ कौरव पाण्डव दोउ दल जूझे करिकै कुरुक्षेत्र मैदान ॥ सोई जनमे सब दुनिया में आल्हा ऊदन आदि महान १ जिनकी कीरति घर घर फैली छैलिकै लीन जगतको छाय ॥ को यश बरणै तिन क्षत्रिन कै हमरे बूत कही ना जाय २ जैसे थाल्हा रणशूरन को आल्हा ऊदन दीन गड़ाय ॥ तैसे छापा सब गुणियन हित मुंशी साहब दीन बढ़ाय ३

२ आल्हखण्ड । ब्राह्मण कायथ मुसलमान ओ नौकर रहे बहुत अँगरेज ॥ काम देखिकै सब काहू को सोवैं नवल भवन तब सेज ४ को गति बरणै तिन मुंशीकै जिनको बढ़ो अमित परताप ॥ लाखन पुस्तक के ऊपरमाँ जिनके परै अबौलौग छाप ५ तिन सुत बाबू प्रागनरायण जिन मन शान्ति रही दर्शाय ॥ को गुण बरणै तिन बाबूके गाये कथा बहुत बढ़िजाय ६ छं० जिला जौन उन्नाम तासु पूरबदिशि माहीं । पांच कोस है ग्राम नाम पँड़री तिहिकाहीं ॥ किरपाशंकर मिश्र वृत्ति पण्डित की जाहीं । तिनसुत ललितेनाम ग्रन्थ निर्मापक आहीं ७ ते यश बरणैं अब जयचंद का लै कै रामचन्द्र का नाम ॥ प्रथम स्वयम्बर संयोगिनि का पाछे बरणौं युद्ध ललाम ८ सबकनवजियात्यहिकनउजमाँ बीचम बसै तहाँ नरपाल ॥ छूटि सुमिरनी गै ह्यांते अब सुनिये कनउज केर हवाल ६ अथ कथाप्रसंग ॥ जयचंद राजा कनउज वाला आला सकल जगत सिरनाम ॥ को गति बरणै त्यहिमंदिरकै सोहै सोन सरिस त्यहिधाम १ केसरि पोतो सब मंदिर है औछति लागि बनातन केर ॥ सुवा पहाड़ी तामें बैठे चकस गड़े बुलबुलन केर २ लाल औ मैनन कै गिनती ना तीतर घूमि रहे सब ओर ॥ पले कबूतर कहुँ घुटकत हैं कहुँ कहुँ नाचि रहे हैं मोर ३ लागि कचहरी है जयचंद के बैठे बड़े बड़े नरपाल ॥ बना सिंहासन है सोने का तामें जड़े जवाहिग लाल ४ तामें बैठो महराजा है दहिने धरे ढाल तलवार ॥

संयोगिनिस्वयम्बर । ३ जामा पहिरे रेशमवाला आला कनउज का सरदार ५ पाग बैंजनी शिरपर सोहै तापर कलँगी करै बहार ॥ कवि औ पण्डित बहु बैठे हैं भारी लाग राजदर्बार ६ नचै पतुरिया सन्मुख ठाढ़े ओढ़े काश्मीर कै सारि ॥ जूरा झलकै त्यहि सारी बिच काली नागिनिके अनुहारि ७ फूल चमेलिन के जूरा में नखतन सरिसकरैं उजियारि ॥ हरवा सोहै गल बेलाका छैला ताको रहे निहारि ८ बालाहालैं त्यहि कानन में गालन छुवै और टरिजाँय ॥ अद्भुत बेसरि स्वहै नाक में शोभा कही तासु ना जाय ६ डुलरी तिलरी पंचलरीलों सो गलबिच में करैं बहार ॥ बाजू सोहैं दोउ बाहुन में जोशन शोभाअमित अपार १० सोहैं कलाइन में ककना भल तामें चुरियाँ करैं बहार ॥ छल्ला सोहैं त्यहि अँगुरिन में ताको क्षत्री रहे निहार ११ सोने करगता तीन लरनको सो कम्मर में करै बहार ॥ कड़ा के ऊपर छड़ा बिराजैं तापर पायजेब झनकार १२ पैर जमावै कमर झुकावै अँगुरिन भाव बतावति जाय ॥ जौनि रागिनी जब वाजिबहै ताको तबै देय दर्शाय १३ जब दिशि जावति है राजाके पावै द्रव्य जाय हर्षाय ॥ माफी पाये है कनउज में लरिकातीनिसखिलौंखाँय १४ लाग अखाड़ा रजपूतन का शोभा कही बूत ना जाय ॥ खाये अफीमन के गोला बहु पलकैं मूंदैं औ रहिजाँय १५ उड़ै तमाखू बुटवल वाली धुवना सरग रहा मड़राय ॥ भाँग जमाये बहु बैठे हैं मनमाँ रहे रामयश गाय १६ त्यही समइया त्यहि अवसरमाँ राजै गयो सोच मनछाय ॥

४ आल्हखण्ड । बरके लायक संयोगिनि है काके संग बियाही जाय १७ यहै सोचिकै मन राजाने तुरतै पण्डित लीन बुलाय ॥ सइति बताओ अब जल्दी सों जामें रचा स्वयम्बर जाय १८ सुनिकै बातें महाराजा की पण्डित साइति दीन बताय ॥ मन्त्री बैठ रहे पासैमाँ राजै हुकुमदीन फर्माय १६ न्यवत पठावो सब राजन को कनउज साजि करो तय्यार ॥ हुकुम पायकै महाराजा को मन्त्री तुरत भयो हुशियार २० उठि सिंहासन सों ठाढ़ो भो राजा कनउज का सरदार ॥ किह्यो पैलगी सब विप्रन को क्षत्रिन कीन्ह्यो राम जुहार २१ ब्राह्मण क्षत्री गे अपने घर महलन गयो चंदेलाराय ॥ आवत दीख्यो जब राजा को बांदी चली तड़ाका धाय २२ खबरि सुनाई महरानी को महलन आवत कन्त तुम्हार ॥ सुनिकै बातें ये बांदी की रानी तुरत भई हुशियार २३ आगे ठाढ़ी भइ द्वारे पर राजा अटे बराबरि आय ॥ पहिले राजा गे मन्दिर को पाछे चली आपहू जाय २४ पौढ़्यो पलँगा पर महाराजा आपौ बैठि चरण ढिग जाय ॥ हरुये हरुये दोउ हाथन सों दोऊ लीन्ह्यो पैर उठाय २५ सो धरि राख्यो निज गोदी में औ छाती में लिह्यो लगाय ॥ चापन लागी धीरे धीरे सोवन लाग चंदेलाराय २६ आपौ सोई महाराजा सँग मनमें रामचन्द्र को ध्याय ॥ भोर भवरहरे पह फाटत खन पक्षी रहे सबै चिल्लाय २७ मन्त्री जागा महाराजा का लीन्ह्यो द्वारपाल को टेरि ॥ जल्दी लावो कोतवाल को यामें करो कछू ना देर २८ सुनिकै बातें ये मन्त्री की चलिभो द्वारपाल शिरनाय ॥

संयोगिनिस्वयम्बर। ५ जायकै पहुँच्यो कोतवाल ढिग औ सबखबरिसुनायो जाय २९ पाय इत्तिला द्वारपाल सों तुरतै अटा भवन में आय ॥ सावधान ह्वै हाथ जोरिकै मन्त्रिहिशीश नवायोजाय ३० ठाढ़े देख्यो कोतवाल को मन्त्री हुकुम दीन फर्माय ॥ मंच गड़ावो दिशि पूरब में मारग साफ करावो जाय ३१ हुई स्वयम्बर संयोगिनि का पुर में डोंड़ी देव पिटाय ॥ झण्डा गाड़ो राजमहल में बन्दनवार देव बँधवाय ३२ सुनिकै बातें ये मन्त्री की तुरतै कोतवाल चलिजाय ॥ फलम दवाइति कागज लैकै सीताराम चरण मनध्याय ३३ चिट्ठी लिखिकै सब राजन को मन्त्री धावन लीन बुलाय ॥ दै दै चिट्ठी हरकारन को राजन न्यवत दीन पहुँचाय ३४ साजि सांडिया को जल्दी सों धावन तुरत भये असवार ॥ चिट्ठी लैकै महाराजा के पहुँचे राजन के दर्बार ३५ चिट्ठी पावत महाराजा के राजा सबै भये हुशियार ॥ अपनी अपनी सब फौजन को राजन तुरत कीन तय्यार ३६ बाजे डंका अहतंका के बंका चलत भये नरपाल ॥ मारु मारु करि मौहरि बाजीं बाजीं हाव हाव करनाल ३७ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बन्दिन कीन समरपद गान ॥ दान मान दै सब बिप्रन को राजन कीन तुरत प्रस्थान ३८ खर खर खर खर कै रथ दौरैं चह चह रहीं धुरी चिल्लाय ॥ दावति आवैं सब कनउज का भारी अंधकार गा छाय ३६ मस्ता हाथी घूमत आवैं छैला घोड़ नचावत जाँय ॥ रातौ दिन का धावा करिकै कनउज धुरा दबायनि आय ४० को गति बरणै तेहि समया कै हमरे बून कही ना जाय ॥

६ आल्हखण्ड । तम्बू गड़िगे सब राजन के झण्डा आसमान फहरायँ ४१ भोर भरहरे मुरगा बोलत जागा कनउज का नरपाल ॥ दिशा फराकत सों छुट्टी करि मज्जनकरतभयोतिहिकाल ४२ पहिरिकै धोती रेशमवाली आसन बैठ चँदेलाराय ॥ संध्या करिकै त्यहि अवसर की औ जपमाली लीन उठाय ४३ मन्त्र गायत्री को जपिकै फिरि तर्पण करन लाग महराज ॥ अक्षत चन्दन धूप दीप औ लै पकवान शम्भु के काज ४४ भोग लगायो शिवशङ्कर को ध्यायो रामचन्द्र को नाम ॥ फिर बुलवायो तिन बिप्रन को जिनके जपै तपै का काम ४५ गऊ मँगायो पैंतालिस फिर ब्याई एक बेर की जोन ॥ बछरा नीचे हैं जिनके फिरि सोने सींग मढ़ी हैं तौन ४६ खुरौ मढ़े हैं जिन चांदी के पीठ म परीं बनातन झूल ॥ पूँछ पकरिकै तिन गौवन की राजा दानदेत मनफूल ४७ भूसा दाना एकमास को बिप्रन घरे दीन पहुँचाय ॥ जायकै पहुँच्च्यो फिरि मंदिरमें यकईस बिप्रनलीन बुलाय ४८ दही दूध औ पेरा बरफी चटनी भांति भांति तय्यार ॥ भोजन दीन्ह्यो तिन बिप्रन को राजा कनउजका सरदार ४९ सीध मँगायो पैंतालिस फिर औरे बिप्रन लीन बुलाय ॥ सहित दक्षिणा के दीन्ह्यो सो राजा बड़ा प्रेम मनलाय ५० ऐसो दान नित्यप्रति देवै राजा बिप्रन घरै बुलाय ॥ पाछे भोजन आपौ करिकै तब दरबार पहुँचै जाय ५१ ऐसो दानी महाराजा यहु राजा कनउज का सरदार ॥ जायकै पहुँच्च्यो तिहि मंदिरमाँ जहँपर भरीलाग दरबार ५२ आवत देख्यो जब राजा को ठाढ़े भये शूर सरदार ॥

संयोगिनिस्वयम्बर । ७

बैठि सिंहासन पर राजागे दहिने लिये ढाल तलवार ५३ बैठे क्षत्रिय निज निज आसन मनमें रामचन्द्र को ध्याय ॥ हाथ जोरिकै मन्त्री बोल्यो वो महराज कनउजी राय ५४ देश देश के राजा आये एक न अयो पिथौराराय ॥ सुनिकै बातें ये मन्त्री की जल्दी हुकुम दीन फर्माय ५५ मूरति बनावो तुम कपड़ा की भीतर पैरा देव भराय ॥ जहाँ उतारे जूता जावैं तहँ पर खड़ा देव करवाय ५६ हुकुम पायकै महाराजा को मन्त्री कीन तैसही जाय ॥ मूरति पिथौरा की बनवायो तहँपर खड़ा दीन करवाय ५७ बैठक बैठे सब राजा तहँ आपौ गयो चँदेलाराय ॥ बाजन बाजे चौगिर्दाते हाहाकार शब्दगा छाय ५८ सजिगाकनउजत्यहिऔसरमाँ शोभा कही बूत ना जाय ॥ बन्दनवारे घर घर बाँधे घर घर रहे पताकाछाय ५६ सजीं सुहागिलैं चौगिर्दा ते गावैं गीत मंगलाचार ॥ त्यही समइया त्यहि औसरमाँ बोल्यो कनउजका सरदार ६० जल्दी लावो संयोगिनि को साइति आयगई नगच्याय ॥ हुकुमपायकै महाराजा का चकरन खबरि जनाई जाय ६१ खबरि पायकै संयोगिनि फिरि महलन तुरत भई हुशियार ॥ औ बुलवायो फिरि बाँदियनको सोलह करनलागि श्रृंगार ६२ सवैया ॥ मज्जेन चीरै औ कुण्डल अंजनै नाकमें मौक्तिकै बेसरसवाँरी । कंचुकि औ क्षुद्रावलि कंकण कुसुमित अम्बरं चन्दनधारी ॥ खायकै पान औ धारिमेंहदीनको हार औ नूपुरे की झनकारी । सिंदुरे भाल विशाल लखे ललितेमनलज्जितमन्मथनारी ६३

८ आल्हखण्ड । सजि सँयोगिनि गै पलमाँ इक बँदियन हुकुम दीन फरमाय ॥ डोला लावो अब जल्दी सों बँदिया चलीं हुकुमकोपाय ६४ लाई डोला सो जल्दी सों औ त्यहि खबरि सुनाई जाय॥ सुनिकै बातैं सो बांदी की मनमें श्रीगणेशको ध्याय ६५ सुमिरि भवानी शिवशंकरको औ सूर्य्यन को माथ नवाय ॥ बैठी डोला में संयोगिनि सीता रामचरण मनलाय ६६ चारि कहरवा मिलिडोला लै तुरतै चले पूर्व दिशिधाय ॥ आगे डोला संयोगिनि को पाछे चलीं सहेली जाँय ६७ दौरति जावैं पुरबासी सब दासिन भीर भई अधिकाय ॥ चढ़िगे मंचन नर नारी सब राजन देखि देखि हर्षाय ६८ बड़ी भीर भय तब कनउज में औ तिल डरे भुई ना जाय ॥ शोभा गावैं जो कनउज की तौफिरिएकसाल लगिजाय६९ डोला लैके संयोगिनि का महरन तहाँ उतारा जाय ॥ जहँना बैठे सब राजा हैं एकते एक रूप अधिकाय ७० उतरिकै डोला सों संयोगिनि माला दहिन हाथ लै लीन्ह ॥ सुमिरिभवानीसुत गणेश को महिफिलमध्यगमनतबकीन्ह७१ बैठे राजा सब महिफिल में एक ते एक शूर सरदार ॥ कोउ कोउ राजा तीस बरसका कोउ कोउ वर्षअठारहक्यार७२ काले नीले पीले लाले उजले शोभा के अधिकाय ॥ जामा पहिरे रेशमवाले चम् चम् चमकिकर हिंजाँय ७३ सोहैं दुपट्टा तिन जामन पर गल में परे मोतियन हार ॥ रंगबिरंगी पगड़ी शिर पर तिनपर कलँगी करै बहार ७४ हाथ लगाये हैं मुच्छन पर दहिने परी ढाल तलवार ॥ पीठ दिखावैं नहिं बैरी को ऐसे सबै शूर सरदार ७५

[Header] •संयोगिनिस्वयम्बर। ६ लैकै माला संयोगिनि तहँ घूमत फिरै सखिन के साथ ॥ मन नहिं भावै कोउ राजा त्यहि जाको करै आपनो नाथ ७६ देखैं राजा संयोगिनि तहँ औ शिर नीचे लेयँ नवाय ॥ माला डालै नहिं काहू के क्षत्री गये सबै शर्माय ७७ सोतो देखै पृथीराज को नहिं तहँ देखि परै महराज ॥ चकृत ह्वैकै चौगिर्दा ते देखनलागि छांडिकै लाज ७८ जब नहिं देख्यो दिल्लीपतिको तब मन सोचि सोचि रहिजाय॥ काह विधाता कै मर्जी है जो नहिं अयो पिथौराराय ७९ क्वारी रहिबे हम दुनिया में या फिरि ब्याहकरब तिनसाथ॥ त्यहिते तुमका हम ध्याइत है सुनिल्यो दीनबन्धु रघुनाथ८० जइस मनोरथ तुम सीताको पुरयो आप चराचर नाथ ॥ तइस मनोरथ अब हमरो है ब्याही जायँ पिथौरा साथ ८१ त्वही गोसइयाँ दीनबन्धु है ओ दशरथ के राजकुमार ॥ बेगि मिलावो दिल्लीपति को तब सब होवै काज हमार ८२ चरण तुम्हारे जो मनलावै गावै राम राम श्री राम ॥ सो फल पावै मनभावै जो पूरण होयँ तासु के काम ८३ यह सुनि राखा हम बिप्रन ते ताको सत्य करो भगवान ॥ मूरति दीख्यो फिरि कपड़ाकी तामें करनलागि अनुमान८४ है यह मूरति पृथीराजकी मनमाँ ठीक लीन ठहराय ॥ लैकै माला संयोगिनि सो मूरति गले दीन पहिराय ८५ देखि तमाशा सब राजा यह आशा छाँड़ि हृदयते दीन ॥ बिदा मांगिकै महराजाते राजन गमन तहाँते कीन ८६ कूचके डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥ चलिभेराजा निज निज घरका करिकै शम्भुचरणको ध्यान८७

८ आल्हाखण्ड । सजि संयोगिनि गै पलमाँ इक बाँदियन हुकुम दीन फरमाय ॥ डोला लावो अब जल्दी सों बाँदिया चलीं हुकुमकोपाय ६४ लाई डोला सो जल्दी सों औ त्यहि खबरि सुनाई जाय॥ सुनिकै बातें सो बांदी की मनमें श्रीगणेशको ध्याय ६५ सुमिरि भवानी शिवशंकरको औ सूर्यन को माथ नवाय ॥ बैठी डोला में संयोगिनि सीता रामचरण मनलाय ६६ चारि कहरवा मिलिडोला लै तुरतै चले पूर्व दिशिधाय ॥ आगे डोला संयोगिनि को पांछे चलीं सहेली जाँय ६७ दौरति जावैं पुरवासी सब दासिन भीर भई अधिकाय ॥ चढ़िगे मंचन नर नारी सब राजन देखि देखि हर्षाय ६८ बड़ी भीर भय तब कनउज में औ तिल डरे भुईं ना जाय ॥ शोभा गावैं जो कनउज की तौफिरिएकसाल लगिजाय६६ डोला लैकै संयोगिनि का महरन तहाँ उतारा जाय ॥ जहँना बैठे सब राजा हैं एकते एक रूप अधिकाय ७० उतरिकै डोला सों संयोगिनि माला दहिन हाथ लै लीन्ह ॥ सुमिरिभवानीसुत गणेश को महिफिलमध्यगमनतबकीन्ह७१ बैठे राजा सब महिफिल में एक ते एक शूर सरदार ॥ कोउ कोउ राजा तीस बरसका कोउ कोउ वर्ष अठारहकप्यार७२ काले नीले पीले लाले उजले शोभा के अधिकाय ॥ जामा पहिरे रेशमवाले चम्चम् चमकि २ रहिजाँय ७३ सोहैं दुपट्टा तिन जामन पर गल में परे मोतियन हार ॥ रंगाविरंगी पगड़ी शिर पर तिनपर कलँगी करै बहार ७४ हाथ लगाये हैं मुच्छन पर दहिने परी ढाल तलवार ॥ ⁻ ० दिखावैं नहिं बैरी को ऐसे सबै शूर सरदार ७५

संयोगिनिस्वयम्बर। ६ लैकै माला संयोगिनि तहँ घूमत फिरै सखिन के साथ ॥ मन नहिं भावै कोउ राजा त्यहि जाको करै आपनो नाथ ७६ देखैं राजा संयोगिनि तहँ औ शिर नीचे लेयं नवाय ॥ माला डालै नहिं काहू के क्षत्री गये सबै शर्माय ७७ सोतो देखै पृथीराज को नहिं तहँ देखि परै महराज ॥ चकृत ह्वैकै चौगिर्दा ते देखनलागि छांड़िकै लाज ७८ जब नहिं देख्यो दिल्लीपतिको तब मन सोचि सोचि रहिजाय॥ काह विधाता कै मर्जी है जो नहिं अयो पिथौराराय ७६ क्वारी रहिबे हम दुनिया में या फिरि ब्याहकरब तिनसाथ॥ त्यहिते तुमका हम ध्याइत है सुनिल्यो दीनबन्धु रघुनाथ८० जइस मनोरथ तुम सीताको पुरयो आप चराचर नाथ ॥ तइस मनोरथ अब हमरो है ब्याही जायँ पिथौरा साथ ८१ त्वही गोसइयाँ दीनबन्धु है ओ दशरथ के राजकुमार ॥ बेगि मिलावो दिल्लीपति को तब सब होवैं काज हमार ८२ चरण तुम्हारे जो मनलावै गावै राम राम श्री राम ॥ सो फल पावै मनभावै जो पूरण होयँ तासु के काम ८३ यह सुनि राखा हम बिप्रन ते ताको सत्य करो भगवान ॥ मूरति दीख्यो फिरि कपड़ाकी तामें करनलागि अनुमान८४ है यह मूरति पृथीराजकी मनमाँ ठीक लीन ठहराय ॥ लैकै माला संयोगिनि सो मूरति गले दीन पहिराय ८५ देखि तमाशा सब राजा यह आशा छाँड़ि हृदयते दीन ॥ बिदा मांगिकै महराजाते राजन गमन तहाँते कीन ८६ कूचके डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥ चलिभेराजा निज निज घरका करिकै शम्भुचरणको ध्यान८७

१० आल्हखण्ड। चढ़िकै डोलामें संयोगिनि सोऊ चली महल को जाय ॥ उठि महराजा फिरिमहफिलते औ दरबार पहुंचे आय ८८ मंत्री बैठत भो बाँयेंपर दहिने बैठि विप्र सब जाय ॥ त्यही समइया त्यहि औसर में राजा बोल्यो भुजा उठाय ८६ कौन पिथौरा को जानत है सन्मुख ठाढ़ होय सो आय ॥ सुनिकै बातें महराजाकी बूढ़ो विप्र उठा हर्षाय ६० हमसों परचय पृथीराजसों ओ महराज कनौजीराय ॥ पाँच बरस हम दिल्ली रहिकै पूजाकीन तासु घर जाय ६१ । भोजन पाये त्यहि महलनमें बैठ्यन संग तासु महराज ' पूँछन चाहो का महराजा सो तुम कहौ आपनो काज ६२ सुनिकै बातें त्यहि ब्राह्मण की बोला तुरत कनौजीराय ॥ कस रजधानी है दिल्ली की कैसो वीर पिथौराराय ६३ सुनिकै बातें ये जयचंद की बोला विप्र बहुत सुख पाय ॥ नाम हस्तिनापुर दिल्लीका जानो आपु कनौजीराय ६४ आगे राजा शन्तनु ह्वैगे गंगा भई जासु की नारि ॥ तिनसुत भीषम फिरि पैदा भे कीन्ह्यो परशुराम सों रारि ६५ दिन सत्ताइस का संगरभा दूनों तरफ चले तहँ तीर ॥ मूर्च्छित ह्वैगे परशुराम जब गंगा आय छिडिक्यो नीर ६६ सनमुख ह्वैगे फिरि दोऊमिलि युद्धको होनलाग सामान ॥ तब समुझायो बहु गंगाने अब नहिं करो युद्ध को ठान ६७ तुम्हरो चेला यहु भीषम है ओ जमदग्नितनय बलवान॥ नाम तुम्हारो जग में ह्वैहै मानो सत्यबचन भगवान् ६८ चेला जिनको अस बलवन्ता है भगवन्ता के अनुमान ॥ धन्य बखानों तिन गुरु केरी रहिहै सदा जगतमें मान ६६

कहि ये बातें परशुराम सों फिरि बहुपुत्र सिखावनदीन ॥ सुनिकै बातें निज माताकी भीषमकहाबचनछलहीन १०० विजयपत्र जो म्वाहिं लिखिदेवैं तौ हम लौटि धामको जायँ ॥ नाहिं तो टरिहौं ना संगर ते बहुतनधजीधजीउड़िजाय१०१ सुनिकै बातें ये भीषम की औ हठ दीख टरै को नाहिं ॥ तब तो गंगा परशुराम सों बोलींहाथजोरित्यहिठाहिं १०२ लरिका अरुझो विजयपत्र को ओ जमदग्नितनय महराज ॥ विजयपत्र अब याको दीजै कीजैआपशिष्यकोकाज १०३ सुनिकै बिनती बहु गंगाकी तबतिनविजयपत्रलिखिदीन॥ विजयपत्र लै तहँ भीषमने औ पैलगी गुरुको कीन १०४ माथ नायकै फिरि गंगा को भीषम दीन्ह्यो शंख बजाय ॥ परशुराम निज आश्रम गमने भीषम घरै पहुंचे आय १०५ चित्र बिचित्रबीर्य रहें राजा भीषमकेर छोट दोउभाय ॥ तेऊ मरिगे विना पूत के तिनघरब्यास पहुंचे आय १०६ आँधर पांडु बिदुर तिनलरिका जिनकारहा जगतयशछाय ॥ अँधरे केरे दुर्योधन भे पांडुकेभये युधिष्ठिरराय १०७ दोऊ मिलिकै संगर ठान्यो तहँ सब क्षत्री गये बिलाय ॥ भयो परीक्षित फिरि दिल्लीपति ज्यहिभागवतसुन्योहर्षाय१०८ कलियुगआयो त्यही राज में ओ महराज कनौजीराय ॥ को गतिबरणैत्यहि कलियुगकै हमरे बूत कही ना जाय १०६ ऐसी दिल्ली की रजधानी जामें बसै पिथौराराय ॥ रूपउजागर सब गुण आगर शोभाकही तासु ना जाय ११० नित प्रति पूजै शिवशंकेर का नाहर दिल्ली का सरदार ॥ गदका बाना पटा बनेठी इनमाँबहुतभांतिहुशियार १११

१२    , आल्हखण्ड । चढ़ी जवानी पृथीराजकी कुश्ती लड़ै अखाड़े जायँ ॥ खनखनठनठन भनभनमनमन कैसो शब्द कानमें जाय ११२ बाण चलावैं जहाँ तानिकै ताको तुरतै देयँ नशाय ॥ ऐसे राजा पृथीराज हैं ओमहराज कनौजीराय ११३ सुनिकै बातें त्यहि बाम्हन की फिरि ना बोल्यो चँदेलाराय ॥ सभा विसर्जन करि जल्दी सों महलमें तुरतपहूंच्यो जाय ११४ कियो बियारी फिरि मंदिर में सोयो रामचन्द्रको ध्याय ॥ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडागड़ानिशाकोआय ११५ तारागण सब चमकन लागे पक्षिन चुप्पसाधि तब लीन ॥ चलेआलसीखटिया तकितकि नाहकजन्म विधातै दीन ११६ आगे लड़ि हैं पृथुइराज अब करि हैं घोर शोर घमसान ॥ बैठो यारो अब थकिआयन मानो सत्यबचनपरमान ११७ इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण जीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपैंड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत संयोगिनि स्वयंवरोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ सवैया ॥ भो शरणागतपाल कृपाल उदार अपार सबै गुण तेरे । यांचि भयौ शरणागत में न लह्यौ अजहूं तुमको कहुँ हेरे ॥ गावत संत महंत सबै कि हृदय बिच रामरहें सबै केरे । सो नहिं टेरे सुनैं ललिते फलिते न भयेहैं मनोरथमेरे १ सुमिरन ॥ बलेश्वरी पँड़री की गड़ये जिनकाविदितजगतपरताप ॥ मन औ बाणी सों जो ध्यावै ताके छूटिजायँ सब ताप १

संयोगिनिस्वयंम्बर । १३ नित प्रति पाठ होयँ दुर्गाके औ तहँ करैं यती नित बास ॥ विधिसों पूजन जोकोउ कीन्ह्यो पूरणभई तासु की आस २ आगे दरखत है नींबी का बायें पीलूका अधिकार ॥ बरगद पीपर गूलर दहिने जिनकीशोभा अमितअपार ३ प्रातःकाल नारि सब जावैं ध्यावैं देवी चरण मन लाय ॥ सायंकाल पुरुष सब जावैं गावैं वेद ऋचन को जाय ४ पिता हमारे किंरपाशङ्कर तहँपर पाठकीन बहुकाल ॥ फिरिम्बेहिं सौंप्यो तिनदेवीका मानो सत्य सत्य सब हाल ५ तेरह बरसें हमका गुजरीं चाकरभये नवल दरबार ॥ छुट्टी लैकै नवरात्रन में जावैं अवशि महीना कार ६ पाठ सुनावैं श्री दुर्गा की बालेश्वरी शरण में जाय ॥ जो कुछ मनमें हमरे होवै सो अभिलाष पूरी है जाय ७ प्रथम भागवत तहँपर बाँची साँची कथा कहाँ सब गाय ॥ रुक्यो न काहू पदमें तहँ पर देवी कृपामई अधिकाय ८ छूटि सुमिरनी गै देवी कै सुनिये जयचँद क्यारहँवाल॥ चन्दभाट दिल्लीको जाई आई दिल्लीका नरपाल ६ अथ कथाप्रसंग ॥ भोर भ्वरहरे पह फाटत खने सोयकै उठा कनौजीराय ॥ प्रातक्रिया करि सब जलदी सों फिरि दरबार पहुंचा आय १ बैठ्यो राजा सिंहासन पर भारी लागि गयो दरबार ॥ किह्यो पैलगी सब बिप्रनको क्षत्रिन कीन्ह्यो राम जुहार २ बूढ़ बिप्रसों फिरि बोलतभा दिल्ली कौन पठावा जाय ॥ सुनिकै बातें चन्देले की बोल्यो बिप्र बचन हर्षाय ३ चन्दभाटको तुम पठवो अब सो पिरथीका लवै बुलाय ॥

१४ आल्हखण्ड। देखन केरी अभिलाषा जो ओ महराज कनौजीराय ४ बूढ़े बाम्हन की बातें सुनि लीन्ह्यो चन्दभाट बुलवाय ॥ औसमुझायो फिरित्यहिकोसब यहु रणबाधु चँदेलोराय ५ सुनिकै बातें चंदेले की चलिभो चन्दभाट शिरनाय ॥ चढ़िकै घोड़ाकी पीठौमाँ दिल्ली शहर पहुंचा जाय ६ जायकै पहुँच्च्यो त्यहिफाटकमाँ जहँ दरबार पिथौरा क्यार ॥ दीख पौरिया चन्दभाट को गरुई हांक दीन ललकार ७ हुकुम दर्रो हुकुम दर्रो साहेबजादे बात बनाव ॥ कहाँते आयो औ कहँ जैहौ जल्दी आपन नाम बताव ८ सुनिकै बातें दरवानी की बोल्यो चन्दभाट ततकाल ॥ देश हमारो कनउज जानो जावैं जहाँ बैठ नरपाल ६ मोहिं पठायो जयचंद राजा हमरो चन्दभाट है नाँउ ॥ खवरि जनावो पृथुइराज को ओ दरवानी बात बनाउ १० सुनिकै बातें चन्दभाट की सो दर्बार पहुंचा जाय ॥ हाथ जोरिकै दोउ बोलतभा औ चरणनमें शीशनवाय ११ चन्दभाट कनउज ते आयो ओ महराज पिथौराराय ॥ हुकुम जो पावैं महराजा को तो मैं लावों साथ लिवाय १२ सुनिकै बातें दरवानी की बोले पृथीराज महराज ॥ लावो लावो त्यहि जल्दी सों आयोचन्दभाटक्यहिकाज १३ सुनिकै बातें महराजा की दौरत चला पौरिया जाय ॥ सँग माँ लैके चन्दभाट को औ दर्बार पहुंचा आय १४ चन्दभाट तब लखि पिरथी का दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ कह्यो सँदेशा चन्देला जो सो पिरथीका दियो सुनाय १५ सुनि संदेशा चन्देले का भा मन खुशी पिथौराराय ॥

संयोगिनिस्वयम्बर । १५

साल दुसाला दिह्यो भाट को गल माँ हार दीन पहिराय १६ आगे पठयो चन्द भाट को पाछे हिरसिंह लियो बुलाय ॥ चन्द कबीश्वर को बुलवायो तासों कह्यो हाल समुझाय १७ बाना बदल्यो पृथुइराज ने मन माँ श्रीगणेशको ध्याय ॥ सुमिरि भवानी शिवशङ्कर को औ सुर्यन को माथनवाय १८ तीनों चलिभे फिरि दिल्लीसों सीता राम चरण मन लाय ॥ आठ रोज को धावा करिकै कनउज धुरादबाइनिआय १९ त्यही समइया त्यहि अवसर माँ राजा कन उज का सरदार ॥ मन्त्री बैठरहे बायें माँ तासों बोल्यो बचन उदार २० एक मना सोना को लै कै औ कारीगर लेव बुलाय ॥ मूरति रचिकै दरवानी की सो द्वारे पर देव धराय २१ सुनिकै बातें महराजा की मन्त्री तुरत उठा शिरनाय ॥ मूरति पौरिया की बनवायी औ द्वारे पर दियो रखाय २२ त्यही समइया त्यहि अवसरमाँ पहुँचा चन्दभाट फिरिआय ॥ खबरि सुनायो सब दिल्ली की औ चरणनमें शीशनवाय २३ हिरसिंह ठाकुर चन्द कबीश्वर तिनके साथ पिथौराराय ॥ तीनों मिलिकै त्यहि पाछे सों औ दरबार पहुंचे आय २४ दीख सिंहासनपर जयचँदको भारी तहां दीख दरबार ॥ बैठै क्षत्री अरूझ्वारा सों एक सों एक शूर सरदार २५ दयर मुकदिमा बहु खूनी हैं बहुतक ठाढ़े तहां वकील ॥ अऊ जेहल को पहुँचायेगे काहुकि दीन हथकड़ी ढील २६ त्यही समइया त्यहिअवसर माँ आगे चन्दकवीश्वर जाय ॥ बहु पद गायो सभा मध्य में आपन दीन्ह्यो नाम बताय २७ कह्यो सँदेशा पृथुइराज ने ओ महराज कनौजीराय ॥