श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 333, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ६ ] जन्मकाण्डम् ३१७
अनेन व्रतराजेन जन्मकाण्डश्रवादपि । अचिरान्मतिना योगं प्राप्स्यसि त्वं विदेहजे ॥१०॥ संयोगीकरणं नाम व्रतं चेदं सुपुण्यदम् । ये कुर्वन्त्यत्र मनुजाः प्रियसैयोगं लभन्ति ते ॥११॥ तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा जानकी प्राह तं पुनः । बह्वन्यब्जानि साकेते पुष्परागमजलाशये ॥१२॥ तन्ति कस्तत्र वै गन्तुं समर्थस्त्विह वर्तते । रामाज्ञया रामदूतैः क्रियते रक्षणं सदा ॥१३॥ इत्सीतावचनं श्रुत्वा तन्पुरः संस्थितो लवः अब्रवीन्मातरं वाक्यं पञ्चवर्षवयःस्थितः ॥१४॥ अम्बारभ्य व्रतस्याद्य त्वं कुरुष्वानेगदिह । अब्जान्यहं प्रदास्यामि महारत्नाय निरन्तरम् ॥१५॥ तल्लवस्य वचः श्रुत्वा विहस्यानिलाय बालकम् । चुचुम्ब तन्मुखं सीता लवं वचनमब्रवीत् ॥१६॥ पङ्कजानि कथं वत्स त्वं समानेतुं दास्यसि । प्रमदवने रामदूतैः क्रियते रक्षणं सदा ॥१७॥ तन्मातुर्वचनं श्रुत्वा लवः प्राहार्थ मातरम् । अम्ब त्वन्स्तन्यपानेन वाल्मीकेः शस्त्रविद्यया ॥१८॥ तथाशीभिर्मुनेश्चापि रामस्यापि भयं न मे पश्याम्ब पौरुषं मेऽद्य मामनुज्ञातुमर्हसि ॥१९॥ इत्युक्त्वा मातरं नत्वा वाल्मीकिं प्रणिपत्य च । आशीभिर्गदितस्त्वाभ्यां धृततूणीरकार्मुकः ॥२०॥ वस्त्रासङ्कारसंयुक्तस्त्वेकाकी रथमारिहतः ययो लवण्श्याप्स्यायां धीरैर्हीनां जवेन सः ॥२१॥ क्रोशोपरि रथं स्थाप्य पङ्कजामागद्वराशयो नावन्मध्याहमसमये गता अग्रगरक्षकाः ॥२२॥ भोजनार्थं स्वगेहानि लब्धोऽब्जानि तदाऽहरत् । पुनः स्वस्य रथे स्थित्वा गत्वाऽऽश्रमपदं मुनेः ॥२३॥ नत्वा मुनिं मातरं स्वां पङ्कजान्यर्पयन्मुदा मुदिता जानकी चापि व्रतारम्भमथाकरोत् ॥२४॥ एवं सप्तदिनान्यब्जान्यनयामास बालकः न विदुः रामदूतास्ते नौपतेऽब्जान चेत हि । २५॥ अथाष्टमीदिनेऽपोष्यां पूर्ववन् लवो ययो। आगत्यस्य बहिः स्थाप्य रथं पङ्कजां ययो लवः ॥२६॥
पश्चात् ८१ द्विजदम्पतीको वस्त्राभूषण आदिसे पूजा करके उन्हें भोजन करावो और दक्षिणा देकर विदा करो। इस व्रतराजक करने तथा जन्मकाण्डकी कथा सुनने से शीघ्र ही तुम्हारे पति तुम्हें मिल जायेंगे ॥९-१०॥ इस व्रतका नाम ही संयोगीकरण व्रत है। जो कोई इस पुनीत व्रत करता है उसे अपने प्रियजनकी प्राप्ति होती है॥११॥ वाल्मीकि मुनिकी बात सुनकर सीताजी कहने लगी कि साकेतके बागीचा में पद्म बहुत कमल होते हैं, वहाँ ही इतने फूल मिल सकते कि जिनसे मैं अपना व्रत पूर्ण कर सकूँ । लेकिन वहाँ से उन्हें लायेगा कौन ? रामचन्द्रजीकी आज्ञासे वहाँ बहुतेरे रक्षक उन फूलोंकी रखवाली करते हैं । १२॥१३॥ सीताकी बात सुनकर पास खड़े लवने, जिनको अवस्था पाँच वर्षकी हो चुका थी, मातासे कहा-॥१४॥ माँ ! तुम आजसे अपना व्रत प्रारम्भ कर दो, मैं नित्य कमलके फूल लाकर तुम्हें दूंगा । १५॥ लवकी वीरतापूर्ण वाणी सुनकर माता हँसी और छातीसे लगाकर उसका मुख चूमती हुई कहने लगी- ॥१६॥ बेटे तुम फूल कैसे लाओगे ? वहाँ रामके असंख्य सिपाही उनकी रक्षा करते हैं ॥१७॥ सीताकी बात सुनकर लवने कहा- माता ! तुम्हारे पवित्र स्तनोंके दुग्ध, महर्षि वाल्मीकिको सिखायी हुई शस्त्रविद्या और उनके आशीर्वादके प्रभावसे मैं रामसे भी नहीं डरता । आप मुझे आज्ञा दें और मेरा पुरुषार्थ देखें ॥१८॥१९॥ इतना कहकर लवने माता तथा वाल्मीकिको प्रणाम किया। फिर उनका आशीर्वाद लेकर धनुष-बाण सहित एक स्थपर जा बैठे ओर उस अमरावतीकी ओर बड़े, जो बहुत दिनोंसे कान्तिहीन हो चुकी थी ॥२०।२१॥ बगीचेके एक कोस आगे ही लवने अपना रथ रोक दिया और पैदल ही बगीचेमें जा पहुँचे । दोपहरका समय था । बगीचेके रक्षक भोजन करनेके लिए अपने-अपने घर जा चुके थे। इसलिए लवको फूल लेनेमें कोई बाधा नहीं हुई फूल लेकर लवने अपने रथपर रखा और आश्रमकी ओर चल दिये ॥२२॥ २३॥ वहाँ पहुँचकर लवने माता और वाल्मीकिको प्रणाम करके फूलोंको सामने रखा । जानकीने भी प्रसन्नताके साथ व्रत प्रारम्भ किया ॥ २४॥ इस प्रकार सात दिन तक लव बराबर फूल ले गये, लेकिन रामके दूतोंको कुछ भी पता नहीं लगा। आठवें दिन अष्टमी तिथिको रोजकी तरह लव फिर वहाँ गये। रथको बाहर रोका और सरोवरमें पहुँचकर निर्भीक-भावसे फूल तोड़कर लाने लगे । संयोगवश उस दिन सिपाही लोग भोजन करके बगीचेमें पहुँच