श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 334, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ६ |
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गत्वाऽऽरामाच्च कासारं गृहीत्वाऽब्जानि निर्भयः। शनैर्यानद्रथं प्राप तावदारामापाऽऽययुः ॥२७॥ तं तु दृष्ट्वा लवं साब्जं पप्रच्छुर्विस्मयान्विताः। न त्वं दृष्टः कदाऽस्माभिः श्रीरामानुचरेषु हि॥२८॥ कदारभ्य रामसेवा त्वया चाङ्गीकृता वद । यत्त्वं निर्भयोऽब्जानि गृहीत्वा गच्छसि प्रभोः॥२९॥ रामदूतवचः श्रुत्वा विहस्याह लवोऽपि सः। वाल्मीक्यनुगोऽहं न रामदर्शनं मम ॥३०॥ दासोऽहं मुनिराजस्य वाल्मीकेः शुद्धचेतसः। तदाज्ञया वै नीयन्ते कमलानि मया मुदा ॥३१॥ इति तद्वचनं श्रुत्वा वाल्मीकीयं लवं तदा। ज्ञात्वा दूताः पारक्यं क्रोधाद्वचनमब्रुवन् ॥३२॥ रामसेवया न दृष्टोऽत्र न नः पृष्ट्व्वया पुनः । नाज्ञादत्ताऽपि रामेण नीयन्तेऽब्जानि प्रत्यहम् ॥३३। न ज्ञातमेतदस्माभिस्त्विदानीं तिष्ठ मा व्रज। अपराध्यसिरामस्य त्वां नेष्यामो वय प्रभोम् ॥३४॥ इत्युक्त्वा तस्य पन्थानं रुरुधु रामसेवकाः। चतुर्दश सशस्त्र स्ता समन्ता रामतो यदा ॥३५॥ तान्दृष्ट्वा स्यन्दनस्थ ह लवोऽप्याह विहस्य च । यूयं गच्छत श्रीरामं मद्वृत्तं ब्रूयमादरात् ॥३६॥ यद्यस्ति पौरुषं रामे तर्हि यास्यति मां प्रति । बालस्य वचनं श्रुत्वा कोपाद्द्ता वचोऽब्रुवन् ॥३७॥ कथ वत्स मर्तुकामस्त्वमित्थं वत्थसे मुधा । बद्ध्वा त्वां वयमेवाद्य विनेष्यामो रघूत्तमम् ॥३८। इत्युक्त्वा ते लव धतुं ययुस्तस्य रथांतिकम्। तान्दृष्ट्वा निकटं यामान् रामदूतान्लवोऽपि सः ॥३९॥ टणस्कृत्य महच्चापं शुणम्धाय वेगतः । अब्रवीत्तान्पुनर्वाक्यं माऽऽगन्तव्य ममान्तिकम्॥४०॥ मार्गेणैषुणा युष्मान् त्यजामि राघवन्तिके । इत्युक्त्वा तान्पुनर्रदृष्ट्वा ऽऽगच्छन्तान धतुं समुद्यतान् ॥४१॥ रवाशं शशिखड्गार्हस्तीक्ष्णाऽप्यच्चम्मंडपे । चतुर्दश रामदूता लवमार्गणताडिताः ॥४२॥ निपेतुर्मूच्छिताः सर्वे श्यामे जाह्नवीतटे । शतशो रामदूतास्ते दृष्ट्वा चक्रुः पलायनम् । ३॥ लवोऽपि विजयी शीघ्र पूर्ववन्स्वाश्रम ययौ । समर्प्याब्जानि सीतायै सर्व वृत्त न्यवेदयत् ॥४४॥
गये ॥ २५-२७॥ लवको फूल लिये देखकर विस्मयपूर्वक वे बोले—हमने कुल कभी रामचन्द्रजीके सेवकोंमें नहीं देखा है ॥ २८ ॥ तुमने कब नौकरी की है ? जो इस तरह निर्भय होकर कमलके फूल ले जा रहे हो ॥ २९ ॥ तब दूतोंकी बात सुनकर हंसते हुए लवने कहा—मैंने तो अभी तक रामको देखा भी नहीं है ॥ ३० ॥ रामका नहीं मैं महर्षि वाल्मीकिका सेवक हूँ । उन्हींके आज्ञानुसार मैं यहांसे फूल ले जाता हूँ। किन्तु तुमने आज ही हमको देखा है। इसके पहले कभी नहीं देख पाया ॥ ३१ ॥ इस तरह अपनेको वाल्मीकिका सेवक बतलानेपर दूतोंको समझमें आया कि यह कोई अजनबी मनुष्य है। यह जानत ही वे मारे क्रोधके तमतमा उठे। उन्होंने कहा—॥ ३२ ॥ तुमने न रामकी आज्ञा ली, न हम लोगोंसे पूछा और रोज फूल ले जाते हो ॥ ३३ । यह बात हमको मालूम नहीं थी । किन्तु, अब ठहरो । तुम रामचन्द्रजीके अपराधी हो । अतएव हम तुम्हें उनके पास ले चलेंगे। ३४ । ऐसा कहकर उन लोगोंने लवका रास्ता रोक लिया। जब एक सौ चौदह सशस्त्र सैनिकों ने लवको घेर लिया। तब लवने रथपर बैठे ही बैठे उनकी ओर देख तथा हँसकर कहा तुम लोग रामके पास जाकर हमारा वृत्तान्त कहो । ३५ ॥ यदि राममे कुछ सामर्थ्य होगी तो वे स्वयं मेरे सामने आयेंगे एक पाँच वर्षके बच्चेकी ऐसी बातें सुनकर दूतोंने कोधपूर्वक कहा—॥३६॥३७॥ हे बच्चे ! तुम क्यों मरना चाहते हो, जो ऐसी बढ़-चढ़कर बातें करत हो ? तुमको बाँधकर हमीं लोग उनके पास अभी लिये चलते हैं । ३८ । ऐसा कहकर लवको पकड़नेके लिए कई दूत आगे बढ़े। उनकी निकट देखकर लवने तुरन्त अपने धनुषका टंकोर करके उसपर एक बाण चढ़ाया और उनसे कहा—सावधान ! मेरे पास न आना ॥ ३९ ॥ ४० ॥ नहीं मानोगे तो मैं इसी धनुष और बाणसे तुम लोगोंको उठाकर रामके पास फेंक दूँगा। ऐसा कहकर लवने देखा कि वे लोग फिर भी उन्हें पकड़नेका प्रयत्न कर रहे हैं ॥४१॥ ऐसी दशामें लवने बाणोंसे दूतोंको उठाकर फेंका और वे गङ्गाके समीप रामकरे यज्ञका कार्यमें मूर्छित होकर जा गिरे। इस प्रकार लवका पराक्रम देखकर रामके जो सैकड़ों सैनिक वहाँ बचे थे, वे सब इधर-उधर भाग गये ॥ ४२ ॥४३॥ सब विजयी होकर वे अपने आश्रमकी ओर बढ़े। वहाँ पहुंचकर लवने कमल