भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 335, कुल 811 में से

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पृष्ठ 335

सर्गः १ ] अगम्यकाण्डम् ११९


चतुर्दश रामदूताः स्वस्थचित्ताश्चिरेण ते । सर्वं वृत्तं राघवाय कथयामासुरादरात् ॥४५॥
तच्छ्रुत्वा रामचन्द्रोऽपि विस्मयाविष्टमानसः । सहस्रदूतानामगमद्वनस्यार्थे प्रबोधवत् ॥४६॥
लवोऽप्यथ नवम्यां स साकेतं पुरंन्वयौ । भट्यं रामदूतास्ते तत्र योद्धुं समुद्यताः ॥४७॥
लवस्तानाह युष्माकं स्वामिना रावणेन हि । यदा सीता वने त्यक्ता जयश्रीश्च गता तदा ॥४८॥
युष्माकं राघवस्यापि गच्छध्वं राघवं पुनः । युष्माभिर्मा मया युद्धं कर्तव्यं मरणोन्मुखैः ॥४९॥
सीताशयायैतु युष्माकं स्वामिनः पौरुषं न हि । इति ते लववाग्बाणैर्भिन्नामर्मस्थलास्तदा ॥५०॥
दूताः शस्त्राणि मुमुचुर्लवोपरि महात्मनैः । लवेोऽपि बाणमाकृत्य रामदूतान्स्वमार्गजैः ॥५१॥
प्रक्षिपत्पूर्ववद्रामं तच्छत्रौघं निवार्य च । अह्नायतो यदा दूताश्शक्रुः सर्वं पलायनम् ॥५२॥
ययौ लवः स विजयी पुष्पसञ्चयलान्वितः । आश्रमं मातरं नत्वा सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥५३॥
पुत्रस्य पौरुषं श्रुत्वा तुतोष जानकी तदा । भुवि निवेदयामासु रामदूता रघूत्तमम् ॥५४॥
मूर्च्छा लवशरैः प्राप्ता भिन्नदेहा मग्नांगणे राम राम महाबाहो शृणुष्वापूर्वमादरात् ॥५५॥
पञ्चवर्षवयस्केन वयमद्य पराजिताः । वाल्मीकेर्भटपुत्रिणः स न जेयो लक्ष्मणादिभिः ॥५६॥
तद्वधे मंत्रयस्वाद्य त्वमुपायं रघूत्तम । सीतात्यागादिवचनैर्नास्तथापि च बालकः ॥५७॥
चकार निंदां श्रीराम गतभीस्त्वेक एव यः । तेषां वचनंवृत्तं कृत्स्नमाकर्ण्य राघवः ॥५८॥
मंत्रय्य सचिवैर्दूतं वाल्मीकि प्रेषयज्जवान् । नत्वा मुनिं रामदूतो रामवाक्यं न्यवेदयत् ॥५९॥
यस्ते शिष्यो महावीरः सोऽपराध्यस्ति वै मम । तं प्रेषयाथवा तेन त्वमागच्छत्व सन्मुखम् ॥६०॥


सीताको दिया और उस दिनका सारा हाल कह सुनाया ॥४४॥ जो दूत रामको यज्ञशालामें गिरे थे, वे बहुत देर तक मूर्छित पड़े रहे। जब चेतना आयी, तब सादर उन्होंने रामको लवका सब समाचार सुनाया ॥४५॥ सो सुनकर रामचन्द्रजीको भी बड़ा आश्चर्य हुआ; उन्होंने फिरसे एक हजार दूतोंको बगीचेकी रखवालीके लिए नियुक्त कर दिया ॥ ४६ ॥ दूसरे दिन अर्थात् नवमीको लव फिर फूल लेनेके लिए बगीचेमें जा पहुंचे। सबने दूतोंको देखकर कहा कि जिस दिन तुम्हारे प्रभु रामने सीताको वनमें भेज दिया उसी दिन उनकी जयश्री भी बिदा हो गयी ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ तुम्हें चाहिए कि तुम रामके पास जाकर लड़ाई करनेसे इनकार कर दो। तुम मरणोन्मुख हो। अतएव मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे साथ युद्ध करूँ ॥ ४९ ॥ सीतापने त्यागनेवाले तुम्हारे प्रभु रामके साथ संग्राम करना मुझे उचित नहीं जँचता इस प्रकार लवके वचनरूपी बाणोंसे सैनिकोंके हृदय विदीर्ण हो गये ॥५०॥ तब उन्होंने लवपर बाणवर्षा आरम्भ कर दी। उधर लवने भी अपने बाणोंसे सैनिकोंके प्रहार बचाते हुए अपने बाणोंसे उनको उठा-उठाकर रामके पास फेंकना आरम्भ किया। थोड़ी देरमे ही सब दूत बगीचा छोड़ छड़कर भाग निकले। तब लव अपनेको विजयी जानते हुए रोजकी तरह फूल लेकर आश्रमको लौट गये। वहाँ पहुंचकर लवने सीता माताको प्रणाम किया और उस दिनका भी सारा हाल सुनाया ॥ ५१-५३ ॥ बेटाका पुरुषार्थ सुनकर सीता परम प्रसन्न हुईं। इधर रामचन्द्रके दूतोंने रामके पास जाकर सब अपनी आपबीती कह सुनायी ॥ ५४॥ जिनको लवने अपने बाणसे उठाकर रामके पास फेंका था, वे लोग घायल होकर बहुत देर तक मूर्छित अवस्थाम ही पड़े रहे। बाद होशमें आने तो कहने लगे हे राम ! हे महाबाहो ! मैं जो कह रहा हूँ, उसे तनिक ध्यान देकर सुनिए। आज हम सब बाल्मीकिके एक शिष्यसे, जिनकी अवस्था अभी पाँच वर्षकी है, परास्त हो गये। मेरा तो यहाँतक विश्वास है कि आपके अलावा लक्ष्मण आदि भी उसे नहीं हरा सकते। ५५ ॥ ५६ ॥ हे रघूत्तम ! उसे मारनेके लिए आप कोई उपाय कीजिए। सीतात्याग आदिकी बातें दुहराकर उस एकाकी बालकने हमारी और आपकी भी भरपूर निन्दा की है। उनकी बातें सुनी तो मंत्रियोंसे परामर्श करके रामने तुरंत कई दूतोंको बाल्मीकिके आश्रमपर भेजा। वे दूत बाल्मीकिके पास पहुंचे और उन्हें प्रणाम करके रामका सन्देश इस तरह सुनाने लगे ॥ ५७-५९ ॥ रामचन्द्रने कहा है कि आपका महावीर शिष्य लव हमारा अपराधी है। उसे या तो हमारे